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बसपा के अस्तित्व की लड़ाई : क्या मायावती फिर खड़ा कर पाएंगी अपना बहुजन सामाजिक समीकरण?

कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी अजेय मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। एक समय था जब बसपा का नाम आते ही दलित राजनीति की सबसे मजबूत ताकत का चेहरा सामने आता था। मायावती सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि करोड़ों वंचितों की उम्मीद मानी जाती थीं। लेकिन समय के साथ बदलते राजनीतिक समीकरणों, नए सामाजिक गठबंधनों और लगातार कमजोर होते जनाधार ने बसपा को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां अब उसके सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है।

देश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों की आहट तेज हो चुकी है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों में बसपा अपनी जमीन बचाने की जद्दोजहद में लगी हुई है। पार्टी की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर चार बार कब्जा करने वाली बसपा के पास आज इन तीन राज्यों में कुल मिलाकर केवल चार विधायक बचे हैं। लोकसभा में पार्टी का एक भी सांसद नहीं है और राज्यसभा में भी बसपा का प्रतिनिधित्व लगभग समाप्ति की ओर है।

बसपा के लिए क्यों निर्णायक साबित हो सकते हैं अगले चुनाव

आने वाले विधानसभा चुनाव बसपा के लिए सामान्य राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि अस्तित्व की परीक्षा माने जा रहे हैं। यदि पार्टी इन चुनावों में प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पाती है तो उसका पारंपरिक वोट बैंक पूरी तरह दूसरे दलों में समाहित हो सकता है। यही वजह है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने संगठन को दोबारा खड़ा करने के लिए जमीनी स्तर पर नई रणनीति लागू करनी शुरू कर दी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार बसपा केवल सीट जीतने की लड़ाई नहीं लड़ रही, बल्कि वह अपने सामाजिक आधार को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। दलित, पिछड़े, मुस्लिम और गरीब सवर्ण मतदाता जो कभी बसपा की ताकत हुआ करते थे, अब विभिन्न राजनीतिक दलों में बंटते दिखाई दे रहे हैं।

तीन राज्यों में सिमट गई बसपा की राजनीतिक मौजूदगी

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब ऐसे राज्य हैं जहां बसपा की अब भी कुछ राजनीतिक पहचान बची हुई है। लेकिन इन राज्यों में भी पार्टी बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी है।

उत्तराखंड में पार्टी के दो विधायक हैं। इनमें लक्सर सीट से मोहम्मद शहजाद और मंगलौर सीट से सर्वत करीम अंसारी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में बसपा का केवल एक विधायक रसड़ा विधानसभा सीट से उमाशंकर सिंह हैं। पंजाब में नवांशहर सीट से डॉ. नछत्तर पाल पार्टी के एकमात्र विधायक हैं।

यह स्थिति उस पार्टी के लिए बेहद चिंताजनक मानी जा रही है जिसने कभी उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर राजनीतिक इतिहास रचा था।

मुस्लिम समुदाय को फिर जोड़ने की कोशिश में मायावती

ईद-उल-अजहा के अवसर पर मायावती द्वारा मुस्लिम समुदाय को दी गई शुभकामनाओं को राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने अपने संदेश में बसपा सरकार के दौरान अमन, भाईचारे और खुशहाली का उल्लेख करते हुए मुस्लिम समाज को यह याद दिलाने की कोशिश की कि बसपा ने हमेशा सर्वसमाज की राजनीति की है।

मायावती ने अपने संदेश में कहा कि कुर्बानी का त्योहार इंसानियत, भाईचारे और त्याग का संदेश देता है। उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में जब समाज को बांटने की राजनीति हो रही है, तब ऐसे संदेश और अधिक जरूरी हो जाते हैं।

राजनीतिक जानकार इसे बसपा की उस रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं जिसके जरिए पार्टी मुस्लिम मतदाताओं को दोबारा अपने साथ जोड़ना चाहती है। पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम वोट बड़ी संख्या में समाजवादी पार्टी की ओर शिफ्ट हुआ है। बसपा के लिए यह सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान माना जाता है।

छोटी बैठकों के जरिए संगठन मजबूत करने की तैयारी

मायावती अब बड़े राजनीतिक आयोजनों के बजाय छोटे स्तर की बैठकों पर जोर दे रही हैं। उनका मानना है कि छोटी बैठकों के जरिए मतदाताओं से सीधा संवाद स्थापित किया जा सकता है। यही वजह है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में लगातार संगठनात्मक समीक्षा बैठकें शुरू कर दी हैं।

इन बैठकों में पार्टी कार्यकर्ताओं को विशेष समुदायों के बीच जाकर संपर्क मजबूत करने के निर्देश दिए जा रहे हैं। बसपा की रणनीति केवल चुनावी रैलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह गांव-गांव और मोहल्लों तक पहुंचकर अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर से सक्रिय करना चाहती है।

मायावती ने पार्टी नेताओं से साफ कहा है कि दलित, ओबीसी, मुस्लिम, आदिवासी और गरीब सवर्ण समाज के लोगों के बीच जाकर संवाद बढ़ाया जाए। पार्टी कार्यकर्ताओं को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वे विपक्षी दलों द्वारा बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिशों से सतर्क रहें।

विपक्ष के पीडीए फॉर्मूले से बढ़ी बसपा की चिंता

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने पिछले लोकसभा चुनाव में पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का जो राजनीतिक फॉर्मूला अपनाया, उसने बसपा की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पीडीए रणनीति का सबसे बड़ा असर बसपा के वोट बैंक पर पड़ा है।

दलित और मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी की ओर झुकता दिखाई दिया। यही कारण है कि बसपा का वोट प्रतिशत लगातार गिरता गया। यदि यही स्थिति विधानसभा चुनाव में भी बनी रहती है तो बसपा के लिए राजनीतिक वापसी और कठिन हो जाएगी।

उत्तराखंड में संगठनात्मक बदलावों पर विशेष जोर

मायावती ने उत्तराखंड इकाई में बड़े स्तर पर संगठनात्मक बदलाव किए हैं। उन्होंने मोहित आनंद को प्रदेश प्रभारी और अनिल कुमार चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है।

बसपा सुप्रीमो ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि पार्टी इस बार उम्मीदवारों के चयन में बेहद सावधानी बरतेगी। साफ छवि और स्थानीय प्रभाव रखने वाले नेताओं को प्राथमिकता देने की बात कही जा रही है।

उत्तराखंड में बूथ स्तर तक संगठन सक्रिय करने के निर्देश भी दिए गए हैं। पार्टी की कोशिश है कि दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज के बीच अपनी पैठ दोबारा मजबूत की जाए।

बहुजन सोशल इंजीनियरिंग मॉडल पर फिर भरोसा

मायावती एक बार फिर उसी सोशल इंजीनियरिंग मॉडल पर भरोसा जता रही हैं जिसने उन्हें वर्ष 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार दिलाई थी। उस समय बसपा ने दलितों के साथ ब्राह्मण और अन्य वर्गों को जोड़कर नया सामाजिक समीकरण बनाया था।

अब पार्टी दलित, पिछड़े, मुस्लिम, अन्य अल्पसंख्यक और गरीब सवर्ण समुदायों को साथ लाने की कोशिश कर रही है। मायावती लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रही हैं कि ये समुदाय केवल वोट बैंक नहीं बल्कि सत्ता चलाने वाले वर्ग बन सकते हैं।

हालांकि राजनीतिक परिस्थितियां अब पहले जैसी नहीं हैं। भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों ने सामाजिक समीकरणों पर मजबूत पकड़ बना ली है। ऐसे में बसपा के लिए पुरानी रणनीति को दोबारा सफल बनाना आसान नहीं माना जा रहा।

जमीनी स्तर पर संवाद की नई रणनीति

बसपा अब यह समझ चुकी है कि केवल बड़ी रैलियों से राजनीतिक प्रभाव नहीं बनाया जा सकता। यही वजह है कि पार्टी स्थानीय मुद्दों पर लोगों से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

छोटी बैठकों में बेरोजगारी, पलायन, आरक्षण, कानून व्यवस्था, महंगाई और सरकारी योजनाओं की स्थिति जैसे मुद्दों पर चर्चा की जा रही है। खासकर उत्तराखंड जैसे राज्यों में स्थानीय नेटवर्क और जातीय समीकरण काफी प्रभावशाली माने जाते हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बसपा जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ाने में सफल रहती है तो वह कुछ क्षेत्रों में अपनी खोई हुई पकड़ वापस पा सकती है।

चार बार सत्ता में रही है बसपा

बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में चार बार सत्ता में रह चुकी है और चारों बार मायावती मुख्यमंत्री बनीं। पहली बार वर्ष 1995 में भाजपा के समर्थन से उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला। इसके बाद 1997 और 2002 में भी भाजपा के सहयोग से उनकी सरकार बनी।

लेकिन वर्ष 2007 का चुनाव बसपा के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा अध्याय साबित हुआ। उस चुनाव में बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और मायावती ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। यह पहली बार था जब बसपा ने अपने दम पर इतनी बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल की।

उस समय दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण को बसपा की सबसे बड़ी ताकत माना गया था। लेकिन वर्ष 2012 के बाद पार्टी का राजनीतिक ग्राफ लगातार नीचे गिरता गया।

लगातार गिरता गया बसपा का वोट प्रतिशत

बसपा की सबसे बड़ी चिंता उसका लगातार गिरता वोट प्रतिशत है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को उत्तर प्रदेश में लगभग 19.6 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि उसे कोई सीट नहीं मिली थी।

वर्ष 2019 में भी पार्टी का वोट प्रतिशत लगभग 19.3 फीसदी रहा। लेकिन वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट बैंक बुरी तरह खिसक गया और उसे उत्तर प्रदेश में केवल 9.3 प्रतिशत वोट मिले।

विधानसभा चुनावों में भी यही स्थिति दिखाई दी। वर्ष 2017 में बसपा को 22.23 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि 2022 में यह घटकर केवल 12.88 प्रतिशत रह गया। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि पार्टी का पारंपरिक जनाधार लगातार कमजोर हो रहा है।

क्यों छिटक गया बसपा का पारंपरिक वोट बैंक

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसपा का वोट बैंक कई कारणों से कमजोर हुआ। दलित वोट का एक हिस्सा भाजपा की ओर गया जबकि मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग समाजवादी पार्टी की तरफ झुक गया।

इसके अलावा बसपा के जमीनी संगठन की निष्क्रियता भी पार्टी के कमजोर होने का बड़ा कारण मानी जाती है। कई क्षेत्रों में पार्टी के पुराने नेता दूसरे दलों में शामिल हो गए। युवा मतदाताओं के बीच भी बसपा की पकड़ पहले जैसी नहीं रही। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और एआईएमआईएम जैसे दलों ने भी बसपा के सामाजिक आधार में सेंध लगाई।

मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती

मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने वोट बैंक को फिर से एकजुट करना है। इसके लिए उन्हें केवल राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि जमीनी संगठन को भी मजबूत करना होगा।

बसपा के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि पार्टी इस दौर में अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर पाती है और सामाजिक गठबंधन को दोबारा खड़ा कर लेती है तो वह राजनीतिक वापसी की उम्मीद जगा सकती है। लेकिन यदि बसपा आगामी विधानसभा चुनावों में भी कमजोर प्रदर्शन करती है तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में उसकी भूमिका और सीमित हो सकती है।

क्या बसपा कर पाएगी वापसी?

यह सवाल आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है। एक समय जिस पार्टी ने दलित राजनीति को नई दिशा दी थी, वही पार्टी आज अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।

हालांकि मायावती अब भी एक बड़ा राजनीतिक चेहरा हैं और दलित समाज के बीच उनकी मजबूत पहचान बनी हुई है। लेकिन बदलते राजनीतिक माहौल में केवल पुरानी पहचान के भरोसे चुनावी सफलता हासिल करना आसान नहीं होगा।

आने वाले विधानसभा चुनाव यह तय करेंगे कि बसपा दोबारा मजबूती के साथ उभर पाएगी या फिर उसका राजनीतिक प्रभाव और सिमट जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि बसपा के लिए यह चुनाव किसी अंतिम परीक्षा से कम नहीं होने वाले हैं।

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