यूपी में दलित कार्ड खेल रही कांग्रेस, राजेन्द्र पाल गौतम को प्रदेश प्रभारी बनाकर साध रही नया सियासी समीकरण

उत्तर प्रदेश कांग्रेस की नई रणनीति पर आधारित फीचर इमेज, जिसमें राजेन्द्र पाल गौतम और रिपोर्टर कमलेश कुमार चौधरी की तस्वीर के साथ दलित राजनीति और नए सियासी समीकरण को दर्शाया गया है।

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने दलित राजनीति को केंद्र में रखकर बड़ा संगठनात्मक बदलाव किया है। पार्टी ने वरिष्ठ दलित नेता राजेन्द्र पाल गौतम को प्रदेश प्रभारी बनाकर अनुसूचित जाति मतदाताओं को साधने की रणनीति अपनाई है। राजेन्द्र पाल गौतम की नियुक्ति से कांग्रेस के राजनीतिक समीकरण, बसपा के साथ संभावित गठबंधन की चर्चाएं और प्रदेश अध्यक्ष पद में बदलाव की अटकलें तेज हो गई हैं। यह फैसला आगामी चुनाव में कांग्रेस की नई रणनीति और सामाजिक संतुलन साधने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस एक बार फिर नई रणनीति के साथ वापसी की जमीन तैयार करने में जुटी है। करीब साढ़े तीन दशक से प्रदेश की सत्ता से दूर कांग्रेस अब विधानसभा चुनाव से पहले अपने संगठन और सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से गढ़ने में लगी है। इसी कड़ी में पार्टी ने बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए वरिष्ठ दलित नेता राजेन्द्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का प्रभारी नियुक्त किया है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि दलित वोट बैंक में अपनी खोई हुई पकड़ को दोबारा मजबूत करने की कांग्रेस की एक बड़ी रणनीति है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित और पिछड़ा वर्ग आज भी सत्ता की चाबी माना जाता है और लगभग सभी दल इन वर्गों को अपने साथ जोड़ने के लिए नए-नए राजनीतिक प्रयोग कर रहे हैं।

दलित चेहरे पर कांग्रेस का बड़ा दांव

कांग्रेस नेतृत्व ने प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय को हटाकर राजेन्द्र पाल गौतम को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। गौतम की पहचान एक आक्रामक अंबेडकरवादी नेता और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेता के रूप में रही है। वह लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी की विचारधारा से जुड़े रहे और बसपा संस्थापक कांशीराम के साथ भी काम कर चुके हैं।

See also  तथ्यों की कसौटी पर सियासत : क्या विपक्ष की रणनीति फिर पड़ रही है भारी?

बाद में उन्होंने आम आदमी पार्टी का दामन थामा और दिल्ली सरकार में मंत्री भी बने। हालांकि, एक विवादित बयान के बाद उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ा था। इसके बावजूद उनकी राजनीतिक सक्रियता और दलित समाज में उनकी पहचान बनी रही।

कांग्रेस को उम्मीद है कि गौतम की नियुक्ति से अनुसूचित जाति समुदाय के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ेगी और वह भाजपा तथा बसपा के बीच बंटे दलित वोटों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकेगी।

तीन दशक बाद फिर दलित नेता को मिली जिम्मेदारी

राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि करीब तीन दशक बाद कांग्रेस ने किसी दलित नेता को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है। इससे पहले वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे को यह जिम्मेदारी मिली थी। उनके बाद प्रदेश की कमान लंबे समय तक सवर्ण या मुस्लिम नेताओं के हाथों में रही।

हाल के वर्षों में प्रियंका गांधी और फिर अविनाश पांडेय ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस के संगठन की जिम्मेदारी संभाली, लेकिन पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के कारण कांग्रेस को कुछ सफलता जरूर मिली, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर पार्टी कमजोर बनी रही।

अविनाश पांडेय के कामकाज पर उठे सवाल

पार्टी के भीतर यह चर्चा लंबे समय से चल रही थी कि अविनाश पांडेय प्रदेश संगठन को अपेक्षित गति देने में सफल नहीं हो पाए। क्षेत्रीय अध्यक्षों और स्थानीय नेताओं के साथ उनका तालमेल भी बहुत अच्छा नहीं माना जा रहा था।

विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिहाज से भी उनकी सक्रियता सीमित दिखाई दी। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व ने बदलाव का निर्णय लेते हुए राजेन्द्र पाल गौतम पर भरोसा जताया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस अब केवल चेहरों के बदलाव तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वह सामाजिक आधार को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है।

See also  राम मंदिर चढ़ावा चोरी जांच में नया मोड़, टिन्नू यादव की पुलिस रिमांड पर उठे सवाल

मायावती से मुलाकात की कोशिश ने बढ़ाई थी चर्चाएं

राजेन्द्र पाल गौतम पिछले दिनों उस समय चर्चा में आए थे, जब वह कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया के साथ बसपा सुप्रीमो मायावती से मिलने उनके लखनऊ स्थित आवास पहुंचे थे। हालांकि, उनकी मुलाकात नहीं हो सकी, लेकिन इस कदम ने प्रदेश की राजनीति में कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया था।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि यह मुलाकात आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और बसपा के संभावित गठबंधन की संभावनाओं को टटोलने की कोशिश थी। हालांकि, इस संबंध में किसी भी दल ने आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा।

राजेन्द्र पाल गौतम ने तब सफाई देते हुए कहा था कि मायावती उनके समाज की सबसे बड़ी नेता हैं और वह केवल उनका कुशलक्षेम जानने गए थे।

दलित और पिछड़े वर्ग पर कांग्रेस की नजर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय पिछड़े और दलित वर्ग सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र बने हुए हैं। भाजपा, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सभी इन वर्गों को अपने पक्ष में करने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।

कांग्रेस भी अब इसी सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश कर रही है। पार्टी पिछले कुछ समय से संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे लगातार दलित और पिछड़े वर्गों के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।

राजेन्द्र पाल गौतम को पहले पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग की कमान भी सौंपी गई थी। दिल्ली में उन्होंने दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के कई बड़े सम्मेलन आयोजित किए, जिसके कारण पार्टी नेतृत्व उनके संगठनात्मक कौशल से प्रभावित हुआ।

क्या बदलेंगे प्रदेश अध्यक्ष अजय राय?

प्रदेश प्रभारी बदलने के साथ ही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। पार्टी के भीतर संगठन में व्यापक बदलाव की अटकलें लगाई जा रही हैं।

See also  'साहब, मैं जिंदा हूं', : जिंदा महिला को मृत घोषित कर बंद कर दी वृद्धा पेंशन

सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए प्रदेश अध्यक्ष पद पर भी नया चेहरा ला सकती है। विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल की नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ और सांसद राकेश राठौर जैसे नेताओं के नाम चर्चा में बताए जा रहे हैं।

इसके अलावा सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को भी संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिलने की संभावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि कांग्रेस जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखकर संगठन में बड़े बदलाव कर सकती है।

बसपा से गठबंधन की संभावना पर भी नजर

कांग्रेस के एक वर्ग का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की तुलना में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन पार्टी के लिए अधिक फायदेमंद साबित हो सकता है।

हालांकि, बसपा सुप्रीमो मायावती कई बार साफ कर चुकी हैं कि उनकी पार्टी किसी भी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी और अकेले चुनाव मैदान में उतरेगी।

इसके बावजूद राजेन्द्र पाल गौतम की नियुक्ति को कुछ राजनीतिक जानकार कांग्रेस और बसपा के बीच संवाद की संभावनाओं से जोड़कर भी देख रहे हैं।

कांग्रेस की सियासी परीक्षा शुरू

राजेन्द्र पाल गौतम को प्रदेश प्रभारी बनाकर कांग्रेस ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में दलित राजनीति को अपनी रणनीति के केंद्र में रखने जा रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह नया दांव कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में खोया हुआ जनाधार वापस दिला पाएगा या फिर यह प्रयोग भी पिछले प्रयासों की तरह सीमित असर तक ही सिमट जाएगा।

फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस ने एक नई सियासी चाल चल दी है और आने वाले महीनों में इसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

यायावर
Author: यायावर

यायावर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें