भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार : क्रांतिकारी से संत और संपादक तक

भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार और लेखक मोहन द्विवेदी के साथ गीता प्रेस गोरखपुर व ‘कल्याण’ पत्रिका की फीचर तस्वीर

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लेखक : मोहन द्विवेदी

भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका प्रभाव किसी एक संस्था, किसी एक विचार या किसी एक कालखंड तक सीमित नहीं रहता। वे अपने जीवन और कर्म से ऐसी परंपरा निर्मित करते हैं, जिसकी छाप आने वाली पीढ़ियों तक दिखाई देती है। हनुमान प्रसाद पोद्दार ऐसे ही व्यक्तित्व थे, जिन्हें देशभर में स्नेह और सम्मान से ‘भाईजी’ कहा गया। उन्होंने एक ओर स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में राष्ट्रवादी चेतना से स्वयं को जोड़ा, दूसरी ओर भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस और सनातन साहित्य को सामान्य जन तक पहुंचाने का ऐसा अभियान चलाया, जिसने भारतीय समाज के धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।

भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार का नाम आज सबसे अधिक गीता प्रेस गोरखपुर और उसकी प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ से जुड़ा हुआ है। लेकिन उनके व्यक्तित्व को केवल एक धार्मिक पत्रिका के संपादक के रूप में देखना उनके जीवन के व्यापक आयामों को सीमित कर देना होगा। वे संत थे, विचारक थे, लेखक थे, संपादक थे, समाजसेवी थे और युवावस्था में राष्ट्रीय आंदोलन तथा क्रांतिकारी गतिविधियों से भी प्रभावित रहे थे। उनके जीवन की यही बहुआयामी यात्रा उन्हें बीसवीं सदी के उन विशिष्ट भारतीय व्यक्तित्वों में शामिल करती है, जिन्होंने आध्यात्मिकता और राष्ट्रबोध को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त किया।

‘कल्याण’ की कल्पना कैसे बनी एक ऐतिहासिक पत्रिका

‘कल्याण’ के जन्म की कहानी भी अपने आप में बेहद दिलचस्प है। वर्ष 1926 में दिल्ली में मारवाड़ी अग्रवाल महासभा का अधिवेशन आयोजित हुआ था। सेठ जमनालाल बजाज इस अधिवेशन के सभापति थे और उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला भी वहां उपस्थित थे। हनुमान प्रसाद पोद्दार के गीता प्रचार और आध्यात्मिक चिंतन से प्रभावित बिड़ला जी ने उनसे कहा कि केवल गीता के प्रचार तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं होगा। सद्विचारों और सनातन धर्म के मूल तत्वों को व्यापक समाज तक पहुंचाने के लिए एक स्तरीय पत्रिका का प्रकाशन होना चाहिए। यही विचार आगे चलकर ‘कल्याण’ की आधारशिला बना। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार अप्रैल 1926 में पत्रिका का नाम ‘कल्याण’ तय किया गया और उसी वर्ष अगस्त में इसका पहला अंक प्रकाशित हुआ।

कहा जाता है कि जब हनुमान प्रसाद पोद्दार ने गीताप्रेस के संस्थापक जयदयाल गोयंदका के सामने पत्रिका की योजना रखी और नाम को लेकर चर्चा हुई तो ‘कल्याण’ नाम सामने आया। यह नाम अपने भीतर ही पत्रिका के उद्देश्य को समेटे हुए था। कल्याण अर्थात ऐसा मार्ग, जो मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन से लेकर समाज और व्यापक मानवता तक के हित की दिशा में ले जाए। पत्रिका का उद्देश्य केवल धार्मिक सामग्री प्रकाशित करना नहीं था, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चिंतन को सरल भाषा में सामान्य पाठक तक पहुंचाना था।

‘कल्याण’ का प्रथम साधारण अंक मुंबई से प्रकाशित हुआ। बाद में इसका प्रकाशन गोरखपुर स्थित गीताप्रेस से होने लगा और यह पत्रिका धीरे-धीरे भारतीय परिवारों में अपनी स्थायी जगह बनाती चली गई। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार पत्रिका का शुरुआती प्रकाशन मुंबई में हुआ और बाद में गोरखपुर इसका प्रमुख केंद्र बना।

महात्मा गांधी से मिला मार्गदर्शन, विज्ञापन से बनाई दूरी

‘कल्याण’ की शुरुआत से पहले हनुमान प्रसाद पोद्दार ने महात्मा गांधी से भी मार्गदर्शन लिया था। गांधीजी और भाईजी के बीच आत्मीय संबंध थे। पत्रिका के उद्देश्य और स्वरूप पर बातचीत के दौरान गांधीजी ने पत्रिका में बाहरी विज्ञापन और पुस्तक समीक्षा न प्रकाशित करने की सलाह दी। भाईजी ने इस सलाह को गंभीरता से लिया और ‘कल्याण’ की संपादकीय नीति में उसे स्थान दिया। बाद के वर्षों में भी पत्रिका की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में उसका विज्ञापन-विहीन स्वरूप माना गया।

‘कल्याण’ के पहले अंक में महात्मा गांधी की रचना का प्रकाशित होना भी इस पत्रिका के इतिहास का महत्वपूर्ण प्रसंग है। गांधीजी ने बाद में भी पत्रिका के लिए लेख और संदेश दिए। गीता प्रेस में गांधीजी से संबंधित पत्र और सामग्री के सुरक्षित होने का उल्लेख भी विभिन्न स्रोतों में मिलता है।

यहां यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भाईजी ने पत्रिका को केवल धार्मिक उपदेशों का माध्यम नहीं बनने दिया। उन्होंने देश के अनेक संतों, विद्वानों, लेखकों और मनीषियों से संपर्क स्थापित किया तथा विभिन्न विषयों पर सामग्री आमंत्रित की। इस प्रयास ने ‘कल्याण’ को धीरे-धीरे एक ऐसी पत्रिका का स्वरूप दिया, जिसमें धर्म, दर्शन, संस्कृति, आस्था, नैतिकता और भारतीय जीवन-दृष्टि से जुड़े विविध विषयों पर सामग्री सामने आने लगी।

गीता प्रेस और भाईजी का संबंध

गोरखपुर की पहचान आज जिस गीता प्रेस से देश-विदेश तक बनी है, उसके इतिहास में हनुमान प्रसाद पोद्दार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मई 1922 में सेठ जयदयाल गोयंदका ने गोरखपुर में अपने सहयोगियों के साथ गीता प्रेस की स्थापना की। धार्मिक ग्रंथों को सामान्य जनता तक सुलभ और अपेक्षाकृत कम कीमत पर पहुंचाने की इस पहल ने आगे चलकर भारतीय प्रकाशन जगत में एक अलग स्थान बनाया।

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भाईजी इस प्रयास से जुड़े और धीरे-धीरे गीता प्रेस की गतिविधियों के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए। उनके संपादन और वैचारिक नेतृत्व में ‘कल्याण’ ने ऐसी पहचान बनाई, जिसने गीता प्रेस के प्रकाशन कार्य को व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव दिया। ‘कल्याण’ केवल एक मासिक पत्रिका नहीं रही, बल्कि भारतीय धार्मिक और आध्यात्मिक साहित्य की लोकप्रिय परंपरा का महत्वपूर्ण माध्यम बन गई।

भाईजी का संपादन लंबे समय तक चलता रहा। उन्होंने पत्रिका को अपनी साधना का माध्यम माना। उनके लिए संपादन महज पेशेवर काम नहीं था। वह इसे समाज में सद्विचारों के प्रसार की जिम्मेदारी के रूप में देखते थे। यही कारण था कि पत्रिका की भाषा, विषय चयन और प्रस्तुति में धार्मिक आस्था के साथ-साथ नैतिक जीवन और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को भी प्रमुखता दी गई।

रामधारी सिंह दिनकर ने क्यों कहा था ‘श्रीकृष्ण दूत’

हनुमान प्रसाद पोद्दार के जीवन और कार्य को समझने के लिए यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि समकालीन साहित्यिक और राष्ट्रीय व्यक्तित्व उन्हें किस दृष्टि से देखते थे। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उनके गीता प्रचार और आध्यात्मिक कार्यों से प्रभावित होकर उन्हें ‘श्रीकृष्ण दूत’ की संज्ञा दी थी। यह संबोधन भाईजी के उस जीवन-कार्य को रेखांकित करता है, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता के विचारों को घर-घर पहुंचाने का निरंतर प्रयास दिखाई देता है।

भाईजी का उद्देश्य धार्मिक ग्रंथों को केवल विद्वानों और पंडितों तक सीमित रखना नहीं था। वे चाहते थे कि सामान्य परिवार भी गीता और भारतीय धार्मिक साहित्य को आसानी से पढ़ सकें। इसी सोच ने गीता प्रेस के प्रकाशनों को व्यापक जनसमुदाय तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘कल्याण’ के माध्यम से भी यही प्रयास आगे बढ़ा। पत्रिका में धर्म और अध्यात्म से जुड़े विषयों को सामान्य पाठक की समझ के अनुरूप प्रस्तुत किया गया। यही कारण रहा कि समय के साथ इसकी पाठक संख्या बढ़ती गई और यह भारतीय घरों में नियमित रूप से पढ़ी जाने वाली पत्रिकाओं में शामिल हो गई।

क्रांतिकारी चेतना से आध्यात्मिक साधना तक की यात्रा

हनुमान प्रसाद पोद्दार का जीवन आरंभ से ही केवल धार्मिक वातावरण में नहीं बीता था। युवावस्था में वे कलकत्ता में रहते हुए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी विचारधाराओं से प्रभावित हुए। रास बिहारी बोस, विपिनचंद्र पाल, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और महर्षि अरविंद जैसे राष्ट्रवादी विचारकों के प्रभाव ने उनके भीतर राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया।

वे अनुशीलन समिति से भी जुड़े। उस समय देश के अनेक युवा ब्रिटिश शासन से मुक्ति के लिए अलग-अलग रास्तों पर आगे बढ़ रहे थे। पोद्दार भी उस दौर की राजनीतिक हलचलों से अछूते नहीं रहे। उनकी गतिविधियों का एक उल्लेखनीय प्रसंग उस गीता के प्रकाशन से जुड़ा है, जिसके मुखपृष्ठ पर तलवार धारण किए भारत माता का चित्र था। ब्रिटिश प्रशासन ने इस संस्करण को आपत्तिजनक और भड़काऊ मानते हुए जब्त कर लिया था।

यह प्रसंग बताता है कि भाईजी के व्यक्तित्व में राष्ट्रभक्ति और धार्मिक चेतना के बीज बहुत पहले पड़ चुके थे। बाद में उनके जीवन की दिशा आध्यात्मिक और धार्मिक साहित्य की ओर अधिक स्पष्ट रूप से मुड़ी, लेकिन राष्ट्र और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना उनके व्यक्तित्व में बनी रही।

वीर सावरकर के विचारों का भी पड़ा प्रभाव

हनुमान प्रसाद पोद्दार के वैचारिक निर्माण में विनायक दामोदर सावरकर के लेखन का भी प्रभाव रहा। सावरकर की प्रसिद्ध पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ ने उन्हें प्रभावित किया। वर्ष 1938 में वे सावरकर से मिलने मुंबई भी गए थे। यह प्रसंग उनके जीवन के उस दौर को समझने में मदद करता है, जब राष्ट्रीय स्वतंत्रता, भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े प्रश्न उनके चिंतन के केंद्र में थे।

उन्होंने महामना मदन मोहन मालवीय के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए चंदा जुटाने में भी योगदान दिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी गतिविधियां केवल धार्मिक प्रकाशन तक सीमित नहीं थीं। शिक्षा, समाज, राष्ट्र और संस्कृति से जुड़े कार्यों के प्रति भी उनका झुकाव था।

वर्ष 1916 में उन्हें अंग्रेजी सरकार ने राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया और जेल भेज दिया। जेल में भी उन्होंने लेखन और भक्ति का सिलसिला जारी रखा। यह उनके व्यक्तित्व की एक विशेषता थी कि कठिन परिस्थितियों में भी उनका मन चिंतन और आध्यात्मिक साधना की ओर बना रहा।

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अंग्रेज कलेक्टर की धमकी के बावजूद नेहरू को दी कार

भाईजी के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग उनकी निर्भीकता और मानवीय दृष्टि को सामने लाता है। वर्ष 1936 में गोरखपुर में भीषण बाढ़ आई थी। उस समय जवाहरलाल नेहरू राहत कार्यों और परिस्थितियों का जायजा लेने गोरखपुर पहुंचे थे। तत्कालीन अंग्रेजी प्रशासन ने कथित तौर पर स्थानीय लोगों को चेतावनी दी थी कि जो व्यक्ति नेहरू को अपनी कार उपलब्ध कराएगा, उसका नाम विद्रोहियों की सूची में डाल दिया जाएगा।

ऐसे माहौल में भी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने अपनी कार नेहरू को उपलब्ध कराई। यह घटना उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों में उनके साहस को दिखाती है। उनके लिए किसी राजनीतिक व्यक्ति से सहमति या असहमति से अधिक महत्वपूर्ण मानवीय सहायता और अपने विवेक के अनुसार निर्णय लेना था।

इस प्रसंग को उनके पूरे जीवन की दृष्टि से देखें तो एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। भाईजी धार्मिक व्यक्ति जरूर थे, लेकिन उनकी धार्मिकता उन्हें सामाजिक जिम्मेदारियों से दूर नहीं ले गई। बल्कि उनके जीवन के अनेक प्रसंग बताते हैं कि वे अपने समय के सामाजिक और राष्ट्रीय प्रश्नों से लगातार जुड़े रहे।

भारत रत्न का प्रस्ताव और विनम्र अस्वीकार

स्वतंत्रता के बाद हनुमान प्रसाद पोद्दार के सम्मान में भारत रत्न दिए जाने का प्रस्ताव सामने आने की बात भी उनके जीवन की चर्चित घटनाओं में शामिल है। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत और अन्य प्रमुख व्यक्तियों की ओर से उनके नाम पर विचार किए जाने का उल्लेख मिलता है। लेकिन भाईजी ने इस सम्मान को स्वीकार करने के बजाय विनम्रतापूर्वक इससे दूरी बनाए रखी।

उनका जीवन सम्मान और प्रतिष्ठा अर्जित करने के बजाय सेवा और साधना पर केंद्रित था। उनके लिए ‘कल्याण’ कोई व्यावसायिक परियोजना नहीं बल्कि आध्यात्मिक विचारों के प्रचार-प्रसार का माध्यम था। यही सोच उनकी संपादकीय नीति में भी दिखाई देती है।

आज जब किसी प्रकाशन की सफलता को उसके व्यावसायिक विस्तार, विज्ञापन और बाजार मूल्य से मापा जाता है, तब भाईजी की यह दृष्टि अलग दिखाई देती है। उन्होंने पत्रिका को आध्यात्मिक उद्देश्य से जोड़कर रखा और उसके माध्यम से विचारों को समाज तक पहुंचाने को प्राथमिकता दी।

राजस्थान के रतनगढ़ से शुरू हुआ जीवन

हनुमान प्रसाद पोद्दार का जन्म 18 सितंबर 1892 को राजस्थान के रतनगढ़ में लाल भीमराज अग्रवाल और रिखीबाई के घर हुआ था। उनके माता-पिता हनुमानजी के भक्त थे, इसलिए उनका नाम हनुमान प्रसाद रखा गया। आगे चलकर यही नाम भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक जगत में एक बड़े व्यक्तित्व की पहचान बना।

उनका जीवन एक सामान्य व्यापारी परिवार के युवक से शुरू होकर राष्ट्रवादी चेतना, क्रांतिकारी गतिविधियों, धार्मिक अध्ययन, संपादन और आध्यात्मिक सेवा तक पहुंचा। यही परिवर्तन उनके जीवन को असाधारण बनाता है। उन्होंने अपने जीवन के अलग-अलग चरणों में अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं, लेकिन हर चरण में भारतीय समाज और संस्कृति के प्रति उनका जुड़ाव दिखाई देता है।

‘कल्याण’ की शताब्दी और बदलता समय

वर्ष 2026 में ‘कल्याण’ अपने प्रकाशन के सौ वर्ष पूरे कर चुका है। अगस्त 1926 में शुरू हुई इस पत्रिका ने एक सदी का सफर पूरा किया है। यह केवल किसी प्रकाशन संस्था की उपलब्धि नहीं, बल्कि हिंदी धार्मिक और सांस्कृतिक पत्रकारिता के इतिहास की भी एक महत्वपूर्ण घटना है।

इसी शताब्दी वर्ष में ‘कल्याण’ की सदस्यता व्यवस्था में बदलाव की खबर भी चर्चा में है। हालिया जानकारी के अनुसार गीताप्रेस ने पत्रिका की पंचवर्षीय सदस्यता योजना बंद कर अब वार्षिक सदस्यता को उपलब्ध रखने का निर्णय लिया है। यह बदलाव पत्रिका के लंबे इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और व्यावसायिक परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है।

लेकिन सदस्यता व्यवस्था में बदलाव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि सौ वर्ष बाद भी ‘कल्याण’ की प्रासंगिकता किस रूप में बनी हुई है। डिजिटल युग में जब पाठक की आदतें बदल रही हैं, सोशल मीडिया ने सूचना की गति को अभूतपूर्व बना दिया है और मुद्रित पत्रिकाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी हैं, तब ‘कल्याण’ का लगातार बने रहना अपने आप में उल्लेखनीय है।

भाईजी की विरासत केवल एक पत्रिका नहीं

हनुमान प्रसाद पोद्दार की सबसे बड़ी विरासत को केवल ‘कल्याण’ के रूप में देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा। उनकी असली विरासत उस विचार में है, जिसमें धार्मिक साहित्य को समाज के सामान्य वर्ग तक पहुंचाने की इच्छा थी। उन्होंने यह समझा कि किसी भी विचार की शक्ति तभी बढ़ती है, जब वह लोगों की भाषा में उनके घर तक पहुंच सके।

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गीताप्रेस के माध्यम से प्रकाशित धार्मिक साहित्य और ‘कल्याण’ के लंबे संपादकीय सफर ने इस सोच को व्यापक बनाया। श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस और भारतीय आध्यात्मिक साहित्य के अनेक ग्रंथों को बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचाने में गीताप्रेस की भूमिका रही है। भाईजी ने इस प्रक्रिया को केवल प्रकाशन का काम नहीं माना, बल्कि इसे सांस्कृतिक सेवा के रूप में देखा।

उनका जीवन यह भी बताता है कि किसी व्यक्ति का वैचारिक विकास एक सीधी रेखा में नहीं चलता। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने युवावस्था में क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा ली, राष्ट्रीय चेतना के दौर को देखा, जेल का अनुभव किया, सामाजिक गतिविधियों में भाग लिया और अंततः धार्मिक एवं आध्यात्मिक साहित्य के प्रचार को अपने जीवन का प्रमुख कार्य बनाया। उनके भीतर राष्ट्र, समाज, धर्म और संस्कृति के प्रश्न अलग-अलग खानों में बंटे हुए नहीं थे।

आज के समय में भाईजी को याद करने का अर्थ

आज जब धार्मिक विमर्श अक्सर राजनीतिक और सामाजिक विवादों के बीच उलझ जाता है, तब हनुमान प्रसाद पोद्दार के जीवन को उसके ऐतिहासिक संदर्भों के साथ पढ़ना आवश्यक हो जाता है। वे जिस समय सक्रिय थे, वह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का समय था। उस दौर में धर्म, राष्ट्र और समाज को लेकर अनेक प्रकार के विचार सामने आ रहे थे।

भाईजी ने अपनी राह आध्यात्मिक साहित्य और विचार-प्रसार के माध्यम से चुनी। ‘कल्याण’ को उन्होंने ऐसा मंच बनाया, जहां भारतीय धार्मिक परंपरा के विविध पक्षों पर सामग्री प्रकाशित हो सके। उनका जोर साधना, नैतिकता, धर्मग्रंथों और सद्विचारों के प्रचार पर था।

उनके जीवन से यह संदेश भी निकलता है कि किसी विचार की दीर्घायु केवल उसके प्रचार से नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद निष्ठा से तय होती है। ‘कल्याण’ के सौ वर्षों का इतिहास इसी निरंतरता का प्रमाण है। एक ऐसे दौर में जब अनेक पत्र-पत्रिकाएं समय के साथ समाप्त हो गईं, ‘कल्याण’ का लगातार प्रकाशित होते रहना उसके पाठक समुदाय और उसके मूल उद्देश्य की स्थायित्व क्षमता को दर्शाता है।

26 मार्च 1971 को समाप्त हुई जीवन यात्रा, लेकिन विचार यात्रा जारी रही

हनुमान प्रसाद पोद्दार ने 26 मार्च 1971 को इस संसार को विदा कहा। लेकिन उनका जीवन-कार्य उनके साथ समाप्त नहीं हुआ। गीता प्रेस और ‘कल्याण’ के माध्यम से उनके विचारों और संपादकीय दृष्टि की छाप लंबे समय तक बनी रही।

रतनगढ़ में जन्म लेने वाला वह बालक, जो युवावस्था में राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित हुआ, जिसने अंग्रेजी शासन की जेल देखी, जिसने गीता के प्रचार को जीवन का उद्देश्य बनाया, जिसने महात्मा गांधी से सलाह ली, जिसने ‘कल्याण’ नाम की एक पत्रिका को अपनी साधना का माध्यम बनाया और जिसने सम्मान से अधिक सेवा को महत्व दिया, अंततः भारतीय धार्मिक पत्रकारिता के इतिहास में अपनी अलग पहचान छोड़ गया।

हनुमान प्रसाद पोद्दार की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें एक व्यक्ति के जीवन के साथ-साथ बीसवीं सदी के भारत की अनेक धाराएं एक साथ दिखाई देती हैं। इसमें स्वतंत्रता आंदोलन की बेचैनी है, राष्ट्रवादी चेतना है, धार्मिक पुनर्जागरण है, प्रकाशन की नई संस्कृति है और समाज तक विचार पहुंचाने की गहरी आकांक्षा भी है।

आज ‘कल्याण’ के सौ वर्ष पूरे होने पर जब पीछे मुड़कर देखा जाता है तो स्पष्ट होता है कि भाईजी की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी पद, पुरस्कार या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा में नहीं थी। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने अपने विश्वास को एक दीर्घकालिक सार्वजनिक कार्य में बदल दिया। उन्होंने संपादन को साधना बनाया, प्रकाशन को सेवा का माध्यम माना और धार्मिक साहित्य को सामान्य पाठक तक पहुंचाने के लिए अपना जीवन लगा दिया।

इसीलिए हनुमान प्रसाद पोद्दार को केवल ‘कल्याण’ के संपादक के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसने भारत के बदलते इतिहास को बहुत करीब से देखा और अपने विश्वास के अनुसार समाज को दिशा देने का प्रयास किया। ‘कल्याण’ की शताब्दी में भाईजी को याद करना दरअसल उस विचार को याद करना है, जिसमें ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाना ही सबसे बड़ा कल्याण माना गया था।

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Author: यायावर

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