यूपी के सभी ग्राम प्रधानों के लिए बड़ी खबर : मानदेय और कल्याण कोष पर बढ़ी चिंता

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला के साथ ग्राम पंचायत की सांकेतिक पृष्ठभूमि, ग्राम प्रधानों के मानदेय और कल्याण कोष से जुड़ी खबर की फीचर इमेज।

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रिपोर्ट: दुर्गा प्रसाद शुक्ला

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव निर्धारित समय पर नहीं हो पाने का असर अब प्रदेश के हजारों ग्राम प्रधानों पर साफ दिखाई देने लगा है। जिन ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और जिन्हें पंचायत चुनाव होने तक प्रशासक के रूप में कार्य करने की जिम्मेदारी दी गई है, वे अब आर्थिक सुविधाओं को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं। प्रशासकीय जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद उन्हें मिलने वाला मासिक मानदेय बंद हो गया है, जबकि कल्याण कोष से मिलने वाली सहायता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

इस मुद्दे को लेकर प्रदेश भर के ग्राम प्रधानों में असंतोष बढ़ रहा है। विभिन्न ग्राम प्रधान संगठनों ने राज्य सरकार से मांग की है कि जब तक पंचायत चुनाव नहीं हो जाते, तब तक प्रशासक के रूप में कार्यरत सभी निवर्तमान ग्राम प्रधानों को पूर्व की तरह मानदेय और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

पंचायत चुनाव में देरी का सीधा असर

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव समय पर नहीं होने के कारण वर्तमान व्यवस्था के तहत हजारों निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ग्राम पंचायतों का प्रशासक बनाया गया है। इनका दायित्व गांवों में विकास कार्यों की निगरानी, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और पंचायत प्रशासन को सुचारु रूप से संचालित करना है।

हालांकि, जिम्मेदारियां पहले जैसी ही रहने के बावजूद आर्थिक सुविधाओं में बदलाव आने से ग्राम प्रधानों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। उनका कहना है कि प्रशासनिक कार्य करने के बावजूद यदि उन्हें मानदेय नहीं मिलेगा तो यह व्यवस्था उनके साथ न्यायसंगत नहीं होगी।

57 हजार से अधिक ग्राम प्रधान प्रभावित

उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रदेश में लगभग 57,694 निवर्तमान ग्राम प्रधान वर्तमान समय में प्रशासक के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इन सभी ग्राम प्रधानों को पहले नियमित रूप से ₹5,000 प्रतिमाह मानदेय दिया जाता था, लेकिन कार्यकाल समाप्त होने के बाद यह भुगतान बंद हो गया है।

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ग्राम प्रधानों का कहना है कि वे अब भी पंचायत से जुड़े सभी आवश्यक प्रशासनिक कार्य कर रहे हैं। गांवों में विकास योजनाओं की निगरानी, सरकारी बैठकों में भागीदारी, विभागीय समन्वय और ग्रामीण समस्याओं के समाधान जैसी जिम्मेदारियां पहले की तरह उनके पास हैं। ऐसे में मानदेय बंद होना उनके लिए आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दोनों दृष्टि से चिंता का विषय बन गया है।

कल्याण कोष की सुविधा पर भी संशय

मानदेय के अलावा ग्राम प्रधानों की सबसे बड़ी चिंता कल्याण कोष को लेकर भी है। पहले ग्राम प्रधानों के असामयिक निधन की स्थिति में उनके परिवार को ₹10 लाख तक की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती थी।

अब जबकि वे प्रशासक के रूप में कार्य कर रहे हैं, यह स्पष्ट नहीं है कि यह सुविधा पूर्ववत जारी रहेगी या नहीं। इस संबंध में अब तक सरकार की ओर से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए हैं।

ग्राम प्रधान संगठनों का कहना है कि यदि किसी प्रशासक के रूप में कार्यरत ग्राम प्रधान के साथ कोई अप्रिय घटना होती है तो उसके परिवार को भी पहले की तरह कल्याण कोष का लाभ मिलना चाहिए। इस विषय पर जल्द स्पष्टता आवश्यक है।

ग्राम प्रधान संगठनों ने सरकार से उठाई मांग

प्रदेश के विभिन्न ग्राम प्रधान संगठनों ने इस पूरे मामले को गंभीरता से उठाया है। विशेष रूप से राष्ट्रीय पंचायती राज ग्राम प्रधान संगठन ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव तथा पंचायती राज विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र भेजकर मांग की है कि प्रशासक के रूप में कार्य कर रहे सभी निवर्तमान ग्राम प्रधानों को तत्काल प्रभाव से मानदेय और कल्याण कोष की सुविधाएं बहाल की जाएं।

संगठन का तर्क है कि जब सरकार स्वयं इन ग्राम प्रधानों से पंचायत प्रशासन का कार्य करवा रही है, तब उन्हें आर्थिक अधिकारों से वंचित रखना उचित नहीं माना जा सकता।

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संगठन ने यह भी कहा है कि ग्रामीण विकास योजनाओं को धरातल पर लागू कराने में ग्राम प्रधानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में उनकी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

प्रशासनिक जिम्मेदारियां पहले जैसी ही

प्रशासक के रूप में कार्यरत ग्राम प्रधानों का कहना है कि उनके दायित्वों में कोई कमी नहीं आई है। गांवों में साफ-सफाई, पेयजल व्यवस्था, विकास कार्यों की निगरानी, विभिन्न सरकारी योजनाओं का संचालन और अधिकारियों के साथ समन्वय जैसी जिम्मेदारियां लगातार निभाई जा रही हैं।

इसके बावजूद यदि उन्हें मानदेय और कल्याण संबंधी सुविधाएं नहीं मिलती हैं तो इससे ग्राम पंचायतों के प्रभावी संचालन पर भी असर पड़ सकता है।

पंचायत चुनाव की प्रतीक्षा

प्रदेश में पंचायत चुनाव की नई प्रक्रिया को लेकर भी ग्राम प्रधानों और ग्रामीणों की निगाहें सरकार पर टिकी हुई हैं। चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद ही नई ग्राम पंचायतों का गठन संभव होगा।

जब तक चुनाव नहीं हो जाते, तब तक प्रशासक व्यवस्था जारी रहने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में यह प्रश्न लगातार उठ रहा है कि इस अवधि में प्रशासक के रूप में कार्यरत ग्राम प्रधानों की आर्थिक व्यवस्था किस प्रकार संचालित होगी।

सरकार के आदेश का इंतजार

फिलहाल सरकार की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया गया है जिसमें प्रशासक के रूप में कार्यरत ग्राम प्रधानों के मानदेय या कल्याण कोष की बहाली का उल्लेख हो।

यही कारण है कि प्रदेश के हजारों ग्राम प्रधान सरकार के अगले निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। यदि सरकार सकारात्मक फैसला लेती है तो न केवल उनका आर्थिक संकट कम होगा बल्कि पंचायत प्रशासन भी पहले की तरह सुचारु रूप से चलता रहेगा।

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ग्रामीण विकास पर भी पड़ सकता है प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्राम पंचायतें ग्रामीण विकास की सबसे महत्वपूर्ण इकाई हैं। यदि पंचायत प्रतिनिधियों के बीच असंतोष बढ़ता है तो इसका असर विकास कार्यों की गति पर भी पड़ सकता है।

ग्राम प्रधान गांवों में केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाओं के क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए उनके अधिकारों और सुविधाओं से जुड़े मुद्दों का समय रहते समाधान निकालना प्रशासनिक दृष्टि से भी आवश्यक माना जा रहा है।

आगे क्या हो सकता है?

अब पूरा मामला राज्य सरकार के निर्णय पर निर्भर है। यदि सरकार ग्राम प्रधान संगठनों की मांग स्वीकार करती है तो प्रदेश के करीब 58 हजार प्रशासक ग्राम प्रधानों को फिर से मानदेय और कल्याण कोष का लाभ मिल सकता है।

हालांकि, जब तक कोई आधिकारिक शासनादेश जारी नहीं होता, तब तक इस विषय को लेकर स्थिति यथावत बनी रहेगी। ऐसे में ग्राम प्रधानों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी सरकार के अगले कदम पर नजर बनाए हुए हैं।

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव में हुई देरी ने ग्राम पंचायत व्यवस्था के सामने एक नया प्रशासनिक और आर्थिक प्रश्न खड़ा कर दिया है। एक ओर हजारों निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें मिलने वाला मानदेय और कल्याण कोष की सुविधाएं बंद होने से असंतोष बढ़ रहा है।

ग्राम प्रधान संगठनों ने सरकार से शीघ्र निर्णय लेने की मांग की है। अब सभी की निगाहें राज्य सरकार पर टिकी हैं कि वह इस मुद्दे पर क्या फैसला लेती है। यदि सकारात्मक निर्णय लिया जाता है, तो प्रदेश के हजारों ग्राम प्रधानों को बड़ी राहत मिलने की संभावना है।

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Author: यायावर

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