कंधों पर दिव्यांग पति, दिल में भोलेनाथ की भक्ति… 180 किलोमीटर पैदल कांवड़ यात्रा कर पेश की प्रेम और समर्पण की अनोखी मिसाल
चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
श्रावण मास में निकलने वाली कांवड़ यात्रा को भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, तप, विश्वास और समर्पण का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। देशभर से लाखों शिवभक्त हरिद्वार पहुंचकर मां गंगा का पवित्र जल लेते हैं और अपने-अपने क्षेत्रों के शिवालयों में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। इस दौरान कई ऐसी प्रेरणादायक घटनाएं सामने आती हैं, जो लोगों के दिलों को छू जाती हैं। इस बार उत्तर प्रदेश के मोदीनगर से आए एक दंपति ने अपनी अटूट आस्था और वैवाहिक समर्पण से ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा पूरे कांवड़ मार्ग के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी हो रही है।
मोदीनगर निवासी आशा ने अपने दिव्यांग पति सचिन को कंधों पर बैठाकर करीब 180 किलोमीटर की कठिन पैदल कांवड़ यात्रा पूरी की। हरिद्वार पहुंचकर उन्होंने मां गंगा से पवित्र जल भरा और भगवान शिव का जलाभिषेक कराया। इस अद्भुत यात्रा ने न केवल श्रद्धालुओं को भावुक किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि सच्चा प्रेम केवल शब्दों में नहीं, बल्कि त्याग, जिम्मेदारी और साथ निभाने में दिखाई देता है।
पति की अधूरी इच्छा को पत्नी ने बनाया अपना संकल्प
सचिन रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगने के कारण सामान्य रूप से चलने-फिरने में असमर्थ हैं। लंबे समय से उनका सपना था कि वे स्वयं हरिद्वार जाकर मां गंगा का पवित्र जल लाएं और भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करें। लेकिन उनकी शारीरिक स्थिति के कारण यह सपना अधूरा ही रह गया था।
पति की इस इच्छा को देखकर आशा ने निर्णय लिया कि वह किसी भी कीमत पर उनके सपने को पूरा करेंगी। उन्होंने यह ठान लिया कि यदि उनके पति पैदल चलकर हरिद्वार नहीं पहुंच सकते, तो वह उन्हें अपने कंधों पर बैठाकर पूरी यात्रा करवाएंगी। यही संकल्प उनकी प्रेरणा बना और उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के यात्रा शुरू कर दी।
आसान नहीं था 180 किलोमीटर का सफर
मोदीनगर से हरिद्वार तक लगभग 180 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करना अपने आप में बड़ी चुनौती है। कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को लगातार पैदल चलना पड़ता है। तेज धूप, उमस, बारिश, लंबी दूरी, भीड़ और थकान जैसी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
इन सबके बावजूद आशा ने अपने पति को सुरक्षित सहारे के साथ कंधों पर बैठाकर यात्रा जारी रखी। रास्ते में कई बार कठिन परिस्थितियां भी आईं, लेकिन उन्होंने अपने कदम नहीं रोके। उनका एक ही लक्ष्य था—पति की मनोकामना पूरी करना और भगवान शिव के चरणों में गंगाजल अर्पित करना।
श्रद्धालुओं की आंखें हुईं नम
जैसे-जैसे यह दंपति कांवड़ मार्ग पर आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे लोगों की भीड़ उन्हें देखने के लिए रुकने लगी। हजारों श्रद्धालु इस दृश्य को देखकर भावुक हो गए। कई लोगों ने उनके साहस को प्रणाम किया तो कई श्रद्धालुओं ने भगवान शिव से उनके सुखी जीवन की कामना की।
कुछ लोगों ने कहा कि आज के समय में जहां रिश्तों में छोटी-छोटी बातों पर दूरियां बढ़ जाती हैं, वहां आशा ने अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि सच्चा वैवाहिक जीवन एक-दूसरे का हर परिस्थिति में साथ निभाने का नाम है।
हरकी पैड़ी पर मां गंगा का लिया आशीर्वाद
कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद आशा और सचिन हरिद्वार पहुंचे। वहां उन्होंने सबसे पहले हरकी पैड़ी पर मां गंगा की विधिवत पूजा-अर्चना की। श्रद्धा और विश्वास के साथ पवित्र गंगाजल भरा और भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।
इसके बाद दोनों दक्षेश्वर महादेव मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने पूरे विधि-विधान से भगवान शिव का जलाभिषेक किया। मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालुओं ने भी इस दंपति की भक्ति और समर्पण की खुलकर सराहना की।
लगातार दूसरे वर्ष पूरी की कठिन कांवड़ यात्रा
इस कहानी की सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि यह पहली बार नहीं हुआ। आशा और सचिन लगातार दूसरे वर्ष भी इसी प्रकार की कठिन कांवड़ यात्रा पूरी कर रहे हैं।
पिछले वर्ष भी आशा ने अपने पति को साथ लेकर हरिद्वार की यात्रा पूरी की थी। इस वर्ष भी उन्होंने वही संकल्प दोहराया और बिना किसी शिकायत के पूरी यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न की। यह उनके अटूट विश्वास, दृढ़ इच्छाशक्ति और मजबूत वैवाहिक रिश्ते का परिचायक है।
सोशल मीडिया पर लोगों ने की जमकर सराहना
इस दंपति की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। हजारों लोग उनकी हिम्मत, प्रेम और भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था की प्रशंसा कर रहे हैं।
कई लोगों ने लिखा कि आज के समय में ऐसा समर्पण बहुत कम देखने को मिलता है। कुछ लोगों ने इसे सच्चे प्रेम की मिसाल बताया, तो कई लोगों ने कहा कि यह कहानी केवल धार्मिक आस्था की नहीं, बल्कि जीवनसाथी के प्रति निभाए गए वचन और जिम्मेदारी की भी प्रेरक कहानी है।
कांवड़ यात्रा देती है सेवा, त्याग और विश्वास का संदेश
श्रावण मास में आयोजित कांवड़ यात्रा भारत की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में से एक है। लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, गंगोत्री और अन्य पवित्र स्थलों से गंगाजल लेकर अपने-अपने क्षेत्रों के शिव मंदिरों तक पहुंचते हैं। कई श्रद्धालु नंगे पैर यात्रा करते हैं, तो कई कठोर व्रत और नियमों का पालन करते हुए अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
इस यात्रा के दौरान केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि सेवा, सहयोग, त्याग और मानवता के अनेक उदाहरण भी देखने को मिलते हैं। जगह-जगह भंडारे, चिकित्सा शिविर और सेवा शिविर लगाए जाते हैं, जहां श्रद्धालुओं की हर संभव सहायता की जाती है।
पति-पत्नी के रिश्ते को दिया नया अर्थ
आशा ने अपने दिव्यांग पति की इच्छा को अपनी जिम्मेदारी मानकर यह साबित कर दिया कि विवाह केवल एक सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि जीवनभर एक-दूसरे का सहारा बनने का वचन भी है।
उन्होंने दिखा दिया कि सच्चा प्रेम केवल खुशियों में साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि कठिन समय में भी अपने जीवनसाथी के सपनों को पूरा करने के लिए हर चुनौती का सामना करने का साहस रखना है। उनकी यह यात्रा केवल 180 किलोमीटर की दूरी तय करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने हजारों लोगों के दिलों तक पहुंचकर प्रेम, विश्वास और समर्पण का संदेश दिया।
समाज के लिए बनी प्रेरणा
आज जब आधुनिक जीवनशैली में रिश्तों की मजबूती पर अक्सर सवाल उठते हैं, तब मोदीनगर के आशा और सचिन की यह कहानी समाज को सकारात्मक सोच और मजबूत पारिवारिक मूल्यों का संदेश देती है। यह दंपति बताता है कि यदि रिश्तों में विश्वास, त्याग और समर्पण हो तो कोई भी कठिनाई बड़ी नहीं होती।
उनकी कांवड़ यात्रा ने यह साबित कर दिया कि भगवान शिव के प्रति सच्ची श्रद्धा और जीवनसाथी के प्रति अटूट प्रेम मिलकर हर असंभव कार्य को संभव बना सकते हैं। यही कारण है कि आशा और सचिन की यह अनोखी यात्रा इस वर्ष की सबसे प्रेरणादायक कांवड़ यात्राओं में शामिल हो गई है और लंबे समय तक लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।











