बदरवा क्यों रूठे? ब्रेक मॉनसून और ट्रफ में बदलाव से थम गई बारिश की रफ्तार

जनगणदूत गोंडा मंडल ब्यूरो के रिपोर्टर चुन्नीलाल प्रधान की तस्वीर के साथ ब्रेक मॉनसून, मॉनसून ट्रफ, बारिश, सूखा और मौसम परिवर्तन को दर्शाती फीचर इमेज।

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रिपोर्ट: चुन्नीलाल प्रधान

उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में इस बार मानसून ने शुरुआत तो दमदार अंदाज में की, लेकिन अब बारिश की रफ्तार अचानक धीमी पड़ने लगी है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कई इलाकों में पिछले कुछ दिनों से बारिश लगभग थम सी गई है। आसमान में बादलों की जगह तेज धूप दिखाई दे रही है और उमस लोगों की परेशानी बढ़ा रही है। ऐसे में हर किसी के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर बारिश के बादल अचानक कहां चले गए?

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ब्रेक मॉनसून (Break Monsoon) और मॉनसून ट्रफ (Monsoon Trough) की स्थिति में आया बदलाव है। यही कारण है कि देश के कुछ हिस्सों में भारी वर्षा हो रही है, जबकि उत्तर-पश्चिम भारत के बड़े इलाके बारिश के इंतजार में हैं।

क्या होता है ब्रेक मॉनसून?

ब्रेक मॉनसून का अर्थ यह नहीं होता कि मानसून समाप्त हो गया है। इसका मतलब केवल इतना है कि कुछ दिनों के लिए मानसूनी गतिविधियां कमजोर पड़ जाती हैं और सामान्य से कम वर्षा होती है।

भारत में मानसून के दौरान जुलाई और अगस्त के महीनों में एक-दो बार ऐसी स्थिति बनना सामान्य माना जाता है। आमतौर पर यह अवधि चार से छह दिनों तक रहती है, लेकिन इस बार इसका असर अपेक्षा से अधिक लंबा दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि कई राज्यों में बारिश का सिलसिला अचानक थम गया है।

मॉनसून ट्रफ क्या है और क्यों है महत्वपूर्ण?

मॉनसून ट्रफ कम वायुदाब का एक लंबा क्षेत्र होता है, जो अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी वाली हवाओं को अपने साथ लेकर चलता है। इसे मानसूनी बारिश का मुख्य मार्ग भी कहा जा सकता है।

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जब यह ट्रफ उत्तर भारत के मैदानी इलाकों के ऊपर सक्रिय रहता है, तब दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान सहित बड़े क्षेत्र में अच्छी बारिश होती है।

लेकिन जब यह ट्रफ अपनी सामान्य स्थिति छोड़कर हिमालय की तलहटी की ओर खिसक जाता है, तब बारिश का क्षेत्र भी उसके साथ उत्तर की ओर चला जाता है। परिणामस्वरूप मैदानी इलाकों में बारिश कम हो जाती है और मौसम शुष्क होने लगता है।

उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में सिमट गई बारिश

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय मॉनसून ट्रफ उत्तर प्रदेश के उत्तरी हिस्से और तराई क्षेत्र की ओर खिसक चुकी है। इसी कारण गोरखपुर, कुशीनगर, बलरामपुर तथा नेपाल सीमा से लगे जिलों में बारिश जारी है, जबकि पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिले सूखे बने हुए हैं।

दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बादलों की कमी के कारण तापमान में फिर बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। उमस भी लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन गई है।

आखिर बारिश के बादल कहां चले गए?

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस समय उत्तर-पूर्वी बिहार, बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत के ऊपर एक चक्रवाती परिसंचरण (Cyclonic Circulation) सक्रिय है। यह प्रणाली बंगाल की खाड़ी से आने वाली अधिकांश नमी को अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

यही कारण है कि पूर्वोत्तर राज्यों, बिहार के कुछ हिस्सों और पूर्वी भारत में लगातार भारी बारिश हो रही है, जबकि उत्तर-पश्चिम भारत तक पर्याप्त नमी नहीं पहुंच पा रही है। नमी की कमी के कारण बादलों का विकास नहीं हो रहा और बारिश की संभावनाएं भी कमजोर बनी हुई हैं।

क्यों बढ़ रही है उमस और गर्मी?

जब मॉनसून ट्रफ हिमालय की ओर खिसक जाती है, तब उसके दक्षिणी हिस्से में पश्चिमी दिशा से अपेक्षाकृत शुष्क हवाएं चलने लगती हैं। इन हवाओं में नमी कम होती है, जिससे वातावरण में जलवाष्प का स्तर घट जाता है।

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नमी कम होने के कारण बादल नहीं बनते और तेज धूप जमीन को अधिक गर्म करने लगती है। इसी वजह से लोगों को दिन में उमस और गर्मी दोनों का सामना करना पड़ रहा है।

क्या यह स्थिति सामान्य है?

मौसम विभाग का कहना है कि ब्रेक मॉनसून कोई असामान्य घटना नहीं है। लगभग हर वर्ष जुलाई और अगस्त के दौरान कुछ दिनों के लिए मानसून कमजोर पड़ता है।

हालांकि इस बार इसकी अवधि सामान्य से अधिक लंबी होती दिखाई दे रही है। जहां सामान्य रूप से यह चार से छह दिनों तक रहता है, वहीं इस बार कई इलाकों में दस से बारह दिनों तक बारिश की कमी देखने को मिल रही है।

यही लंबा सूखा अंतराल मौसम वैज्ञानिकों की चिंता का विषय भी बना हुआ है।

क्या अल नीनो का भी पड़ रहा है असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार लंबे समय तक बने ब्रेक मॉनसून के पीछे वैश्विक जलवायु परिस्थितियों की भी भूमिका हो सकती है।

विशेष रूप से अल नीनो (El Niño) जैसी समुद्री जलवायु घटनाएं मानसून की गति और उसकी तीव्रता को प्रभावित करती हैं। जब प्रशांत महासागर के जल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, तब इसका असर दुनिया भर के मौसम तंत्र पर पड़ता है।

भारत में भी कई बार अल नीनो के प्रभाव से मानसून कमजोर पड़ जाता है या वर्षा का वितरण असंतुलित हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार जुलाई के दूसरे पखवाड़े में इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से महसूस किया जा रहा है।

दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कब लौटेगी बारिश?

मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि जैसे ही मॉनसून ट्रफ अपनी सामान्य स्थिति की ओर लौटेगी और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी दोबारा उत्तर-पश्चिम भारत तक पहुंचेगी, वैसे ही दिल्ली-एनसीआर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में फिर से बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं।

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हालांकि इसके लिए लोगों को अभी कुछ दिन और इंतजार करना पड़ सकता है। मौसम विभाग लगातार ट्रफ की स्थिति और नए कम दबाव वाले क्षेत्रों पर नजर बनाए हुए है।

किसानों के लिए बढ़ी चिंता

बारिश में आई इस रुकावट का सबसे अधिक असर खेती पर पड़ने लगा है। धान, मक्का, दलहन और अन्य खरीफ फसलों की सिंचाई के लिए इस समय नियमित वर्षा बेहद जरूरी होती है।

यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो खेतों में नमी की कमी बढ़ सकती है और किसानों को अतिरिक्त सिंचाई का सहारा लेना पड़ेगा। वहीं लगातार उमस और गर्मी का असर सब्जियों तथा अन्य फसलों पर भी दिखाई देने लगा है।

मौसम का बदला मिजाज समझना जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून केवल बारिश का नाम नहीं है, बल्कि यह कई मौसम प्रणालियों का संयुक्त प्रभाव होता है। मॉनसून ट्रफ, कम दबाव के क्षेत्र, चक्रवाती परिसंचरण, समुद्री नमी और वैश्विक जलवायु घटनाएं—इन सभी का संतुलन ही तय करता है कि किस क्षेत्र में कितनी वर्षा होगी।

इस समय उत्तर भारत में बारिश का ठहराव भले लोगों की चिंता बढ़ा रहा हो, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यह मानसूनी चक्र का हिस्सा है। जैसे ही ट्रफ की स्थिति बदलेगी और नमी की आपूर्ति सामान्य होगी, वैसे ही उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश की गतिविधियां फिर से तेज होने की संभावना है। फिलहाल लोगों को उमस और गर्मी से राहत के लिए मानसून की वापसी का इंतजार करना होगा।

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Author: यायावर

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