चलो गाँव की ओर

“मौसम अब किसान का साथी नहीं, डर बन गया है…”

गोंडा के गांव से चुन्नीलाल प्रधान और संपादक के बीच लंबी टेलीफोनिक बातचीत

सुबह का वक्त था। धूप अभी पूरी तरह आग नहीं बनी थी, लेकिन हवा में गर्मी की बेचैनी तैरने लगी थी। खेतों के ऊपर से उड़ती धूल, सूखती मेड़ें और आसमान में टंगे बिखरे बादल किसी अनहोनी का संकेत देते लग रहे थे। तभी फोन की घंटी बजी।

स्क्रीन पर नाम चमका— “चुन्नीलाल प्रधान, गोंडा…”

बरसों से गांव-गांव की मिट्टी, किसान और मौसम की नब्ज पकड़ने वाले जनगणदूत.कॉम के पुराने सहयोगी चुन्नीलाल प्रधान।फोन उठाते ही उधर से गंवई अपनापन छलका— “का हो संपादक जी… शहर मा बैठ के मौसम देखत होईं, कि खेत-खार की खबर भी लेत हो?”

संपादक हल्का हंसे— “अरे प्रधान जी, शहर का मौसम टीवी पर बदलता है… असली मौसम तो गांव में बदलता है। बताइए, गोंडा का का हाल बा?” उधर से लंबी सांस सुनाई दी। “हाल पूछत हउअ… किसानन का हाल अब भगवानो ना पूछत होई…” बस, यहीं से शुरू हुई खेत, किसान, मौसम और टूटती उम्मीदों पर लंबी बातचीत।

“बारिश अब बरकत नहीं, आफत बन गई है”

संपादक: “प्रधान जी, इस बार किसान सबसे ज्यादा किस बात से डरा है? गर्मी से, बारिश से या सूखे से?”

चुन्नीलाल प्रधान: “डर अब एक चीज से थोड़ी ना रहिगा संपादक जी… अब त किसान बादर देख के डेरात है अउर धूप देख के घबरात है। बरसात होई त फसल सड़ जाई… ना होई त सूख जाई। किसान जाए त जाए कहाँ?” फिर थोड़ा ठहरकर बोले— “पहिले मौसम के भरोसा रहा। अब मौसम जुआ बन गवा है।”

“खेती अब पूजा नहीं, जोखिम हो गई है”

संपादक: “गांवों में माहौल कैसा है अभी?”

प्रधान: “का बताईं… गांव मा हर आदमी आसमान ताकत फिरत है। कौनो कहत है पानी पड़ जाए त धान बच जाए… कौनो कहत है अभी पानी गिर गवा त भूसा भी ना बचे।” “गोंडा के तरबगंज, मनकापुर, कटरा, वजीरगंज सब ओर किसान परेशान है। खेत कट गवा, लेकिन मन अभी तक नहीं संभरा।”

“एक बारिश पूरा साल खा जाती है”

संपादक: “पिछले साल का असर अभी तक है क्या?”

प्रधान: “अरे संपादक जी, पिछला साल किसान भुला ही कहाँ पाया है! कटाई के टाइम पानी गिरा रहा। गेहूं खेत मा लेट गवा। जौ किसान बेटी की शादी का सपना देखत रहा, उ आज तक उधारी चुकावत फिरत है।” फिर अचानक उनकी आवाज भर्रा गई—

“एक हरिराम यादव है… दुई बीघा खेत। कहत रहा— ‘भगवान पानी भी समय से ना देत, अउर रोकत भी समय से ना।’” कुछ पल के लिए दोनों तरफ सन्नाटा छा गया।

“मौसम विभाग मोबाइल में है, भरोसा कहीं नहीं”

संपादक:“अब तो गांवों में लोग मोबाइल पर मौसम देखने लगे होंगे?”

प्रधान (हंसते हुए): “मोबाइल त सब देखत हैं, लेकिन मौसम मोबाइल से कहाँ चलत है संपादक जी!” “कभी कहत हैं आंधी आई… कुछो ना होत।  कभी कहत हैं साफ मौसम रही… अउर ओले पड़ जात हैं।” “अब किसान मोबाइल कम, आसमान ज्यादा देखत है।”

“खेती में लागत बढ़ी, हिम्मत घटी”

संपादक: “सबसे ज्यादा परेशानी किस चीज की है?”

प्रधान: “सब चीज की है! डीजल महंगा… खाद महंगी… बीज महंगा… मजदूरी महंगी…
बस किसान का अनाज सस्ता!” किसान खेत कम जोत रहा, हिसाब ज्यादा लगा रहा है।” फिर गंवई अंदाज में बोले— “खेती अब पेट से ज्यादा माथा खा रही है।”

“गांव का किसान रात में सो नहीं पा रहा”

संपादक: “क्या सचमुच किसान इतना मानसिक दबाव झेल रहा है?”

प्रधान: “अरे संपादक जी, शहर वाले समझते हैं किसान बस हल चला रहा। जरा गांव में रात बिताइए… हल्की हवा चली नहीं कि आदमी उठ के बाहर झांकने लगता है। बादर गरजा नहीं कि लोग खेत की ओर दौड़ पड़ते हैं।” किसान दिन में खेत जोतता है… रात में चिंता।”

“अब बाप खुद बेटे से कह रहा— खेती मत करना”

संपादक: “युवा खेती छोड़ रहे हैं?”

प्रधान: “बहुत तेजी से!” अब गांव मा बाप खुद कहत है— बबुआ, कुछो कर लइयो… लेकिन खेती मत करियो। जिस खेती ने पीढ़ी पाली, वही अब बोझ लगने लगी है।”

“गांव की चौपाल बदल गई”

संपादक: “पहले और अब के गांव में सबसे बड़ा फर्क क्या दिखता है?”

प्रधान: “पहिले चौपाल पर बीज, बैल अउर पैदावार की बात होत रही। अब कर्जा, मौसम अउर मुआवजा की बात होत है।” पहिले किसान खेत देखकर मुस्कुरात रहा। अब खेत देखकर हिसाब लगावत है।”

“सरकारी मदद कागज में ज्यादा दिखती है”

संपादक: “सरकार की योजनाओं का फायदा नहीं पहुंच रहा?”

प्रधान: “देखिए, योजना खराब नहीं कहेंगे… लेकिन गांव तक पहुंचते-पहुंचते किसान थक जाता है। फसल बीमा का पैसा कब आई… कितना आई… का कट गई… किसान को खुदे नहीं पता चलता। जिनके खेत डूब जाते हैं, कई बार उनका नाम सूची में तक नहीं आता।”

फिर गंवई तंज कसते हुए बोले— “कागज पर किसान खूब बचा लिया जाता है संपादक जी… असली किसान खेत में रोता रह जाता है।”

“मौसम अब किसान का दोस्त नहीं रहा”

संपादक: “आप इतने साल से गांव देख रहे हैं। सबसे बड़ा बदलाव क्या लगा?”

प्रधान: “मौसम का मिजाज।” पहिले किसान कहत रहा— ‘भगवान जैसा चाही वैसा करिहैं।’
अब कहत है— ‘हे भगवान, बस ज्यादा मत करिहौ। अब हर मौसम डर लेकर आता है।”

“किसान सिर्फ अनाज नहीं, उम्मीद बोता है”

संपादक: “इतनी मार के बाद भी किसान टूटता क्यों नहीं?”

प्रधान: “काहे कि किसान दुनिया का सबसे जिद्दी आदमी है। फसल बर्बाद हो जाई… कर्जा बढ़ जाई… घर में तंगी हो जाई…
फिर भी अगली सुबह वही किसान खेत पहुंच जाता है।” “काहे? काहे कि उ सिर्फ गेहूं-धान नहीं बोता… उम्मीद बोता है।”

“शहर वालों को किसान का दर्द समझना होगा”

संपादक: “शहर के लोग किसान की परेशानी समझते हैं क्या?”

प्रधान: “बहुत कम। शहर मा बारिश मतलब मौसम सुहाना। गांव मा बारिश मतलब दिल धड़कना। शहर वाले छत से पानी देखते हैं… किसान खेत से नुकसान।”

“अगर किसान हार गया, तो देश भूखा हो जाएगा”

बातचीत अब भावुक मोड़ पर पहुंच चुकी थी।

संपादक: “प्रधान जी, आखिर सबसे बड़ी चिंता क्या है?” उधर कुछ क्षण चुप्पी रही। फिर धीमी आवाज आई— “चिंता ये है संपादक जी… किसान धीरे-धीरे अंदर से टूट रहा है।” “अगर खेत छोड़ दिया उसने… तो शहर की चमक भी ज्यादा दिन नहीं टिकेगी।”

आखिरी सवाल… और भर्राई हुई आवाज

संपादक: “तो इस वक्त गोंडा का किसान भगवान से क्या मांग रहा है?”

प्रधान: “बस इत्ते कि मौसम इंसानियत दिखा दे…”

फिर हल्की हंसी के साथ बोले— “बाकी किसान त हर साल मर-मर के भी जीना सीख ही लेता है।” फोन कट गया। लेकिन गोंडा के गांव से आई वह गंवई आवाज देर तक कानों में गूंजती रही। क्योंकि सच यही है— मौसम बदलता है… सरकारें बदलती हैं… नीतियां बदलती हैं…लेकिन किसान की चिंता कभी नहीं बदलती।

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