कागज़ों में पूरी हुई योजनाएं, ग्रामीण आज भी बूंद-बूंद पानी को मोहताज सरकारी दावों की खुली पोल, जिला मुख्यालय से सटे गांव में नहीं पहुंचा ‘हर घर नल जल’ का लाभ
कालूपुर (पाही) में पेयजल संकट
महिलाओं को सुबह से ही पानी की तलाश में निकलना पड़ता है। कई बार उन्हें दूर-दराज के स्रोतों से पानी लाना पड़ता है। इससे उनका समय और श्रम दोनों बर्बाद होता है। बच्चों की पढ़ाई और दैनिक जीवन भी इस संकट से प्रभावित हो रहा है।
रिपोर्ट: संजय सिंह राणा
चित्रकूट। एक ओर केंद्र और प्रदेश सरकार ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय चित्रकूट से सटे पाही विकासखंड के कालूपुर गांव की तस्वीर इन दावों की हकीकत बयां कर रही है। गांव में पेयजल संकट इतना गहरा गया है कि ग्रामीणों को आज भी पीने के पानी के लिए लंबी मशक्कत करनी पड़ रही है। सबसे अधिक परेशानी अनुसूचित जाति बस्ती के लोगों को झेलनी पड़ रही है, जहां न तो हैंडपंप पर्याप्त हैं और न ही पाइपलाइन से जलापूर्ति की व्यवस्था सुचारू रूप से शुरू हो सकी है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी अभिलेखों में जल जीवन मिशन और हर घर नल जल योजना के तहत कार्य पूरे दिखाए जा चुके हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात बिल्कुल विपरीत हैं। पाइपलाइन बिछा दी गई है, लेकिन पानी की एक बूंद भी लोगों तक नहीं पहुंच रही है। इससे ग्रामीणों में भारी नाराजगी व्याप्त है।
अनुसूचित जाति बस्ती में सबसे अधिक संकट
गांव की अनुसूचित जाति बस्ती में रहने वाले परिवार लंबे समय से पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं। ग्रामीण बताते हैं कि बस्ती में पर्याप्त हैंडपंप नहीं हैं और जो हैं, उनमें से कई खराब पड़े हुए हैं या उनका जलस्तर नीचे चला गया है। गर्मी के दिनों में स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है।
महिलाओं को सुबह से ही पानी की तलाश में निकलना पड़ता है। कई बार उन्हें दूर-दराज के स्रोतों से पानी लाना पड़ता है। इससे उनका समय और श्रम दोनों बर्बाद होता है। बच्चों की पढ़ाई और दैनिक जीवन भी इस संकट से प्रभावित हो रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार अधिकारियों को समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन समाधान के नाम पर केवल आश्वासन ही मिले हैं। लोगों का आरोप है कि बस्ती की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।
टैंकर से जलापूर्ति के दावे भी खोखले
स्थानीय लोगों के अनुसार गांव में पानी की समस्या को देखते हुए टैंकर से जलापूर्ति किए जाने की बात कही गई थी। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश ग्रामीणों को नियमित रूप से टैंकर का पानी नहीं मिल रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि कभी-कभार टैंकर पहुंचता भी है तो उससे पूरे गांव की आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती। कई परिवारों को पानी मिलने से पहले ही टैंकर खाली हो जाता है। इससे लोगों को मजबूर होकर दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि यदि टैंकर व्यवस्था प्रभावी ढंग से संचालित की जाए तो अस्थायी राहत मिल सकती है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था लोगों की जरूरतों को पूरा करने में असफल साबित हो रही है।
पाइपलाइन बिछी, लेकिन नहीं मिला पानी
ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत जल जीवन मिशन के तहत बिछाई गई पाइपलाइन को लेकर है। गांव में जगह-जगह पाइपलाइन बिछाने का कार्य किया गया। लोगों को उम्मीद थी कि अब उनके घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचेगा और वर्षों पुरानी समस्या समाप्त हो जाएगी।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि पाइपलाइन बिछाने के बाद भी जलापूर्ति शुरू नहीं की गई। कई स्थानों पर पाइप दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं पहुंच रहा। लोगों का कहना है कि योजना के नाम पर निर्माण कार्य तो हुआ, लेकिन उसका लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पाया।
कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि कार्य की गुणवत्ता भी जांच का विषय है। उनका कहना है कि यदि योजना का सही क्रियान्वयन हुआ होता तो आज गांव के लोग पानी के लिए परेशान नहीं होते।
‘हर घर नल जल’ योजना पर उठ रहे सवाल
सरकार द्वारा चलाई जा रही ‘हर घर नल जल’ योजना का उद्देश्य प्रत्येक घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना है। कालूपुर गांव में भी इसी योजना के तहत पाइपलाइन बिछाने और जलापूर्ति व्यवस्था विकसित करने का दावा किया गया।
लेकिन गांव की स्थिति देखकर योजना के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई स्थानों पर नलों के लिए आवश्यक ढांचा ही तैयार नहीं किया गया। कहीं पाइपलाइन अधूरी दिखाई देती है तो कहीं जलापूर्ति का कोई प्रमाण नहीं मिलता।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि योजना पूरी हो चुकी है तो फिर पानी क्यों नहीं मिल रहा? आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद लोगों को पेयजल के लिए भटकना क्यों पड़ रहा है?
सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
गांव के लोगों का कहना है कि कागजों में योजनाएं पूरी दिखाई जा रही हैं, लेकिन धरातल पर हालात बदतर हैं। प्रशासन और संबंधित विभागों द्वारा पेयजल व्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, परंतु गांव के लोग आज भी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के सामने समस्या रखी गई, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल सका। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में संकट और गहरा सकता है।
महिलाओं और बच्चों पर सबसे अधिक असर
पेयजल संकट का सबसे अधिक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है। पानी की व्यवस्था करने में महिलाओं का काफी समय निकल जाता है। कई बार उन्हें कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। इससे घरेलू कार्यों के साथ-साथ उनकी सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।
बच्चों को भी पानी लाने में परिवार की मदद करनी पड़ती है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। ग्रामीणों का कहना है कि स्वच्छ पानी न मिलने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ने की आशंका बनी रहती है।
ग्रामीणों ने की जांच और कार्रवाई की मांग
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जल जीवन मिशन और हर घर नल जल योजना के तहत हुए कार्यों की गुणवत्ता तथा प्रगति की समीक्षा की जाए। यदि कहीं अनियमितता हुई है तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
ग्रामीण चाहते हैं कि गांव में तत्काल प्रभाव से नियमित पेयजल आपूर्ति शुरू की जाए, खराब हैंडपंपों की मरम्मत कराई जाए और टैंकर व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए, ताकि लोगों को राहत मिल सके।
प्रशासन की ओर टिकी ग्रामीणों की निगाहें
अब गांव के लोगों की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस गंभीर समस्या का संज्ञान लेकर आवश्यक कार्रवाई करेगा? क्या जल जीवन मिशन और हर घर नल जल योजना का वास्तविक लाभ कालूपुर के ग्रामीणों तक पहुंच पाएगा? या फिर सरकारी योजनाओं के दावे केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे?
फिलहाल कालूपुर (पाही) के ग्रामीणों का एक ही सवाल है— जब पाइपलाइन बिछ गई, योजनाएं पूरी हो गईं और करोड़ों रुपये खर्च हो गए, तो आखिर उन्हें पीने का साफ पानी कब मिलेगा? यह प्रश्न आज भी जवाब की प्रतीक्षा कर रहा है।








