चित्रकूट के पाठा में जल संकट दूर करने की बड़ी पहल : बिना सरकारी खर्च बन रहा तालाब, हजारों ग्रामीणों को मिलेगा फायदा
संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
चित्रकूट। बुंदेलखंड के सबसे अधिक जल संकट वाले क्षेत्रों में शामिल चित्रकूट का पाठा इलाका वर्षों से पेयजल की गंभीर समस्या से जूझता रहा है। हर साल गर्मियों में यहां के दर्जनों गांवों में हैंडपंप जवाब दे देते हैं, कुएं सूख जाते हैं और ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है। ऐसे समय में मानिकपुर तहसील के मड़ैयन गांव में बिना किसी सरकारी खर्च के तैयार हो रहा तालाब न केवल जल संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, बल्कि यह प्रशासन और कार्यदायी संस्था के समन्वय का ऐसा मॉडल भी बन सकता है, जिसे भविष्य में अन्य जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में अपनाया जा सके।
मड़ैयन गांव में बन रहा है निःशुल्क तालाब
मानिकपुर तहसील के ग्राम मड़ैयन में गाटा संख्या 513, रकबा 1.819 हेक्टेयर भूमि पर एयरपोर्ट अथॉरिटी की कार्यदायी संस्था RITES द्वारा निःशुल्क तालाब का निर्माण कराया जा रहा है। प्रशासन के अनुसार जिस स्थान पर तालाब बनाया जा रहा है, वहां वर्षों पहले प्राकृतिक तालाब मौजूद था। समय के साथ उसका स्वरूप समाप्त हो गया और भूमि समतल हो गई, जिससे वर्षाजल का संचयन बंद हो गया। परिणामस्वरूप आसपास के ग्रामीणों को हर वर्ष पानी की समस्या का सामना करना पड़ने लगा।
जिलाधिकारी की पहल से बना अनूठा मॉडल
इस परियोजना के पीछे जिलाधिकारी पुलकित गर्ग की पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सड़क चौड़ीकरण कार्य के लिए RITES को बड़ी मात्रा में मिट्टी की आवश्यकता थी। जिलाधिकारी ने संस्था को तालाब की खुदाई से निकलने वाली मिट्टी निःशुल्क उपलब्ध कराने का प्रस्ताव दिया। इसके बदले संस्था ने सार्वजनिक उपयोग के लिए तालाब का निर्माण बिना किसी सरकारी खर्च के कराने पर सहमति जताई।
प्रशासनिक स्तर पर यह मॉडल इसलिए भी उल्लेखनीय माना जा रहा है क्योंकि इससे एक ओर सड़क परियोजना के लिए मिट्टी उपलब्ध हो रही है तो दूसरी ओर क्षेत्र को स्थायी जलस्रोत भी मिल रहा है। इससे सरकारी धन की बचत के साथ प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो रहा है।
दशकों से जल संकट झेल रहा है पाठा क्षेत्र
चित्रकूट का पाठा क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से पथरीली भूमि, कम जलधारण क्षमता और सीमित जलस्रोतों वाला इलाका माना जाता है। यहां वर्षा का अधिकांश पानी बहकर निकल जाता है, जिससे भूजल का पर्याप्त पुनर्भरण नहीं हो पाता। गर्मियों में स्थिति और गंभीर हो जाती है। अनेक गांवों में हैंडपंपों का जलस्तर नीचे चला जाता है और कई प्राकृतिक जलस्रोत सूख जाते हैं।
बुंदेलखंड के जल संकट पर विभिन्न सरकारी एवं स्वतंत्र अध्ययनों में भी पाठा क्षेत्र को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। जल संरक्षण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पेयजल आपूर्ति योजनाएं इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं। इसके लिए स्थानीय स्तर पर तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षाजल संचयन, चेक डैम, अमृत सरोवर और भूजल पुनर्भरण जैसी संरचनाओं का विस्तार आवश्यक है।
पुराने तालाबों के पुनर्जीवन से मिलेगा स्थायी समाधान
जल विशेषज्ञों का कहना है कि जिन गांवों में पुराने तालाबों का संरक्षण हुआ है, वहां भूजल स्तर अपेक्षाकृत बेहतर बना रहता है। मड़ैयन में बन रहा तालाब भी इसी अवधारणा पर आधारित है। मानसून के दौरान इसमें वर्षाजल संग्रहित होगा, जिससे आसपास के भूजल स्तर में सुधार की संभावना बढ़ेगी। इसका लाभ किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण परिवारों को लंबे समय तक मिल सकता है।
इसके अलावा तालाब स्थानीय जैव विविधता, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी सहायक साबित हो सकता है।
हजारों ग्रामीणों को मिलेगा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ
हालांकि प्रशासन की ओर से अभी इस तालाब से लाभान्वित होने वाली आबादी का आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया गया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह जलस्रोत मड़ैयन तथा आसपास के गांवों के लोगों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा। विशेष रूप से गर्मियों के दौरान पशुओं के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ेगी और वर्षाजल संरक्षण के माध्यम से भूजल स्तर में सुधार होने पर हैंडपंपों एवं अन्य जलस्रोतों को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी प्रकार प्रत्येक ग्राम पंचायत में पुराने तालाबों का पुनर्जीवन किया जाए तो पाठा क्षेत्र में जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
सरकार की जल योजनाओं से भी मिल रही राहत
पाठा क्षेत्र में जल संकट कम करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार विभिन्न योजनाओं पर कार्य कर रही हैं। जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर नल से जल पहुंचाने का अभियान जारी है। इसके अलावा प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (वाटरशेड विकास), अमृत सरोवर मिशन, मनरेगा के तहत तालाबों की खुदाई और पुनर्जीवन, चेक डैम निर्माण तथा वर्षाजल संचयन जैसी योजनाओं पर भी कार्य किया जा रहा है।
इन योजनाओं का उद्देश्य केवल पेयजल उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि भूजल संरक्षण और वर्षाजल संचयन के माध्यम से जल संकट का स्थायी समाधान विकसित करना है। प्रशासन का मानना है कि पाइपलाइन आधारित पेयजल योजनाओं के साथ यदि स्थानीय जलस्रोतों का संरक्षण भी होता रहे तो पाठा क्षेत्र की जल समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल
विशेषज्ञों के अनुसार एक बड़ा तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं होता बल्कि वह स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र का भी आधार बनता है। इससे भूजल रिचार्ज होता है, तापमान नियंत्रण में मदद मिलती है, पशु-पक्षियों को पानी उपलब्ध होता है और आसपास की हरियाली को भी बढ़ावा मिलता है। भविष्य में यदि तालाब के चारों ओर पौधरोपण और संरक्षण कार्य किया जाता है तो इसका पर्यावरणीय महत्व और अधिक बढ़ जाएगा।
चित्रकूट के लिए बन सकता है मिसाल
मड़ैयन में बन रहा यह तालाब केवल एक निर्माण कार्य नहीं बल्कि प्रशासनिक नवाचार का उदाहरण भी है। सड़क परियोजना के लिए आवश्यक मिट्टी और सार्वजनिक हित के जल संरक्षण कार्य को एक साथ जोड़कर बिना सरकारी खर्च के तालाब तैयार करने का यह मॉडल संसाधनों के बेहतर उपयोग का संदेश देता है।
यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो चित्रकूट के अन्य जल संकटग्रस्त गांवों में भी इसी प्रकार के मॉडल विकसित किए जा सकते हैं। इससे सरकारी व्यय कम होगा, पुराने तालाबों का पुनर्जीवन होगा और ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में ठोस परिणाम सामने आ सकते हैं।
पाठा क्षेत्र वर्षों से पानी की समस्या का प्रतीक रहा है। ऐसे में मड़ैयन में बन रहा यह तालाब केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि जल संरक्षण, जनसहभागिता और प्रशासनिक नवाचार की ऐसी पहल है, जो आने वाले वर्षों में हजारों ग्रामीणों के जीवन को आसान बनाने के साथ-साथ बुंदेलखंड में जल प्रबंधन का एक अनुकरणीय मॉडल भी बन सकती है।









