जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य का मुद्दा ; संवैधानिक बहाली, राजनीतिक दबाव और जनता की बढ़ती बेचैनी के बीच नई बहस

जम्मू-कश्मीर में पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर प्रदर्शन करते लोग और लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा की तस्वीर के साथ संपादकीय फीचर इमेज

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केवल कृष्ण पनगोत्रा

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में “पूर्ण राज्य” का प्रश्न एक बार फिर केंद्र में आ खड़ा हुआ है। बीते दिनों 11 मई को केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah से मुलाकात कर प्रदेश को पुनः राज्य का दर्जा देने की मांग को गंभीरता से उठाया। यह कोई पहली मुलाकात नहीं थी, लेकिन इस बार परिस्थितियां पहले से अधिक संवेदनशील और राजनीतिक रूप से परिपक्व दिखाई देती हैं।

दरअसल, जम्मू-कश्मीर में “स्टेटहुड” यानी पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली अब केवल राजनीतिक दलों का मुद्दा नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे आम नागरिकों की आकांक्षा और सम्मान से जुड़ा प्रश्न बनता जा रहा है। भाजपा को छोड़ दें तो लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल—नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस, पीडीपी और अन्य क्षेत्रीय संगठन—राज्य के दर्जे की बहाली की मांग को खुलकर उठा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि अब भाजपा के समर्थकों के बीच भी दबी जुबान में यह स्वीकार किया जाने लगा है कि जम्मू-कश्मीर को बहुत लंबे समय तक केंद्र शासित प्रदेश बनाए रखना व्यावहारिक नहीं होगा।

2019 का वह निर्णायक मोड़

जम्मू-कश्मीर की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए अगस्त 2019 की घटनाओं को याद करना आवश्यक है। 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक और विवादास्पद फैसला लेते हुए संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A को निष्प्रभावी कर दिया। इसके साथ ही तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित कर दिया गया।

जम्मू-कश्मीर को विधानसभा सहित केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, जबकि लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया। केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण, विकास और सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम बताया, लेकिन दूसरी ओर क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और एक बड़े वर्ग ने इसे राज्य की राजनीतिक पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट के रूप में देखा।

उस समय केंद्र सरकार का तर्क था कि यह व्यवस्था अस्थायी होगी और हालात सामान्य होने पर राज्य का दर्जा वापस दिया जाएगा। यही आश्वासन अब राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा आधार बन चुका है।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने बढ़ाई उम्मीद

दिसंबर 2023 में Supreme Court of India ने अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को संवैधानिक रूप से सही ठहराया, लेकिन साथ ही केंद्र सरकार को यह भी याद दिलाया कि जम्मू-कश्मीर को जल्द से जल्द राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत विधानसभा चुनाव कराए जाने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी गई, क्योंकि इससे यह संदेश गया कि “स्टेटहुड” कोई वैकल्पिक राजनीतिक वादा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक अपेक्षा है। अदालत ने सीधे समय सीमा तो तय नहीं की, लेकिन “जल्द” शब्द ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नई उम्मीद पैदा कर दी। इसके बाद से ही राज्य का मुद्दा लगातार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बना हुआ है।

उमर अब्दुल्ला की सक्रियता और बढ़ता दबाव

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला लगातार केंद्र सरकार के समक्ष यह मुद्दा उठा रहे हैं। हालिया मुलाकात में उन्होंने न केवल पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग की, बल्कि प्रशासनिक कामकाज के नियमों और अधिकारों के सीमित दायरे पर भी चिंता व्यक्त की।

दरअसल, केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार के अधिकार सीमित हो गए हैं। पुलिस, भूमि, प्रशासनिक नियंत्रण और कई महत्वपूर्ण विषयों पर अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और उपराज्यपाल कार्यालय के हाथ में है। इससे स्थानीय सरकारों की कार्यक्षमता और राजनीतिक प्रभाव दोनों प्रभावित हुए हैं।

नेशनल कॉन्फ्रेंस का मानना है कि लोकतांत्रिक सरकार तभी प्रभावी हो सकती है जब उसके पास पर्याप्त संवैधानिक अधिकार हों। यही कारण है कि उमर अब्दुल्ला बार-बार यह कह रहे हैं कि जनता ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास दिखाया है, इसलिए अब केंद्र को भी अपनी प्रतिबद्धता निभानी चाहिए।

केवल नेताओं की मांग नहीं रहा “स्टेटहुड”

जम्मू-कश्मीर की राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अब “स्टेटहुड” केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रहा। गांवों, कस्बों, व्यापारिक संगठनों, युवा समूहों और सामाजिक मंचों पर भी यह सवाल खुलकर उठने लगा है कि यदि चुनाव हो चुके हैं और सरकार अस्तित्व में है, तो फिर पूर्ण राज्य का दर्जा देने में देरी क्यों हो रही है?

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15 मई को हिरानगर में बंसी लाल कांडले के नेतृत्व में हुआ प्रदर्शन इसी बदलती जनभावना का संकेत माना जा रहा है। इस प्रदर्शन में विभिन्न वर्गों के लोगों ने भाग लेकर राज्य के दर्जे की बहाली की मांग उठाई। यह केवल राजनीतिक रैली नहीं थी, बल्कि उस बेचैनी का सार्वजनिक प्रदर्शन था जो पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ी है। लोगों के भीतर यह भावना मजबूत हो रही है कि राज्य का दर्जा केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि राजनीतिक सम्मान और पहचान का प्रश्न है।

भाजपा की दुविधा

भाजपा की स्थिति इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत जटिल दिखाई देती है। पार्टी सार्वजनिक रूप से यह कहती रही है कि जम्मू-कश्मीर को “उचित समय” पर राज्य का दर्जा वापस दिया जाएगा। केंद्रीय नेतृत्व कई बार “बहुत जल्द” शब्द का इस्तेमाल कर चुका है, लेकिन अब तक कोई स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं आई है।

भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा, राजनीतिक नियंत्रण और चुनावी समीकरणों के बीच संतुलन बनाए रखने की है। पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि राज्य का दर्जा बहाल होने के बाद भी केंद्र की सुरक्षा और प्रशासनिक पकड़ कमजोर न पड़े।

दूसरी ओर, देरी बढ़ने से विपक्ष को लगातार यह कहने का अवसर मिल रहा है कि केंद्र सरकार अपनी प्रतिबद्धता पूरी नहीं कर रही। यही कारण है कि भाजपा समर्थक वर्ग के भीतर भी अब यह सवाल उठने लगा है कि यदि केंद्र ने स्वयं राज्य बहाली का आश्वासन दिया था, तो फिर इसमें इतनी देरी क्यों हो रही है।

लोकतंत्र बनाम प्रशासनिक नियंत्रण

जम्मू-कश्मीर का वर्तमान विवाद केवल संवैधानिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक दर्शन से भी जुड़ा हुआ है। एक ओर केंद्र सरकार सुरक्षा और स्थिरता को प्राथमिकता देती है, दूसरी ओर स्थानीय राजनीतिक दल जनता की भागीदारी और अधिकारों की बहाली की बात करते हैं।

केंद्र शासित प्रदेश की व्यवस्था में निर्वाचित सरकार की भूमिका सीमित रहती है। ऐसे में जनता के बीच यह धारणा बनती है कि वास्तविक सत्ता कहीं और केंद्रित है। यही भावना लोकतांत्रिक असंतोष को जन्म देती है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करना है, तो निर्वाचित सरकार को अधिक अधिकार देना अनिवार्य होगा। यही कारण है कि “स्टेटहुड” का मुद्दा अब प्रशासनिक से अधिक राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक बन चुका है।

क्या 2026 निर्णायक वर्ष बन सकता है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में जम्मू-कश्मीर का प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति में और अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। केंद्र सरकार पर लगातार बढ़ता दबाव, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, स्थानीय दलों की सक्रियता और जनता की बढ़ती भागीदारी इस मुद्दे को नई दिशा दे रहे हैं।

यदि केंद्र सरकार जल्द कोई सकारात्मक घोषणा करती है, तो यह जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक विश्वास बहाली की दिशा में बड़ा कदम माना जाएगा। लेकिन यदि देरी जारी रहती है, तो यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन सकता है।

वर्तमान समय में जम्मू-कश्मीर के लोग केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि सम्मानजनक राजनीतिक पुनर्स्थापना की अपेक्षा कर रहे हैं। यही कारण है कि “पूर्ण राज्य” का प्रश्न बार-बार सतह पर लौट आता है। जम्मू-कश्मीर का “स्टेटहुड” मुद्दा अब केवल संवैधानिक बहस नहीं रह गया है। यह जनता की राजनीतिक पहचान, लोकतांत्रिक अधिकार और क्षेत्रीय सम्मान से जुड़ा विषय बन चुका है।

केंद्र सरकार अभी भी “उचित समय” की बात कर रही है, लेकिन जनता और क्षेत्रीय दलों का धैर्य धीरे-धीरे कम होता दिखाई दे रहा है। उमर अब्दुल्ला की हालिया सक्रियता और हिरानगर जैसे प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह मांग अब केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रही।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार अपने पुराने आश्वासन को कब और किस रूप में पूरा करती है। क्योंकि जम्मू-कश्मीर की राजनीति में फिलहाल सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूर्ण राज्य की बहाली के बिना वास्तव में पूरी मानी जा सकती है?

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