रिपोर्ट: संजय सिंह राणा
चित्रकूट। निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर सवाल सामने आया है। आरोप है कि पहाड़ी ब्लॉक क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कुछ निजी विद्यालयों में स्कूली बच्चों को ऐसे वाहनों से लाने-ले जाने का काम किया जा रहा है, जिनके पास आवश्यक परमिट नहीं है और कुछ वाहनों के नंबर तक स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं। यदि यह स्थिति सही पाई जाती है तो यह न केवल परिवहन नियमों की अनदेखी का मामला है, बल्कि मासूम बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय भी बन जाता है।
शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित वातावरण में बेहतर भविष्य की ओर ले जाना है। विद्यालय तक पहुंचने और वापस घर लौटने की व्यवस्था भी उसी सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में यदि स्कूल संचालकों अथवा परिवहन व्यवस्था से जुड़े लोगों की ओर से नियमों की अनदेखी की जाती है तो अभिभावकों की चिंता स्वाभाविक है। बच्चों को स्कूल पहुंचाने वाले वाहनों की फिटनेस, परमिट, पंजीकरण, बीमा, चालक का लाइसेंस और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की नियमित जांच होना बेहद जरूरी है।
निजी विद्यालयों की परिवहन व्यवस्था पर निगरानी की जरूरत
क्षेत्र में संचालित निजी विद्यालयों में बड़ी संख्या में बच्चे प्रतिदिन वाहनों के माध्यम से स्कूल पहुंचते हैं। इनमें वैन, छोटे चार पहिया वाहन तथा अन्य निजी परिवहन साधनों का इस्तेमाल किया जाता है। ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में कई बार अभिभावक स्वयं बच्चों के परिवहन की व्यवस्था करने में सक्षम नहीं होते। ऐसे में विद्यालय अथवा उससे जुड़े संचालकों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली परिवहन सुविधा पर उनका भरोसा निर्भर करता है।
यही कारण है कि स्कूल वाहनों के मामले में नियमों का पालन सामान्य वाहन संचालन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। बच्चों को ले जाने वाले वाहन में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाना, वाहन की नियमित जांच न कराना, बिना वैध परमिट वाहन चलाना या बिना पंजीकरण नंबर के वाहन का इस्तेमाल करना गंभीर लापरवाही की श्रेणी में आ सकता है।
यदि किसी विद्यालय द्वारा ऐसी व्यवस्था की जा रही है तो शिक्षा विभाग के साथ-साथ परिवहन विभाग और जिला प्रशासन को भी मामले का संज्ञान लेकर वास्तविक स्थिति की जांच करनी चाहिए।
हादसा होने पर जवाबदेही किसकी होगी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि नियमों की अनदेखी करते हुए बच्चों को लाने-ले जाने वाला कोई वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? दुर्घटना के बाद कार्रवाई करने से बेहतर है कि संभावित खतरे को पहले ही रोक दिया जाए।
बच्चों को लेकर चलने वाले वाहन के चालक की दक्षता, वाहन की तकनीकी स्थिति और आवश्यक दस्तावेजों की वैधता की जांच पहले से होनी चाहिए। वाहन में बैठने वाले बच्चों की संख्या भी निर्धारित क्षमता के अनुरूप होनी चाहिए। किसी भी प्रकार की लापरवाही की कीमत बच्चों और उनके परिवारों को नहीं चुकानी चाहिए।
विशेषज्ञों का सामान्य मत है कि स्कूल परिवहन व्यवस्था में सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक है। वाहन के नियमित रखरखाव से लेकर चालक के सत्यापन तक प्रत्येक स्तर पर निगरानी होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि कई स्थानों पर खराब सड़कें और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां पहले से ही यात्रा को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।
शिक्षा विभाग की भूमिका पर भी सवाल
निजी विद्यालयों की मान्यता और संचालन से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। यदि किसी विद्यालय में नियमों के विपरीत परिवहन व्यवस्था संचालित होने की शिकायत सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों को मौके पर जांच करनी चाहिए।
सिर्फ विद्यालय के दस्तावेजों की जांच पर्याप्त नहीं होगी। आवश्यकता इस बात की है कि स्कूल परिसर में बच्चों को लाने और ले जाने वाले वाहनों का भौतिक सत्यापन किया जाए। कौन-सा वाहन किस विद्यालय से जुड़ा है, उसका पंजीकरण क्या है, परमिट वैध है या नहीं, फिटनेस प्रमाणपत्र उपलब्ध है या नहीं, बीमा और प्रदूषण प्रमाणपत्र की स्थिति क्या है तथा वाहन चालक के पास वैध लाइसेंस है या नहीं—इन सभी बिंदुओं की जांच की जानी चाहिए।
यदि जांच में नियमों का उल्लंघन मिलता है तो संबंधित विद्यालय संचालक और वाहन संचालक के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। कार्रवाई का उद्देश्य किसी संस्था को परेशान करना नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए।
अभिभावकों को भी सतर्क रहने की जरूरत
बच्चों की सुरक्षा केवल प्रशासन या विद्यालय की जिम्मेदारी नहीं है। अभिभावकों की सजगता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। माता-पिता को यह जानने का अधिकार है कि उनका बच्चा जिस वाहन से विद्यालय जा रहा है, वह वैध और सुरक्षित है या नहीं।
अभिभावकों को स्कूल प्रबंधन से वाहन का पंजीकरण नंबर, परमिट, फिटनेस और चालक से संबंधित आवश्यक जानकारी मांगनी चाहिए। यदि वाहन में क्षमता से अधिक बच्चे बैठाए जा रहे हों अथवा चालक तेज गति और लापरवाही से वाहन चलाता हो तो इसकी शिकायत विद्यालय प्रबंधन के साथ संबंधित विभाग से की जानी चाहिए।
विशेषकर छोटे बच्चों के मामले में अभिभावकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वाहन में चढ़ने और उतरने के दौरान पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था हो। बच्चों को सड़क सुरक्षा के सामान्य नियमों के बारे में भी जागरूक किया जाना चाहिए।
बिना नंबर के वाहन पर कड़ी निगरानी जरूरी
वाहन की पहचान के लिए पंजीकरण नंबर अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। किसी वाहन से संबंधित शिकायत, दुर्घटना या आपराधिक घटना की स्थिति में नंबर के माध्यम से वाहन की पहचान की जाती है। ऐसे में बच्चों को ले जाने वाले वाहन पर स्पष्ट और वैध पंजीकरण नंबर होना अनिवार्य सुरक्षा उपायों में शामिल है।
यदि किसी वाहन का नंबर नहीं है, अस्पष्ट है अथवा वाहन की पहचान छिपाने की कोशिश की जा रही है तो यह संबंधित अधिकारियों के लिए जांच का विषय होना चाहिए। बच्चों को ले जाने वाले वाहनों के मामले में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
प्रशासन से तत्काल सत्यापन अभियान की मांग
क्षेत्रीय स्तर पर सामने आए इन आरोपों और चिंताओं के बीच जिला प्रशासन तथा शिक्षा एवं परिवहन विभाग से व्यापक सत्यापन अभियान चलाने की मांग उठ रही है। निजी विद्यालयों के सभी वाहनों की सूची तैयार कर उनका दस्तावेजी सत्यापन किया जा सकता है। इसके बाद नियमों के अनुरूप पाए जाने वाले वाहनों को ही बच्चों के परिवहन की अनुमति दी जानी चाहिए।
इसके साथ ही विद्यालय संचालकों को स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए कि वे किसी ऐसे वाहन का इस्तेमाल न करें जो आवश्यक मानकों को पूरा नहीं करता। यदि किसी विद्यालय के स्तर पर नियमों की जानबूझकर अनदेखी सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए।
बच्चों की सुरक्षा से समझौता नहीं
स्कूल जाने वाला प्रत्येक बच्चा अपने परिवार के लिए अनमोल है। अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय इस भरोसे के साथ भेजते हैं कि वे सुरक्षित वातावरण में शिक्षा प्राप्त करेंगे और सुरक्षित घर लौटेंगे। इस भरोसे को बनाए रखना विद्यालय प्रबंधन और प्रशासन दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
निजी विद्यालयों की परिवहन व्यवस्था में यदि कहीं भी बिना परमिट, बिना वैध नंबर या अन्य नियमों का उल्लंघन करते हुए वाहनों का इस्तेमाल हो रहा है तो उसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। जांच में आरोप सही पाए जाने पर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि किसी संभावित दुर्घटना से पहले खतरे को रोका जा सके।
बच्चों की सुरक्षा किसी भी संस्था की सुविधा, लापरवाही या आर्थिक हित से ऊपर होनी चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए विद्यालयों की परिवहन व्यवस्था का नियमित निरीक्षण करे। साथ ही विद्यालय संचालकों को भी समझना होगा कि बच्चों को लाने-ले जाने की जिम्मेदारी केवल एक परिवहन सेवा नहीं, बल्कि एक बड़ी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी है।
आखिरकार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नियमों का पालन हुआ या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या स्कूल जाने वाले बच्चों की यात्रा वास्तव में सुरक्षित है? यदि व्यवस्था में कोई कमी है तो उसे हादसा होने का इंतजार किए बिना अभी दूर करना जरूरी है।

























