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इस बार इतना क्यों गिरा सीबीएसई परीक्षा पास करने वाले छात्रों का प्रतिशत?

ऑन स्क्रीन मार्किंग से लेकर बदलते परीक्षा पैटर्न तक, कई सवालों के घेरे में सीबीएसई का रिज़ल्ट

अंजनी कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट

Central Board of Secondary Education यानी सीबीएसई के 12वीं बोर्ड परीक्षा परिणाम इस बार केवल एक शैक्षणिक आंकड़ा नहीं रहे, बल्कि उन्होंने देशभर में शिक्षा व्यवस्था, मूल्यांकन प्रणाली और छात्रों की तैयारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
साल 2026 में जहां 85.20 प्रतिशत छात्र परीक्षा में सफल घोषित किए गए, वहीं पिछले वर्ष यह आंकड़ा 88.39 प्रतिशत था। यानी महज एक साल में लगभग तीन प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

कोविड महामारी के बाद यह पहली बार है जब सीबीएसई के रिज़ल्ट में इतनी बड़ी गिरावट देखने को मिली है। यही वजह है कि छात्र, अभिभावक, शिक्षक और स्कूल प्रबंधन अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर इस बार ऐसा क्या हुआ कि पास प्रतिशत अचानक नीचे आ गया? इस पूरे विवाद के केंद्र में है “ऑन स्क्रीन मार्किंग” यानी ओएसएम प्रणाली, जिसे सीबीएसई ने पहली बार बड़े स्तर पर लागू किया।

पहली बार डिजिटल तरीके से जांची गईं बोर्ड कॉपियां

इस वर्ष सीबीएसई ने उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑन स्क्रीन मार्किंग प्रणाली लागू की। इसके तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया गया और फिर शिक्षकों ने कंप्यूटर स्क्रीन पर ही उत्तरों का मूल्यांकन किया।

करीब 98.67 लाख कॉपियों की डिजिटल जांच की गई और लगभग 70 हजार शिक्षकों को इस प्रक्रिया में लगाया गया। सीबीएसई का दावा है कि इससे मूल्यांकन प्रक्रिया तेज़, पारदर्शी और त्रुटिरहित बनी। बोर्ड के मुताबिक, इसी नई व्यवस्था की वजह से परिणाम कम समय में जारी किए जा सके। लेकिन नतीजे सामने आते ही यही नई तकनीक सवालों के घेरे में आ गई।

छात्रों का आरोप- “हमारी मेहनत को सही अंक नहीं मिले”

रिज़ल्ट आने के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में छात्रों ने नाराज़गी जाहिर की। कई छात्रों का कहना है कि उन्होंने परीक्षा अच्छी दी थी, लेकिन अंक उम्मीद से बहुत कम आए। छात्रों का आरोप है कि डिजिटल स्क्रीन पर लंबे और विश्लेषणात्मक उत्तरों का सही मूल्यांकन नहीं हुआ। कई छात्रों का यह भी कहना है कि वैकल्पिक प्रश्नों के अंक भी नहीं दिए गए।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कई छात्रों ने दावा किया कि ओएसएम प्रक्रिया की वजह से लाखों छात्रों को नुकसान हुआ है।
ऑनलाइन याचिकाएं शुरू हुईं और 24 घंटे के भीतर हजारों हस्ताक्षर जुट गए।

शिक्षा विशेषज्ञों ने भी उठाए गंभीर सवाल

देश के वरिष्ठ शिक्षाविद और National Council of Educational Research and Training के पूर्व निदेशक Krishna Kumar ने भी इस प्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

उनका कहना है कि इतनी बड़ी परीक्षा प्रणाली में ऑन स्क्रीन मार्किंग को जल्दबाज़ी में लागू किया गया। उन्होंने स्कैन की गई कॉपियों की गुणवत्ता और डिजिटल मूल्यांकन की विश्वसनीयता पर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक, बोर्ड का पूरा ध्यान जल्दी परिणाम जारी करने पर रहा, जबकि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मूल्यांकन की गुणवत्ता होना चाहिए था।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग स्पष्ट नहीं होगी या मूल्यांकनकर्ता स्क्रीन पर उत्तरों को सही तरीके से नहीं पढ़ पाएंगे, तो छात्रों के अंक प्रभावित होना तय है।

क्या केवल ओएसएम ही है रिज़ल्ट गिरने की वजह?

हालांकि शिक्षा जगत का एक बड़ा वर्ग यह मानने को तैयार नहीं कि सिर्फ़ ऑन स्क्रीन मार्किंग ही इस गिरावट की वजह है। कई शिक्षकों और स्कूल प्रशासकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में छात्रों की अध्ययन शैली भी तेजी से बदली है। आज बड़ी संख्या में छात्र बोर्ड परीक्षा की तुलना में प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे जेईई और नीट की तैयारी पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में बोर्ड परीक्षा के वर्णनात्मक उत्तरों की तैयारी कमजोर रह जाती है।

बदल गया प्रश्नपत्रों का स्वरूप

इस बार सीबीएसई ने प्रश्नपत्रों में भी कई बदलाव किए थे। रटने वाले सवालों की जगह स्किल आधारित, केस स्टडी और एप्लीकेशन बेस्ड प्रश्नों की संख्या बढ़ाई गई। कई प्रिंसिपलों का मानना है कि छात्र अभी इस बदलाव के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे। विशेषकर ग्रामीण और छोटे शहरों के छात्रों को नए पैटर्न को समझने में कठिनाई हुई। शिक्षकों का कहना है कि बच्चे अब भी पारंपरिक तरीके से पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि बोर्ड विश्लेषणात्मक सोच और व्यावहारिक समझ को प्राथमिकता दे रहा है।

अनुभवहीन शिक्षकों पर भी उठे सवाल

देशभर में 3,000 से अधिक मूल्यांकन केंद्र बनाए गए थे। लेकिन कुछ वरिष्ठ शिक्षकों का कहना है कि कॉपी जांचने वाले शिक्षकों के चयन में भी खामियां हैं। सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों का शिक्षक डेटा ओएसिस सॉफ्टवेयर में दर्ज होता है और उसी आधार पर मूल्यांकनकर्ताओं का चयन किया जाता है। आरोप है कि इस डेटा का पर्याप्त सत्यापन नहीं होता।

कई मामलों में कम अनुभव वाले शिक्षकों को भी बोर्ड कॉपियां जांचने की जिम्मेदारी मिल जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अनुभवहीन शिक्षक डिजिटल स्क्रीन पर तेजी से कॉपियां जांचते समय उत्तरों की गुणवत्ता का सही मूल्यांकन नहीं कर पाते।

ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा गुणवत्ता भी चिंता का विषय

रिज़ल्ट में गिरावट को लेकर शिक्षा जगत में एक और बड़ा सवाल उठा है—ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ाई की गुणवत्ता। कई स्कूल प्रबंधकों का कहना है कि अभिभावक अक्सर बच्चों की रुचि और क्षमता को समझे बिना उन्हें विज्ञान वर्ग में दाखिला दिला देते हैं। ऐसे छात्र न तो बोर्ड परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं और न ही प्रतियोगी परीक्षाओं में। विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा अब “डिग्री” और “कोचिंग” तक सीमित होती जा रही है। लेखन कौशल, अवधारणात्मक समझ और विषय की गहराई लगातार कमजोर हो रही है।

कोविड के बाद बदली पढ़ाई की आदतें

कोविड महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई ने छात्रों की अध्ययन शैली को पूरी तरह बदल दिया। 2021 में जब बोर्ड परीक्षाएं आयोजित नहीं हुई थीं, तब आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर छात्रों को अंक दिए गए थे और उस वर्ष पास प्रतिशत 99 प्रतिशत से अधिक पहुंच गया था।

लेकिन वास्तविक परीक्षाएं शुरू होने के बाद लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला। 2022 में पास प्रतिशत 92.71 रहा। 2024 में यह 87.98 प्रतिशत पर पहुंचा। 2025 में 88.39 प्रतिशत छात्र पास हुए। अब 2026 में यह गिरकर 85.20 प्रतिशत रह गया।

यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि महामारी के बाद शिक्षा व्यवस्था अब भी पूरी तरह संतुलन में नहीं लौट पाई है।

छात्रों में बढ़ा मानसिक दबाव

कम अंक आने के बाद बड़ी संख्या में छात्र मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। विशेषकर वे छात्र जो मेडिकल, इंजीनियरिंग और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें अब कटऑफ और मेरिट सूची की चिंता सता रही है। कई कोचिंग संचालकों का कहना है कि यदि सीबीएसई छात्रों के अंक अन्य बोर्डों की तुलना में कम रहे, तो उन्हें दाखिले में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसी वजह से कई छात्र रीचेकिंग और पुनर्मूल्यांकन की मांग कर रहे हैं।

क्या भविष्य में और बढ़ेगा डिजिटल मूल्यांकन?

शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि तकनीक का इस्तेमाल पूरी तरह गलत नहीं है। दुनिया के कई देशों में ऑन स्क्रीन मार्किंग जैसी प्रणालियां सफलतापूर्वक लागू हैं। लेकिन भारत जैसे विशाल शिक्षा तंत्र में इसे लागू करने के लिए चरणबद्ध तैयारी, प्रशिक्षित मूल्यांकनकर्ता और मजबूत तकनीकी व्यवस्था जरूरी है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि:

  • स्कैनिंग की गुणवत्ता बेहतर की जाए
  • मूल्यांकनकर्ताओं को विस्तृत प्रशिक्षण दिया जाए
  • रीचेकिंग प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनाई जाए
  • छात्रों को उत्तर पुस्तिका देखने की सुविधा मिले
  • अनुभवहीन शिक्षकों को बोर्ड मूल्यांकन से दूर रखा जाए

सीबीएसई की चुप्पी भी बनी चर्चा का विषय

अब तक बोर्ड ने ऑन स्क्रीन मार्किंग से जुड़े आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि बोर्ड का कहना है कि रीचेकिंग और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था मौजूद है। लेकिन जिस तरह देशभर में छात्र और शिक्षक सवाल उठा रहे हैं, उससे साफ है कि यह विवाद जल्दी खत्म होने वाला नहीं है।

केवल रिज़ल्ट नहीं, शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल

सीबीएसई 2026 का रिज़ल्ट केवल कम पास प्रतिशत की खबर नहीं है। यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के भीतर छिपी कई चुनौतियों को सामने लाने वाला संकेत है। क्या तकनीक को जल्दबाज़ी में लागू किया गया? क्या छात्र बोर्ड परीक्षा से ज्यादा कोचिंग आधारित पढ़ाई पर निर्भर हो गए हैं? क्या स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण का संकट गहरा रहा है? क्या बदलते प्रश्नपत्र पैटर्न के लिए छात्र तैयार नहीं हैं?

इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में भारत की शिक्षा नीति और परीक्षा प्रणाली की दिशा तय करेंगे।

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