कमलेश कुमार चौधरी की तहकीकी रिपोर्ट
बलरामपुर। ग्राम पंचायत का चुनाव अब केवल गांव की सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं रह गया है। यह स्थानीय सत्ता, सामाजिक प्रतिष्ठा, राजनीतिक प्रभाव और विकास के संसाधनों पर पकड़ बनाने की अहम लड़ाई भी बन चुका है।
खासकर तब, जब पंचायत की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो। कागज पर सत्ता महिला के हाथ में आती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या पंचायत के फैसले भी उसी के हाथ में रहते हैं?
बलरामपुर जिले के श्रीदत्तगंज क्षेत्र की ग्राम पंचायत मुजहनी इसी बड़े सवाल को सामने लाती है। यहां महिला प्रधान सीमा नौशाद के कार्यकाल को लेकर पंचायत संचालन, अधिकारों की समझ और निर्वाचित प्रतिनिधि की वास्तविक भूमिका पर स्थानीय स्तर पर चर्चाएं होती रही हैं।
इन चर्चाओं को किसी व्यक्ति के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा। हालांकि, वे पंचायती राज व्यवस्था की उस चुनौती की ओर जरूर संकेत करती हैं, जिस पर गंभीर बहस और तथ्यपरक जांच जरूरी है।
सवाल सीधा है—यदि प्रधान का चुनाव महिला जीतती है तो पंचायत चलाने का अधिकार भी उसी के पास होना चाहिए या किसी पति, रिश्तेदार अथवा गैर-निर्वाचित व्यक्ति का प्रभाव उसके संवैधानिक अधिकारों पर भारी पड़ सकता है? यही मुजहनी पंचायत की कहानी का असली केंद्र है।
आरक्षण ने कुर्सी बदली, क्या सत्ता का चरित्र भी बदला?
संविधान के 73वें संशोधन के बाद पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का उद्देश्य केवल चुनावी आंकड़ा बदलना नहीं था। इसका मकसद महिलाओं को गांव की विकास योजनाओं, सार्वजनिक संसाधनों और स्थानीय निर्णय प्रक्रिया में प्रत्यक्ष भागीदारी देना था।
लेकिन व्यवहार में कई जगह अलग तस्वीर दिखाई देती है। महिला सीट आरक्षित होने पर परिवार की कोई महिला चुनाव लड़ती है और जीतने के बाद उसके पति या परिवार के किसी पुरुष सदस्य की सक्रियता बढ़ जाती है।
इसी प्रवृत्ति से ‘प्रधान पति’ या ‘प्रधान प्रतिनिधि’ जैसे गैर-संवैधानिक शब्दों का चलन सामने आया है। यहां एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—ग्राम पंचायत में संवैधानिक पद प्रधान का है, ‘प्रधान पति’ का नहीं।
पति पत्नी की मदद कर सकता है। परिवार सलाह दे सकता है और कोई व्यक्ति कागजी प्रक्रिया समझने में सहयोग भी कर सकता है। लेकिन पंचायत के निर्णय, बैठकों में नेतृत्व और निर्वाचित अधिकार का इस्तेमाल अंततः उसी व्यक्ति की जिम्मेदारी है, जिसे जनता ने वोट देकर चुना है।
मुजहनी पंचायत में सवाल व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का है
मुजहनी पंचायत को लेकर उपलब्ध चर्चाओं में महिला प्रधान सीमा नौशाद की निजी पृष्ठभूमि का भी उल्लेख मिलता है। लेकिन किसी निर्वाचित महिला का मूल्यांकन उसके जन्म, विवाह, धर्म या पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर करना न लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित है और न पत्रकारिता की कसौटी पर।
प्रधान के रूप में असली सवाल उनके सार्वजनिक काम और संवैधानिक भूमिका से जुड़े होने चाहिए। क्या उन्होंने पंचायत की बैठकों में प्रभावी भूमिका निभाई? क्या ग्राम सभा की आवाज को पंचायत के फैसलों तक पहुंचाया गया? क्या विकास योजनाओं की प्राथमिकता तय करने में उनकी भागीदारी रही? क्या सरकारी अधिकारियों के साथ पंचायत संबंधी मामलों में उन्होंने स्वयं संवाद किया? क्या ग्रामीण अपनी समस्याएं सीधे निर्वाचित प्रधान तक पहुंचा सके? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पंचायत के फैसलों की जवाबदेही निर्वाचित प्रधान के स्तर पर दिखाई दी? इन सवालों का उत्तर राजनीतिक चर्चा से नहीं, बल्कि पंचायत के दस्तावेजों और जमीन पर हुए काम से मिलेगा।
‘प्रधान पति’ की संस्कृति पर लगना चाहिए पूर्णविराम
महिला आरक्षण का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब महिला केवल चुनावी चेहरा न रहकर वास्तविक निर्णयकर्ता बने। यदि महिला प्रधान के नाम पर कोई दूसरा व्यक्ति अधिकारियों से लगातार संवाद करता है, पंचायत के फैसलों में प्रमुख भूमिका निभाता है और ग्रामीणों के सामने खुद को वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, आरोप और तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। किसी पति का पत्नी के साथ पंचायत कार्यालय जाना अपने आप में गलत नहीं है। किसी दस्तावेज को समझने में सहायता करना भी गलत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब सहयोग धीरे-धीरे अधिकार में बदल जाए और निर्वाचित महिला की संवैधानिक भूमिका पीछे छूटने लगे। लोकतंत्र में यही वह बिंदु है, जहां ‘परिवार की मदद’ और ‘सत्ता के अनौपचारिक हस्तांतरण’ के बीच की रेखा दिखाई देती है।
लाखों के संसाधन, फिर सवाल विकास का
ग्राम पंचायत मुजहनी का मूल्यांकन केवल राजनीतिक प्रभाव या स्थानीय चर्चाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता। पंचायत को मिले वित्तीय संसाधन और उनसे हुए विकास कार्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
उपलब्ध ग्रामीण विकास संबंधी रिकॉर्ड में SHRIDUTTGANJ–GP MUJHAINI–Village Mujhaini का उल्लेख मिलता है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2011 में पंचायत की आबादी 4,152 और परिवारों की संख्या 587 दर्ज थी। वर्ष 2022 के लिए अनुमानित आबादी 5,275 बताई गई है। स्वच्छता संबंधी कार्यों के लिए लगभग 37.19 लाख रुपये के कुल फंड का उल्लेख भी मिलता है। अब असली सवाल यह है कि इन संसाधनों का जमीन पर कितना असर दिखाई दिया?
गांव की सड़कें कैसी हैं? नालियों की स्थिति क्या है? साफ पानी की उपलब्धता कितनी सुधरी? स्वच्छता व्यवस्था कितनी नियमित हुई? पंचायत की सार्वजनिक संपत्तियों का रखरखाव कैसा है? सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र लोगों तक कितना पहुंचा? इन सवालों के जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि अभिलेखों और जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से मिलने चाहिए।
पंचायत का हिसाब पोस्टर से नहीं, काम से होगा
प्रधान की लोकप्रियता, राजनीतिक संपर्क या चुनावी प्रभाव पंचायत की सफलता का प्रमाण नहीं है। पंचायत की असली रिपोर्ट गांव की गलियों में लिखी जाती है। जहां सड़क टूटी है, वहां सवाल है। जहां नाली जाम है, वहां सवाल है। जहां पेयजल की समस्या है, वहां सवाल है। जहां पात्र परिवार सरकारी योजना से वंचित है, वहां सवाल है। और जहां पंचायत का पैसा खर्च हुआ है, वहां सबसे बड़ा सवाल है—काम कितना हुआ? इसीलिए मुजहनी पंचायत के किसी भी कार्यकाल का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए ग्राम सभा की कार्यवाही, स्वीकृत योजनाएं, भुगतान विवरण, विकास कार्यों की स्थिति और लाभार्थियों की वास्तविक स्थिति सामने रखना जरूरी है।
महिला को चुनावी ‘चेहरा’ बनाना सशक्तिकरण नहीं
गांव की राजनीति में कई बार महिला आरक्षण परिवारों के लिए राजनीतिक अवसर भी बन जाता है। सीट महिला के लिए आरक्षित हुई तो पत्नी, बहू या परिवार की किसी अन्य महिला को चुनाव मैदान में उतार दिया जाता है। यह अपने आप में गलत नहीं है। महिला स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ सकती है और परिवार का समर्थन भी ले सकती है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब चुनाव जीतने के बाद यह सवाल उठे कि पंचायत के निर्णय कौन ले रहा है?
यदि महिला केवल नामांकन, चुनाव प्रचार और शपथ तक सीमित रह जाए और पंचायत की वास्तविक राजनीति कोई दूसरा व्यक्ति संभाले, तो आरक्षण की मूल भावना कमजोर होती है। महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल यह नहीं है कि पंचायत के दस्तावेज में प्रधान के नाम के आगे महिला का नाम लिखा हो। सशक्तिकरण तब है, जब वह बजट समझे, प्रस्ताव पढ़े, अधिकारियों से सवाल करे, ग्राम सभा में अपनी बात रखे और विकास कार्यों की निगरानी करे।
सीमा नौशाद के कार्यकाल की कसौटी क्या हो?
मुजहनी पंचायत की महिला प्रधान सीमा नौशाद के कार्यकाल की निष्पक्ष समीक्षा करनी है तो व्यक्तिगत आरोपों के बजाय दस्तावेजी सवाल पूछने होंगे।
कितनी ग्राम सभा बैठकें हुईं? उनमें प्रधान की क्या भूमिका रही? कितने विकास प्रस्ताव पारित हुए? कितनी योजनाओं के लिए धन स्वीकृत हुआ? कितनी राशि खर्च हुई? कितने काम पूरे हुए? क्या पंचायत के अभिलेख ग्रामीणों के लिए उपलब्ध रहे? क्या ग्रामीणों की शिकायतों पर कार्रवाई हुई? और क्या महत्वपूर्ण निर्णयों में निर्वाचित प्रधान की प्रत्यक्ष भागीदारी दर्ज है? इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह आकलन संभव होगा कि मुजहनी में महिला नेतृत्व कितना प्रभावी रहा।
धर्म या विवाह नहीं, काम बने मूल्यांकन का आधार
सीमा नौशाद की निजी पृष्ठभूमि को लेकर स्थानीय चर्चाएं हो सकती हैं, लेकिन उनके प्रधान पद के मूल्यांकन में धर्म, विवाह या पारिवारिक मूल निर्णायक नहीं हो सकते।
एक महिला का जन्म किसी समुदाय में होना और विवाह के बाद दूसरे परिवार में जाना उसकी प्रशासनिक क्षमता का प्रमाण या खंडन नहीं है। लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधि की पहचान उसके सार्वजनिक काम और जवाबदेही से तय होती है।
इसलिए मुजहनी पंचायत की कहानी को निजी जीवन की कहानी बनाने के बजाय पंचायत शासन और सार्वजनिक जवाबदेही की कहानी के रूप में देखना ज्यादा जरूरी है।
पारदर्शिता होगी तो ‘कौन चला रहा है पंचायत’ का सवाल खत्म होगा
पंचायत में पारदर्शिता जितनी मजबूत होगी, अनौपचारिक सत्ता की गुंजाइश उतनी ही कम होगी। ग्रामीणों को पता होना चाहिए कि पंचायत को कितना पैसा मिला, किस योजना के लिए मिला, कहां खर्च हुआ, कौन सा काम स्वीकृत हुआ और उसकी वास्तविक स्थिति क्या है।
इसी तरह ग्राम सभा की बैठकों और निर्णयों की जानकारी भी सार्वजनिक होनी चाहिए। जब रिकॉर्ड सामने होते हैं तो राजनीति से ज्यादा तथ्य बोलते हैं। यही मुजहनी पंचायत के मामले में भी सबसे जरूरी है।
असली चुनौती: महिला नेतृत्व को नाम से अधिकार तक पहुंचाना
मुजहनी पंचायत का मामला केवल एक महिला प्रधान के मूल्यांकन का विषय नहीं है। यह उत्तर प्रदेश के ग्रामीण लोकतंत्र के सामने खड़े एक बड़े सवाल का स्थानीय उदाहरण भी है। महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण देना ऐतिहासिक कदम था। लेकिन अब अगला सवाल यह है कि क्या आरक्षित सीटों से चुनी गई महिलाएं वास्तव में सत्ता का इस्तेमाल कर रही हैं? यदि जवाब हां है तो ऐसे नेतृत्व को सामने लाना चाहिए।
यदि कहीं महिला की भूमिका सीमित है तो उसे दोषी ठहराने के बजाय यह भी देखना होगा कि उसे प्रशिक्षण, प्रशासनिक जानकारी और स्वतंत्र निर्णय लेने का अवसर कितना मिला। क्योंकि महिला को कमजोर बताकर समस्या खत्म नहीं होगी। उसे सक्षम बनाना ही समाधान है।
प्रधान की कुर्सी किसी परिवार की जागीर नहीं
ग्राम पंचायत का प्रधान पद किसी परिवार, रिश्तेदार या अनौपचारिक प्रतिनिधि की निजी संपत्ति नहीं है। यह ग्रामीण जनता के विश्वास से मिला संवैधानिक दायित्व है।
मुजहनी पंचायत के मामले में भी फैसला आरोपों या चर्चाओं से नहीं, बल्कि ग्राम सभा के रिकॉर्ड, पंचायत के वित्तीय दस्तावेज, विकास कार्यों और ग्रामीणों के प्रत्यक्ष अनुभव से होना चाहिए।
सीमा नौशाद के खिलाफ लगाए जाने वाले किसी भी आरोप को प्रमाण के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता। उसी तरह केवल महिला के रूप में निर्वाचित होना भी सफल पंचायत नेतृत्व का प्रमाण नहीं है।
लोकतंत्र की असली कसौटी इससे आगे है।
कुर्सी पर कौन बैठा, यह पहला सवाल है। कुर्सी का इस्तेमाल किसने किया, यह दूसरा सवाल है। और जनता के लिए क्या बदला—यह सबसे बड़ा सवाल है।
मुजहनी पंचायत की पूरी कहानी का जवाब भी इसी तीसरे सवाल में छिपा है। क्योंकि चुनाव जीतना लोकतंत्र की शुरुआत है, लेकिन जनता के सामने जवाबदेह होना उसकी असली परीक्षा है।

























