हाय रे चीनी, इतनी कड़वी ? कम उत्पादन, एथेनॉल जिम्मेदार,  कुछ तो करो सरकार !

चीनी की बढ़ती कीमतों पर संपादकीय फीचर इमेज, जिसमें चीनी मिल, गन्ना, चीनी की बोरियां और संपादक अनिल अनूप की तस्वीर दिखाई गई है।

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

लेखक : अनिल अनूप

चीनी—नाम लेते ही मिठास का एहसास होता है। चाय की प्याली हो, घर में बनने वाली खीर हो, त्योहारों की मिठाई हो या किसी खुशी के मौके पर मुंह मीठा कराने की परंपरा, चीनी भारतीय जीवन का ऐसा हिस्सा है जिससे शायद ही कोई परिवार अछूता हो। लेकिन आज यही चीनी आम आदमी की जेब के लिए कड़वी होती जा रही है। जिस चीनी की कीमत कुछ समय पहले तक करीब 45-46 रुपये किलो के आसपास बताई जा रही थी, उसके खुदरा दाम कई जगहों पर 60-65 रुपये किलो तक पहुंचने की चर्चा है। कीमतों में यह उछाल केवल रसोई का हिसाब नहीं बिगाड़ रहा, बल्कि मिठाई कारोबार, छोटे दुकानदारों, बेकरी उद्योग और त्योहारों की तैयारियों पर भी असर डाल रहा है।

सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि चीनी महंगी क्यों हो गई। असली सवाल यह है कि चीनी की कीमतों में इतनी तेजी के पीछे कौन-कौन से कारण हैं और सरकार आम उपभोक्ता, किसान तथा व्यापारी—तीनों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाएगी?

मथुरा और मुजफ्फरनगर जैसे चीनी और गन्ना कारोबार से जुड़े महत्वपूर्ण इलाकों से सामने आ रही तस्वीर इस चिंता को और गंभीर बनाती है। व्यापारियों के मुताबिक थोक बाजार में चीनी की बोरी, जो पहले करीब 2200 रुपये में मिलती थी, अब लगभग 3000 रुपये तक पहुंचने की बात कही जा रही है। मुजफ्फरनगर में भी पिछले साल लगभग 4000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास रहने वाली चीनी की कीमत अब करीब 6000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचने की बात सामने आई है।

आंकड़ों और स्थानीय व्यापारियों की बातों में भले ही अलग-अलग बाजारों के कारण अंतर हो, लेकिन एक बात स्पष्ट है—चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी आम आदमी के लिए चिंता का विषय बन चुकी है।

चीनी की मिठास में महंगाई का कड़वापन

महंगाई का सबसे बड़ा असर तब दिखाई देता है जब वह रोजमर्रा की छोटी-छोटी जरूरतों को प्रभावित करने लगे। चीनी ऐसा ही उत्पाद है। कोई परिवार रोजाना कितनी चीनी खरीदता है, यह भले ही बहुत बड़ी मात्रा न हो, लेकिन चीनी से जुड़े उत्पादों की संख्या बहुत बड़ी है।

चाय और कॉफी से लेकर मिठाई, बिस्कुट, केक, पेय पदार्थ और अनेक घरेलू व्यंजनों तक चीनी की जरूरत पड़ती है। इसलिए चीनी के दाम बढ़ने का असर केवल चीनी के पैकेट तक सीमित नहीं रहता। जब मिठाई बनाने वाले की लागत बढ़ती है तो मिठाई महंगी होती है। बेकरी उत्पादों की लागत बढ़ती है तो उनकी कीमत बढ़ती है। छोटे होटल और चाय की दुकानों पर भी लागत का दबाव बढ़ता है।

यानी चीनी की कीमत में बढ़ोतरी धीरे-धीरे महंगाई की दूसरी परतों को जन्म दे सकती है।

सबसे अधिक चिंता त्योहारों के मौसम को लेकर है। भारत में त्योहारों के दौरान मिठाइयों और घरेलू पकवानों की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। ऐसे समय में यदि चीनी महंगी रहती है तो इसका सीधा असर परिवारों के बजट पर पड़ेगा। पहले से महंगाई का सामना कर रहे मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए यह अतिरिक्त बोझ मामूली नहीं है।

क्या एथेनॉल ही चीनी की महंगाई का जिम्मेदार है?

चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच एथेनॉल का मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में है। कुछ व्यापारियों और किसानों का मानना है कि गन्ने से एथेनॉल उत्पादन बढ़ने तथा चीनी के लिए उपलब्ध गन्ने या उससे बनने वाली चीनी की मात्रा पर असर पड़ने से बाजार में कीमतों का दबाव बढ़ा है।

लेकिन यहां सरकार और बाजार, दोनों के लिए एक जरूरी सावधानी है। चीनी की महंगाई का पूरा दोष केवल एथेनॉल पर डाल देना शायद समस्या का सम्पूर्ण विश्लेषण नहीं होगा।

See also  विश्वास का यह सेतु ; समाचार दर्पण 24 की यात्रा, जनगणदूत का नया पड़ाव

चीनी का बाजार कई कारकों से प्रभावित होता है—गन्ने का उत्पादन, चीनी मिलों की रिकवरी, मौसम, खेती का रकबा, उत्पादन लागत, गन्ने का मूल्य, मिलों की आर्थिक स्थिति, घरेलू मांग, निर्यात-आयात नीति, सरकारी स्टॉक, बाजार में उपलब्धता और भविष्य की कीमतों को लेकर कारोबारी धारणा। एथेनॉल नीति इन कारकों में महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन अंतिम कीमत तय होने की प्रक्रिया इससे कहीं अधिक जटिल है।

इसलिए सरकार को यह साफ करना चाहिए कि वर्तमान परिस्थितियों में चीनी की कीमतों पर एथेनॉल उत्पादन का वास्तविक प्रभाव कितना है। यदि एथेनॉल नीति के कारण चीनी उत्पादन में कमी आई है, तो उसके आंकड़े सार्वजनिक होने चाहिए। यदि उत्पादन में कमी का मुख्य कारण गन्ने की पैदावार है, तो उसकी भी स्पष्ट तस्वीर सामने रखी जानी चाहिए।

नीति का आधार अनुमान नहीं, आंकड़े होने चाहिए।

गन्ने की खेती से किसान क्यों पीछे हटे?

चीनी की महंगाई की चर्चा में अक्सर उपभोक्ता और व्यापारी दिखाई देते हैं, लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण किरदार किसान है।

गन्ना किसान वर्षों से अपनी उत्पादन लागत, भुगतान में देरी, सिंचाई, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और खेती की बढ़ती लागत की समस्या से जूझता रहा है। किसान के लिए केवल यह मायने नहीं रखता कि बाजार में चीनी कितने रुपये किलो बिक रही है। उसके लिए सवाल यह है कि उसे अपने गन्ने की उपज के बदले कितना वास्तविक आर्थिक लाभ मिल रहा है।

यदि गन्ने की लागत लगातार बढ़ती जाए और किसान को उसके अनुपात में लाभ न मिले, तो किसान स्वाभाविक रूप से ऐसी फसल की ओर जाने पर विचार करेगा जिसमें कम समय में बेहतर आर्थिक वापसी की संभावना हो।

यही कारण है कि गन्ने के रकबे और उत्पादन को लेकर चिंता को केवल कृषि का मुद्दा मानकर टालना ठीक नहीं होगा। गन्ना केवल किसान की फसल नहीं है। यह चीनी मिलों, मजदूरों, परिवहन, व्यापार और अंततः उपभोक्ता की रसोई तक पहुंचने वाली एक पूरी आर्थिक श्रृंखला का आधार है।

अगर किसान गन्ने से दूरी बनाता है तो उसका असर कुछ समय बाद चीनी उत्पादन पर पड़ सकता है। और जब बाजार में मांग के मुकाबले उपलब्धता कम होगी तो कीमतों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।

किसान चीनी की महंगाई से खुश क्यों?

यह विरोधाभास देखने में अजीब लग सकता है कि एक तरफ आम उपभोक्ता महंगी चीनी से परेशान है और दूसरी तरफ कुछ किसान चीनी के बढ़ते दामों को अच्छी खबर मान रहे हैं।

लेकिन किसान के दृष्टिकोण से इसे समझना होगा।

यदि किसान को लगता है कि चीनी की कीमत बढ़ने के बावजूद उसके गन्ने का मूल्य पर्याप्त नहीं बढ़ रहा है, तो उसके लिए महंगी चीनी का अर्थ अधिक आय नहीं है। किसान चाहता है कि उत्पादन लागत और बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप उसे गन्ने का उचित मूल्य मिले।

यही कारण है कि किसानों की ओर से यह मांग उठती है कि जब चीनी बाजार में महंगी हो रही है तो गन्ने के मूल्य निर्धारण में भी किसानों के हित को पर्याप्त महत्व दिया जाए।

यहां सरकार के सामने सबसे कठिन काम है—किसान को बेहतर मूल्य मिले, मिलें आर्थिक रूप से टिकाऊ रहें और उपभोक्ता को चीनी उचित कीमत पर उपलब्ध हो।

तीनों हितों का संतुलन ही वास्तविक समाधान है।

व्यापारी भी सिर्फ मुनाफाखोर नहीं

चीनी की कीमत बढ़ने पर अक्सर सबसे पहले दुकानदार और व्यापारी संदेह के घेरे में आ जाते हैं। यह मान लिया जाता है कि खुदरा विक्रेता मनमाने तरीके से कीमत बढ़ा रहे हैं। जहां ऐसा हो, वहां निश्चित रूप से कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन हर व्यापारी को कीमत बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहरा देना भी उचित नहीं।

See also  “आस्था, संस्कृति और सभ्यता की अनुपम धरती उत्तर प्रदेश”

यदि थोक बाजार में ही चीनी महंगी मिल रही है तो खुदरा विक्रेता के सामने भी सीमित विकल्प होते हैं। उसकी खरीद लागत बढ़ती है, परिवहन महंगा होता है और पूंजी अधिक समय के लिए बाजार में फंसती है।

इसलिए सरकार को कीमतों की पूरी श्रृंखला की निगरानी करनी चाहिए—मिल से थोक व्यापारी और थोक व्यापारी से खुदरा बाजार तक।

जहां कृत्रिम कमी पैदा की जा रही हो, जमाखोरी हो रही हो या मुनाफाखोरी की शिकायत हो, वहां सख्त कार्रवाई जरूरी है। लेकिन यदि बाजार में वास्तविक आपूर्ति की कमी है तो केवल छापेमारी से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

चीनी आयात: राहत का रास्ता या अस्थायी उपाय?

बढ़ती कीमतों के बीच चीनी आयात की संभावना की चर्चा भी सामने आ रही है। यदि घरेलू बाजार में उपलब्धता कम है और कीमतें लगातार बढ़ रही हैं तो नियंत्रित और समयबद्ध आयात से बाजार में आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है।

इसका तत्काल लाभ उपभोक्ताओं को मिल सकता है। लेकिन आयात का फैसला भी बहुत सोच-समझकर करना होगा।

बहुत अधिक आयात से घरेलू चीनी उद्योग और किसानों पर दबाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, जरूरत से कम आयात बाजार में अपेक्षित राहत नहीं देगा। इसलिए सरकार को उत्पादन, स्टॉक, खपत और संभावित मांग के वैज्ञानिक आकलन के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

सरकार के सामने चुनौती यही है कि उपभोक्ता को राहत देने के लिए उठाया गया कदम किसान के हित के खिलाफ न चला जाए।

सरकार को अब क्या करना चाहिए?

सबसे पहला काम है—बाजार की वास्तविक स्थिति को पारदर्शी बनाना।

सरकार को देश में चीनी के उपलब्ध स्टॉक, अनुमानित उत्पादन, घरेलू खपत और संभावित कमी के आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। इससे अफवाहों और अनिश्चितता पर रोक लगेगी।

दूसरा, चीनी की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी की निगरानी होनी चाहिए। थोक और खुदरा बाजार में कीमतों के अंतर की जांच होनी चाहिए।

तीसरा, जमाखोरी और कृत्रिम कमी पैदा करने वालों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

चौथा, जरूरत पड़ने पर सीमित और रणनीतिक आयात पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि बाजार में आपूर्ति बढ़े लेकिन घरेलू किसान और चीनी उद्योग भी असुरक्षित न हों।

पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण कदम—गन्ना किसान की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना होगा।

अगर सरकार चाहती है कि देश में गन्ने का उत्पादन स्थिर रहे तो किसान को ऐसी आर्थिक व्यवस्था देनी होगी जिसमें उसकी मेहनत और लागत का उचित प्रतिफल सुनिश्चित हो। केवल समर्थन मूल्य या मूल्य वृद्धि की घोषणा पर्याप्त नहीं; उत्पादन लागत, भुगतान की समयबद्धता और खेती की वास्तविक आय को भी ध्यान में रखना होगा।

एथेनॉल नीति पर भी खुले मन से समीक्षा जरूरी

एथेनॉल भारत की ऊर्जा नीति के लिए महत्वपूर्ण विषय है। पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण से आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता घटाने और किसानों को वैकल्पिक बाजार देने जैसे उद्देश्य जुड़े हैं। इसलिए एथेनॉल को खलनायक बनाकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

लेकिन किसी भी नीति की सफलता तभी है जब उसके लाभ और दुष्प्रभाव दोनों पर बराबर नजर रखी जाए।

यदि एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की नीति से किसी समय चीनी की उपलब्धता पर दबाव पैदा हो रहा है, तो सरकार को संतुलन बनाने के उपाय खोजने होंगे। देश को ईंधन भी चाहिए और खाद्य एवं उपभोक्ता वस्तुओं की पर्याप्त आपूर्ति भी।

ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य मूल्य स्थिरता को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बनाया जा सकता।

जरूरत इस बात की है कि गन्ने के उपयोग का ऐसा संतुलित मॉडल तैयार हो जिसमें चीनी, एथेनॉल और किसान—तीनों की आर्थिक जरूरतों को साथ लेकर चला जा सके।

महंगी चीनी का राजनीतिक अर्थ भी है

महंगाई केवल अर्थशास्त्र का विषय नहीं होती। जब किसी परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें महंगी होती हैं तो उसका असर उसकी सोच और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर भी पड़ता है।

See also  जब घर जला तो शेर अमर हो गया : बशीर बद्र, दंगे और हमारी सामूहिक विफलता

आम उपभोक्ता यह नहीं देखता कि कीमत बढ़ने के पीछे वैश्विक बाजार है या उत्पादन में कमी, एथेनॉल नीति है या आपूर्ति व्यवस्था। वह अपनी जेब देखता है।

जब दूध महंगा होता है, जब खाद्य तेल महंगा होता है, जब सब्जियां महंगी होती हैं और अब चीनी भी महंगी हो जाती है तो परिवार के मासिक बजट पर दबाव बढ़ता है।

आने वाले समय में त्योहारों के दौरान यदि चीनी की कीमत ऊंची रहती है तो इसका असर जनता की नाराजगी में भी दिखाई दे सकता है। सरकारों के लिए महंगाई का यही सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम है—जनता आर्थिक आंकड़ों से अधिक अपनी रसोई के अनुभव को याद रखती है।

इसलिए सरकार को किसी संभावित राजनीतिक नुकसान की चिंता से पहले सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारी के तहत कदम उठाना चाहिए।

सवाल सिर्फ चीनी का नहीं, नीति की मिठास का है

आज जरूरत इस बात की है कि सरकार चीनी की कीमतों को लेकर तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर काम करे।

तात्कालिक स्तर पर बाजार में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जाए, जमाखोरी पर रोक लगे, जरूरत पड़ने पर आयात का रास्ता खोला जाए और उपभोक्ताओं को राहत दी जाए।

दीर्घकालिक स्तर पर गन्ने की खेती को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाया जाए, किसानों की उत्पादन लागत घटाने के उपाय हों, सिंचाई और कृषि तकनीक में निवेश हो, चीनी मिलों की दक्षता बढ़ाई जाए और चीनी-एथेनॉल नीति में बेहतर संतुलन स्थापित किया जाए।

किसान को उचित मूल्य मिलेगा तो वह गन्ना बोएगा। गन्ने का उत्पादन पर्याप्त होगा तो चीनी मिलों को कच्चा माल मिलेगा। चीनी का उत्पादन स्थिर रहेगा तो बाजार में आपूर्ति बनी रहेगी। आपूर्ति पर्याप्त होगी तो कीमतों पर नियंत्रण रखना आसान होगा। और कीमत नियंत्रित रहेगी तो आम आदमी की रसोई में मिठास बनी रहेगी।

यह पूरा चक्र एक-दूसरे से जुड़ा है।

हाय रे चीनी, इतनी कड़वी क्यों?

चीनी का बाजार आज सरकार के सामने एक छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण आईना लेकर खड़ा है। इसमें किसान की मजबूरी भी दिखाई देती है, व्यापारी की चिंता भी, उपभोक्ता की परेशानी भी और नीति-निर्माण की चुनौतियां भी।

सवाल यह नहीं कि चीनी 45 रुपये की हो या 65 रुपये की। सवाल यह है कि उस कीमत के पीछे किसान को कितना मिला, व्यापारी ने कितना खर्च किया, बाजार में वास्तविक कमी कितनी है और उपभोक्ता पर कितना बोझ पड़ा।

अगर चीनी के दाम बढ़ने का वास्तविक कारण उत्पादन में कमी है तो उत्पादन बढ़ाने की नीति चाहिए। यदि आपूर्ति की समस्या है तो आपूर्ति सुधारनी होगी। यदि जमाखोरी है तो कार्रवाई करनी होगी। यदि एथेनॉल नीति का प्रभाव है तो संतुलन बनाना होगा। और यदि किसान की लागत इसका मूल कारण है तो किसान की आय और लागत का समाधान करना होगा।

सरकार से यही अपेक्षा है कि वह केवल चीनी के दाम देखकर प्रतिक्रिया न दे, बल्कि उस पूरी व्यवस्था को देखे जिसके कारण खेत से निकलने वाला गन्ना उपभोक्ता की रसोई तक पहुंचते-पहुंचते इतना महंगा हो जाता है।

मिठास की चीज कड़वी न बने, इसके लिए बाजार के साथ नीति में भी संतुलन जरूरी है।

आम आदमी को सस्ती चीनी चाहिए, किसान को सम्मानजनक मूल्य चाहिए और व्यापारी को पारदर्शी बाजार। सरकार यदि इन तीनों जरूरतों को एक साथ साध ले तो चीनी की यह कड़वाहट काफी हद तक कम की जा सकती है।

वरना सवाल फिर वही रहेगा—हाय रे चीनी, इतनी कड़वी क्यों? और इस सवाल का जवाब केवल बाजार से नहीं, सरकार की नीतियों से भी मांगा जाएगा।

यायावर
Author: यायावर

यायावर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें