दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता बृज भूषण शरण सिंह को महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न से जुड़े मामले में दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया है। हालांकि, इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल केवल बृज भूषण शरण सिंह को बरी किए जाने का नहीं, बल्कि अदालत के 244 पन्नों के फैसले को सार्वजनिक न किए जाने को लेकर भी खड़ा हुआ है। अदालत ने तीन अगस्त को फैसला सुनाया था और 10 अगस्त को दोनों पक्षों के वकीलों को इसकी प्रति उपलब्ध कराई गई, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक यह आदेश अदालत की वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया था।
इस मामले में शिकायत करने वाली महिला पहलवानों में से एक ने अदालत के फैसले को चुनौती देने और उसके खिलाफ अपील करने की बात कही है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 2023 में छह महिला पहलवानों ने बृज भूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। इन आरोपों के बाद पहलवानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन किया था और बृज भूषण की गिरफ्तारी तथा भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष पद से उनके इस्तीफे की मांग की थी।
फैसले की प्रति सार्वजनिक न होने पर सवाल
राउज़ एवेन्यू मजिस्ट्रेट कोर्ट ने तीन अगस्त को अपना 244 पन्नों का फैसला सुनाया। सामान्य तौर पर अदालतों के फैसले सुनाए जाने के बाद उनकी प्रतियां उपलब्ध होती हैं और कुछ समय के भीतर उन्हें न्यायालय की वेबसाइट पर भी अपलोड कर दिया जाता है। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
दोनों पक्षों के वकीलों ने फोन पर बताया कि उनसे एक ‘अंडरटेकिंग’ पर हस्ताक्षर करवाए गए हैं। इस दस्तावेज में कथित तौर पर यह उल्लेख है कि वकील अदालत के आदेश की प्रति संबंधित पक्षों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को उपलब्ध नहीं कराएंगे।
फैसले को सार्वजनिक न किए जाने की स्थिति पर अभियोजन पक्ष से जुड़ी वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने सवाल उठाया है। उनका कहना है कि न्यायालय के फैसले सार्वजनिक दस्तावेज होते हैं। हालांकि यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़ितों की पहचान की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है और आवश्यक संपादन के जरिए उनकी पहचान को छिपाया जा सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि पूरा फैसला ही सार्वजनिक न किया जाए।
रेबेका जॉन के मुताबिक, पीड़ितों के नाम और पहचान उजागर करने पर कानूनी रोक हो सकती है, लेकिन आवश्यक रूप से संपादित यानी रेडैक्ट किए गए फैसले को सार्वजनिक करने पर सामान्य तौर पर कोई ऐसी रोक नहीं है।
संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा सवाल
लीगल थिंक टैंक विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी से जुड़े स्वप्निल त्रिपाठी ने भी फैसले को सार्वजनिक न किए जाने को संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय बताया है।
उनके मुताबिक प्रथम दृष्टि में इस तरह की रोक संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) से जुड़े सवाल खड़े करती है। सुप्रीम कोर्ट कई मौकों पर यह स्पष्ट कर चुका है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में न्यायिक कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग का अधिकार भी शामिल है।
स्वप्निल त्रिपाठी का तर्क है कि न्यायिक प्रक्रिया की रिपोर्टिंग केवल मुकदमे के दौरान ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि मुकदमा शुरू होने से पहले और फैसला आने के बाद भी मीडिया की भूमिका बनी रहती है। खुली न्याय व्यवस्था यानी ओपन जस्टिस की अवधारणा न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम मानी जाती है।
हालांकि यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में पीड़ितों की निजता और पहचान की सुरक्षा का भी विशेष महत्व है। ऐसे मामलों में अदालतें बंद कमरे में सुनवाई या पीड़ित की पहचान सार्वजनिक न करने जैसे उपाय अपना सकती हैं। लेकिन फैसला सुनाए जाने के बाद पूरे आदेश को सार्वजनिक करने पर रोक किस कानूनी आधार पर लगाई गई है और यह रोक कितने समय तक प्रभावी रहेगी, इस संबंध में स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
दोनों पक्षों के वकीलों से बातचीत के बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो सका कि अंडरटेकिंग में अदालत के आदेश को सार्वजनिक करने पर रोक से संबंधित कौन-कौन से प्रावधान शामिल हैं और यह प्रतिबंध कब तक लागू रहेगा।
किन धाराओं में बरी हुए बृज भूषण?
बृज भूषण शरण सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354, 354A, 354D और 506 के तहत आरोप लगाए गए थे। इनमें महिला की गरिमा भंग करने, यौन उत्पीड़न, पीछा करने और आपराधिक धमकी से जुड़े आरोप शामिल थे।
अदालत ने बृज भूषण शरण सिंह को इन आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। वहीं भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व महासचिव विनोद तोमर को भी भारतीय दंड संहिता की धारा 506(1) के तहत लगाए गए धमकी के आरोप से बरी कर दिया गया।
मामले की सुनवाई दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में दर्ज एफआईआर के आधार पर हुई थी। एफआईआर में छह महिला पहलवान शिकायतकर्ता थीं। सुनवाई के दौरान इनमें से दो शिकायतकर्ताओं ने अपने पहले के बयानों से अलग रुख अपनाया।
अदालत ने आरोपों को बताया ‘गहरी साजिश’
बीबीसी और कुछ अन्य मीडिया संस्थानों द्वारा देखी गई फैसले की प्रति के अनुसार, मजिस्ट्रेट अश्विन पंवार ने बृज भूषण शरण सिंह के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने मामले को एक ‘गहरी साजिश’ के तौर पर देखा और कहा कि बृज भूषण के खिलाफ लगाए गए आरोप मनगढ़ंत थे तथा उन्हें काल्पनिक तरीके से तैयार किया गया था।
अदालत ने उन बयानों और परिस्थितियों पर भी विचार किया, जिनके आधार पर अभियोजन पक्ष ने अपना मामला तैयार किया था। फैसले में गवाहों के बयानों में कथित विरोधाभास, घटनाओं के समय और स्थान से जुड़ी गलतियां तथा बाद के बयानों में आए बदलावों को महत्वपूर्ण माना गया।
बृज भूषण शरण सिंह के वकील राजीव मोहन ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बचाव पक्ष ने अभियोजन की ओर से पेश किए गए बयानों में मौजूद विरोधाभासों को अदालत के सामने रखा और अदालत ने उन दलीलों को स्वीकार किया। उनके अनुसार, कुछ गवाहों के बयान और उनके ही पहले दिए गए बयानों में सामंजस्य नहीं था। शिकायतें सामने लाने में हुई देरी को भी अदालत ने अपने फैसले में महत्व दिया।
दो गवाहों के बयान बदलने का भी जिक्र
मामले की सुनवाई के दौरान दो महिला शिकायतकर्ताओं के अपने पहले के बयान से अलग रुख अपनाने को अदालत ने अभियोजन के मामले के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना। इन महिलाओं ने अदालत के समक्ष यह कहा था कि उन पर बृज भूषण शरण सिंह के खिलाफ बयान देने के लिए राजनीतिक दबाव था।
अदालत ने हालांकि उनके बयान बदलने को अभियोजन पक्ष के लिए गंभीर झटका माना और कहा कि इससे अभियोजन की कहानी पर असर पड़ता है। फैसले में ऐसे बयानों को मामले की विश्वसनीयता के आकलन का हिस्सा बनाया गया।
दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष की वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने अदालत के इस निष्कर्ष पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि जिन पीड़ितों और प्रत्यक्षदर्शी गवाहों ने कथित यौन उत्पीड़न के संबंध में विस्तृत गवाही दी, उनकी गवाही को तारीखों से जुड़ी छोटी-मोटी त्रुटियों के आधार पर खारिज करना उचित नहीं है।
उनके अनुसार, ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त ठोस आधार के यह निष्कर्ष निकाला कि पीड़ितों ने बृज भूषण को किसी साजिश के तहत फंसाया। अभियोजन पक्ष का मानना है कि इस दृष्टिकोण की न्यायिक समीक्षा आवश्यक है और फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए।
तस्वीरों और कथित सौहार्दपूर्ण संबंधों पर भी अदालत की टिप्पणी
अदालत ने अपने फैसले में शिकायतकर्ताओं और बृज भूषण शरण सिंह के बीच कथित तौर पर लंबे समय तक बने रहे सौहार्दपूर्ण संबंधों का भी उल्लेख किया।
फैसले में कहा गया कि बृज भूषण उस समय भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष थे और उनके पास पहलवानों के करियर को प्रभावित करने की क्षमता थी। लेकिन अदालत ने इस सवाल को भी महत्व दिया कि यदि लगातार यौन उत्पीड़न हुआ था तो शिकायतकर्ताओं और आरोपी के बीच लंबे समय तक सौहार्दपूर्ण संबंध किस तरह बने रहे।
अदालत ने साक्ष्य के तौर पर पेश की गई एक तस्वीर का भी उल्लेख किया। फैसले में तस्वीर में दिखाई देने वाली कथित सहज शारीरिक मुद्रा को इस बात के संदर्भ में देखा गया कि क्या कोई महिला उस व्यक्ति के साथ सहज दिखाई दे सकती है, जिसके बारे में वह बार-बार उत्पीड़न का आरोप लगा रही हो।
इसी तरह एक पहलवान के पति के संबंध में भी अदालत ने टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता और उनके पति आरोपी के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखते थे और कथित घटना के बाद विवाह के उपरांत बृज भूषण के निवास पर आशीर्वाद लेने भी गए थे। अदालत ने इन परिस्थितियों को अभियोजन के आरोपों की विश्वसनीयता के मूल्यांकन में शामिल किया।
घटनाओं की तारीख और स्थान में कथित विरोधाभास
फैसले में कथित घटनाओं से संबंधित विवरणों में सामने आए अंतर को भी महत्वपूर्ण माना गया। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ताओं ने यह बताया था कि उन्होंने तत्काल शिकायत इसलिए नहीं की क्योंकि उन्हें अपने करियर को नुकसान पहुंचने का डर था। लेकिन बाद में घटना के स्थान और वर्ष से जुड़े विवरणों में गलतियां सामने आईं।
अदालत ने इन विरोधाभासों को अभियोजन के लिए गंभीर माना। फैसले के अनुसार, आरोपों और गवाहियों में मौजूद कमियों ने अभियोजन की कहानी को संदेह के घेरे में ला दिया।
मजिस्ट्रेट ने यह भी टिप्पणी की कि आरोपों में इतनी कमियां थीं कि वे अदालत को पूरी तरह विश्वसनीय नहीं लगे। फैसले में यह आशंका भी व्यक्त की गई कि ऐसा प्रतीत होता है कि किसी गवाह को बयान देने के लिए सिखाया-पढ़ाया गया हो।
अब आगे क्या होगा?
बृज भूषण शरण सिंह को ट्रायल कोर्ट से राहत मिलने के बाद इस मामले का अगला महत्वपूर्ण चरण संभावित अपील है। शिकायतकर्ता महिला पहलवानों में से एक ने फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है। यदि अपील दाखिल होती है तो ऊपरी अदालत ट्रायल कोर्ट के फैसले, साक्ष्यों, गवाहियों और कानूनी निष्कर्षों की समीक्षा कर सकती है।
इस मामले की संवेदनशीलता इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह केवल एक आपराधिक मुकदमे तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 2023 में महिला पहलवानों के धरने ने भारतीय कुश्ती व्यवस्था, खेल संस्थानों में महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा और प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ शिकायतों की प्रक्रिया को लेकर देशव्यापी बहस को जन्म दिया था।
अब ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद दो समानांतर सवाल सामने हैं। पहला, क्या अभियोजन पक्ष ऊपरी अदालत में ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को चुनौती देकर उन्हें बदलवा पाएगा? और दूसरा, अदालत के 244 पन्नों के फैसले को सार्वजनिक करने पर लगाई गई कथित रोक का संवैधानिक और कानूनी आधार क्या है?
फिलहाल ट्रायल कोर्ट के फैसले ने बृज भूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को आरोपों से राहत दी है, लेकिन महिला पहलवानों की ओर से संभावित अपील के कारण इस मामले की कानूनी लड़ाई अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। फैसले की सार्वजनिक उपलब्धता को लेकर उठे सवाल भी इस पूरे प्रकरण में पारदर्शिता और खुले न्याय की बहस को आगे बढ़ा रहे हैं।

























