फीचर स्टोरी | भोजपुरी सिनेमा से राष्ट्रीय राजनीति तक रवि किशन का सफर
आलेख: अंजनी कुमार त्रिपाठी
भोजपुरी सिनेमा के जिस अभिनेता ने देसी मिट्टी की खुशबू को पर्दे की चमक के बीच बचाए रखा, उसका नाम रवि किशन है। अभिनय की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले रवि किशन का सफर केवल एक फिल्म स्टार के सफलता तक पहुंचने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस कलाकार की कहानी है जिसने छोटे शहर और गांव की सांस्कृतिक जमीन से निकलकर मुंबई की कठिन और प्रतिस्पर्धी दुनिया में अपने लिए जगह बनाई। आज वे अभिनय के साथ राजनीति में भी सक्रिय हैं और गोरखपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं। संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वे 2024 में 18वीं लोकसभा के लिए दोबारा निर्वाचित हुए।
रवि किशन का जीवन इस मायने में भी उल्लेखनीय है कि उनकी पहचान किसी एक भाषा या एक फिल्म उद्योग तक सीमित नहीं रही। भोजपुरी सिनेमा में उन्होंने लोकप्रियता का बड़ा आधार बनाया, हिंदी फिल्मों और टेलीविजन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों में भी काम किया। बाद के वर्षों में लापता लेडीज में सब-इंस्पेक्टर श्याम मनोहर के किरदार ने उनके अभिनय के एक ऐसे पक्ष को सामने रखा, जिसने हिंदी सिनेमा के दर्शकों और समीक्षकों दोनों का ध्यान खींचा।
गांव की रामलीला से शुरू हुआ अभिनय का सपना
रवि किशन का असली नाम रविंद्र शुक्ला है। उनका जन्म 17 जुलाई 1969 को हुआ। संसद के आधिकारिक जीवन-वृत्त में उनके पिता का नाम श्याम नारायण शुक्ला और माता का नाम जड़ावती देवी दर्ज है। आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका जन्मस्थान मुंबई दर्ज है, हालांकि उनके जीवन और सार्वजनिक परिचय में उत्तर प्रदेश के जौनपुर से उनका गहरा संबंध लगातार सामने आता रहा है।
उनके बचपन की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर गांव की रामलीला से जुड़ी है। अभिनय के प्रति उनका आकर्षण बचपन से ही दिखाई देने लगा था। रामलीला में सीता की भूमिका निभाने वाला वह किशोर आगे चलकर भोजपुरी सिनेमा का बड़ा चेहरा बनेगा, तब शायद किसी ने इसकी कल्पना नहीं की होगी।
रामलीला उनके लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं थी। वह अभिनय की पहली पाठशाला थी। मंच पर संवाद बोलना, भाव-भंगिमा बदलना, दर्शकों के सामने खड़े होना और किरदार को जीने की कोशिश करना—इन सबने उनके भीतर के कलाकार को धीरे-धीरे आकार दिया।
लेकिन हर सपना परिवार को स्वीकार्य हो, यह जरूरी नहीं। रवि किशन के पिता अभिनय की दुनिया को लेकर सहज नहीं थे। परिवार की अपनी सामाजिक और आर्थिक प्राथमिकताएं थीं। ऐसे माहौल में अभिनय को करियर बनाना आसान फैसला नहीं था।
यहीं उनकी मां की भूमिका निर्णायक बनती है। मां ने बेटे के भीतर के कलाकार को पहचाना और उसके सपने को रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ने का साहस दिया। यही वह भावनात्मक पूंजी थी, जिसने रवि किशन को मुंबई की ओर जाने का रास्ता दिखाया।
जेब में कम पैसे, आंखों में बड़ा सपना
मुंबई उन दिनों भी सपनों की नगरी थी, लेकिन हर सपने को जगह देने वाली नगरी नहीं। बाहर से आने वाले हजारों युवाओं की तरह रवि किशन के सामने भी सबसे बड़ा सवाल था—काम कहां मिलेगा और गुजारा कैसे होगा?
संघर्ष के दिनों की उनकी कहानियां आज उनकी सफलता के साथ अक्सर दोहराई जाती हैं। छोटे से कमरे में कई लोगों के साथ रहना, सीमित संसाधनों में दिन गुजारना और खाने तक के लिए जूझना उस दौर की कठोर वास्तविकता को सामने लाता है।
बताया जाता है कि संघर्ष के समय वे करीब 10×12 फुट के कमरे में कई लोगों के साथ रहते थे और कभी-कभी पानी वाली खिचड़ी से ही गुजारा करना पड़ता था। अभिनय के अवसरों की तलाश के साथ-साथ उन्होंने छोटे-मोटे काम भी किए, ताकि मुंबई में टिके रह सकें।
यही दौर किसी भी कलाकार के व्यक्तित्व को गढ़ता है। मुंबई में केवल प्रतिभा काफी नहीं होती। वहां धैर्य, निरंतरता, असफलता को झेलने की क्षमता और बार-बार खुद को साबित करने की जरूरत होती है। रवि किशन ने इन कसौटियों को पार करते हुए धीरे-धीरे अपना रास्ता बनाया।
उनकी कहानी का सबसे बड़ा पक्ष यह है कि सफलता आने के बाद भी संघर्ष की स्मृतियां उनके व्यक्तित्व से पूरी तरह अलग नहीं हुईं। यही कारण है कि भोजपुरी दर्शकों का एक बड़ा वर्ग उन्हें अपने बीच का कलाकार मानता है।
भोजपुरी सिनेमा बना पहचान का सबसे मजबूत आधार
रवि किशन के अभिनय जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय भोजपुरी सिनेमा से जुड़ा है। भोजपुरी भाषा और पूर्वांचली संस्कृति के दर्शकों के बीच उन्होंने ऐसी लोकप्रियता हासिल की, जिसने उन्हें क्षेत्रीय सिनेमा के बड़े सितारों में शामिल कर दिया।
भोजपुरी फिल्मों में उनकी संवाद अदायगी, देसी अंदाज, शारीरिक भाषा और भावनात्मक अभिनय ने उन्हें अलग पहचान दी। उन्होंने ऐसे किरदार किए जिनमें ग्रामीण समाज, पारिवारिक रिश्ते, संघर्ष, प्रेम, हास्य और सामाजिक परिस्थितियां दिखाई देती थीं।
इसी दौर में उनके प्रशंसकों ने उन्हें भोजपुरी सिनेमा का बड़ा चेहरा मानना शुरू किया। कई लोगों ने उन्हें भोजपुरी फिल्म उद्योग का ‘अमिताभ बच्चन’ तक कहा। यह उपमा उनके अभिनय की हूबहू तुलना से अधिक उस लोकप्रियता की ओर संकेत करती है जो उन्होंने अपने दर्शक वर्ग में अर्जित की।
रवि किशन की खासियत यह रही कि उन्होंने भोजपुरी को केवल एक क्षेत्रीय बाजार के रूप में नहीं देखा। उन्होंने इस भाषा के सिनेमा को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाने की कोशिश की और स्वयं भी हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा में लगातार जगह बनाते रहे।
छोटे पर्दे ने बढ़ाया दायरा
फिल्मों के साथ टेलीविजन ने भी रवि किशन की लोकप्रियता को नए दर्शकों तक पहुंचाया। बिग बॉस जैसे रियलिटी शो में उनकी मौजूदगी ने उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने रखा जो फिल्मों के किरदारों से अलग था।
रियलिटी टेलीविजन में कलाकार को कैमरे के सामने बिना किसी फिल्मी किरदार के अपने व्यक्तित्व के साथ मौजूद रहना पड़ता है। रवि किशन की बेबाक शैली, बातचीत का अंदाज और देसी ठसक ने उन्हें टीवी दर्शकों के बीच भी पहचान दिलाई।
झलक दिखला जा जैसे शो से उनकी लोकप्रियता का दायरा और बढ़ा। इस तरह उनका करियर केवल भोजपुरी फिल्मों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फिल्म, टेलीविजन और बाद में राजनीति—तीनों क्षेत्रों में फैलता गया।
हिंदी सिनेमा में धीरे-धीरे मजबूत हुई जगह
रवि किशन का हिंदी फिल्मों का सफर भी दिलचस्प रहा है। मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में उन्हें हमेशा केंद्रीय भूमिका नहीं मिली, लेकिन उन्होंने सहायक और चरित्र भूमिकाओं के जरिए अपनी उपयोगिता साबित की।
उनके अभिनय की एक विशेषता यह है कि वे किरदार को केवल संवादों से नहीं, बल्कि आवाज, चेहरे के हावभाव और शरीर की भाषा से भी स्थापित करते हैं। यही वजह है कि कई फिल्मों में सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद उनकी उपस्थिति याद रह जाती है।
समय के साथ उन्हें ऐसे किरदार मिलने लगे जिनमें उनकी स्वाभाविक देसी शैली का इस्तेमाल रचनात्मक तरीके से किया गया। यही प्रक्रिया लापता लेडीज तक पहुंचती है।
‘लापता लेडीज’ ने दिखाया अभिनय का नया रंग
किरण राव की फिल्म लापता लेडीज में रवि किशन ने सब-इंस्पेक्टर श्याम मनोहर की भूमिका निभाई। फिल्म 2024 में दर्शकों के सामने आई और इस किरदार ने रवि किशन की अभिनय क्षमता पर नए सिरे से चर्चा शुरू कर दी।
श्याम मनोहर एक ऐसा पुलिस अधिकारी है जिसमें हास्य, चालाकी, ग्रामीण परिवेश और मानवीय जटिलताओं का मिश्रण दिखाई देता है। रवि किशन ने इस किरदार को जिस सहजता से निभाया, उसने फिल्म के कई दृश्यों को खास बना दिया।
इस भूमिका के लिए आमिर खान ने भी ऑडिशन दिया था, लेकिन अंततः किरण राव ने रवि किशन को चुना। 2025 में आमिर खान के ऑडिशन का वीडियो सामने आने के बाद इस बात पर फिर चर्चा हुई कि आखिर यह भूमिका रवि किशन के हिस्से कैसे आई।
रवि किशन ने स्वयं भी इस अवसर के लिए किरण राव और आमिर खान के प्रति आभार व्यक्त किया था।
यह फिल्म उनके करियर में इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इसने उन्हें केवल भोजपुरी स्टार के रूप में देखने की धारणा को और पीछे धकेला। हिंदी दर्शकों के एक नए वर्ग ने उन्हें गंभीरता से एक सक्षम चरित्र अभिनेता के रूप में देखा।
‘लापता लेडीज’ के बाद बदली नजर
किसी अभिनेता के करियर में कुछ भूमिकाएं ऐसी होती हैं जो उसके पहले किए गए काम पर नया प्रकाश डाल देती हैं। श्याम मनोहर का किरदार रवि किशन के लिए कुछ ऐसा ही साबित हुआ।
इस भूमिका में उनका हास्य अभिनय से अलग नहीं था, बल्कि कहानी का हिस्सा था। उनकी आवाज, आंखों की चाल, पान चबाने की शैली, संवादों के बीच ठहराव और ग्रामीण पुलिस अधिकारी की देहभाषा ने किरदार को विशिष्ट बनाया।
फिल्म को भारत की ओर से ऑस्कर के लिए आधिकारिक प्रविष्टि चुने जाने के बाद रवि किशन ने भी इस उपलब्धि पर अपनी खुशी व्यक्त की थी।
यही वह मोड़ था जहां भोजपुरी सिनेमा के लोकप्रिय स्टार की छवि के साथ-साथ एक ऐसे अभिनेता की छवि मजबूत हुई जो अलग-अलग तरह के किरदारों को निभाने की क्षमता रखता है।
अभिनय से राजनीति तक
रवि किशन के जीवन का दूसरा बड़ा मोड़ राजनीति है। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जौनपुर से चुनाव लड़ा। उस चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली।
लेकिन राजनीति से उनका संबंध वहीं खत्म नहीं हुआ। 2017 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर तेजी से आगे बढ़ा।
2019 में वे गोरखपुर से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। 2024 में उन्होंने इसी सीट से दोबारा जीत दर्ज की और 18वीं लोकसभा के सदस्य बने। संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका दल भारतीय जनता पार्टी और निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर दर्ज है।
गोरखपुर की राजनीति अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण रही है। यह क्षेत्र लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहा है। ऐसे क्षेत्र से अभिनेता का लगातार दो बार लोकसभा पहुंचना रवि किशन की राजनीतिक स्वीकार्यता का संकेत है।
पर्दे का कलाकार, संसद का जनप्रतिनिधि
रवि किशन के सामने अब चुनौती पहले से अलग है। फिल्मों में अभिनय के लिए कैमरा, निर्देशक और पटकथा होती है। राजनीति में जनता सीधे मूल्यांकन करती है।
संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वे रक्षा संबंधी संसदीय समिति के सदस्य भी रहे हैं और विभिन्न संसदीय समितियों में उनकी भूमिका दर्ज है।
इस भूमिका में उनका फिल्मी व्यक्तित्व पूरी तरह समाप्त नहीं होता। उनकी भाषण शैली, संवाद बोलने का अंदाज और जनता से जुड़ने की क्षमता अब राजनीतिक मंच का हिस्सा है। यही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार भी है और सबसे बड़ी परीक्षा भी।
उनके राजनीतिक सफर में उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल, भोजपुरी भाषा और फिल्म उद्योग से जुड़े मुद्दों की चर्चा लगातार दिखाई देती है। वे खुद को उस सांस्कृतिक भूगोल से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं, जहां से उनकी अपनी यात्रा शुरू हुई।
सफलता के बावजूद मिट्टी से रिश्ता
रवि किशन की कहानी का सबसे आकर्षक पहलू उनकी सफलता से अधिक उनकी जड़ों से जुड़ाव है। मुंबई की फिल्मी दुनिया से लेकर संसद के गलियारों तक पहुंचने के बाद भी उनकी भाषा और प्रस्तुति में पूर्वांचल की छाप साफ दिखाई देती है।
यही कारण है कि उनके प्रशंसकों के लिए रवि किशन सिर्फ अभिनेता नहीं हैं। वे संघर्ष से सफलता तक पहुंचने का एक उदाहरण हैं।
एक युवक जिसने रामलीला के मंच पर सीता का किरदार निभाया, जिसने परिवार की असहमति के बावजूद अभिनय का सपना नहीं छोड़ा, जिसने सीमित संसाधनों के बीच मुंबई में संघर्ष किया, जिसने भोजपुरी फिल्मों में अपनी पहचान बनाई, हिंदी और दक्षिण भारतीय सिनेमा में काम किया, टेलीविजन पर लोकप्रिय हुआ और अंततः संसद तक पहुंचा—यह यात्रा अपने आप में असाधारण है।
दौलत से बड़ी है संघर्ष की कहानी
रवि किशन की संपत्ति और आर्थिक सफलता की चर्चा अक्सर उनके जीवन की कहानी के साथ की जाती है। लेकिन उनकी उपलब्धि को केवल करोड़ों की संपत्ति के आंकड़े में सीमित करना उनकी यात्रा को छोटा कर देना होगा।
किसी कलाकार की वास्तविक कमाई उसकी लोकप्रियता और लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता में भी होती है। रवि किशन ने तीन दशक से अधिक समय तक मनोरंजन की दुनिया में सक्रिय रहकर यह साबित किया है कि क्षेत्रीय सिनेमा से निकला कलाकार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकता है। हाल के वर्षों में भी वे फिल्मों और मनोरंजन परियोजनाओं में सक्रिय रहे हैं।
उनकी कहानी यह भी बताती है कि क्षेत्रीय भाषा का कलाकार अगर अपनी पहचान को कमजोरी मानने के बजाय ताकत बना ले, तो वही पहचान उसे बड़े मंच तक पहुंचा सकती है।
माटी की गंध बचाए रखने वाला सितारा
रवि किशन की जिंदगी को एक वाक्य में समेटना हो तो कहा जा सकता है—यह मिट्टी से उठकर मायानगरी की रोशनी तक पहुंचने और फिर सार्वजनिक जीवन के बड़े मंच पर खड़े होने की कहानी है।
रामलीला के मंच से शुरू हुई अभिनय की यात्रा भोजपुरी फिल्मों के विशाल संसार तक पहुंची। वहां से हिंदी सिनेमा, टेलीविजन और दक्षिण भारतीय फिल्मों का रास्ता खुला। लापता लेडीज जैसी फिल्म ने उनके अभिनय को नई पीढ़ी के सामने एक अलग रूप में रखा। उसके बाद राजनीति ने उनके जीवन को एक और दिशा दी।
आज रवि किशन के नाम के साथ अभिनेता, भोजपुरी स्टार और सांसद—तीनों पहचानें जुड़ी हैं। लेकिन इन सभी पहचान के पीछे वह संघर्ष मौजूद है जिसमें सपने थे, अभाव था, असफलताएं थीं और लगातार आगे बढ़ने की जिद थी।
शायद इसी वजह से रवि किशन की कहानी केवल एक फिल्म अभिनेता की जीवनी नहीं लगती। यह उस भारत की कहानी लगती है जहां गांव की रामलीला का एक कलाकार बड़े शहर की चमक में खोने के बजाय अपनी बोली, अपनी संस्कृति और अपनी माटी को साथ लेकर आगे बढ़ता है।
और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है—आसमान की ऊंचाई तक पहुंचने के बाद भी पैरों में अपनी माटी की पकड़ बनाए रखना।

























