20 अक्टूबर 2026 3:58 अपराह्न

कमजोर होकर भी क्यों इतनी मस्त चाल चल रहा है हाथी? बसपा के वोटबैंक पर टिकी यूपी की सियासत

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासत में मायावती और बसपा के वोटबैंक पर चर्चा, साथ में रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी भले ही पिछले कुछ चुनावों में लगातार कमजोर हुई हो, लेकिन उसका हाथी चुनावी मैदान से बाहर नहीं हुआ है। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर बसपा प्रमुख मायावती एक बार फिर उस सामाजिक समीकरण को साधने में जुटी दिखाई दे रही हैं, जिसने 2007 में पार्टी को पूर्ण बहुमत की सरकार तक पहुंचाया था। ब्राह्मण समाज को अपने साथ जोड़ने और दलित वोटबैंक को फिर से मजबूती से बसपा के पीछे खड़ा करने की कोशिश इस रणनीति का सबसे अहम हिस्सा नजर आ रही है।

मायावती के राजनीतिक संदेशों में बार-बार यह बात सामने आ रही है कि बसपा शासन के दौरान समाज के कमजोर तबकों के साथ-साथ ब्राह्मणों को भी सत्ता और प्रशासन में हिस्सेदारी मिली थी। पार्टी इसी पुराने सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल को नए राजनीतिक संदर्भ में दोहराने की कोशिश कर रही है। हालांकि बड़ा सवाल यह है कि क्या करीब दो दशक पहले सफल रहा यह फार्मूला आज के बदले हुए उत्तर प्रदेश में उतना ही असरदार साबित होगा?

2007 का फार्मूला आज क्यों आसान नहीं?

साल 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को बसपा की राजनीतिक सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। उस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने 403 में से 206 सीटों पर जीत हासिल कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। पार्टी को करीब 30.43 प्रतिशत वोट मिले थे। उस समय बसपा के पक्ष में दलित और ब्राह्मण सामाजिक समीकरण की चर्चा खूब हुई थी, लेकिन उस चुनाव की परिस्थितियां आज से काफी अलग थीं।

उस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्य मुकाबला समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच दिखाई देता था। भारतीय जनता पार्टी आज की तरह मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में मैदान में नहीं थी। तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार के खिलाफ पैदा हुए राजनीतिक असंतोष का लाभ मायावती को मिला और सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल गया।

आज हालात बदल चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी ने ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में अपना मजबूत संगठन और व्यापक जनाधार तैयार कर लिया है। समाजवादी पार्टी भी लगातार अपने सामाजिक आधार को नए समूहों तक फैलाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अपने बिखरे हुए सामाजिक आधार को दोबारा एकजुट करने की है।

बसपा का सबसे बड़ा संकट: बिखरता कोर वोटबैंक

बहुजन समाज पार्टी की सबसे बड़ी ताकत लंबे समय से दलित वोटबैंक रहा है। इसके साथ ब्राह्मण समर्थन जुड़ने पर पार्टी का सामाजिक आधार व्यापक हुआ। लेकिन पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि बसपा की चुनावी ताकत लगातार कमजोर हुई है।

2007 में जहां बसपा ने 206 सीटें जीती थीं, वहीं 2012 में उसकी सीटें घटकर 80 रह गईं। उस चुनाव में पार्टी का वोट शेयर करीब 25.91 प्रतिशत था। इसके बाद 2017 में भाजपा की जबरदस्त चुनावी लहर के बीच बसपा केवल 19 सीटों तक सिमट गई और उसका वोट शेयर 22.72 प्रतिशत रहा।

2022 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका लेकर आया। पार्टी का वोट शेयर घटकर करीब 13.17 प्रतिशत रह गया और 403 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद वह केवल एक सीट जीत सकी। यही वह स्थिति है जिसने बसपा के सामने अपने मूल वोटबैंक को बचाने की चुनौती खड़ी कर दी है।

इसलिए आगामी विधानसभा चुनाव में मायावती की रणनीति को केवल सत्ता में वापसी की कोशिश के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। बसपा के पास अभी भी इतना वोट आधार मौजूद है कि वह कई विधानसभा सीटों के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है।

ब्राह्मण वोटों पर फिर क्यों नजर?

बसपा की मौजूदा राजनीतिक रणनीति में ब्राह्मण समाज को जोड़ने की कोशिश खास महत्व रखती है। पार्टी इससे पहले भी ब्राह्मण-दलित सामाजिक समीकरण के जरिए सत्ता तक पहुंच चुकी है। इसी कारण मायावती एक बार फिर ब्राह्मण समाज के बीच राजनीतिक संदेश पहुंचाने में सक्रिय दिखाई दे रही हैं।

लेकिन 2022 का अनुभव बसपा के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं रहा। उस समय भी पार्टी ने ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलनों का आयोजन किया था। बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा गया था। इसके बावजूद चुनाव परिणाम बसपा के पक्ष में नहीं आए और पार्टी महज एक विधानसभा सीट तक सीमित रह गई।

यही कारण है कि 2027 के चुनाव के लिए ब्राह्मणों को साधने की मौजूदा कोशिश को पिछली रणनीति की पुनरावृत्ति के बजाय नए राजनीतिक समीकरणों की कसौटी पर देखना होगा।

जाटव वोट पर किसकी नजर?

बसपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल उसका जाटव वोटबैंक है। जाटव समुदाय लंबे समय से मायावती और बसपा की राजनीति का मजबूत आधार माना जाता रहा है। हालांकि समय के साथ इस वोटबैंक में भी दूसरे राजनीतिक दलों की सेंधमारी बढ़ी है।

राजनीतिक विश्लेषण में अक्सर यह दावा किया जाता है कि 2012 के आसपास बड़ी संख्या में जाटव मतदाता बसपा के साथ थे, लेकिन 2022 तक इसमें उल्लेखनीय कमी आई। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को आगे बढ़ाया। इससे बसपा के पारंपरिक दलित आधार पर भी राजनीतिक दबाव दिखाई दिया।

यही कारण है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में जाटव वोट का रुख बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि बसपा अपने इस मूल वोटबैंक को मजबूती से अपने साथ बनाए रखने में सफल रहती है तो वह भले ही अकेले सरकार बनाने की स्थिति में न पहुंचे, लेकिन अनेक सीटों पर चुनावी परिणाम प्रभावित करने की क्षमता जरूर रख सकती है।

दलित वोट खिसका तो किसे मिलेगा फायदा?

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा लगभग डेढ़ सौ सीटों पर दलित मतदाता चुनावी परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित करने की स्थिति में माने जाते हैं। इसलिए दलित वोट का मामूली सा बदलाव भी प्रदेश की सत्ता का समीकरण बदल सकता है।

यहीं से बसपा की राजनीतिक कमजोरी के बावजूद उसकी अहमियत बढ़ जाती है। यदि उसका पारंपरिक वोट पूरी तरह उसके साथ रहता है तो कई सीटों पर वह मजबूत चुनौती पेश कर सकती है। लेकिन यदि इस वोटबैंक का एक हिस्सा समाजवादी पार्टी या भाजपा की ओर जाता है तो उसके परिणाम दूसरे दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

भाजपा की नजर गैर-जाटव दलित समूहों पर लंबे समय से रही है। पासी, कोरी, धोबी और अन्य दलित समुदायों के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश भाजपा के व्यापक सामाजिक गठजोड़ का हिस्सा रही है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी पीडीए के जरिए दलित और पिछड़े मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।

असली सवाल सत्ता नहीं, सत्ता का समीकरण है

बसपा के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वह 2007 की तरह पूर्ण बहुमत हासिल कर पाएगी या नहीं। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में उसके लिए अपने दम पर सत्ता में वापसी करना कठिन दिखाई देता है। असली सवाल यह है कि बसपा का वोट किस दल को सत्ता के करीब ले जाएगा और किस दल को सत्ता से दूर कर सकता है।

यदि जाटव सहित दलित वोट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा समाजवादी पार्टी के पक्ष में जाता है और वह अपने पीडीए सामाजिक समीकरण को मजबूत कर लेती है, तो उसका चुनावी लाभ बढ़ सकता है। इसी तरह भाजपा यदि गैर-जाटव दलित आधार को अपने साथ रखते हुए जाटव वोट में भी उल्लेखनीय सेंध लगाने में सफल होती है, तो उसके लिए भी बड़ा चुनावी लाभ संभव है।

इस पूरे समीकरण में मायावती की राजनीतिक भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण बनी हुई है क्योंकि बसपा का वोट भले ही पिछले चुनावों में घटा हो, लेकिन वह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। कई विधानसभा सीटों पर बसपा अभी भी ऐसा वोट रखती है जो जीत-हार का अंतर तय करने की क्षमता रखता है।

2027 में हाथी की चाल किसे बनाएगी मजबूत?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव केवल सीटों की संख्या से नहीं जीते जाते, बल्कि सामाजिक समूहों के बीच वोटों के स्थानांतरण से भी परिणाम तय होते हैं। बसपा का कमजोर होना इसलिए भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक अवसर और चुनौती है।

मायावती यदि ब्राह्मण समाज के एक हिस्से को फिर से अपने साथ जोड़ने और दलित वोटबैंक में हुई सेंधमारी को रोकने में सफल होती हैं तो बसपा की चुनावी ताकत में अचानक सुधार हो सकता है। वहीं यदि उसका कोर वोटबैंक और अधिक बिखरता है तो इसका सीधा फायदा उसके प्रतिद्वंद्वी दलों को मिल सकता है।

इसलिए 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को केवल सीटों के चश्मे से देखना राजनीतिक तस्वीर को अधूरा समझना होगा। हाथी भले ही पहले की तुलना में कमजोर नजर आ रहा हो, लेकिन उसकी चाल अभी भी कई सीटों पर चुनावी दिशा बदलने की क्षमता रखती है।

यही वजह है कि आगामी चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि बसपा कितनी सीटें जीतती है, बल्कि यह होगा कि बसपा का वोट किसके पक्ष में निर्णायक मोड़ पैदा करता है। मायावती सत्ता में लौटें या न लौटें, उनके वोटबैंक का रुख उत्तर प्रदेश की अगली सरकार के गठन में अहम भूमिका निभा सकता है।

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