खास बात

बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत : जून के बिल में 10% फ्यूल सरचार्ज पर आयोग की रोक, नए आकलन के आदेश

बिजली उपभोक्ताओं के हित में आयोग का बड़ा फैसला

चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं को जून महीने में आने वाले बिजली बिल को लेकर बड़ी राहत मिली है। उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने बिजली कंपनियों द्वारा प्रस्तावित 10 प्रतिशत अतिरिक्त फ्यूल सरचार्ज (ईंधन अधिभार) को नियमों के विपरीत बताते हुए उस पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि बिजली कंपनियां पुराने बकाया भुगतान और पूर्व अवधि की देनदारियों को जोड़कर उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं डाल सकतीं।

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए आयोग ने पावर कॉरपोरेशन को सात दिनों के भीतर संशोधित और वास्तविक आकलन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। आयोग के इस निर्णय को प्रदेश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है।

क्या है फ्यूल सरचार्ज का पूरा मामला?

बिजली उत्पादन और खरीद की लागत में होने वाले उतार-चढ़ाव को समायोजित करने के लिए फ्यूल सरचार्ज लगाया जाता है। सामान्यतः यह अतिरिक्त शुल्क उस स्थिति में लगाया जाता है जब बिजली खरीद की वास्तविक लागत आयोग द्वारा निर्धारित लागत से अधिक हो जाती है।

पावर कॉरपोरेशन ने जून 2026 के बिजली बिलों में 10 प्रतिशत अतिरिक्त फ्यूल सरचार्ज लगाने का प्रस्ताव तैयार किया था। इस प्रस्ताव के अनुसार उपभोक्ताओं को अपने नियमित बिजली बिल के अलावा अतिरिक्त राशि का भुगतान करना पड़ता। हालांकि उपभोक्ता परिषद ने इस प्रस्ताव को चुनौती देते हुए आयोग से हस्तक्षेप की मांग की थी।

आयोग ने क्यों बताया नियमों के विरुद्ध?

सुनवाई के दौरान आयोग ने बहुवर्षीय टैरिफ विनियम-2025 (MYT Regulations-2025) का हवाला देते हुए कहा कि नियम केवल तीसरे महीने में बिजली खरीद और ईंधन लागत में आए वास्तविक अतिरिक्त खर्च को समायोजित करने की अनुमति देते हैं।

आयोग ने पाया कि पावर कॉरपोरेशन ने मार्च 2026 की लागत के साथ-साथ पूर्व अवधि के भुगतान और पुराने बकाया दावों को भी जोड़कर फ्यूल सरचार्ज की गणना की है। नियामक आयोग के अनुसार ऐसा करने का कोई स्पष्ट प्रावधान वर्तमान नियमों में मौजूद नहीं है। इसी आधार पर आयोग ने 10 प्रतिशत फ्यूल सरचार्ज के आकलन को प्रथम दृष्टया नियमों के विपरीत माना और कॉरपोरेशन से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा।

सात दिनों में देना होगा नया ब्यौरा

आयोग ने पावर कॉरपोरेशन को निर्देश दिया है कि वह सात दिनों के भीतर मार्च 2026 की वास्तविक बिजली खरीद लागत का पुनः आकलन कर प्रस्तुत करे। इसके साथ ही कॉरपोरेशन को यह भी बताना होगा कि अपटेल (APTEL) के आदेशों के अनुपालन में किए गए भुगतानों को किस आधार पर फ्यूल सरचार्ज गणना में शामिल किया गया।

आयोग ने यह भी पूछा है कि किन नियमों और प्रावधानों के तहत पुराने भुगतान को जोड़कर जून महीने के लिए अतिरिक्त अधिभार निर्धारित किया गया। इस आदेश के बाद अब पूरे मामले की दोबारा समीक्षा होगी और उपभोक्ताओं पर प्रस्तावित अतिरिक्त बोझ की वैधता का परीक्षण किया जाएगा।

उपभोक्ता परिषद ने उठाए गंभीर सवाल

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने आयोग के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यदि मार्च 2026 की वास्तविक बिजली खरीद लागत का निष्पक्ष आकलन किया जाए तो उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत भार डालने की कोई आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने दावा किया कि आयोग द्वारा स्वीकृत बिजली खरीद लागत लगभग 4.94 रुपये प्रति यूनिट थी, जबकि मार्च 2026 के लिए लगभग 5.86 रुपये प्रति यूनिट की खरीद लागत दर्शाई गई। इससे उपभोक्ताओं पर लगभग 1610 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने की कोशिश की गई।

परिषद का कहना है कि यह अंतर वास्तविक परिस्थितियों की तुलना में कहीं अधिक दिखाया गया, जिससे उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंच सकता था।

10 प्रतिशत अधिभार की जगह मिल सकती है राहत

उपभोक्ता परिषद का दावा है कि यदि केवल वास्तविक ऊर्जा खरीद लागत को आधार बनाया जाए तो उपभोक्ताओं को अतिरिक्त भुगतान करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

परिषद के अनुसार वास्तविक गणना के आधार पर उपभोक्ताओं को 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क देने के बजाय लगभग 2 प्रतिशत तक की राहत भी मिल सकती है। यही कारण है कि परिषद लगातार इस मामले की निष्पक्ष जांच और पुनर्गणना की मांग कर रही है। यदि यह दावा सही साबित होता है तो लाखों घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं को बड़ी आर्थिक राहत मिल सकती है।

फरवरी में भी उठा था विवाद

यह पहला अवसर नहीं है जब फ्यूल सरचार्ज को लेकर विवाद सामने आया हो। परिषद के अनुसार फरवरी 2026 में भी उपभोक्ताओं से 10 प्रतिशत फ्यूल सरचार्ज वसूला गया था।

उस मामले में भी आयोग ने स्पष्टीकरण मांगा था और वह प्रकरण अभी विचाराधीन है। ऐसे में जून महीने के लिए दोबारा 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव कई सवाल खड़े करता है। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि यदि पूर्व मामलों की जांच पूरी नहीं हुई है तो नए अधिभार की घोषणा उचित नहीं मानी जा सकती।

पुराने बकायों को जोड़ने पर आपत्ति

उपभोक्ता परिषद ने आरोप लगाया है कि मार्च 2026 की बिजली खरीद लागत के साथ लगभग 1400 करोड़ रुपये के पुराने बकाया दावों और पूर्व अवधि की देनदारियों को भी जोड़ दिया गया।

परिषद का मानना है कि यह प्रक्रिया नियामकीय व्यवस्था और पारदर्शिता के सिद्धांतों के विरुद्ध है। यदि पुराने भुगतान को अलग-अलग अवधियों में समायोजित करने के बजाय एक साथ उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा तो बिजली बिल अनावश्यक रूप से बढ़ जाएंगे। यही कारण है कि परिषद ने आयोग से पूरे मामले की गहन जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

उपभोक्ताओं के लिए क्या होगा असर?

आयोग के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल जून महीने में प्रस्तावित 10 प्रतिशत अतिरिक्त फ्यूल सरचार्ज पर अनिश्चितता की स्थिति बन गई है। यदि पुनर्गणना में परिषद के दावे सही पाए जाते हैं तो उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिल सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी गणना प्रणाली और नियामकीय नियमों का पालन उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। आयोग का यह कदम भविष्य में बिजली दरों और अधिभार निर्धारण की प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह बना सकता है।

उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग का यह फैसला बिजली उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोग ने स्पष्ट संकेत दिया है कि नियमों से हटकर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता। अब सभी की निगाहें पावर कॉरपोरेशन द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले नए आकलन पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि जून महीने के बिजली बिल में उपभोक्ताओं को अतिरिक्त भुगतान करना होगा या फिर उन्हें राहत मिलेगी।

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