संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
चित्रकूट। जिले के कालूपुर पाही क्षेत्र में जमीनों के स्वामित्व, ग्राम सभा की संपत्तियों और ग्रामीणों की भूमि को लेकर विवाद के आरोपों ने एक बार फिर प्रशासनिक पारदर्शिता और राजस्व व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता एवं ‘चलो गांव की ओर जागरूकता अभियान’ के संस्थापक-अध्यक्ष संजय सिंह राणा ने पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद से जुड़ी बताई जा रही संपत्तियों और भूमि संबंधी मामलों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि जांच के जरिए यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित जमीनों का वास्तविक स्वामित्व किसके नाम है और उनका वर्तमान उपयोग राजस्व अभिलेखों के अनुरूप है या नहीं।
मामला ग्राम पंचायत कालूपुर पाही से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित बेशकीमती जमीनों, ग्राम सभा की भूमि और ग्रामीणों की जमीन को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि राजनीतिक प्रभाव और रसूख के चलते कुछ जमीनों पर कब्जे किए गए अथवा भूमि संबंधी अधिकारों में बदलाव कराया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और संबंधित दस्तावेजों तथा प्रशासनिक जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
राष्ट्रीय राजमार्ग किनारे करोड़ों की संपत्ति पर सवाल
कालूपुर पाही क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित एक आलीशान मकान और उसके आसपास की जमीन को लेकर विशेष तौर पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि इस क्षेत्र में मौजूद भूमि की बाजार कीमत करोड़ों रुपये हो सकती है। इसी के साथ मकान के पीछे स्थित जमीन को लेकर भी स्वामित्व और कब्जे की स्थिति स्पष्ट किए जाने की मांग की गई है।
भूमि विवाद से जुड़े मामलों में केवल मौजूदा कब्जे को आधार मानकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होता। संबंधित जमीन का खसरा नंबर, खतौनी, राजस्व नक्शा, दाखिल-खारिज, रजिस्ट्री और भूमि उपयोग का रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही वास्तविक स्थिति का पता चल सकता है। ऐसे में प्रशासनिक जांच के दौरान इन सभी अभिलेखों की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।
ग्राम सभा की जमीन को लेकर गंभीर आरोप
ग्राम सभा की जमीन को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर प्रभावशाली लोगों द्वारा कब्जा किया गया और उसे निजी उपयोग में लाया गया। यदि ऐसा कोई मामला सामने आता है तो यह केवल निजी भूमि विवाद नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा से जुड़ा विषय बन जाता है।
ग्राम सभा की जमीन का उपयोग आम तौर पर गांव के सामुदायिक हितों के लिए किया जाता है। ऐसी जमीन पर अतिक्रमण की शिकायत मिलने पर राजस्व विभाग द्वारा अभिलेखों की जांच और मौके की पैमाइश कर वास्तविक स्थिति का निर्धारण किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर अवैध कब्जे की पुष्टि होने पर नियमानुसार कार्रवाई भी संभव है।
क्षेत्र के ग्रामीणों की ओर से यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि जमीन वास्तव में ग्राम सभा की है तो उस पर निजी कब्जा किस आधार पर हुआ और संबंधित अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। इन सवालों का जवाब राजस्व रिकॉर्ड और प्रशासनिक जांच से ही मिल सकता है।
ग्रामीणों की जमीन के अधिकार का मामला
विवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष गरीब ग्रामीणों की जमीन से जुड़ा है। आरोप है कि कुछ ग्रामीण परिवारों की जमीन को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी है कि संबंधित भूमि का स्वामित्व किसके नाम दर्ज है और उसके संबंध में कोई बिक्री, दान, पट्टा, नामांतरण या अन्य हस्तांतरण हुआ है तो वह किस प्रक्रिया के तहत हुआ।
यदि किसी ग्रामीण की जमीन पर दबाव, धोखाधड़ी या गलत दस्तावेजों के जरिए कब्जे का प्रयास हुआ है तो संबंधित व्यक्ति को कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। वहीं यदि आरोप तथ्यहीन हैं तो जांच के बाद संबंधित पक्ष को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अधिकार है।
यही कारण है कि पूरे मामले में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग हटकर दस्तावेज आधारित जांच को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
राजस्व अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आए
भूमि संबंधी विवादों में राजस्व विभाग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। आरोपों में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या संबंधित अधिकारियों पर किसी प्रकार का दबाव था और क्या भूमि संबंधी प्रक्रियाओं में नियमों की अनदेखी हुई।
जांच के दौरान यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित जमीनों के पुराने रिकॉर्ड क्या कहते हैं, वर्तमान खतौनी में किसका नाम दर्ज है, नामांतरण कब और किस आदेश के आधार पर हुआ, मौके पर भूमि का उपयोग किस रूप में हो रहा है और क्या भूमि की श्रेणी में कोई बदलाव किया गया है।
यदि सरकारी या ग्राम सभा की भूमि निजी उपयोग में पाई जाती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जिम्मेदारी संबंधित प्रशासनिक तंत्र की होगी। दूसरी ओर, यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में कोई अंतर नहीं मिलता तो विवाद के संबंध में स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी।
शिव मंदिर तक जाने वाले रास्ते का भी मुद्दा
क्षेत्र में शिव मंदिर तक जाने वाले रास्ते को लेकर भी विवाद की बात सामने आई है। आरोप है कि मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते में बाधा उत्पन्न की गई। यदि यह रास्ता सार्वजनिक अथवा राजस्व अभिलेखों में दर्ज रास्ता है तो उसके आवागमन को लेकर प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
इसके लिए राजस्व नक्शे और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान किया जाना जरूरी है। ग्रामीणों और धार्मिक स्थल तक आने-जाने वाले लोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रशासन को शिकायत मिलने पर निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।
पीडीए की स्थापना और राजनीतिक प्रभाव का सवाल
पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद के राजनीतिक जीवन और बसपा शासनकाल में उनकी भूमिका का भी इस पूरे विवाद में उल्लेख किया गया है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि सत्ता में रहते हुए उनके प्रभाव का इस्तेमाल व्यक्तिगत और संपत्ति संबंधी मामलों में किया गया।
हालांकि किसी व्यक्ति के राजनीतिक पद पर रहने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसने किसी जमीन पर अवैध कब्जा किया है। इसलिए इस पहलू की पुष्टि भी दस्तावेजों और सक्षम जांच के आधार पर ही होनी चाहिए।
किसी पूर्व मंत्री या सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति की संपत्ति की जांच की मांग अपने आप में गंभीर विषय है। यदि प्रशासन ऐसी जांच कराता है तो उसे संपत्ति के स्रोत, भूमि अभिलेख और संबंधित लेन-देन की वैधानिकता को नियमों के अनुसार देखना होगा।
सरकार से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग
संजय सिंह राणा ने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद से जुड़ी बताई जा रही चल-अचल संपत्तियों, ग्राम सभा की जमीनों और ग्रामीणों की भूमि से संबंधित मामलों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही यदि किसी सरकारी अथवा ग्राम सभा की भूमि पर अवैध कब्जा पाया जाता है तो उसे नियमानुसार मुक्त कराया जाए।
उन्होंने गरीब ग्रामीणों को उनके भूमि अधिकार दिलाने और भ्रष्टाचार या प्रभाव के आधार पर किसी भी प्रकार की अनियमितता होने पर कार्रवाई की मांग की है।
जांच से ही साफ होगी तस्वीर
पूरे मामले में अब सबसे अहम सवाल प्रशासनिक जांच का है। आरोप गंभीर हैं, लेकिन उनका सत्यापन राजस्व अभिलेखों, मौके की पैमाइश और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर ही संभव है। इसलिए प्रशासन यदि मामले का संज्ञान लेता है तो जांच को पारदर्शी रखते हुए सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर देना होगा।
जांच में यदि ग्राम सभा की भूमि पर अवैध कब्जा, नियम विरुद्ध नामांतरण अथवा ग्रामीणों की जमीन से संबंधित अनियमितता सामने आती है तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो संबंधित पक्ष को भी अनावश्यक विवाद से राहत मिलेगी।
फिलहाल इस मामले में किसी सक्षम जांच एजेंसी या प्रशासनिक अधिकारी द्वारा आरोपों की पुष्टि किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए लगाए गए आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद या उनके प्रतिनिधियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है तो उसे भी खबर में उचित स्थान दिया जाना आवश्यक होगा।
भूमि विवादों की संवेदनशीलता को देखते हुए अब निगाह इस बात पर है कि प्रशासन कौलपुर (पाही) क्षेत्र की संबंधित जमीनों के अभिलेखों और मौके की स्थिति की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाता है या नहीं।
रिपोर्ट: संजय सिंह राणा
फोकस कीफ्रेज:
स्लग:
टैग्स:
मेटा डिस्क्रिप्शन:
SEO पैराग्राफ: चित्रकूट के कौलपुर पाही क्षेत्र में जमीन, ग्राम सभा की संपत्ति और ग्रामीणों की भूमि को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। संजय सिंह राणा ने पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद से जुड़ी बताई जा रही संपत्तियों और भूमि मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग की है। राष्ट्रीय राजमार्ग किनारे की जमीन, ग्राम सभा की भूमि, शिव मंदिर के रास्ते और गरीब ग्रामीणों के भूमि अधिकार से जुड़े आरोपों की राजस्व अभिलेखों के आधार पर जांच की मांग की गई है। हालांकि आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

























