अल नीनो की दस्तक से बढ़ा खतरा! मॉनसून पर मंडराया सूखे का साया, गर्मी से तपेगा भारत
कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
देश इस समय भीषण गर्मी की मार झेल रहा है। राजधानी दिल्ली समेत उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में सूरज आग उगल रहा है। हालात ऐसे हैं कि सुबह से लेकर देर रात तक गर्म हवाएं लोगों को झुलसा रही हैं। बीच-बीच में कुछ इलाकों में बारिश जरूर हो रही है, लेकिन वह गर्मी से राहत देने के बजाय उमस और बेचैनी बढ़ा रही है। इसी बीच भारतीय मौसम विभाग (IMD) की एक चेतावनी ने चिंता और बढ़ा दी है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस साल प्रशांत महासागर में तेजी से विकसित हो रहा “सुपर अल नीनो” भारतीय मॉनसून को कमजोर कर सकता है, जिससे देश के कई हिस्सों में सूखे और भीषण गर्मी की स्थिति पैदा होने का खतरा बढ़ गया है।
मौसम विभाग ने अनुमान जताया है कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून इस बार 26 मई के आसपास केरल में दस्तक दे सकता है। यह सामान्य तिथि से पहले माना जा रहा है, लेकिन वैज्ञानिकों की चिंता इस बात को लेकर ज्यादा है कि मॉनसून भले समय पर आए, मगर उसकी बारिश सामान्य से कम रह सकती है। यही स्थिति खेती, जल संकट और तापमान को लेकर सबसे बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है।
क्या होता है अल नीनो और क्यों डराता है यह नाम?
अल नीनो एक समुद्री और वायुमंडलीय घटना है, जो प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी के कारण पैदा होती है। जब समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है तो इसका असर पूरी दुनिया के मौसम चक्र पर पड़ता है। भारत में इसका सीधा प्रभाव मॉनसून पर देखा जाता है।
आमतौर पर अल नीनो की स्थिति में भारत में बारिश कम होती है। इससे तापमान बढ़ता है, सूखे की स्थिति बनती है और कृषि क्षेत्र पर गहरा असर पड़ता है। वैज्ञानिकों के अनुसार 1997 और 2015 में आए अल नीनो ने दुनिया के कई देशों में मौसम को बुरी तरह प्रभावित किया था। अब जो परिस्थितियां बन रही हैं, उन्हें देखकर मौसम विशेषज्ञों को आशंका है कि इस बार का अल नीनो भी बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
अगस्त-सितंबर में सबसे बड़ा संकट
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जून और जुलाई में कुछ हिस्सों में सामान्य बारिश देखने को मिल सकती है, लेकिन अगस्त और सितंबर के महीनों में मॉनसून कमजोर पड़ सकता है। यही वह समय होता है जब खरीफ फसलें सबसे ज्यादा पानी मांगती हैं। यदि इस दौरान बारिश कम हुई तो खेत सूख सकते हैं और फसल उत्पादन पर भारी असर पड़ सकता है।
भारत की लगभग 60 प्रतिशत खेती आज भी मॉनसून पर निर्भर है। ऐसे में बारिश कम होने का मतलब केवल मौसम खराब होना नहीं, बल्कि किसानों की आर्थिक कमर टूटना भी है। धान, मक्का, सोयाबीन, दालें और कपास जैसी फसलों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
उत्तर और मध्य भारत पर सबसे ज्यादा खतरा
वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार अल नीनो का सबसे ज्यादा असर उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में देखने को मिल सकता है। इन इलाकों में सामान्य से काफी कम बारिश होने की आशंका है।
मध्य प्रदेश में बढ़ सकती है मुश्किलें
मध्य प्रदेश के कई शहरों में सूखे जैसे हालात बनने की संभावना जताई गई है। इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, चंबल, जबलपुर, रीवा, शहडोल, सागर और नर्मदापुरम जैसे इलाकों में बारिश सामान्य से काफी कम हो सकती है। यहां पहले से ही तापमान 45 डिग्री के आसपास पहुंच रहा है। यदि बारिश कम हुई तो जल संकट और भी गहरा सकता है।
पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में सूखे का खतरा
उत्तर भारत के कृषि प्रधान राज्यों पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के लिए भी यह अल नीनो गंभीर संकट बन सकता है। इन राज्यों की खेती काफी हद तक मॉनसूनी बारिश पर निर्भर करती है। अगस्त और सितंबर में बारिश कम होने से खेतों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो धान और बाजरे की खेती प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही भूजल स्तर में भी गिरावट आने का खतरा बढ़ जाएगा।
दिल्ली-NCR में नहीं मिलेगी राहत
दिल्ली और एनसीआर के लोगों को इस बार भीषण गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद कम दिखाई दे रही है। पहले ही राजधानी में तापमान लगातार रिकॉर्ड तोड़ रहा है। मौसम विभाग का कहना है कि यहां सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है, जिससे उमस और गर्मी दोनों लोगों को परेशान करेंगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि शहरीकरण और कंक्रीट के बढ़ते जंगलों ने दिल्ली की स्थिति और खराब कर दी है। कम बारिश और अधिक तापमान की वजह से हीट वेव का खतरा और बढ़ सकता है।
महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों पर भी असर
दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र, उत्तरी कर्नाटक, गुजरात, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भी सूखे जैसी परिस्थितियां बनने की आशंका जताई जा रही है। इन इलाकों में पानी की उपलब्धता पहले से चुनौती बनी रहती है। यदि मॉनसून कमजोर रहा तो पेयजल संकट भी गहरा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलाशयों में पानी कम होने से बिजली उत्पादन और सिंचाई दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर उद्योगों और आम जनजीवन पर भी देखने को मिलेगा।
समय से पहले मॉनसून, फिर भी चिंता क्यों?
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 26 मई को केरल पहुंच सकता है। आमतौर पर मॉनसून 1 जून के आसपास केरल में प्रवेश करता है। पिछले साल यह 24 मई को पहुंचा था।
हालांकि मौसम वैज्ञानिक साफ कह रहे हैं कि मॉनसून का जल्दी आना इस बात की गारंटी नहीं है कि पूरे सीजन में बारिश अच्छी होगी। कई बार शुरुआती बारिश सामान्य रहती है लेकिन बाद में मॉनसून कमजोर पड़ जाता है। इस बार भी ऐसी आशंका जताई जा रही है।
IMD ने कहा है कि मॉनसून के आगमन की तिथि में चार दिन आगे या पीछे का अंतर भी हो सकता है। इसके बावजूद मौसम विभाग लगातार अल नीनो की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है।
किसानों के सामने बड़ी चुनौती
यदि अल नीनो का असर बढ़ता है तो सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ेगी। खेती की लागत पहले ही बढ़ चुकी है। डीजल, खाद और बीज महंगे हैं। ऐसे में यदि बारिश कम हुई तो सिंचाई पर अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह स्थिति बेहद मुश्किल साबित हो सकती है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अभी से वैकल्पिक फसलों और जल संरक्षण की रणनीति तैयार करनी चाहिए। किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर प्रेरित करने की जरूरत होगी।
बिजली और पानी का संकट भी बढ़ेगा
कम बारिश का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा। बिजली उत्पादन पर भी इसका असर पड़ेगा। जलविद्युत परियोजनाओं में पानी कम पहुंचने से बिजली संकट गहरा सकता है।
इसके साथ ही शहरों में पेयजल संकट बढ़ने की आशंका भी है। कई महानगर पहले से पानी की कमी से जूझ रहे हैं। यदि मॉनसून कमजोर रहा तो टैंकर और भूजल पर निर्भरता और बढ़ सकती है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम की अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है। कभी अचानक बाढ़ तो कभी लंबे समय तक सूखा जैसी स्थितियां अब सामान्य होती जा रही हैं।
अल नीनो जैसी घटनाएं पहले भी आती थीं, लेकिन अब उनका प्रभाव अधिक खतरनाक होता जा रहा है। यही कारण है कि वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले वर्षों में भारत को मौसम संबंधी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
सरकार और प्रशासन के लिए अलर्ट का समय
मौसम विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समय सरकार और प्रशासन के लिए सतर्क रहने का है। जल संरक्षण, बिजली प्रबंधन और कृषि रणनीति पर अभी से काम करने की जरूरत है।
यदि समय रहते तैयारी नहीं हुई तो गर्मी, सूखा और जल संकट मिलकर आम लोगों की मुश्किलें कई गुना बढ़ा सकते हैं। आने वाले दो महीने भारत के मौसम और कृषि दोनों के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।
देश इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां एक तरफ समय से पहले मॉनसून की उम्मीद है तो दूसरी तरफ सुपर अल नीनो का खतरा भी मंडरा रहा है। यदि मौसम वैज्ञानिकों की आशंकाएं सच साबित होती हैं तो इस साल भारत को भीषण गर्मी, कम बारिश और सूखे जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि इसका असर सीधे आम आदमी की जिंदगी, खेती, बिजली, पानी और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। ऐसे में आने वाले दिनों में मौसम विभाग की हर अपडेट बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाली है।








