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पनगोत्रा की चिट्ठी ; धर्म, अध्यात्म और जागरूकता : क्या करोड़ों अनुयायी समाज को बेहतर बना पाए हैं?

इस विशेष लेख में धर्म, अध्यात्म और जागरूकता पर आधारित केवल कृष्ण पंचगोत्र समाज और धार्मिक अधर्म के वर्तमान स्वरूप का गहन विश्लेषण किया गया है। लेख में ओशो के विचारों के माध्यम से यह प्रश्न उठाया गया है कि यदि धर्म का प्रभाव इतना व्यापक है तो समाज में अपराध, हिंसा और अहिंसा क्यों बनी है। धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर प्रेम, करुणा, सत्य और जागरूकता का विकास करना है, न कि केवल आदर्शों की संख्या बढ़ाना। ‘पनगोत्र की वर्णमाला’ का यह विचारोत्तेजक स्तम्भ धर्म, अध्यात्म, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवता पर गंभीर चर्चा प्रस्तुत करता है।

केवल कृष्ण पन्नागोत्रा ​​(स्वतंत्र-पत्रकार)

“हर गली में खुद की भीड़ देखने को मिली!
असली सामान मेरे घर से चला आया!!”

आज की अल्टरनेटिव की शुरुआत इन दो दोस्तों से हो रही है। ये किसी ग़ज़ल का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे दर्द की अभिव्यक्ति हैं जो आज के सामाजिक और धार्मिक ग़ज़लों में देखने को मिलती हैं।

इन दोस्तों के पीछे छिपा हुआ दर्द सिर्फ एक शख्स का नहीं है। कहा गया है कि पूरे समाज का दर्द है, जिस धर्म के नाम पर पहले से अधिक धार्मिकता दिखाई देती है, लेकिन इसके अंदर कहीं अधिक अस्थिर, अहिंसा और विभाजन होता है। कुछ समय पहले मैं ओशो के विचार पढ़ रहा था। देखें-पढ़ें एक प्रश्न मेरे अंदर भी उतर गया। ओशो डेमोक्रेट हैं- “यदि विश्व में लाखों लोग धर्म का पालन कर रहे हैं, तो फिर अपराध, दासता, हिंसा और शोषण क्यों बढ़ रहे हैं? समस्या धर्म में है या जागरूकता के बिना उसके अंधानुकरण में?”

यह प्रश्न लगभग सबसे सरल दिग्दर्शन हैं, सीधे-सीधे भीदिग्दर्शन हैं।

आज चारों ओर धर्म का बोलबाला दिखाई देता है। हर शहर में बड़े-बड़े आश्रम हैं। हर गली में कोई ना कोई गुरु है। हर मंच पर आध्यात्मिक प्रवचन हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर धर्म का प्रदर्शन लगातार बढ़ रहा है। लेकिन जब मैं समाज की ओर देखता हूं तो कुछ न कुछ चित्र और ही दिखाई देता है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध कम नहीं हुए। बलात्कार और शोषण की घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं। आज भी व्यवस्था का एक भाग बना हुआ है। अदालतों में लाखों मामले मौजूद हैं। चोरी, डकैती, हत्या और सामाजिक हिंसा के समाचार रोज़ सुरखियाँ हैं।

ऐसे मन में एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है – यदि धर्म का प्रभाव इतना व्यापक है तो फिर मनुष्य के अंदर परिवर्तन क्यों नहीं होता? यह प्रश्न किसी धर्म विशेष पर नहीं है। इस धर्म का वर्तमान स्वरूप एक गंभीर प्रश्न है।

आज लोग पहले से अधिक पूजा-पाठ कर रहे हैं। पौराणिक कथाओं में भीड़ है। धार्मिक यात्राएँ बढ़ रही हैं। व्रत और अनुष्ठानों की संख्या बहुत अधिक है। लेकिन मनुष्य का क्रोध किस प्रकार कम हुआ? क्या ख़त्म हुई? क्या लालिमा कम हुई? परिवार में प्रेम बढ़ाया क्या है?

यदि सत्यता से उत्तर मिल जाए तो अधिकांश मामलों में उत्तर नकारात्मक ही होगा।

हम मंदिरों में दर्शन करने जाते हैं, लेकिन वहीं छोटी-सी बात पर झगड़ पड़ते हैं। हम मस्जिद में जाकर इबादत करते हैं, लेकिन दूसरे समुदाय के प्रति घृणा रखते हैं। हम चर्च में प्रार्थना करते हैं, लेकिन अहंकार से भरे रहते हैं। हम आश्रमों में जाते हैं, लेकिन वहाँ भी राजनीति और गुटबाजी दिखाई देती है।

यदि धर्म के बाद भी वही क्रोध, वही हिंसा, वही लालच और वही घृणा बनी हुई है, तो फिर वास्तव में बदला क्या? शायद केवल कपड़े बदले हैं। शायद केवल नारे बदले हैं। शायद केवल झंडे बदले हैं। लेकिन मनुष्य नहीं बदला। और जब मनुष्य नहीं बदलता, तब समझ लेना चाहिए कि धर्म हृदय में नहीं उतरा, केवल सिर पर बैठ गया है। यहाँ एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है। कोई भी धर्म बुरा नहीं होता। संसार के सभी धर्म प्रेम, करुणा, सत्य, सेवा और मानवता की शिक्षा देते हैं।

समस्या धर्म में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब धर्म जीवन का हिस्सा बनने के बजाय प्रदर्शन का साधन बन जाता है। जब धर्म भीतर उतरता है तो वह मनुष्य को विनम्र बनाता है। जब धर्म केवल बाहरी रूप में रह जाता है तो वह अहंकार को बढ़ाता है। आज अक्सर धर्म को पहचान, शक्ति और संख्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यही कारण है कि उसका मूल उद्देश्य पीछे छूटता जा रहा है।

प्रिय पाठकों,

कभी-कभी मैं अपने गाँव और पुराने समय को याद करता हूँ। यदि हम लगभग सौ वर्ष पीछे जाएँ तो पाएँगे कि उस समय भी धर्म था और अधर्म भी था। लेकिन धर्म का स्वरूप आज की तुलना में अलग था।

मैं जिस गाँव में रहता हूँ, वहाँ कभी केवल एक मंदिर हुआ करता था। आज मंदिरों की संख्या लगातार बढ़ रही है और आगे भी बढ़ती जाएगी। उस समय अधिकांश घरों में अलग से पूजा कक्ष नहीं होते थे। किसी कोने में एक छोटी चौकी पर ठाकुरजी विराजमान रहते थे या दीवार पर किसी देवी-देवता की तस्वीर टंगी होती थी।

लेकिन पूजा दिखावे की नहीं, भावना की होती थी। धर्म का प्रदर्शन कम था, लेकिन उसका प्रभाव जीवन में अधिक दिखाई देता था। उस दौर में सामाजिक जीवन में सहयोग और संवेदनशीलता अधिक दिखाई देती थी। यदि किसी घर में शादी होती तो पूरा गाँव उसकी तैयारी में हाथ बँटाता था। यदि किसी परिवार में फसल बोने या काटने के समय मृत्यु हो जाती, तो पूरा गाँव मिलकर उसकी खेती का काम पूरा कर देता था। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे।

यह केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि धर्म का जीवंत स्वरूप था। धर्म मंदिरों की संख्या से नहीं, बल्कि लोगों के व्यवहार से दिखाई देता था। इसीलिए उस समय लगता था कि ईश्वर वास्तव में लोगों के घरों में रहता है। लेकिन आज स्थिति उलटती दिखाई देती है। घरों में देवी-देवताओं की तस्वीरें बढ़ गई हैं। पूजा स्थलों की संख्या बढ़ गई है। धार्मिक आयोजनों की भव्यता बढ़ गई है। लेकिन मानवीय संवेदनाएँ कम होती जा रही हैं। तभी मन में यह भावना जन्म लेती है—

“हर गली में खुदाओं की भीड़ देखकर!
असली खुदा मेरे घर से चला गया!!”

आज एक नया चलन भी दिखाई देता है। लोग गर्व से कहते हैं— “हमारे गुरु के इतने करोड़ फॉलोअर्स हैं।” लेकिन क्या यही अध्यात्म है? क्या अनुयायियों की संख्या ही किसी गुरु की सफलता का प्रमाण है? यदि किसी आध्यात्मिक आंदोलन का मूल्यांकन केवल भीड़ के आधार पर किया जाए तो फिर उसमें और किसी राजनीतिक अभियान में क्या अंतर रह जाएगा?

धर्म का उद्देश्य भीड़ इकट्ठी करना नहीं होता। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना होता है। वास्तविक अध्यात्म व्यक्ति के भीतर परिवर्तन लाता है, न कि केवल उसके आसपास अनुयायियों की भीड़ खड़ी करता है। ओशो के विचारों का सार यही है कि धर्म का अंतिम उद्देश्य एक जागरूक मनुष्य का निर्माण है।

ऐसा मनुष्य जो प्रेम करना जानता हो। जो करुणा से भरा हो। जो सत्य के लिए अकेला खड़ा होने का साहस रखता हो। जो स्त्री को वस्तु नहीं, चेतना के रूप में देखता हो। जो शक्ति मिलने पर शोषण न करे। जो भय के कारण नहीं, बल्कि समझ के आधार पर जीवन जिए। यदि धर्म ऐसे मनुष्य तैयार नहीं कर रहा, तो फिर उसकी दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक है।

दुर्भाग्य से आज अनेक लोग धर्म का उपयोग जागने के लिए नहीं, बल्कि अपने अहंकार को सजाने के लिए कर रहे हैं। जब कोई व्यक्ति अपने गुरु के करोड़ों अनुयायियों की संख्या गिनाने लगता है, तो वह आध्यात्मिक भाषा नहीं बोल रहा होता। वह बाज़ार की भाषा बोल रहा होता है। वह वही भाषा है जिसमें कंपनियाँ अपने ग्राहकों की संख्या बताती हैं। सत्य कभी संख्या पर निर्भर नहीं करता। सत्य हमेशा चेतना पर आधारित होता है। एक जागा हुआ मनुष्य करोड़ों सोए हुए लोगों से अधिक मूल्यवान हो सकता है।

ओशो बार-बार कहते थे कि भीड़ कभी धार्मिक नहीं होती। धार्मिकता हमेशा व्यक्ति के भीतर जन्म लेती है। कोई व्यक्ति भीड़ का हिस्सा होकर धार्मिक दिखाई दे सकता है, लेकिन वास्तव में धार्मिक तभी होता है जब उसके भीतर करुणा, प्रेम, संवेदनशीलता और जागरूकता का जन्म हो। इसलिए अगली बार जब कोई व्यक्ति अपने गुरु के करोड़ों अनुयायियों का उल्लेख करे, तो उससे केवल एक प्रश्न पूछिए— “तुम्हारे गुरु ने कितने अनुयायी नहीं, बल्कि कितने जागे हुए मनुष्य पैदा किए?” यही वह प्रश्न है जो धर्म और पाखंड के बीच की रेखा स्पष्ट कर देता है।

प्रिय पाठकों,

आज की उपाधि समाप्त होने से पहले बस इतना ही कहना है कि धर्म का उद्देश्य तीर्थों, मस्जिदों, चर्चों और आश्रमों की संख्या नहीं है। धर्म का उद्देश्य मनुष्य के अंदर प्रेम, करुणा, सत्य और जागरूकता का जन्म होना है। फॉलोअर्स खरीदना आसान है। क्रेडिट तकनीक आसान है। भव्य आयोजन करना सबसे आसान है। लेकिन एक बेहतरीन इंसान बनना और बनना सबसे कठिन काम है। जिस दिन धर्म पुनः आरंभ होगा वही मनुष्य निर्माण का माध्यम बनेगा, जिस दिन समाज में वास्तविक परिवर्तन आएगा। क्योंकि अंततः धर्म का मूल्य उनके चरित्रों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके चरित्र से तय होता है। और जिसे मनुष्य ने नहीं बनाया, उसने धर्म का केवल व्यापार किया है, धर्म का जन्म नहीं। केवल कृष्ण पन्नागोत्रा

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