पुरानी रंजिश की आग में झुलसा था टंडवा गांव, अदालत ने सुनाया बड़ा फैसला
हत्या मामले में 7 दोषियों को उम्रकैद, दूसरे पक्ष के 6 लोगों को भी मिली 5-5 साल की सजा
जगदंबा उपाध्याय की रिपोर्ट
बलिया जिले के पकड़ी थाना क्षेत्र स्थित टंडवा गांव में छह वर्ष पहले हुई खूनी रंजिश का आखिरकार अदालत में निर्णायक अंत हो गया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने लंबे समय तक चली सुनवाई, गवाहों के बयान और पुलिस विवेचना के आधार पर दोनों पक्षों के मामलों में दोषियों को सजा सुनाई है। अदालत के इस फैसले के बाद पूरे इलाके में चर्चा का माहौल है, क्योंकि यह मामला गांव की पुरानी दुश्मनी, खेत विवाद और हिंसक टकराव से जुड़ा रहा है।
जिला न्यायाधीश अनिल कुमार झा की अदालत ने हत्या के मामले में एक ही परिवार के छह सदस्यों समेत कुल सात आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही प्रत्येक दोषी पर एक लाख 51 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। वहीं, इसी घटना से जुड़े दूसरे मुकदमे में अदालत ने छह लोगों को दोषी मानते हुए पांच-पांच वर्ष के कारावास और प्रत्येक पर 76 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।
छह साल पुराने विवाद पर आया फैसला
यह मामला वर्ष 2020 का है, जब टंडवा गांव में पुरानी रंजिश ने अचानक हिंसक रूप ले लिया था। गांव में लंबे समय से चली आ रही तनातनी और खेत संबंधी विवाद धीरे-धीरे इतनी गहरी हो चुकी थी कि दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। घटना ने पूरे इलाके को दहला दिया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 30 अप्रैल 2020 की सुबह गांव निवासी सुरेंद्र नाथ पांडेय खेत से अपने घर लौट रहे थे। इसी दौरान रास्ते में पहले से घात लगाए बैठे लोगों ने उन पर हमला कर दिया। हमला इतना अचानक और उग्र था कि सुरेंद्र नाथ पांडेय संभल भी नहीं सके। शोर सुनकर जब उनके परिजन और ग्रामीण मौके की ओर दौड़े तो हमलावरों ने उनके साथ भी मारपीट शुरू कर दी।
घटना में सुरेंद्र नाथ पांडेय गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें बचाने पहुंचे जय प्रकाश पांडेय और धर्मेंद्र कुमार पांडेय भी हमले में जख्मी हुए। स्थानीय लोगों की मदद से घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने सुरेंद्र नाथ पांडेय को मृत घोषित कर दिया। इस घटना के बाद गांव में तनाव फैल गया था और पुलिस को मौके पर भारी सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ी थी।
बेटे की तहरीर पर दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा
सुरेंद्र नाथ पांडेय की मौत के बाद उनके बेटे अभिषेक पांडेय ने पकड़ी थाने में तहरीर देकर गांव के अजय तिवारी, उनके पुत्र आलोक तिवारी और अभय तिवारी, भाई उदय नारायण तिवारी, मनीष तिवारी, अमित तिवारी तथा सुभाष जायसवाल के खिलाफ हत्या समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था।
पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत विवेचना शुरू की। कई लोगों के बयान दर्ज किए गए और घटनास्थल से जुड़े साक्ष्य जुटाए गए। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने सभी सात आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया।
दूसरे पक्ष ने भी दर्ज कराया था मुकदमा
इस मामले की खास बात यह रही कि घटना के बाद दूसरा पक्ष भी पीछे नहीं रहा। रंभा देवी की ओर से भी उसी घटना को लेकर दूसरा मुकदमा दर्ज कराया गया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उनके पति अजय तिवारी के खेत पर जबरन कब्जा करने की कोशिश की जा रही थी। विरोध करने पर दूसरे पक्ष के लोगों ने हमला कर दिया।
रंभा देवी ने अपनी तहरीर में ग्राम प्रधान संजय वर्मा, सत्येंद्र पांडेय, अभिषेक पांडेय, लक्ष्मण वर्मा, अमरजीत वर्मा और अभिषेक वर्मा पर लाठी-डंडों से हमला करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बीच-बचाव करने पहुंचे अमित कुमार तिवारी और मनीष कुमार तिवारी के साथ भी मारपीट की गई थी। पुलिस ने इस मामले की भी अलग से जांच की और छह आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया।
अदालत ने दोनों मुकदमों पर सुनाया फैसला
करीब छह वर्षों तक चले मुकदमे में अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें, गवाहों के बयान और पुलिस जांच रिपोर्ट का विस्तार से परीक्षण किया। सुनवाई पूरी होने के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनिल कुमार झा ने शुक्रवार को फैसला सुनाया।
हत्या के मामले में अदालत ने सात आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही प्रत्येक दोषी पर एक लाख 51 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में सफल रहा और प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त हैं।
वहीं, दूसरे पक्ष द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे में भी अदालत ने छह लोगों को दोषी माना। अदालत ने उन्हें पांच-पांच वर्ष के कारावास की सजा सुनाते हुए प्रत्येक पर 76 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
फैसले के बाद गांव में चर्चा तेज
अदालत के फैसले के बाद टंडवा गांव और आसपास के इलाकों में इस मामले की चर्चा तेज हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि पुरानी दुश्मनी और खेत विवाद ने दो परिवारों की जिंदगी पूरी तरह बदल दी। एक ओर जहां एक व्यक्ति की जान चली गई, वहीं दोनों पक्षों के कई लोग अब जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गए हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि समय रहते विवाद को सुलझा लिया जाता तो इतनी बड़ी घटना शायद टल सकती थी। गांव के बुजुर्गों ने भी इस फैसले को भविष्य के लिए सबक बताया है।
कानून व्यवस्था पर भी उठे सवाल
घटना के समय गांव में तनाव की स्थिति बनी हुई थी। पुलिस प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई कर हालात को नियंत्रित किया था, लेकिन इस मामले ने ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते भूमि विवाद और पुरानी रंजिशों को लेकर चिंता भी बढ़ाई।
विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे विवाद जब समय पर नहीं सुलझते तो वे हिंसक संघर्ष का रूप ले लेते हैं। यही वजह है कि प्रशासन लगातार पंचायत स्तर पर विवाद समाधान और सामंजस्य की कोशिशों पर जोर दे रहा है।
न्यायालय के फैसले को माना जा रहा महत्वपूर्ण
कानूनी जानकारों के अनुसार, अदालत का यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दोनों पक्षों के मुकदमों की सुनवाई समानांतर रूप से हुई और न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अलग-अलग दोष सिद्ध किए। इससे यह संदेश गया है कि अदालत केवल एक पक्ष की कहानी पर नहीं बल्कि समग्र तथ्यों और प्रमाणों पर निर्णय देती है।
बलिया की अदालत का यह फैसला अब जिले में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा। गांव की पुरानी रंजिश से शुरू हुई यह कहानी अदालत के फैसले के साथ भले समाप्त होती दिख रही हो, लेकिन इसने समाज को यह संदेश जरूर दिया है कि हिंसा का रास्ता अंततः जेल की सलाखों तक ही पहुंचाता है।








