बलरामपुर से दुर्गा प्रसाद शुक्ला की चिट्ठी
प्रिय संपादक जी,
राम-राम!
आज यह चिट्ठी लिखने बैठा हूं तो सबसे पहले राप्ती नदी याद आ रही है। नदी के किनारे बसे शहरों की अपनी एक अलग प्रकृति होती है। पानी केवल खेतों को नहीं सींचता, वह लोगों की भाषा, उनके स्वभाव और उनकी स्मृतियों में भी उतरता है। बलरामपुर भी ऐसा ही जिला है—जहां देवीपाटन की आस्था है, सुहेलवा की हरियाली है, खेतों में मेहनत करता किसान है और सीमांत इलाके की अपनी बेचैनियां भी हैं।
बलरामपुर को दूर से देखने वाला शायद इसे उत्तर प्रदेश के नक्शे पर नेपाल सीमा के पास बसा एक जिला भर समझे, लेकिन यहां कुछ दिन ठहरकर देखिए तो मालूम होगा कि इस जिले की कहानी बहुत बड़ी है।
यहां सुबह गांव की पगडंडी से शुरू होती है और शाम किसी चौराहे की चाय की दुकान पर देश-दुनिया की चर्चा करते लोगों के बीच उतरती है। कोई धान की चिंता कर रहा है, कोई खाद की। कोई अपने बच्चे को पढ़ाकर शहर भेजना चाहता है तो कोई चाहता है कि गांव में ही ऐसा काम मिले कि बेटे को रोजी के लिए परदेस न जाना पड़े। बलरामपुर की असली कहानी इन्हीं छोटे-छोटे सवालों में छिपी हुई है।
किसान के हाथ में फसल है, लेकिन चिंता भी है
इन दिनों जिले में किसानों की बड़ी चिंताओं में खाद की उपलब्धता भी शामिल है। गैसड़ी में किसानों ने यूरिया की किल्लत और वितरण व्यवस्था को लेकर प्रदर्शन किया। किसानों का कहना था कि जरूरत के समय खाद उपलब्ध नहीं हो पा रही और उन्हें बार-बार कागजी प्रक्रिया तथा तारीखों के बीच दौड़ना पड़ रहा है। साहब, किसान की परेशानी को आंकड़ों में समझना आसान है, उसके चेहरे पर पढ़ना मुश्किल।
जिस किसान ने महीनों खेत तैयार किया हो, बीज डाला हो, पानी का इंतजाम किया हो, उसके लिए खाद की एक बोरी केवल खाद की बोरी नहीं होती। उसमें उसकी फसल, घर का खर्च, बच्चे की पढ़ाई और अगले मौसम की उम्मीद बंधी होती है। इसलिए खाद की उपलब्धता का सवाल केवल कृषि विभाग की व्यवस्था का सवाल नहीं है। यह किसान के भरोसे का सवाल भी है।
सरकारें योजनाएं बनाती हैं और अधिकारी व्यवस्थाएं करते हैं, लेकिन गांव का किसान आखिर में यह देखता है कि उसे जरूरत के समय सुविधा मिली या नहीं।
विकास की तस्वीर गांव तक कितनी पहुंची?
बलरामपुर में विकास के काम हो रहे हैं। गांवों की योजनाओं को ई-ग्राम स्वराज जैसे डिजिटल माध्यमों से आगे बढ़ाने की कोशिश है। हालांकि तकनीकी अड़चनों के कारण ग्राम पंचायतों की योजनाओं को लेकर समय-सीमा बढ़ाने की जरूरत भी सामने आई।
यह बात छोटी लग सकती है, लेकिन गांव के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। कागज पर स्वीकृत सड़क और गांव में बनी सड़क में फर्क होता है। फाइल में दर्ज नाली और बरसात में पानी निकालती नाली में फर्क होता है। योजना में लिखा विद्यालय और वास्तव में बच्चों से भरा विद्यालय—इन दोनों के बीच भी फर्क होता है। बलरामपुर को अब इसी फर्क को कम करना है।
लेकिन संपादक जी, गांव की पंचायत व्यवस्था की चर्चा करते हुए एक दूसरा प्रसंग भी याद आता है। यह प्रसंग बलरामपुर का नहीं, बल्कि इसी अंचल के गोंडा जिले के दुल्हापुर बनकट का है। इसे यहां इसलिए याद कर रहा हूं कि गांव की पंचायत व्यवस्था और आम आदमी के सरकारी कागजों से जुड़ी परेशानियां किसी एक जिले की कहानी नहीं हैं।
दुल्हापुर बनकट से आती एक छोटी-सी बड़ी कहानी
दुल्हापुर बनकट में इन दिनों एक महिला ग्राम प्रधान कुमारी देवी को लेकर भी एक प्रसंग चर्चा में बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि उनके पति का निधन कई वर्ष पहले हो चुका है, लेकिन अब किसी आवश्यक काम के लिए उनके मृत्यु प्रमाणपत्र की जरूरत आन पड़ी है। विडंबना यह है कि जिस महिला के पास गांव के लोगों के सरकारी कामों और पंचायत से जुड़े मामलों को देखने की जिम्मेदारी है, वही अपने दिवंगत पति के मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए परेशान बताई जा रही हैं। बात केवल एक मृत्यु प्रमाणपत्र की नहीं है।
पुराने सरकारी दस्तावेजों की जरूरत जब वर्षों बाद पड़ती है तो आम परिवार को कितनी कठिनाइयों से गुजरना पड़ सकता है, इसका अंदाजा ऐसे प्रसंगों से लगाया जा सकता है। संभव है कि पुराने अभिलेखों के सत्यापन या प्रक्रिया संबंधी किसी कारण से विलंब हो रहा हो। इसलिए किसी अधिकारी या कर्मचारी पर बिना तथ्य आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल फिर भी अपनी जगह है— यदि एक निर्वाचित महिला प्रधान को अपने परिवार के जरूरी दस्तावेज के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है तो सामान्य ग्रामीण की स्थिति क्या होगी? और दुल्हापुर बनकट की चर्चा केवल इस प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं बताई जाती।
प्रधान कौन, पंचायत का काम कौन?
गांव में पंचायत के कामकाज को लेकर एक और चर्चा सुनने को मिलती है। ग्रामीणों के बीच यह बात कही जाती है कि महिला प्रधान कुमारी देवी के पीछे एक प्रभावशाली परिवार के पिता-पुत्र की सक्रिय भूमिका रहती है और पंचायत से जुड़े अनेक कामों में उनकी दखल दिखाई देती है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि प्रधान का बहुत-सा काम भी वही लोग संभालते हैं और यहां तक चर्चा है कि प्रधान को अपने कामकाज की पूरी जानकारी तक नहीं रहती।
इन बातों को हम ग्रामीण चर्चाओं और स्थानीय दावों के रूप में ही देखेंगे। केवल चर्चा के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं है। लेकिन यदि ऐसी चर्चा लगातार हो रही है तो उसका सच सामने आना भी जरूरी है।
ग्राम प्रधान जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि है। पंचायत के निर्णय, विकास कार्य, अभिलेख, भुगतान और योजनाओं से जुड़े अधिकार और जिम्मेदारियां निर्धारित हैं। यदि किसी दूसरे व्यक्ति की भूमिका केवल सहयोग तक सीमित है तो बात स्पष्ट हो सकती है। लेकिन यदि किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा निर्वाचित प्रधान के अधिकारों में अनधिकृत हस्तक्षेप किया जा रहा है तो यह प्रशासन के लिए जांच का विषय होना चाहिए।
दुल्हापुर बनकट में इन बातों को लेकर चर्चा और कुचर्चा दोनों होने की बातें सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन ने कभी इस चर्चा की वास्तविकता जानने की कोशिश की?
यदि शिकायत है तो जांच होनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं तो स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। यदि कोई अनियमितता है तो कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि सब कुछ नियम के अनुसार है तो ग्रामीणों को भी सच बताया जाना चाहिए। चुप्पी किसी आरोप को सच नहीं बनाती, लेकिन लगातार बनी चुप्पी अफवाहों को जरूर लंबा जीवन देती है।
दुल्हापुर बनकट का यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि पंचायत लोकतंत्र की सबसे पहली पाठशाला है। गांव का आदमी सरकार को सबसे पहले पंचायत के दरवाजे पर ही देखता है।
शहर की तस्वीर भी बदलनी चाहिए, गांव की भी
बलरामपुर में शहर के प्रमुख चौराहों के सौंदर्यीकरण, नालों की सफाई और यातायात व्यवस्था को बेहतर करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन बलरामपुर की खूबसूरती केवल चौराहों से नहीं बनेगी।
असली खूबसूरती तब होगी जब गांव की सड़क पर चलते किसान को लगे कि उसका रास्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शहर का मुख्य मार्ग।
जब किसी ग्रामीण को प्रमाणपत्र के लिए अनावश्यक चक्कर न लगाने पड़ें। जब पंचायत की बैठक में ग्रामीण की आवाज सुनी जाए। जब सरकारी योजना का लाभ कागज से निकलकर वास्तविक लाभार्थी तक पहुंचे। और जब ग्राम प्रधान अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के साथ वास्तव में पंचायत का नेतृत्व कर सके।
देवीपाटन की घंटियों से सुहेलवा की हरियाली तक
बलरामपुर की पहचान उसकी धार्मिक और प्राकृतिक विरासत से भी है। तुलसीपुर का देवीपाटन मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है। जिले की पर्यटन पहचान में सुहेलवा वन्यजीव क्षेत्र, कोइलाबास, जयप्रभाग्राम और दूसरे स्थल भी शामिल हैं।
सोचिए, किसी जिले के पास एक तरफ आस्था का इतना बड़ा केंद्र हो और दूसरी तरफ प्राकृतिक संपदा—तो पर्यटन यहां केवल घूमने-फिरने का विषय नहीं रह जाता। यह रोजगार का माध्यम बन सकता है। स्थानीय नौजवानों के लिए छोटे होटल, भोजनालय, हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पाद, परिवहन और गाइड सेवाओं में अवसर पैदा किए जा सकते हैं। बलरामपुर के पास अपनी पहचान दुनिया तक पहुंचाने के लिए बहुत कुछ है। जरूरत केवल इतनी है कि उस पहचान को व्यवस्थित ढंग से दुनिया तक पहुंचाया जाए।
चीनी मिल की सीटी और गांव की अर्थव्यवस्था
बलरामपुर की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व बहुत बड़ा है। जिले की आधिकारिक जानकारी में बलरामपुर चीनी मिल को देश के बड़े चीनी उद्योगों में शामिल बताया गया है। साथ ही जिले को आकांक्षी जिलों में भी रखा गया है। यहां खेत और उद्योग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
किसान गन्ना उगाता है, मिल उसे खरीदती है, मजदूर काम करता है, ट्रैक्टर चलता है, परिवहन चलता है और बाजार में पैसा आता है। यानी खेत की फसल केवल किसान की आमदनी नहीं बनाती, वह पूरे स्थानीय बाजार को गति देती है। इसीलिए बलरामपुर के विकास की चर्चा में किसान और उद्योग को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।
सीमांत जिला है, लेकिन सपने सीमित नहीं
नेपाल की सीमा के करीब होना बलरामपुर की भौगोलिक पहचान का हिस्सा है। राप्ती के किनारे बसा यह जिला देवीपाटन मंडल और ऐतिहासिक अवध क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है। सीमांत जिलों की अपनी चुनौतियां होती हैं।
यहां सड़क, बाजार, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की सुविधाओं का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि लोगों को बेहतर अवसरों के लिए दूर जाना पड़ता है।
बलरामपुर का युवा आज मोबाइल पर दुनिया देखता है। वह जानता है कि लखनऊ क्या है, दिल्ली क्या है, मुंबई क्या है। वह यह भी जानता है कि दूसरे शहरों में रोजगार के कितने अवसर हैं।
इसलिए अब गांव के युवा को केवल यह कहकर नहीं रोका जा सकता कि गांव में रहो। उसे गांव में रहने का कारण देना होगा।
उसे शिक्षा चाहिए। उसे रोजगार चाहिए। उसे इंटरनेट चाहिए। उसे बाजार चाहिए। और सबसे बढ़कर उसे यह भरोसा चाहिए कि उसकी मेहनत की कीमत उसके अपने जिले में भी है।
बलरामपुर को केवल पिछड़े जिले के रूप में मत देखिए
बलरामपुर के सामने चुनौतियां हैं, यह सच है। लेकिन किसी जिले को केवल उसकी कमियों से पहचानना भी उचित नहीं। बलरामपुर की मिट्टी में संभावना है। यहां कृषि है, धार्मिक पर्यटन है, प्राकृतिक संपदा है, चीनी उद्योग है और मेहनतकश आबादी है।
जिले की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार यहां 801 ग्राम पंचायतें और 1017 गांव हैं। यानी विकास की वास्तविक तस्वीर शहर के कुछ चौराहों से नहीं, इन गांवों की स्थिति से तय होगी।
अगर इन गांवों में शिक्षा मजबूत होती है, स्वास्थ्य सुविधाएं सुधरती हैं, किसानों को समय पर कृषि इनपुट मिलता है, सड़कों और सिंचाई की व्यवस्था बेहतर होती है और स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलते हैं तो बलरामपुर की तस्वीर तेजी से बदल सकती है।
संपादक जी,
बलरामपुर की चिट्ठी लिखते हुए मुझे बार-बार लगता है कि यह जिला किसी शिकायत की किताब नहीं, बल्कि संभावनाओं की अधूरी कहानी है। यहां समस्याएं हैं, लेकिन उनके साथ समाधान की जमीन भी है। किसान परेशान है, मगर खेत छोड़ना नहीं चाहता।
युवा रोजगार चाहता है, मगर अपनी मिट्टी से रिश्ता भी नहीं तोड़ना चाहता। श्रद्धालु देवीपाटन आता है, पर्यटक सुहेलवा देख सकता है और बाहर से आने वाला व्यक्ति बलरामपुर की संस्कृति को जान सकता है। बस जरूरत है—व्यवस्था और संभावना के बीच की दूरी कम करने की।
किसी भी जिले का विकास केवल बड़े भवनों और चमकते चौराहों से नहीं मापा जाता। वह उस किसान की मुस्कान से मापा जाता है जिसे खाद के लिए लाइन में परेशान न होना पड़े। उस ग्रामीण के भरोसे से मापा जाता है जिसे अपने जरूरी प्रमाणपत्र के लिए दफ्तरों की भूलभुलैया में न भटकना पड़े। उस छात्र की आंखों से मापा जाता है जिसे पढ़ने के लिए मजबूरी में अपना गांव न छोड़ना पड़े।उस मां के भरोसे से मापा जाता है जिसे इलाज के लिए जिला मुख्यालय से बहुत दूर न भागना पड़े।
और उस युवा के निर्णय से मापा जाता है जो कह सके— “मैं अपने बलरामपुर में ही कुछ कर सकता हूं।” बस, इसी उम्मीद के साथ आज की चिट्ठी यहीं रोकता हूं।
अगली चिट्ठी में बलरामपुर के किसी और गांव, किसी और बाजार और किसी और चेहरे की कहानी लेकर फिर मिलूंगा।
आपका,
दुर्गा प्रसाद शुक्ला
बलरामपुर













