रिपोर्ट: दुर्गा प्रसाद शुक्ला
उत्तर प्रदेश में गोमूत्र को लेकर शुरू हुआ एक नया प्रयोग अब खेती, ग्रामीण रोजगार और सियासत—तीनों का मुद्दा बन गया है। एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत किसानों और पशुपालकों से 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदा जा रहा है। इससे प्राकृतिक खाद और जैविक कीटनाशक तैयार करने की योजना है। पहल के समर्थकों का दावा है कि इससे पशुपालकों को अतिरिक्त आमदनी मिलेगी, ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और रासायनिक उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इस योजना के सामने आते ही राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी ने इसे सरकार की ओर से जनता का ध्यान भटकाने वाला प्रयोग बताते हुए सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि जब किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है, तब गोमूत्र खरीदने की योजना को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करना वास्तविक कृषि समस्याओं से ध्यान हटाने की कोशिश है।
वहीं भारतीय जनता पार्टी का तर्क है कि प्राकृतिक खेती, गोपालन और किसानों की लागत कम करने के लिए किए जा रहे नए प्रयोगों का विरोध करने के बजाय उनके परिणामों का इंतजार किया जाना चाहिए। भाजपा ने समाजवादी पार्टी पर नए कृषि प्रयोगों का विरोध करने का आरोप लगाया है।
10 रुपये लीटर में गोमूत्र खरीदने की शुरुआत
फिलहाल यह योजना पूरे उत्तर प्रदेश में लागू नहीं हुई है। इसे एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया है, जिसमें शुरुआती चरण में करीब 15 गांवों को जोड़ा गया है। योजना के तहत महिला समूहों के माध्यम से गोमूत्र एकत्र किया जा रहा है और संबंधित संगठन इसे 10 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीद रहा है।
इस पहल का उद्देश्य केवल गोमूत्र की खरीद तक सीमित नहीं है। एकत्र किए गए गोमूत्र को प्रसंस्करण केंद्र तक पहुंचाकर उसमें विभिन्न वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद प्राकृतिक खेती के लिए उपयोगी माने जाने वाले तरल उत्पाद, पाउडर और दानेदार खाद तैयार करने का दावा किया गया है।
परियोजना से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इससे गांवों में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा करने की कोशिश की जा रही है।
करीब 300 महिलाएं अभियान से जुड़ीं
किसान उत्पादक संगठन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. प्रवीण कुमार के अनुसार, इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए 15 गांवों का चयन किया गया है। इन गांवों में गोमूत्र संग्रह के लिए व्यवस्था बनाई गई है और महिला समूहों को इससे जोड़ा गया है।
उनके मुताबिक करीब 300 महिलाएं इस काम में भाग ले रही हैं। एक महिला प्रतिदिन औसतन आठ से दस लीटर तक गोमूत्र एकत्र कर लेती है। परियोजना से जुड़े लोगों का दावा है कि रोजाना करीब 500 लीटर गोमूत्र एकत्र किया जा रहा है।
इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गोमूत्र एकत्र करने का काम स्थानीय स्तर पर ही किया जा रहा है। इसके बाद इसे प्रसंस्करण केंद्र तक पहुंचाया जाता है। इस तरह ग्रामीण महिलाओं को घर और गांव के आसपास रहते हुए अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
6 हजार वर्ग फुट में तैयार किया गया प्रसंस्करण केंद्र
गोमूत्र से प्राकृतिक खाद और कीटनाशक तैयार करने के लिए करीब 6 हजार वर्ग फुट क्षेत्र में प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किया गया है। इसके लिए जमीन किराये पर ली गई है। परियोजना से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक केंद्र में पांच तकनीकी कर्मचारी और करीब 25 श्रमिक काम कर रहे हैं। इनमें महिलाओं की संख्या भी उल्लेखनीय बताई गई है। गोमूत्र को केंद्र तक लाने के बाद उसे विभिन्न प्राकृतिक सामग्री के साथ प्रसंस्कृत किया जाता है। दावा है कि इसी प्रक्रिया से खेती में इस्तेमाल किए जाने वाले अलग-अलग उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
हालांकि, इस तरह तैयार होने वाले उत्पादों की गुणवत्ता, प्रभावशीलता और बड़े पैमाने पर कृषि उपयोगिता को लेकर स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षण और विस्तृत आंकड़ों की जरूरत बनी हुई है।
क्या गोमूत्र आधारित कीटनाशक वैज्ञानिक रूप से कारगर है?
इस योजना पर सबसे बड़ा सवाल इसके वैज्ञानिक आधार को लेकर उठ रहा है। परियोजना से जुड़े डॉ. प्रवीण कुमार का कहना है कि उन्होंने इस विषय पर शोध किया है और गोमूत्र आधारित कीटनाशक के इस्तेमाल से पौधों में फंगस की समस्या को नियंत्रित करने के परिणाम मिले हैं।
वहीं कृषि एवं पशु चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि गोमूत्र में कुछ ऐसे प्राकृतिक घटक हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल जैव-कीटनाशक और फफूंदनाशक उत्पादों में किया जा सकता है, लेकिन हर तैयार उत्पाद को प्रभावी मानने से पहले उसकी वैज्ञानिक जांच जरूरी है।
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक गोमूत्र को नीम और अन्य वनस्पतियों के अर्क के साथ मिलाकर इस्तेमाल किए जाने पर कुछ कीटों और फफूंदजनित रोगों के नियंत्रण में संभावनाएं सामने आई हैं। कुछ कृषि अध्ययनों में गोमूत्र आधारित वनस्पति फॉर्मूलेशन के इस्तेमाल से कीट नियंत्रण के सकारात्मक परिणाम भी बताए गए हैं।
लेकिन विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि किसी खास प्लांट में तैयार किए जा रहे उत्पाद की गुणवत्ता और प्रभाव के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए उसके निर्माण की पूरी प्रक्रिया, मात्रा, मिश्रण, परीक्षण और खेतों में हुए परिणामों को देखना जरूरी है।
विशेषज्ञ बोले—किसानों की अतिरिक्त कमाई अच्छी बात, लेकिन जांच जरूरी
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा के अनुसार, खेती में गोमूत्र का इस्तेमाल पहले से होता रहा है और किसानों द्वारा इसे खरीदे जाने की परंपरा भी रही है। उनके अनुसार अगर किसानों और पशुपालकों को इससे अतिरिक्त आय मिल रही है तो यह सकारात्मक पहल हो सकती है।
हालांकि, उनका कहना है कि प्रसंस्करण केंद्र में किस तकनीक से खाद और कीटनाशक तैयार किए जा रहे हैं, इसे देखे बिना उत्पाद की प्रभावशीलता पर अंतिम राय देना उचित नहीं होगा।
यही इस पायलट प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण चुनौती भी है। योजना को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले यह देखना होगा कि तैयार उत्पाद वास्तव में कितने प्रभावी हैं, उनकी लागत कितनी है और किसानों को रासायनिक उत्पादों के मुकाबले उनसे कितना लाभ मिलता है।
सरकार ने बताया प्राकृतिक खेती की दिशा में कदम
उत्तर प्रदेश गौसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने इस पहल को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाला कदम बताया है। उनका कहना है कि कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों और महंगे कृषि इनपुट पर निर्भरता कम करने के लिए स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ाया जाना चाहिए।
उनके मुताबिक देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी गोमूत्र से कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार करने के प्रयोग किए जा चुके हैं। ऐसे प्रयोगों से मिले अनुभवों के आधार पर उत्तर प्रदेश में भी मॉडल विकसित करने की कोशिश की जा रही है।
सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि यदि गोमूत्र को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक विषय के रूप में देखने के बजाय कृषि संसाधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो पशुपालकों और किसानों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिल सकता है।
छत्तीसगढ़ में पहले भी खरीदा जा चुका है गोमूत्र
गोमूत्र खरीदने की ऐसी पहल देश में पहली बार नहीं हुई है। छत्तीसगढ़ में तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार ने वर्ष 2022 में गोधन न्याय योजना के तहत गोमूत्र खरीदना शुरू किया था।
वहां गोमूत्र की खरीद के लिए चार रुपये प्रति लीटर की दर तय की गई थी। इसके साथ ही गोबर की खरीद की व्यवस्था भी की गई थी। उद्देश्य गोबर और गोमूत्र से जैविक खाद तथा अन्य कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार करना था।
छत्तीसगढ़ के कई गांवों में गौठानों के माध्यम से इस व्यवस्था को संचालित किया गया। महिला स्व-सहायता समूहों को भी इससे जोड़ा गया था। इसके बाद देश के कुछ अन्य राज्यों में भी गोबर की खरीद और उससे जैविक उत्पाद तैयार करने की योजनाएं शुरू की गईं।
उत्तर प्रदेश में शुरू हुआ मौजूदा प्रयोग इसी व्यापक विचार से जुड़ा हुआ है कि पशुधन से निकलने वाले संसाधनों को बेकार जाने देने के बजाय उन्हें किसानों की आय बढ़ाने के साधन में बदला जाए।
समाजवादी पार्टी ने साधा निशाना
गोमूत्र खरीदने की योजना को लेकर समाजवादी पार्टी ने सरकार पर तीखा हमला किया है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने इसे जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से हटाने की कोशिश बताया।
सपा का आरोप है कि प्रदेश में किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है और कृषि से जुड़े कई गंभीर सवाल अब भी बने हुए हैं। पार्टी ने खास तौर पर आलू की कम कीमत का मुद्दा उठाते हुए सरकार से किसानों की आय और फसल के बाजार मूल्य पर ध्यान देने की मांग की है।
सपा का कहना है कि चुनावी माहौल में ऐसे प्रयोगों को राजनीतिक प्रचार का विषय बनाया जा रहा है। पार्टी ने सरकार पर गाय के नाम पर किसानों और जनता को भ्रमित करने का आरोप भी लगाया है।
भाजपा ने कहा—हर नए प्रयोग का विरोध क्यों?
सपा के आरोपों पर भाजपा ने पलटवार किया है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता आनंद दुबे ने समाजवादी पार्टी को नए प्रयोगों का विरोधी बताया।
भाजपा का कहना है कि किसानों को मजबूत बनाने के लिए केवल फसल की खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य ही पर्याप्त नहीं हैं। पशुपालन, प्राकृतिक खेती, जैविक खाद और कम लागत वाली कृषि तकनीकों को भी बढ़ावा देना जरूरी है।
भाजपा के अनुसार, अगर गोमूत्र और गोबर जैसे स्थानीय संसाधनों से कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं और उनसे किसानों तथा ग्रामीण महिलाओं को आय मिल सकती है, तो ऐसे प्रयोगों को मौका दिया जाना चाहिए।
असली परीक्षा बाजार और खेत में होगी
इस योजना को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भले ही तेज हो गई हो, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता का फैसला खेत और बाजार में होगा।
सबसे पहला सवाल यह होगा कि किसानों को तैयार प्राकृतिक खाद और कीटनाशक किस कीमत पर उपलब्ध होंगे। दूसरा सवाल इसकी गुणवत्ता और प्रभावशीलता का है। तीसरा सवाल यह है कि क्या किसान इसे बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए तैयार होंगे।
इसके अलावा यह भी देखना होगा कि 10 रुपये प्रति लीटर की खरीद दर लंबे समय तक आर्थिक रूप से टिकाऊ है या नहीं। यदि गोमूत्र खरीद, परिवहन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बिक्री की लागत उत्पाद की कीमत को बहुत बढ़ा देती है, तो योजना के सामने व्यावसायिक चुनौती खड़ी हो सकती है।
इसके विपरीत यदि स्थानीय स्तर पर कच्चा माल उपलब्ध होने, महिलाओं के श्रम को आय से जोड़ने और कम लागत में उत्पाद तैयार करने का मॉडल सफल रहता है, तो इसे दूसरे क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।
किसानों और महिलाओं के लिए कितनी बड़ी संभावना?
इस प्रयोग का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष ग्रामीण महिलाओं को इससे जोड़ना है। यदि महिलाएं गोमूत्र संग्रह के माध्यम से नियमित आमदनी हासिल करती हैं और प्रसंस्करण केंद्रों में रोजगार पाती हैं, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी मॉडल बन सकता है।
पशुपालकों के लिए भी यह अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकता है। आम तौर पर पशुधन से जुड़े कई संसाधनों का आर्थिक मूल्य सीमित रहता है। ऐसे में गोमूत्र की खरीद के लिए निश्चित बाजार उपलब्ध होना पशुपालकों को आर्थिक प्रोत्साहन दे सकता है।
लेकिन इसके लिए खरीद व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए। भुगतान समय पर होना चाहिए और उत्पाद की बिक्री का मजबूत नेटवर्क भी विकसित करना होगा।
पायलट प्रोजेक्ट से बड़े मॉडल तक पहुंचने की चुनौती
फिलहाल इसे सीमित गांवों में किया जा रहा प्रयोग माना जा रहा है। इसलिए इसके परिणाम आने में समय लगेगा। किसी भी पायलट प्रोजेक्ट की तरह इसमें भी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों अनुभव सामने आ सकते हैं।
जरूरत इस बात की है कि उत्पादन और बिक्री के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। कितने किसानों से गोमूत्र खरीदा गया, कितनी महिलाओं को कितना भुगतान हुआ, कितनी मात्रा में खाद और कीटनाशक बना, उसकी लागत क्या रही और किसानों ने खेत में इसका क्या परिणाम पाया—इन सवालों के स्पष्ट आंकड़े योजना की विश्वसनीयता बढ़ा सकते हैं।
सियासत से अलग परिणाम पर नजर
गोमूत्र खरीद योजना को लेकर सियासी बहस चाहे जितनी तीखी हो, फिलहाल यह समझना जरूरी है कि यह पूरे प्रदेश में लागू सरकारी योजना नहीं बल्कि सीमित क्षेत्र में शुरू किया गया पायलट प्रोजेक्ट है।
एक तरफ सरकार और परियोजना से जुड़े लोग इसे प्राकृतिक खेती, ग्रामीण रोजगार और पशुपालकों की अतिरिक्त आय से जोड़कर देख रहे हैं। दूसरी तरफ विपक्ष इसे चुनाव से पहले ध्यान भटकाने वाला मुद्दा बता रहा है।
आखिरकार इस प्रयोग की सफलता राजनीतिक नारों से नहीं बल्कि किसानों की आय, महिलाओं को मिलने वाले रोजगार, उत्पाद की वैज्ञानिक गुणवत्ता, लागत और खेतों में वास्तविक परिणाम से तय होगी।
अगर गोमूत्र से तैयार उत्पाद वैज्ञानिक कसौटियों पर प्रभावी साबित होते हैं, उनकी कीमत किसानों की पहुंच में रहती है और गांवों में इससे स्थायी रोजगार पैदा होता है, तो यह मॉडल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन यदि दावों के अनुरूप परिणाम नहीं मिलते, तो इसे केवल राजनीतिक या भावनात्मक मुद्दे तक सीमित रखने के बजाय वैज्ञानिक समीक्षा की जरूरत होगी।
फिलहाल 10 रुपये प्रति लीटर की गोमूत्र खरीद ने उत्तर प्रदेश में प्राकृतिक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर एक नई बहस जरूर शुरू कर दी है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि यह सीमित प्रयोग आने वाले समय में कितना सफल होता है और क्या इसे दूसरे जिलों तक विस्तार देने का आधार तैयार हो पाता है।

























