विचार

वट सावित्री : आस्था के धागों में उलझा प्रकृति का मौन प्रश्न

मातृशक्ति की श्रद्धा, सनातन की संवेदना और वट वृक्ष का भविष्य

लेखक : अनिल अनूप

सच्ची श्रद्धा केवल माथा टेकने में नहीं होती, बल्कि संरक्षण में होती है। जिस वृक्ष से हम आशीर्वाद मांगते हैं, उसके जीवन की रक्षा करना भी हमारा धर्म होना चाहिए

सुबह जब सड़क पर कदम पड़ा तो वातावरण में एक अलग ही प्रकार की पवित्रता तैरती महसूस हुई। गलियों से लेकर मुख्य सड़कों तक रंग-बिरंगे परिधानों में सजी महिलाएं हाथों में पूजा की थाल लिए वट वृक्षों की ओर बढ़ रही थीं। किसी के माथे पर गाढ़ा सिंदूर था, किसी के हाथों में मेहंदी की लालिमा, तो किसी की आंखों में अपने परिवार के लिए अटूट प्रेम और प्रार्थना का उजास। वट सावित्री पूजा का यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि भारतीय समाज की उस सांस्कृतिक आत्मा का दर्शन था, जो आज भी रिश्तों, प्रकृति और विश्वास को जोड़कर चलती है।

वट वृक्ष के चारों ओर महिलाएं परिक्रमा कर रही थीं। कोई मंत्र पढ़ रही थी, कोई अपने पति की लंबी आयु की कामना कर रही थी, तो कोई दूसरी महिलाओं को आशीर्वाद दे रही थी। कहीं हंसी थी, कहीं भक्ति थी और कहीं एक ऐसी सामूहिक ऊर्जा थी, जो शायद केवल भारतीय स्त्री-समाज ही रच सकता है। उस क्षण यह विचार मन में फिर से जीवित हो उठा कि इस देश में ईश्वर, आस्था और परंपरा की जो लौ अब भी जल रही है, उसे सबसे अधिक बचाकर रखने का श्रेय भारतीय महिलाओं को ही जाता है। यदि केवल आधुनिकता और तर्क की दौड़ में भागते पुरुषों पर यह जिम्मेदारी छोड़ दी जाती, तो शायद आस्था की यह गर्माहट बहुत पहले ठंडी पड़ चुकी होती।

लेकिन इस पूरे दृश्य को देखने का केवल एक ही दृष्टिकोण नहीं है। यही भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता भी है कि यहां हर परंपरा के भीतर कई अर्थ छिपे होते हैं। एक ओर यह पूजा स्त्री के समर्पण, प्रेम और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है, तो दूसरी ओर यह प्रकृति और जीव-जगत के साथ सनातन संबंधों का भी उत्सव है।

सनातन केवल पूजा नहीं, प्रकृति का सहअस्तित्व भी है

वट सावित्री पूजा के दौरान महिलाएं वट वृक्ष के नीचे फल, मिठाई, पूड़ी, पकवान और अन्य खाद्य सामग्री अर्पित करती हैं। सामान्य दृष्टि से देखने पर यह केवल धार्मिक प्रसाद लगता है, लेकिन यदि थोड़ा गहराई से देखा जाए तो यह भारतीय संस्कृति की उस सूक्ष्म पर्यावरणीय चेतना को भी प्रकट करता है, जो हजारों वर्षों से प्रकृति को परिवार मानती आई है।

सनातन दर्शन में “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि जीवन की अवधारणा है। यहां वृक्ष भी परिवार हैं, नदियां भी मां हैं, पर्वत भी देवता हैं और पशु-पक्षी भी जीवन-चक्र के सहभागी। वट वृक्ष के नीचे छोड़ा गया भोजन केवल धार्मिक क्रिया नहीं होता; वह उस पूरे इकोसिस्टम के लिए आहार बनता है, जिसमें चींटियां, गिलहरियां, पक्षी और अनगिनत सूक्ष्म जीव शामिल होते हैं। यह दृश्य हमें बताता है कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति और अध्यात्म कभी अलग-अलग नहीं रहे।

आज जब दुनिया पर्यावरण संरक्षण पर बड़े-बड़े सम्मेलन कर रही है, तब भारतीय गांवों और कस्बों में महिलाएं अनजाने में ही उस प्रकृति-दर्शन को जी रही हैं, जो आधुनिक पर्यावरण विज्ञान का भी मूल है। यह सनातन की सबसे बड़ी शक्ति है कि वह मनुष्य को प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि उसका सहभागी मानता है।

लेकिन क्या आस्था कभी-कभी अनजाने में पीड़ा भी बन जाती है?

यहीं से इस पूरे दृश्य का दूसरा पक्ष सामने आता है। जब वट वृक्ष को थोड़ा पास जाकर देखा गया तो उसकी छाल पर कसकर बंधे हजारों धागे दिखाई दिए। किसी ने मोटा धागा बांधा था, किसी ने लंबी सूती डोरी, तो किसी ने रंगीन कलावा। हर धागे के पीछे किसी स्त्री की श्रद्धा थी। जिसकी जितनी गहरी आस्था, उसका उतना मजबूत और कसकर बंधा धागा।

दूर से देखने पर यह दृश्य अत्यंत सुंदर लगता है। सफेद, लाल और पीले धागों से लिपटा वट वृक्ष मानो आस्था का कोई जीवंत स्तंभ बन जाता है। लेकिन जब यही दृश्य प्रकृति के दृष्टिकोण से देखा जाता है, तब मन में एक बेचैन करने वाला प्रश्न उठता है — क्या यह आस्था कहीं उसी वृक्ष के लिए पीड़ा का कारण तो नहीं बन रही?

वृक्ष भी जीवित होते हैं। उनकी भी सांसें होती हैं, उनका भी एक जैविक तंत्र होता है। जब किसी वृक्ष की छाल को लंबे समय तक कसकर बांध दिया जाता है, तब उसके भीतर नमी रुकने लगती है, फंगस पनपने लगते हैं और धीरे-धीरे वह हिस्सा कमजोर होने लगता है। कई बार दीमक और अन्य संक्रमण पूरे वृक्ष को भीतर से खोखला कर देते हैं।

सबसे दुखद बात यह है कि यदि कोई व्यक्ति इन धागों को हटाने की बात करे, तो उसे तुरंत आस्था-विरोधी मान लिया जाता है। समाज उसे नास्तिक कह सकता है, परंपरा का विरोधी बता सकता है। यही वह बिंदु है जहां आस्था और विवेक का संघर्ष शुरू होता है।

क्या वट वृक्ष को भी किसी सावित्री की जरूरत नहीं?

वट सावित्री पूजा का मूल संदेश पति के जीवन की रक्षा और दीर्घायु से जुड़ा है। कथा में सावित्री अपने तप, प्रेम और संकल्प से सत्यवान को मृत्यु से वापस ले आती है। लेकिन आज एक विचित्र विडंबना सामने खड़ी है। जिस वट वृक्ष को इस पूजा में देवतुल्य माना जाता है, वही वृक्ष धीरे-धीरे हमारी अनदेखी का शिकार हो रहा है।

कभी गांवों में हर चौपाल पर विशाल बरगद हुआ करते थे। उनकी छांव में पंचायतें बैठती थीं, राहगीर विश्राम करते थे, बच्चे खेलते थे और पक्षियों का संसार बसता था। लेकिन अब शहरों के विस्तार, सड़कों के चौड़ीकरण और आधुनिक निर्माणों ने वट वृक्षों की संख्या तेजी से कम कर दी है।

आज जनसंख्या बढ़ रही है, आस्थावानों की संख्या भी बढ़ रही है, पूजा के धागे भी बढ़ रहे हैं, लेकिन वट वृक्ष कम होते जा रहे हैं। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकट भी है। जिस वृक्ष को भारतीय परंपरा अमरत्व का प्रतीक मानती है, वही वृक्ष आज संरक्षण के लिए पुकार रहा है।

ऐसे में सचमुच यह प्रश्न उठता है — क्या अब वट वृक्ष को भी किसी सावित्री का इंतजार नहीं है? क्या कोई ऐसी सावित्री सामने आएगी, जो केवल पूजा न करे, बल्कि उस वृक्ष को पानी भी दे, उसकी जड़ों की रक्षा भी करे और उसे जीवित रखने का संकल्प भी ले?

परंपरा को बचाना है तो प्रकृति को बचाना होगा

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी खूबी यह रही है कि उसने परंपराओं को समय के साथ संवेदनशील ढंग से विकसित किया। यदि किसी परंपरा से प्रकृति को नुकसान पहुंच रहा हो, तो उसका समाधान खोजा जाना चाहिए, न कि परंपरा को छोड़ दिया जाए।

वट सावित्री पूजा में धागा बांधने की परंपरा आस्था का प्रतीक है, लेकिन क्या इसे इस तरह नहीं किया जा सकता कि वृक्ष को हानि न पहुंचे? क्या जैविक और ढीले धागों का उपयोग नहीं हो सकता? क्या पूजा के कुछ दिन बाद सामूहिक रूप से धागे हटाने की व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती? क्या हर पूजा के साथ “एक वट वृक्ष लगाओ” अभियान नहीं जोड़ा जा सकता?

यदि हर महिला, जो वट सावित्री का व्रत रखती है, अपने जीवन में केवल एक वट वृक्ष लगाने और उसकी देखभाल करने का संकल्प ले ले, तो आने वाले वर्षों में भारत फिर से बरगदों की छांव से भर सकता है।

आस्था का सबसे सुंदर रूप संरक्षण है

सच्ची श्रद्धा केवल माथा टेकने में नहीं होती, बल्कि संरक्षण में होती है। जिस वृक्ष से हम आशीर्वाद मांगते हैं, उसके जीवन की रक्षा करना भी हमारा धर्म होना चाहिए। यदि कोई मां अपने बच्चे को केवल पूजा करे लेकिन भोजन और सुरक्षा न दे, तो वह प्रेम अधूरा होगा। ठीक वैसे ही यदि हम वृक्षों को पूजें लेकिन उनकी देखभाल न करें, तो हमारी आस्था भी अधूरी रह जाएगी।

आज की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि धार्मिक आयोजनों को पर्यावरणीय चेतना से जोड़ा जाए। मंदिरों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। वट सावित्री पूजा केवल परिक्रमा और धागों तक सीमित न रहे, बल्कि वृक्ष संरक्षण का जन-अभियान बने।

कल्पना कीजिए, यदि हर शहर और गांव में महिलाएं वट सावित्री के दिन “एक सावित्री — एक वट” का संकल्प लें, तो यह केवल धार्मिक पर्व नहीं रहेगा, बल्कि देश का सबसे बड़ा पर्यावरण आंदोलन बन सकता है।

मातृशक्ति को प्रणाम, प्रकृति के प्रति संकल्प भी जरूरी

भारतीय स्त्री केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि संस्कृति की भी संरक्षिका है। उसने ही घरों में परंपराओं को जीवित रखा है। उसने ही त्योहारों को अर्थ दिया है। उसने ही अगली पीढ़ियों तक संस्कार पहुंचाए हैं। इसलिए यह विश्वास भी उसी स्त्री-शक्ति से जुड़ता है कि यदि वह ठान ले, तो वट वृक्षों को नया जीवन मिल सकता है।

वट सावित्री केवल पति की लंबी आयु का पर्व न रह जाए, बल्कि धरती की हरियाली और प्रकृति की दीर्घायु का भी संकल्प बने — शायद यही समय की सबसे बड़ी मांग है।

जब अगली बार कोई सावित्री वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधे, तो वह मन ही मन यह भी कहे — “मैं तुम्हें केवल पूजने नहीं आई हूं, तुम्हें बचाने भी आई हूं।” तभी आस्था पूर्ण होगी। तभी सनातन की आत्मा जीवित रहेगी। और तभी वट वृक्ष को अपनी सावित्री मिल सकेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button