नीम का पत्ता कड़वा है… फिर गाली से नाराज़गी क्यों?

लेखिका सीमा चिश्ती की तस्वीर के साथ युवाओं के विरोध प्रदर्शन, विरोध पोस्टरों और तीखी नारों की पृष्ठभूमि पर आधारित फीचर इमेज, जिसमें भाषा बनाम मूल मुद्दों की बहस को दर्शाया गया है।

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आलेख : सीमा चिश्ती

[संपादकीय भूमिका – शब्दों की कड़वाहट पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन उस कड़वाहट के पीछे छिपे आक्रोश को समझना कहीं अधिक जरूरी है। लोकतंत्र में विरोध हमेशा सलीके से चुने गए शब्दों में ही व्यक्त हो, यह अपेक्षा शायद जितनी सुंदर लगती है, उतनी व्यावहारिक नहीं है। जब युवा अपनी पढ़ाई, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, अवसरों और भविष्य को लेकर बेचैन होता है और उसे लगता है कि उसकी सामान्य भाषा सत्ता तक नहीं पहुंच रही, तो उसका विरोध कई बार तीखा और असहज करने वाला रूप ले लेता है।

बेशक, सार्वजनिक संवाद में मर्यादा और जिम्मेदारी का महत्व है। गाली-गलौज, धमकी, घृणा और किसी कमजोर व्यक्ति को अपमानित करने वाली भाषा को सामान्य नहीं बनाया जा सकता। लेकिन भाषा की मर्यादा की यह कसौटी सत्ता और समाज के हर वर्ग पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। केवल युवाओं के पोस्टर, नारों और सोशल मीडिया की भाषा पर सवाल उठाकर सार्वजनिक जीवन में वर्षों से मौजूद राजनीतिक कटाक्ष, व्यक्तिगत टिप्पणियों, ट्रोल संस्कृति और मीडिया के शोर को नजरअंदाज करना इस बहस को अधूरा बना देता है।

इसलिए मूल प्रश्न यह नहीं कि युवाओं ने कौन-सा शब्द बोला। मूल प्रश्न यह है कि वे इतने नाराज क्यों हैं, उनकी आवाज सुनने में संस्थाएं कहां विफल हुईं और क्या सत्ता असुविधाजनक सवालों को भी सुनने का लोकतांत्रिक धैर्य रखती है?

प्रस्तुत आलेख इसी कठिन और असुविधाजनक सवाल को सामने रखता है। यह पाठक को गाली का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि गाली के पीछे मौजूद गुस्से को पढ़ने के लिए आमंत्रित करता है। क्योंकि लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा तब नहीं होती जब नागरिक सत्ता की प्रशंसा कर रहे हों; उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब नागरिक नाराज हों, उनकी भाषा कड़वी हो और उनके सवाल सत्ता के लिए असहज हों।कड़वे शब्दों को सुधारने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर समाज में इतनी कड़वाहट पैदा क्यों हुई?]

दुनिया में शायद एक ऐसी ‘भाषा’ है, जिसे किसी शब्दकोश, व्याकरण या भाषा-शास्त्र की जरूरत नहीं पड़ती। गालियां और अपशब्द किसी एक भाषा की संपत्ति नहीं हैं, लेकिन उनका भाव लगभग हर समाज में समझ लिया जाता है। वे किसी भावना को तीखा कर सकते हैं, गुस्से को धार दे सकते हैं और विरोध को अधिक प्रभावशाली बना सकते हैं। यही वजह है कि जब कोई आंदोलन अपने चरम पर होता है तो उसकी भाषा भी हमेशा पाठ्यपुस्तकों जैसी शालीन नहीं रहती।

हाल के युवा विरोध प्रदर्शनों ने इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है। प्रदर्शनकारियों के पोस्टरों, नारों और सोशल मीडिया पोस्ट में इस्तेमाल की गई तीखी और कई बार आपत्तिजनक भाषा को लेकर ‘संस्कारी’ हलकों में नाराजगी दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक विरोध का मूल्यांकन केवल इस आधार पर किया जाना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों ने कौन-से शब्द इस्तेमाल किए, या फिर यह भी देखा जाना चाहिए कि वे किन परिस्थितियों में सड़क पर उतरे और उनकी आवाज किस सत्ता के सामने उठ रही थी?

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सीबीएफसी के अध्यक्ष शशि शेखर वेम्पति की ओर से युवाओं के जेंडर संबंधी अपशब्दों के इस्तेमाल पर चिंता जताई गई। इस चिंता को लेकर बहस स्वाभाविक है, लेकिन यह सवाल भी उतना ही जरूरी है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा का पैमाना सबके लिए समान है या नहीं।

यदि युवाओं के पोस्टर पर लिखा कोई अपशब्द असभ्य माना जाता है, तो सत्ता, राजनीतिक दलों और प्रभावशाली लोगों द्वारा लंबे समय से इस्तेमाल की जाती रही अपमानजनक भाषा का हिसाब भी उसी कसौटी पर होना चाहिए।

गाली नहीं, गुस्से का संदर्भ समझना जरूरी

शब्दों को उनके संदर्भ से काटकर देखना अक्सर किसी भी बहस को अधूरा बना देता है। कोई शब्द घर में बोला जाए, संसद में इस्तेमाल हो, किसी कमजोर व्यक्ति को अपमानित करने के लिए कहा जाए या किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन में सत्ता के खिलाफ नारे के रूप में इस्तेमाल हो—इन सभी परिस्थितियों का सामाजिक और राजनीतिक अर्थ एक जैसा नहीं हो सकता।

आंदोलन की भाषा अक्सर आक्रोश की भाषा होती है। वहां यह उम्मीद करना कि हजारों युवा संस्कृत के श्लोकों की तरह संतुलित और शास्त्रीय भाषा में अपनी नाराजगी व्यक्त करेंगे, वास्तविकता से आंखें मूंदने जैसा है।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हर गाली सही है या हर अपमान को जायज ठहरा दिया जाना चाहिए। किसी कमजोर, गरीब, महिला, बच्चे, कर्मचारी, ड्राइवर, मजदूर या सामाजिक रूप से हाशिये पर खड़े व्यक्ति को अपमानित करना और किसी शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता के खिलाफ तीखा व्यंग्य या अपशब्द इस्तेमाल करना नैतिक रूप से एक ही स्थिति नहीं है। यही अंतर इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।

जब युवा विद्यार्थी देश के सबसे ताकतवर राजनीतिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ तीखी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो उसके संदर्भ में सत्ता और नागरिक के बीच मौजूद असमान शक्ति-संबंध को भी देखना होगा। लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछने की गुंजाइश जितनी बड़ी होगी, लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ होगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने भी गाली और अश्लीलता में अंतर माना

इस बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी महत्वपूर्ण है। 17 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने एक मामले में कहा कि केवल गाली-गलौज, अशिष्ट या अभद्र शब्दों का इस्तेमाल अपने-आप में कानूनी अर्थों में अश्लीलता नहीं माना जा सकता। अदालत ने अश्लीलता और महज अपशब्दों के बीच अंतर पर जोर दिया।

मामला जमीन विवाद के दौरान इस्तेमाल की गई बेहद आपत्तिजनक भाषा से जुड़ा था। अदालत के सामने सवाल यह था कि क्या ऐसे शब्द अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 294 के तहत अश्लीलता का अपराध बनते हैं। अदालत ने इस अंतर को रेखांकित किया कि कोई भाषा असभ्य, अप्रिय या बेहद आपत्तिजनक हो सकती है, लेकिन हर आपत्तिजनक शब्द कानूनी रूप से ‘अश्लील’ नहीं हो जाता।

यह फैसला इस बहस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समाज में किसी भाषा को नापसंद करना और उसे कानूनी अपराध मानना दो अलग बातें हैं।

यदि जमीन को लेकर विवाद में गुस्से में बोले गए बेहद आपत्तिजनक शब्दों का संदर्भ अदालत देख सकती है, तो शिक्षा, रोजगार, प्रश्नपत्र लीक, भ्रष्टाचार और अवसरों की कमी जैसे बड़े सामाजिक सवालों को लेकर सड़क पर उतरे युवाओं की भाषा का संदर्भ भी समझना होगा।

असली सवाल है—युवा आखिर नाराज क्यों हैं?

गाली के एक शब्द पर पूरी बहस केंद्रित कर देने से कहीं बड़ा सवाल पीछे छूट जाता है। युवा सड़कों पर क्यों हैं? उनके भीतर इतना आक्रोश क्यों है? उन्हें क्यों लगता है कि उनकी सामान्य और शालीन भाषा में कही गई बात सत्ता तक नहीं पहुंचती?

प्रश्नपत्र लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता, रोजगार की कमी, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतें केवल राजनीतिक मुद्दे नहीं हैं। ये सीधे युवाओं के भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं।

एक युवा जब वर्षों तक परीक्षा की तैयारी करता है, परिवार की आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करता है, नौकरी की उम्मीद में उम्र की सीमा के करीब पहुंचता है और फिर परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े होते देखता है, तो उसका गुस्सा केवल किसी एक व्यक्ति के प्रति नहीं होता। वह उस पूरी व्यवस्था से नाराज होता है, जिसने उसकी मेहनत और उम्मीद के बीच दीवार खड़ी कर दी है।

ऐसे में अगर वह सड़क पर आता है और उसकी भाषा तीखी हो जाती है, तो उस भाषा को सुनकर असहज होने से पहले उसके पीछे छिपे कारणों को सुनना जरूरी है।

करोड़ों रुपये की प्रचार मशीन और आम युवा

सरकारी विज्ञापन खर्च के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि 2014-15 से 2024-25 के बीच भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का विज्ञापन खर्च 5,987.46 करोड़ रुपये रहा, यानी औसतन करीब 1.5 करोड़ रुपये प्रतिदिन। यह आंकड़ा राज्यों की भाजपा सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों और अन्य संस्थाओं के खर्च को शामिल नहीं करता।

यहां बहस केवल विज्ञापन खर्च की नहीं है। सवाल राजनीतिक संचार की उस ताकत का है, जिसका मुकाबला एक सामान्य छात्र या बेरोजगार युवा अपने हाथ में पकड़े पोस्टर और मोबाइल फोन से करता है। एक तरफ संसाधनों से लैस राजनीतिक प्रचार है, दूसरी तरफ वह युवा है जिसके पास अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया, पोस्टर, मीम, व्यंग्य और कभी-कभी बेहद तीखी भाषा के अलावा बहुत कम साधन हैं।

इसीलिए किसी आंदोलन की भाषा को समझते समय उसकी पहुंच और संसाधनों की असमानता को भी देखना होगा।

क्या भाषा की मर्यादा का पैमाना सबके लिए समान है?

यहां सबसे कठिन सवाल यही है। यदि सार्वजनिक जीवन में अपमानजनक भाषा को लेकर चिंता है, तो वह चिंता सार्वभौमिक होनी चाहिए। वह किसी एक राजनीतिक विचारधारा या एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रह सकती।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा नेताओं और दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं के भाषणों में भी समय-समय पर तीखे राजनीतिक व्यंग्य, व्यक्तिगत टिप्पणियां और विवादास्पद शब्द सामने आते रहे हैं। महिलाओं और विपक्षी नेताओं को लेकर कही गई कई टिप्पणियां राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हैं।

सवाल यह नहीं है कि किस दल के नेता ने कब कौन-सा शब्द कहा। सवाल यह है कि क्या हम भाषा की एक ऐसी समान कसौटी विकसित कर सकते हैं, जो सत्ता और विपक्ष, नेता और नागरिक, सरकार और प्रदर्शनकारी—सभी पर समान रूप से लागू हो? अगर नहीं, तो ‘संस्कारी भाषा’ की पूरी बहस सिर्फ राजनीतिक सुविधा बनकर रह जाएगी।

ट्रोल संस्कृति ने भी बदली सार्वजनिक भाषा

आज की भाषा केवल संसद, अखबार और टीवी स्टूडियो से नहीं बनती। सोशल मीडिया ने राजनीतिक संवाद को पूरी तरह बदल दिया है। राजनीतिक दलों से जुड़े समर्थक समूहों, ट्रोल नेटवर्क और सोशल मीडिया अकाउंट्स के माध्यम से गाली-गलौज, धमकियां और व्यक्तिगत हमले अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं।

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कई बार महिलाओं, पत्रकारों, राजनीतिक विरोधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बेहद आपत्तिजनक भाषा और धमकियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे माहौल में नई पीढ़ी बड़ी हुई है।

फिर यह उम्मीद करना कि वही पीढ़ी सार्वजनिक जीवन में केवल अत्यंत शुद्ध और संस्कृतनिष्ठ भाषा का इस्तेमाल करेगी, वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों की अनदेखी होगी।

युवा भाषा को केवल बिगाड़ नहीं रहे; वे उस डिजिटल राजनीतिक संस्कृति को भी प्रतिबिंबित कर रहे हैं, जिसे उन्होंने अपने आसपास विकसित होते देखा है।

मीडिया की चीखती बहसों का असर

इस बदलाव में टेलीविजन मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। लंबे समय से चलती आ रही चीखती बहसें, एक-दूसरे पर बोलते एंकर, युद्ध जैसी भाषा, राजनीतिक आरोप और व्यक्तिगत हमले आम दर्शक की रोजमर्रा की भाषा में घुल चुके हैं।

जब प्राइम टाइम की बहस में विरोधी को बोलने नहीं दिया जाता, जब राजनीतिक असहमति को राष्ट्र-विरोधी या देशद्रोही जैसी भाषा में बांट दिया जाता है और जब बहस तर्क से अधिक शोर में बदल जाती है, तो उसका असर समाज पर पड़ता है। फिर सड़क पर खड़ा युवा उसी शोर को अपनी भाषा में वापस लौटाता है।

यह कहना आसान है कि युवा असभ्य भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। कठिन सवाल यह है कि उन्हें ऐसी भाषा की तरफ धकेलने वाले सार्वजनिक वातावरण को किसने बनाया?

‘संस्कारी’ हिंदी बनाम आम लोगों की हिंदी

भाषा की लड़ाई का एक दूसरा पक्ष भी है। हिंदी केवल संस्कृत से निकले शब्दों का संग्रह नहीं है। भारतीय समाज की वास्तविक हिंदी में उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, बुंदेली और अनेक क्षेत्रीय बोलियों के शब्द शामिल हैं।

भारत की भाषाई शक्ति उसकी विविधता में है। बाजार, चाय की दुकान, खेत, बस अड्डा, विश्वविद्यालय, अदालत और घर—हर जगह हिंदी का अलग रूप दिखाई देता है।

सरकारी संचार में अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ और जटिल शब्दावली आम नागरिक से दूरी पैदा कर सकती है। भाषा का उद्देश्य यदि संवाद है, तो ऐसी भाषा अधिक प्रभावी होगी जिसे सामान्य नागरिक आसानी से समझ सके।

भाषा को किसी खास राजनीतिक पहचान का प्रतीक बना देना उसके स्वाभाविक विकास को सीमित करता है।

नई पीढ़ी का बोलचाल का तरीका इसीलिए कई बार परंपरागत भाषा-शुद्धतावादियों को असहज करता है। लेकिन भाषा हमेशा बदलती रही है। जो शब्द कभी अस्वीकार्य माने जाते थे, वे समय के साथ सामान्य बोलचाल में आ गए। इसी तरह आज के कई शब्द आने वाले समय में अलग अर्थ और सामाजिक स्वीकार्यता हासिल कर सकते हैं।

शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण हैं उनके परिणाम

नैतिकता का वास्तविक पैमाना केवल शब्द नहीं, बल्कि उसके परिणाम होने चाहिए। यदि कोई व्यक्ति बेहद शालीन शब्दों में किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा को उचित ठहराता है, तो क्या उसकी भाषा केवल इसलिए स्वीकार्य हो जाएगी क्योंकि उसने कोई गाली नहीं दी? यदि किसी कमजोर व्यक्ति को सभ्य भाषा में अपमानित किया जाए, तो क्या वह अपमान कम हो जाएगा?

इसके उलट यदि कोई युवा किसी शक्तिशाली राजनीतिक व्यक्ति के खिलाफ व्यंग्यात्मक पोस्टर लगाता है, तीखा नारा देता है या अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करता है, तो क्या उसे केवल शब्दों के आधार पर लोकतंत्र का दुश्मन मान लेना उचित होगा?

लोकतंत्र में असहमति हमेशा सुंदर भाषा में व्यक्त नहीं होती। कई बार वह असुविधाजनक होती है, कड़वी होती है और सत्ता के लिए बेहद अप्रिय होती है। यही लोकतंत्र की परीक्षा भी है।

कानून की भाषा और समाज की भाषा में अंतर

सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—हर खराब भाषा अपराध नहीं होती। कानून को यह तय करने के लिए संदर्भ, उद्देश्य और प्रभाव देखना पड़ता है। सामाजिक स्तर पर भी यही विवेक जरूरी है।

किसी शब्द को पसंद न करना हमारा अधिकार है। किसी भाषा से असहमति भी स्वाभाविक है। लेकिन असहमति को अपराध घोषित करने की कोशिश लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक हो सकती है।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि धमकी, यौन हिंसा की धमकी, जातीय या धार्मिक घृणा और वास्तविक हिंसा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर स्वीकार कर लिया जाए। लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। मगर तीखे राजनीतिक व्यंग्य और वास्तविक हिंसा के आह्वान के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

सत्ता की छवि से बड़ा है जनता का सवाल

राजनीतिक नेतृत्व की छवि बनाना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है। लेकिन किसी नेता की छवि जनता की समस्याओं का विकल्प नहीं बन सकती।

विज्ञापन, पोस्टर, रील, सोशल मीडिया अभियान और प्रचार किसी सरकार को लोकप्रिय बना सकते हैं, लेकिन बेरोजगार युवा को नौकरी नहीं दे सकते। किसी परीक्षा में गड़बड़ी होने पर प्रचार वीडियो उसकी भरपाई नहीं कर सकता। किसी छात्र के वर्षों के परिश्रम को एक आकर्षक राजनीतिक संदेश वापस नहीं लौटा सकता।

इसलिए सरकारों के लिए सबसे जरूरी काम यह नहीं होना चाहिए कि विरोध की भाषा कितनी सभ्य है। सबसे जरूरी सवाल यह होना चाहिए कि विरोध पैदा ही क्यों हुआ।

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अगर सरकारें युवाओं की बात सुनेंगी, उनकी शिकायतों का समाधान करेंगी और जवाबदेही सुनिश्चित करेंगी, तो सड़क की भाषा अपने आप बदल सकती है।

‘नीम का पत्ता कड़वा है’—लेकिन कड़वाहट का कारण भी देखिए

नीम का पत्ता कड़वा होता है। उसकी कड़वाहट से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन केवल कड़वाहट के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि उसमें कोई औषधीय गुण नहीं है।

आंदोलन की भाषा भी कई बार नीम जैसी होती है—कड़वी, तीखी और असुविधाजनक। सत्ता को वह पसंद नहीं आती। समाज के संभ्रांत वर्ग को भी उससे परेशानी हो सकती है। लेकिन उसकी कड़वाहट के पीछे मौजूद असंतोष को समझना जरूरी है।

युवा जब कहता है कि उसकी परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा, नौकरी नहीं मिल रही, उसकी मेहनत का मूल्य नहीं है या उसकी आवाज सत्ता तक नहीं पहुंच रही, तो उसके शब्दों को केवल ‘गाली’ कहकर खारिज कर देना आसान रास्ता है। मुश्किल रास्ता है उस गुस्से को सुनना।

बोलने और करने के बीच का फर्क

किसी समाज की नैतिकता केवल उसकी भाषा से तय नहीं होती। उसके वास्तविक काम ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। बहुत शालीन भाषा बोलने वाला व्यक्ति यदि अन्याय को संरक्षण देता है, तो उसकी भाषा की शालीनता किस काम की?

इसके विपरीत कोई युवा गुस्से में कड़वे शब्द बोल दे, लेकिन महिलाओं, अल्पसंख्यकों और कमजोर तबकों की सुरक्षा और सम्मान के पक्ष में खड़ा हो, तो उसके शब्दों का मूल्यांकन उसके पूरे आचरण के संदर्भ में करना चाहिए। यही वह बिंदु है जहां ‘शब्द’ और ‘कर्म’ के बीच का अंतर सामने आता है।

सार्वजनिक जीवन में सभ्यता जरूरी है, लेकिन सभ्यता का अर्थ केवल शब्दों की चमक नहीं है। असली सभ्यता न्याय, समानता, जवाबदेही और नागरिक सम्मान में दिखाई देती है।

युवाओं की भाषा को सुनने की जरूरत

आज की युवा पीढ़ी पुराने राजनीतिक संचार से अलग तरीके से बोलती है। वह मीम बनाती है, व्यंग्य करती है, रील बनाती है, पोस्टर पर तीखे शब्द लिखती है और राजनीतिक प्रतीकों को नए अर्थ देती है। इसे केवल ‘बदतमीजी’ कहकर खारिज करना संभव नहीं है। यह राजनीतिक संवाद के बदलते स्वरूप का हिस्सा है।

नई पीढ़ी को भाषा की जिम्मेदारी समझनी होगी, लेकिन सत्ता और संस्थानों को भी यह समझना होगा कि युवा केवल भाषा नहीं बदल रहे—वे संवाद का तरीका बदल रहे हैं।

यदि संसद प्रभावी बहस करेगी, मीडिया सवाल पूछेगा, संस्थाएं जवाबदेह रहेंगी और सरकारें नागरिकों की शिकायतों पर कार्रवाई करेंगी, तो शायद सड़क की भाषा भी नरम हो जाएगी। लेकिन जब संस्थागत संवाद कमजोर पड़ता है, तो सड़क बोलती है। और सड़क की भाषा हमेशा सभ्य नहीं होती।

 कड़वे शब्दों से पहले कड़वी सच्चाई सुनिए

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि युवाओं ने कौन-सी गाली दी। सवाल यह है कि उन्हें उस स्तर के गुस्से तक पहुंचने की जरूरत क्यों महसूस हुई।

भाषा पर बहस होनी चाहिए। सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा, यौन हिंसा की धमकियों, जातीय या धार्मिक घृणा और व्यक्तिगत उत्पीड़न को सामान्य नहीं बनाया जा सकता। लेकिन राजनीतिक असहमति, व्यंग्य और सत्ता की आलोचना को केवल इसलिए अपराध या नैतिक पतन घोषित करना भी उचित नहीं कि वह असुविधाजनक भाषा में व्यक्त हुई है।

लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं कि उसके खिलाफ कितनी मीठी बातें कही जा रही हैं। असली परीक्षा यह है कि जब जनता कड़वे शब्दों में सवाल पूछती है, तब सत्ता उन सवालों को सुनती है या नहीं।

नीम का पत्ता कड़वा है। लेकिन अगर समाज को उसकी कड़वाहट से शिकायत है, तो पहले यह देखना होगा कि लोग उसे चबाने को मजबूर क्यों हुए।

युवाओं की भाषा को सुधारने से पहले उनकी शिकायतों का समाधान करना होगा। उनके पोस्टर मिटाने से पहले उन सवालों के जवाब देने होंगे, जो उन पोस्टरों पर लिखे हैं। रील हटाने से पहले उस असंतोष को समझना होगा, जो रील के पीछे है। क्योंकि जब आक्रोशित युवा बोलता है और सत्ता सुनने से इनकार करती है, तो उसकी भाषा सड़क की भाषा बन जाती है। और कई बार सत्ता को वही भाषा सुनाई देती है, जिसे वह सबसे पहले अनसुना करना चाहती है।

[आलेख : सीमा चिश्ती लेखिका डिजिटल समाचार पोर्टल द वायर के संपादकमंडल में हैं। वह बीबीसी की दिल्ली ब्यूरो प्रमुख और न्यू इंडियन एक्सप्रेस में उपसंपादक रह चुकी हैं।]

संपादित एवं पुनर्संयोजित प्रस्तुति

महत्वपूर्ण सूचना

इस आलेख में व्यक्त विचार एवं मत पूरी तरह लेखिका सीमा चिश्ती के निजी हैं। ‘जन गण दूत’ का इन विचारों से कोई संबंध अथवा सरोकार नहीं है। आलेख का प्रकाशन केवल पाठकों के विचार-विमर्श एवं सूचना के उद्देश्य से किया गया है।

लेखिका सीमा चिश्ती की तस्वीर के साथ शिक्षा नीति, युवा असंतोष और बदलाव की मांग को दर्शाती फीचर इमेज
लेखिका सीमा चिश्ती के आलेख में शिक्षा नीति, युवा असंतोष, वैज्ञानिक सोच और बदलाव की जरूरत से जुड़े सवालों को रेखांकित किया गया है। Clik Photo
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Author: यायावर

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4 Responses

  1. यह लेख केवल एक समाचार नहीं, बल्कि समाज की अंतरात्मा को झकझोरने वाला गंभीर विमर्श है। लेखक ने जिस निर्भीकता और संवेदनशीलता के साथ विषय को प्रस्तुत किया है, वह प्रशंसनीय है। तकनीक मानव जीवन को सरल बनाने के लिए है, लेकिन यदि उसका दुरुपयोग मासूमों की गरिमा और सुरक्षा पर आघात करने लगे, तो पूरे समाज को सजग होकर उसके विरुद्ध खड़ा होना चाहिए।

    ऐसी पत्रकारिता ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है, जो कठिन विषयों पर भी बिना सनसनी फैलाए तथ्य, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ अपनी बात रखती है। उम्मीद है कि यह लेख नीति-निर्माताओं, अभिभावकों और युवाओं को गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करेगा।

    जनहित और सामाजिक चेतना को समर्पित इस उत्कृष्ट लेख के लिए लेखिका तथा जनगणदूत की संपादकीय टीम को हार्दिक साधुवाद और शुभकामनाएँ।

  2. यह लेख एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय को संतुलित ढंग से सामने लाता है। लेखिका ने केवल समस्या की ओर ध्यान आकर्षित नहीं किया, बल्कि उसके सामाजिक और नैतिक पक्ष पर भी विचार करने के लिए प्रेरित किया है। आज जब तकनीक तेजी से बदल रही है, तब उसका जिम्मेदारी के साथ उपयोग होना भी उतना ही आवश्यक है।

    लेख की सबसे अच्छी बात यह लगी कि इसमें तथ्यों के साथ मानवीय संवेदनाओं का भी ध्यान रखा गया है। यदि समाज, प्रशासन और तकनीकी संस्थाएं मिलकर ऐसे मामलों में समय रहते प्रभावी कदम उठाएं, तो कई गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है।

    ऐसे जनजागरूकता बढ़ाने वाले लेख लगातार प्रकाशित होने चाहिए। लेखिका और संपादकीय टीम को इस सार्थक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई।

  3. यह लेख पढ़ने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर हम तकनीक को इंसानियत के लिए बना रहे हैं या इंसानियत को तकनीक की भेंट चढ़ा रहे हैं? यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का इस्तेमाल किसी मासूम की गरिमा, निजता और सम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए होने लगे, तो यह केवल कानून का नहीं, पूरे समाज के नैतिक पतन का संकेत है।

    सिर्फ घटनाओं पर अफसोस जताने या बयान देने से काम नहीं चलेगा। सरकार, तकनीकी कंपनियों, कानून-प्रवर्तन एजेंसियों और समाज—सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। जो लोग ऐसी तकनीक का दुरुपयोग करते हैं, उनके खिलाफ त्वरित और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि डिजिटल अपराध भी उतना ही गंभीर अपराध है जितना वास्तविक दुनिया का अपराध।

    इस विषय पर बेबाक, जिम्मेदार और जनजागरण करने वाला लेख प्रकाशित करने के लिए लेखक और जनगणदूत की संपादकीय टीम बधाई की पात्र है। समाज को ऐसे ही निर्भीक और विचारोत्तेजक लेखों की आवश्यकता है।

  4. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

    आदरणीय मैडम सीमा चिश्ती जी,
    हार्दिक नमस्ते!
    मैं आपका दूसरा लेख पढ़ रहा हूं। काॅलेज के समय से ही लेखादि पढ़ने का शौक रखता हूं। पिछले १०-१२ वर्षों से भारत के ९० % से भी ज्यादा समाचारपत्र गूंगे-बहरे हो ग ए हैं। मिडिया का एक बड़ा हिस्सा गोदी हो चुका है, इसमें कोई दो राय नहीं। आपने सही लिखा है कि कड़वाहट के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि करेले में कोई औषधीय गुण नहीं है।
    आंदोलन की भाषा भी कड़वी, तीखी और असुविधाजनक हो सकती है, सत्ता को वह पसंद नहीं आती। मगर कड़वाहट के पीछे मौजूद असंतोष और पीड़ा को समझना जरूरी होता है।
    वैसे आपको पढ़ने के बाद मेरे दिमाग में एक प्रश्न आ रहा है कि आज जिनको युवाओं की भाषा से तकलीफ़ हो रही है, क्या उन्होंने कभी यह सोचा कि भारत में सियासी बद्तमीज़ी का दौर कितने वर्ष पूर्व शुरू हुआ है?
    जनगनदूत डॉट कॉम पर आपके लेख प्रकाशित करने के लिए संपादक अनिल अनूप जी को भी हार्दिक धन्यवाद देता हूं। बड़ी देर बाद ऐसा लेख पढ़ने को मिला जहां मुद्दों पर तार्किक विवेचना पढ़ने को मिली। बड़े लम्बे समय के बाद एक विवेचनात्मक लेख पढ़ने की भूख शांत हुई है।

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