मुख्तार गैंग के करीबी जफर उर्फ चंदा को कोर्ट से बड़ा झटका, 4 करोड़ की कुर्क संपत्ति मुक्त कराने की याचिका खारिज
अनुराग गुप्ता की रिपोर्ट
बाराबंकी। पूर्वांचल के चर्चित माफिया सरगना Mukhtar Ansari के नेटवर्क से जुड़े रहे जफर उर्फ चंदा को बाराबंकी की गैंगस्टर अदालत से बड़ा झटका लगा है। अपराध से अर्जित संपत्तियों को वापस पाने की उसकी कोशिश अदालत में सफल नहीं हो सकी। गैंगस्टर एक्ट से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रहे अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश विनय आर्या ने जिला प्रशासन द्वारा की गई कुर्की कार्रवाई को वैध मानते हुए जफर की याचिका खारिज कर दी। इस फैसले के बाद करीब चार करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियों पर प्रशासन का कब्जा बरकरार रहेगा और आगे की कानूनी प्रक्रिया भी जारी रहेगी।
यह फैसला उस समय आया है जब प्रदेश में संगठित अपराध और माफिया तंत्र के खिलाफ लगातार सख्त कार्रवाई की जा रही है। अदालत के इस निर्णय को कानून व्यवस्था और अपराध से अर्जित संपत्तियों पर नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एंबुलेंस प्रकरण से खुला था नेटवर्क का राज
वर्ष 2021 में चर्चित एंबुलेंस मामले की जांच के दौरान पुलिस को मुख्तार अंसारी गैंग के कई सदस्यों की भूमिका के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां मिली थीं। जांच एजेंसियों के अनुसार, एक एंबुलेंस का उपयोग मुख्तार अंसारी को पंजाब की जेल से उत्तर प्रदेश की अदालतों में पेशी के लिए लाने-ले जाने में किया जाता था। बाद में इस एंबुलेंस के पंजीकरण और दस्तावेजों में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।
पुलिस जांच में आरोप लगाया गया कि एंबुलेंस के पंजीकरण के लिए फर्जी नाम, गलत पता और कथित रूप से जाली पहचान पत्रों का इस्तेमाल किया गया था। जांच का दायरा बढ़ने पर जफर उर्फ चंदा का नाम भी सामने आया। पुलिस का दावा था कि वह मुख्तार अंसारी के बेहद करीबी सहयोगियों में शामिल था और गैंग की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाता था।
हथियारबंद सुरक्षा और गैंग की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका
जांच एजेंसियों के अनुसार जफर उर्फ चंदा केवल एक सहयोगी नहीं था, बल्कि वह गैंग की गतिविधियों में प्रत्यक्ष रूप से शामिल रहता था। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक वह कई मौकों पर हथियारबंद सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनकर मुख्तार अंसारी के साथ चलता था।
अधिकारियों का कहना है कि जफर की गतिविधियां केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वह गैंग के आर्थिक और संगठनात्मक तंत्र से भी जुड़ा हुआ था। इसी आधार पर उसके खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए और पर्याप्त साक्ष्य जुटाने के बाद न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया गया।
एक दशक में खड़ी की करोड़ों की संपत्ति
पुलिस और प्रशासनिक जांच के दौरान जफर उर्फ चंदा की आर्थिक स्थिति का भी विस्तृत अध्ययन किया गया। जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले 10 से 12 वर्षों के दौरान उसने अपनी घोषित आय से कहीं अधिक मूल्य की संपत्तियां अर्जित कीं।
जांच अधिकारियों के अनुसार उसके नाम पर भूमि, भूखंड और अन्य अचल संपत्तियों का बड़ा नेटवर्क विकसित हुआ था। इन संपत्तियों के स्रोतों की पड़ताल की गई तो कई मामलों में आय के वैध स्रोतों और संपत्ति के मूल्य के बीच बड़ा अंतर पाया गया। प्रशासन ने इसे गैंग के माध्यम से अर्जित अवैध धन से खरीदी गई संपत्ति माना।
बाजार मूल्यांकन के बाद इन संपत्तियों की कीमत लगभग चार करोड़ रुपये आंकी गई। इसके आधार पर जिला प्रशासन ने गैंगस्टर एक्ट के प्रावधानों के तहत कार्रवाई शुरू की।
जिला मजिस्ट्रेट ने दिया था कुर्की का आदेश
जांच रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट ने गैंगस्टर एक्ट की धारा 14(1) के अंतर्गत सुनवाई की। इस दौरान संपत्तियों के स्वामित्व, आय के स्रोत और अर्जन के तरीकों से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण किया गया।
सभी पक्षों को सुनने के बाद जिला मजिस्ट्रेट ने निष्कर्ष निकाला कि संबंधित संपत्तियां अपराध से अर्जित धन से खरीदी गई हैं। इसके बाद उन्हें राज्य के पक्ष में कुर्क करने का आदेश जारी किया गया।
प्रशासनिक कार्रवाई के बाद जफर उर्फ चंदा ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि संपत्तियों की कुर्की अनुचित है तथा उसे निरस्त किया जाना चाहिए।
अदालत में नहीं टिक सके तर्क
जफर उर्फ चंदा की ओर से गैंगस्टर न्यायालय में दायर याचिका में कुर्की आदेश को चुनौती दी गई थी। याचिका में संपत्तियों को मुक्त करने और जिला प्रशासन की कार्रवाई को रद्द करने की मांग की गई।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क और दस्तावेज प्रस्तुत किए। शासकीय अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि एंबुलेंस प्रकरण में कई गंभीर तथ्य सामने आए थे और जांच में जफर की भूमिका स्पष्ट रूप से स्थापित हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि संपत्तियों के संबंध में उपलब्ध साक्ष्य प्रशासन की कार्रवाई को उचित ठहराते हैं।
न्यायालय ने उपलब्ध अभिलेखों, जांच रिपोर्टों और प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण किया। इसके बाद अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता की ओर से ऐसे ठोस तथ्य प्रस्तुत नहीं किए गए जिनके आधार पर जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को गलत ठहराया जा सके।
न्यायालय ने प्रशासनिक कार्रवाई को माना वैध
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश विनय आर्या ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जिला प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई विधिसम्मत प्रतीत होती है। अदालत ने कहा कि प्रस्तुत सामग्री के आधार पर कुर्की आदेश को निरस्त करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता।
इसी कारण जफर उर्फ चंदा की याचिका को खारिज कर दिया गया। अदालत के इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया कि संबंधित संपत्तियां फिलहाल राज्य के नियंत्रण में ही रहेंगी और प्रशासन द्वारा की गई कुर्की प्रभावी बनी रहेगी।
माफिया नेटवर्क पर कार्रवाई को मिला बल
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला संगठित अपराध के खिलाफ चल रही कार्रवाई को और मजबूती देगा। पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में कई बड़े अपराधियों और माफिया गिरोहों की संपत्तियों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है।
प्रशासन का कहना है कि अपराध के जरिए अर्जित संपत्तियों पर कार्रवाई का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि अपराध के आर्थिक ढांचे को कमजोर करना भी है। जब अवैध कमाई से बनाई गई संपत्तियों को जब्त किया जाता है तो अपराधी नेटवर्क की वित्तीय ताकत पर सीधा असर पड़ता है।
आगे क्या होगा?
अदालत से राहत न मिलने के बाद जफर उर्फ चंदा के पास उच्च न्यायालय में अपील का विकल्प मौजूद है। हालांकि फिलहाल बाराबंकी गैंगस्टर अदालत के फैसले के बाद जिला प्रशासन की कार्रवाई को कानूनी मान्यता मिल गई है।
इस निर्णय के साथ ही लगभग चार करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियों पर राज्य का अधिकार बरकरार रहेगा। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि कानून के तहत आगे की प्रक्रिया भी निर्धारित नियमों के अनुसार पूरी की जाएगी।
बाराबंकी की अदालत का यह फैसला एक बार फिर यह संदेश देता है कि संगठित अपराध और उससे अर्जित अवैध संपत्तियों के खिलाफ कानून का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है, और न्यायालय भी ऐसे मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कठोर रुख अपनाने से पीछे नहीं हट रहे हैं।








