15 अगस्त की रोशनी और 14 अगस्त का अंधेरा ; वह सवाल, जिसका जवाब इतिहास मांगता है

संपादक अनिल अनूप की तस्वीर के साथ भारत विभाजन विभीषिका 1947, विस्थापन, स्वतंत्रता दिवस और तिरंगे को दर्शाती संपादकीय फीचर इमेज।

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संपादक अनिल अनूप

भारत के आधुनिक इतिहास में 14 और 15 अगस्त केवल कैलेंडर की दो तारीखें नहीं हैं। ये दो ऐसे दिन हैं जिनके बीच भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा राजनीतिक परिवर्तन, सबसे गहरी मानवीय त्रासदी और स्वतंत्रता की सबसे बड़ी कीमत दर्ज है। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन उस स्वतंत्रता के साथ देश का विभाजन भी हुआ। इसलिए आजादी का उत्सव जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उन लाखों लोगों को याद करना भी है, जिन्होंने विभाजन की हिंसा में अपने घर, परिवार, संपत्ति और जीवन तक खो दिए।

स्वतंत्रता की कहानी को केवल सत्ता हस्तांतरण की कहानी मानना इतिहास को बहुत छोटा कर देना होगा। यह कहानी लंबे राजनीतिक संघर्ष, जनआंदोलनों, क्रांतिकारी गतिविधियों, सैनिक असंतोष, द्वितीय विश्वयुद्ध से कमजोर हुए ब्रिटिश साम्राज्य और अंततः भारतीय नेताओं के कठिन राजनीतिक निर्णयों से मिलकर बनी थी। इसमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. भीमराव आंबेडकर, मोहम्मद अली जिन्ना, सुभाषचंद्र बोस और असंख्य ज्ञात-अज्ञात भारतीयों की भूमिकाएं थीं। इतिहास की गंभीरता इसी में है कि उसमें किसी एक व्यक्ति या एक संगठन को संपूर्ण सत्य का अकेला वाहक मान लेना उचित नहीं।

आजादी के साथ विभाजन क्यों आया?

1947 का विभाजन अचानक घटित घटना नहीं था। उसके पीछे कई दशकों में विकसित हुई राजनीतिक परिस्थितियां थीं। ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज की विविधताओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व की अलग-अलग व्यवस्थाओं में बांटा। 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों से अलग निर्वाचन व्यवस्था को संस्थागत रूप मिला और आगे चलकर सामुदायिक राजनीतिक पहचानें और मजबूत हुईं। 1932 का कम्यूनल अवॉर्ड, प्रांतीय राजनीति, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच बढ़ता अविश्वास तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी—इन सभी ने मिलकर परिस्थितियों को जटिल बनाया।

यह कहना सरल होगा कि केवल किसी एक नेता, किसी एक समुदाय या किसी एक राजनीतिक दल के कारण विभाजन हुआ। लेकिन इतिहास इससे कहीं अधिक पेचीदा है। विभाजन के लिए ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियां जिम्मेदार थीं, तो भारतीय राजनीति के भीतर बढ़ती असहमति और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण भी महत्वपूर्ण कारक थे। मुस्लिम लीग ने अलग राष्ट्र की मांग को राजनीतिक आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बनाया और 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद पाकिस्तान की मांग अधिक स्पष्ट होती गई। दूसरी ओर कांग्रेस अखंड भारत की समर्थक थी, लेकिन 1947 तक वह विभाजन को रोक पाने की स्थिति में नहीं रह गई थी।

द्वितीय विश्वयुद्ध ने ब्रिटेन की आर्थिक और सामरिक शक्ति को गहरा आघात पहुंचाया। युद्ध के बाद ब्रिटेन के लिए भारत पर पुराना औपनिवेशिक नियंत्रण बनाए रखना कठिन होता जा रहा था। 1946 का नौसैनिक विद्रोह, सैनिक असंतोष, आजाद हिंद फौज के मुकदमों से उत्पन्न जनभावना और देशव्यापी राजनीतिक दबाव ने भी ब्रिटिश शासन को यह संकेत दिया कि भारत को लंबे समय तक उसी तरीके से नियंत्रित करना संभव नहीं होगा।

इसी पृष्ठभूमि में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया तेज हुई। माउंटबेटन योजना ने विभाजन का रास्ता प्रशस्त किया और भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के माध्यम से भारत तथा पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन बने।

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क्या कांग्रेस के सामने कोई आसान रास्ता था?

यह प्रश्न आज भी इतिहासकारों और राजनीतिक चिंतकों के बीच बहस का विषय है। यह कहना कि कांग्रेस ने केवल सत्ता पाने की अधीरता में विभाजन स्वीकार कर लिया, एक राजनीतिक व्याख्या हो सकती है, लेकिन इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा।

कांग्रेस नेतृत्व के सामने वास्तविक संकट था। एक ओर अखंड भारत की आकांक्षा थी, दूसरी ओर बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा, प्रशासनिक विघटन और सत्ता हस्तांतरण में देरी का खतरा। 1946-47 में बंगाल, बिहार, पंजाब और अन्य क्षेत्रों में हिंसा ने परिस्थितियों को भयावह बना दिया था। पंजाब में स्थिति इतनी विस्फोटक हो चुकी थी कि एक संयुक्त प्रशासन के भीतर शांति स्थापित करना कठिन होता जा रहा था।

डॉ. आंबेडकर ने भी विभाजन के प्रश्न पर गंभीर चिंतन किया था। उनकी पुस्तक Pakistan or the Partition of India इस पूरे प्रश्न की जटिलताओं को समझने के लिए आज भी महत्वपूर्ण स्रोत है। आंबेडकर जनसंख्या के संभावित स्थानांतरण और उसके परिणामों पर विचार करते थे। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि बड़े पैमाने पर जनसंख्या विनिमय अपने आप में कोई मानवीय समाधान नहीं था। 1947 में जो हुआ, उसने साबित कर दिया कि ऐसी प्रक्रिया कितनी भयावह हो सकती है।

स्वतंत्रता की आधी रात और सीमा के उस पार का अंधेरा

15 अगस्त की आधी रात को भारत स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा था। दिल्ली में उत्सव का वातावरण था, संसद भवन में स्वतंत्रता का ऐतिहासिक क्षण आकार ले रहा था और दूसरी ओर पंजाब तथा बंगाल के अनेक हिस्से हिंसा की आग में जल रहे थे। यही विभाजन की सबसे बड़ी विडंबना थी—एक ही समय में स्वतंत्रता का जन्म और मानवीय त्रासदी का विस्तार।

लाखों लोग विस्थापित हुए। परिवार बिछड़े। ट्रेनें शरणार्थियों से भरीं और अनेक ट्रेनें मौत की खबर लेकर पहुंचीं। महिलाओं के साथ भयावह हिंसा हुई। बच्चों ने अपने माता-पिता खोए और पीढ़ियों से बसे घर कुछ ही दिनों में पराए हो गए। इतिहासकारों के आकलन अलग-अलग हैं, लेकिन व्यापक रूप से माना जाता है कि विभाजन के दौरान लगभग एक करोड़ से डेढ़ करोड़ तक लोग विस्थापित हुए और हिंसा में लाखों लोग मारे गए।

इसलिए विभाजन को केवल नक्शे पर खींची गई सीमा के रूप में देखना उस त्रासदी की गंभीरता को कम करना है। यह मानव इतिहास के सबसे बड़े जबरन विस्थापनों में से एक था।

‘दस लाख’ का आंकड़ा और इतिहास की जिम्मेदारी

विभाजन में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान मिलते हैं। कई लोकप्रिय लेखों में दस लाख या उससे अधिक मौतों का उल्लेख मिलता है। इसलिए किसी एक संख्या को अंतिम और निर्विवाद मानने के बजाय यह समझना अधिक उचित है कि मृतकों की सही संख्या आज भी निश्चित नहीं है।

लेकिन संख्या चाहे जो हो, प्रत्येक मृतक एक मनुष्य था—किसी का पिता, किसी की मां, किसी का भाई, किसी की बेटी। इसलिए विभाजन की स्मृति किसी समुदाय के विरुद्ध आरोपपत्र नहीं, बल्कि मानवता के पक्ष में चेतावनी होनी चाहिए।

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इसी दृष्टि से 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में याद किया जाना महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता का उत्सव और विभाजन के पीड़ितों की स्मृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बल्कि दोनों को साथ रखकर ही 1947 की पूरी तस्वीर समझी जा सकती है।

क्या विभाजन केवल हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की कहानी थी?

नहीं। यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उत्तर उतना ही जटिल है। भारत का सामाजिक इतिहास हिंदू, मुस्लिम, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और अनेक स्थानीय समुदायों के सहअस्तित्व से बना है। भारतीय मुसलमानों को केवल ‘अरब’, ‘तुर्क’, ‘मुगल’ या किसी एक विदेशी मूल से जोड़कर देखना भी ऐतिहासिक और सामाजिक वास्तविकता का सरलीकरण है। भारतीय मुसलमानों की विशाल आबादी की जड़ें इसी उपमहाद्वीप में हैं। धर्म परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं ने भारतीय समाज को अनेक स्तरों पर बदला, लेकिन किसी समुदाय की वर्तमान पहचान को केवल वंशावली से निर्धारित नहीं किया जा सकता।

इसीलिए ‘एटीएम’ जैसी श्रेणियों के आधार पर पूरे मुस्लिम समाज को समझना इतिहास के बजाय राजनीतिक सरलीकरण बन सकता है। यह जरूर अध्ययन का विषय है कि दक्षिण एशिया के मुस्लिम समाज में जाति, वंश, सामाजिक प्रतिष्ठा और अशराफ-पसमांदा संबंधों ने किस प्रकार सामाजिक संरचनाओं को प्रभावित किया। लेकिन इस विमर्श को किसी समुदाय के प्रति सामूहिक घृणा या ऐतिहासिक दोषारोपण में बदल देना उस सामाजिक जटिलता के साथ न्याय नहीं होगा।

इसी तरह जिन्ना की राजनीति को केवल किसी गुप्त षड्यंत्र का परिणाम मानना भी पर्याप्त ऐतिहासिक व्याख्या नहीं है। जिन्ना ने अपने राजनीतिक जीवन में अलग-अलग चरणों में अलग राजनीतिक दृष्टिकोण अपनाए। पाकिस्तान की मांग कई राजनीतिक परिस्थितियों, प्रतिनिधित्व की चिंताओं, सत्ता-साझेदारी की असफलताओं और साम्प्रदायिक राजनीति के बढ़ते प्रभाव से बनी। ब्रिटिश नीति ने इन विभाजनों को गहरा किया, लेकिन भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की अपनी रणनीतियों और सीमाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

नेताजी और 1940 के दशक का बदलता भारत

सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिंद फौज का प्रभाव भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। आजाद हिंद फौज सैन्य दृष्टि से ब्रिटिश शासन को पराजित नहीं कर सकी, लेकिन उसके सैनिकों पर चले मुकदमों ने भारतीय जनमानस में गहरी प्रतिक्रिया पैदा की। 1946 के नौसैनिक विद्रोह और अन्य सैनिक असंतोषों ने भी ब्रिटिश शासन की चिंता बढ़ाई।

यह कहना कि स्वतंत्रता केवल किसी एक आंदोलन या किसी एक नेता की देन थी, इतिहास को संकुचित करना होगा। स्वतंत्रता अनेक धाराओं के संघर्ष का परिणाम थी—अहिंसक जनआंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियां, श्रमिक और किसान आंदोलनों, सैनिक असंतोष, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और ब्रिटिश साम्राज्य की आर्थिक कमजोरी ने मिलकर उस ऐतिहासिक क्षण को जन्म दिया।

आठ दशक बाद सबसे बड़ा प्रश्न

विभाजन के लगभग आठ दशक बाद हमें यह पूछना चाहिए कि 1947 से हमने क्या सीखा? क्या भारत और पाकिस्तान के लोगों ने यह समझ लिया है कि नफरत की राजनीति अंततः आम नागरिक को ही सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती है? क्या हमने यह स्वीकार किया है कि धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक भय पैदा करना आसान है, लेकिन उसका परिणाम पीढ़ियों तक भुगतना पड़ता है? क्या हम यह समझ पाए हैं कि किसी समुदाय के भीतर सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव या सत्ता-संबंधों की आलोचना और पूरे समुदाय को दोषी ठहराना दो अलग बातें हैं?

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भारत में पसमांदा मुस्लिम विमर्श सामाजिक न्याय के प्रश्नों को सामने लाता है। पाकिस्तान में बलोच, सिंधी, पश्तून और अन्य समूह अपने अधिकारों और पहचान के सवाल उठाते रहे हैं। इन सबका अध्ययन आवश्यक है, लेकिन इन्हें सीधे 1947 के किसी एक ‘षड्यंत्र’ का प्रमाण मानना इतिहास की जटिलता को कम करना होगा। वास्तविक चुनौती यह है कि दक्षिण एशिया अपने अतीत से प्रतिशोध नहीं, विवेक सीखे।

विभाजन की रेखा मिटाने का अर्थ क्या है?

विभाजन की भौगोलिक रेखा मिटाने की बात भावनात्मक रूप से आकर्षक हो सकती है, लेकिन उसका वास्तविक अर्थ केवल सीमाओं को बदलना नहीं होना चाहिए। यदि विभाजन के बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो सबसे पहले उन मानसिक सीमाओं को कम करना होगा, जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करती हैं।

धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर घृणा को राजनीति का स्थायी हथियार बनने से रोकना होगा। इतिहास को न तो भुलाना चाहिए और न ही उसे प्रतिशोध का औजार बनाना चाहिए।

14 अगस्त हमें पीड़ा याद दिलाता है। 15 अगस्त हमें स्वतंत्रता का अर्थ याद दिलाता है। इन दोनों को साथ रखकर देखने पर एक गहरी बात सामने आती है—स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति का नाम नहीं है। स्वतंत्रता भय से मुक्ति भी है, घृणा से मुक्ति भी है और उस मानसिकता से मुक्ति भी है जो पड़ोसी को शत्रु बना देती है।

1947 के लाखों विस्थापितों और मृतकों के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम इतिहास को ईमानदारी से पढ़ें। जहां अन्याय हुआ, उसे स्वीकार करें; जहां राजनीतिक भूलें हुईं, उन्हें पहचानें; जहां औपनिवेशिक नीतियों ने विभाजन को बढ़ाया, उन्हें समझें; और जहां भारतीय नेतृत्व से चूक हुई, वहां भी प्रश्न पूछने से न डरें।

आजादी का उत्सव तभी पूर्ण होगा, जब उसके साथ विभाजन की पीड़ा की स्मृति भी जीवित रहे। 14 अगस्त और 15 अगस्त इसलिए एक-दूसरे के विरोधी दिन नहीं, बल्कि एक ही ऐतिहासिक अनुभव के दो पक्ष हैं।

भारत आजाद हुआ—यह हमारे इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में है। भारत विभाजित हुआ—यह हमारी सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। इन दोनों सत्यों को एक साथ स्वीकार करना ही परिपक्व इतिहासबोध है।

इतिहास हमसे बदला नहीं मांगता; वह स्मृति, विवेक और चेतना मांगता है। यदि विभाजन की विभीषिका हमें यह सिखा सके कि राजनीतिक असहमति को मानवीय दुश्मनी में बदलना कितना महंगा पड़ता है, तो शायद 1947 के उन अनगिनत अनाम बलिदानों की स्मृति सचमुच सार्थक होगी।

और शायद तब 14 अगस्त केवल शोक का दिन नहीं रहेगा—वह उस संकल्प का दिन भी बनेगा कि आने वाली पीढ़ियों को फिर कभी ऐसी विभीषिका का सामना न करना पड़े।

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Author: यायावर

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