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मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना में तकनीक का कमाल : 42,781 फर्जी आवेदन पकड़े

नकली दुल्हन और शादीशुदा दूल्हे के मामले ने खोली धोखाधड़ी की परतें, डिजिटल सत्यापन व्यवस्था बनी गरीबों की हकदार सहायता की गारंटी

रिपोर्ट: कमलेश कुमार चौधरी

उत्तर प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए एक बड़ी सामाजिक सहायता योजना के रूप में स्थापित हो चुकी है। इस योजना का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों की बेटियों के विवाह में आर्थिक सहयोग प्रदान करना है, ताकि गरीबी किसी बेटी के विवाह में बाधा न बने। लेकिन हाल के वर्षों में इस योजना का लाभ लेने के लिए कुछ लोगों द्वारा धोखाधड़ी के प्रयास भी सामने आए हैं। अब आधुनिक तकनीक और डिजिटल सत्यापन प्रणाली ने ऐसे फर्जीवाड़ों पर प्रभावी अंकुश लगाना शुरू कर दिया है।

हाल ही में कन्नौज में सामने आया एक मामला इस बात का उदाहरण बन गया कि तकनीक किस तरह सरकारी योजनाओं को पारदर्शी और सुरक्षित बना रही है। यहां एक शादीशुदा व्यक्ति ने स्वयं को अविवाहित बताकर योजना का लाभ लेने का प्रयास किया। आरोप है कि उसके साथ एक नकली दुल्हन भी लाई गई थी। हालांकि, तकनीकी जांच और दस्तावेजों के मिलान के दौरान गड़बड़ी सामने आ गई। जैसे ही अधिकारियों ने सवाल पूछने शुरू किए, कथित तौर पर बारात और संबंधित लोग कार्यक्रम स्थल से गायब हो गए। यदि यह मामला पकड़ में नहीं आता तो सरकारी धन का दुरुपयोग हो सकता था।

डिजिटल सत्यापन से बचा करोड़ों रुपये का नुकसान

समाज कल्याण विभाग द्वारा लागू की गई नई डिजिटल निगरानी प्रणाली का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान कुल 42,781 ऐसे आवेदकों की पहचान की गई जो योजना की पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करते थे। इन आवेदनों को अंतिम स्वीकृति से पहले ही निरस्त कर दिया गया।

मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के अंतर्गत प्रत्येक पात्र जोड़े को एक लाख रुपये की सहायता प्रदान की जाती है। इस हिसाब से यदि ये सभी अपात्र आवेदन स्वीकृत हो जाते, तो सरकारी खजाने से लगभग 427.81 करोड़ रुपये का भुगतान गलत लाभार्थियों को हो सकता था। डिजिटल जांच के कारण यह पूरी राशि बचा ली गई।

यह उपलब्धि केवल वित्तीय बचत का मामला नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि तकनीक का सही उपयोग सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को कितना मजबूत बना सकता है।

तकनीक ने बढ़ाया पारदर्शिता पर भरोसा

समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण ने योजना की सफलता पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा के अनुरूप यह योजना वास्तव में जरूरतमंद परिवारों की सहायता के लिए बनाई गई है। उन्होंने कहा कि अतीत में कुछ अनियमितताओं और फर्जीवाड़े की शिकायतें सामने आती थीं, लेकिन अब तकनीकी साधनों की मदद से ऐसे मामलों को प्रभावी ढंग से रोका जा रहा है।

मंत्री के अनुसार डिजिटल सत्यापन ने योजना को अधिक पारदर्शी, विश्वसनीय और जवाबदेह बनाया है। इससे यह सुनिश्चित हो रहा है कि सरकारी सहायता केवल उन्हीं लोगों तक पहुंचे जो वास्तव में इसके हकदार हैं।

आईरिस और बायोमेट्रिक जांच बनी धोखेबाजों की चुनौती

विभागीय अधिकारियों के अनुसार अब योजना के अंतर्गत आवेदन करने वाले प्रत्येक लाभार्थी की कई स्तरों पर जांच की जाती है। इसमें आधार आधारित पहचान सत्यापन, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, आईरिस स्कैन, आय प्रमाणपत्र की ऑनलाइन जांच और विभिन्न सरकारी डेटाबेस के साथ रिकॉर्ड का मिलान शामिल है।

इस बहुस्तरीय सत्यापन प्रणाली के कारण फर्जी पहचान, गलत दस्तावेज और झूठी जानकारी देकर योजना का लाभ लेना लगभग असंभव होता जा रहा है। कन्नौज की घटना इसी मजबूत व्यवस्था का परिणाम मानी जा रही है, जहां कथित धोखाधड़ी अंतिम चरण तक पहुंचने से पहले ही पकड़ ली गई।

अधिकारियों का कहना है कि सुर्खियों में आने वाले मामले तो कुछ ही होते हैं, लेकिन हजारों ऐसे आवेदन भी हैं जिन्हें तकनीकी जांच के दौरान प्रारंभिक स्तर पर ही रोक दिया जाता है।

ऐसे मिलती है एक लाख रुपये की सहायता

मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के अंतर्गत दी जाने वाली एक लाख रुपये की सहायता राशि को अलग-अलग मदों में विभाजित किया गया है। समाज कल्याण विभाग के उपनिदेशक आर. पी. सिंह के अनुसार पात्र जोड़े को मिलने वाली राशि में 60 हजार रुपये सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में हस्तांतरित किए जाते हैं।

इसके अतिरिक्त 25 हजार रुपये मूल्य की घरेलू और वैवाहिक उपयोग की सामग्री उपलब्ध कराई जाती है, जबकि 15 हजार रुपये विवाह समारोह और आयोजन संबंधी व्यवस्थाओं पर खर्च किए जाते हैं।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य भर में कुल 76,522 पात्र जोड़ों का विवाह इस योजना के माध्यम से संपन्न कराया गया। सभी लाभार्थियों की जांच और सत्यापन के बाद ही उन्हें सहायता के लिए पात्र माना गया।

पीलीभीत बना सबसे आगे, हजारों परिवारों को मिला लाभ

जिलावार आंकड़े बताते हैं कि योजना का लाभ प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर पहुंच रहा है। वर्ष 2025-26 में पीलीभीत जिला सबसे आगे रहा, जहां 4,207 जोड़ों का विवाह इस योजना के माध्यम से संपन्न हुआ।

इसके बाद बिजनौर में 3,071 और महराजगंज में 3,070 विवाह दर्ज किए गए। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि योजना ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच व्यापक प्रभाव छोड़ रही है।

कौन उठा सकता है योजना का लाभ?

मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना का लाभ लेने के लिए कुछ निर्धारित पात्रता शर्तें हैं। दुल्हन का उत्तर प्रदेश का स्थायी निवासी होना आवश्यक है। इसके साथ ही परिवार की वार्षिक आय तीन लाख रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए।

योजना के लिए महिला की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई है। अविवाहित युवतियों के साथ-साथ विधवा और तलाकशुदा महिलाएं भी इस योजना के लिए पात्र हैं।

सरकार द्वारा निराश्रित महिलाओं, विधवाओं की बेटियों तथा दिव्यांग कन्याओं को प्राथमिकता भी प्रदान की जाती है, ताकि समाज के सबसे कमजोर वर्गों को पहले सहायता मिल सके।

तकनीक बदल रही है कल्याणकारी योजनाओं की तस्वीर

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना अब केवल एक सामाजिक सहायता कार्यक्रम नहीं रह गई है, बल्कि यह डिजिटल गवर्नेंस का सफल मॉडल बनती जा रही है। एल्गोरिदम आधारित जांच, डेटा मिलान और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसी तकनीकें यह सुनिश्चित कर रही हैं कि सरकारी धन का उपयोग सही हाथों तक पहुंचे।

आज जब सरकारें कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार कम करने के लिए तकनीकी समाधान तलाश रही हैं, तब उत्तर प्रदेश का यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है।

इस योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल हजारों विवाहों का सफल आयोजन नहीं, बल्कि वह 427.81 करोड़ रुपये की राशि है जो फर्जी लाभार्थियों तक पहुंचने से पहले ही बचा ली गई। यह दर्शाता है कि तकनीक और सुशासन का मेल जनता के विश्वास को मजबूत करने के साथ-साथ सरकारी संसाधनों की रक्षा भी कर सकता है।

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