खास बात

घर के इंतजार में खत्म होती कला : लोक कलाकारों का पलायन नहीं, सांस्कृतिक विस्थापन है यह

"कठपुतलियां खामोश हैं: उजड़ती बस्ती और मिटती लोक कलाओं की दास्तान"

दिल्ली की कठपुतली कॉलोनी कभी भारत की लोक कला और पारंपरिक कलाकारों का सबसे बड़ा केंद्र मानी जाती थी। यहां कठपुतली कलाकार, जादूगर, नट, लोक गायक और बाजीगर पीढ़ियों से अपनी कला का प्रदर्शन करते रहे हैं। पुनर्विकास परियोजना के तहत विस्थापन के बाद हजारों कलाकार आनंद पर्वत ट्रांजिट कैंप में रहने को मजबूर हैं। स्थायी आवास के इंतजार के साथ-साथ वे अपनी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक कला को बचाने की लड़ाई भी लड़ रहे हैं। यह कहानी केवल पुनर्वास की नहीं, बल्कि भारत की अमूल्य लोक विरासत के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे की भी है।

विनीता साहू विशेष रिपोर्ट

दिल्ली के पश्चिमी हिस्से में स्थित कठपुतली कॉलोनी कभी सिर्फ एक बस्ती नहीं थी, बल्कि भारत की लोक कलाओं का जीवंत संग्रहालय हुआ करती थी। यहां की तंग गलियों में सुबह होते ही ढोल की थाप सुनाई देती थी, कहीं रंग-बिरंगी कठपुतलियां नाचती थीं, कहीं जादूगर अपने करतब दिखाने की तैयारी में जुटे रहते थे। रस्सी पर चलने वाले नट, लोक गायक, बहुरूपिए, सपेरे और कठपुतली कलाकार—सभी इस बस्ती की पहचान थे।

लेकिन आज वही कलाकार दिल्ली के आनंद पर्वत स्थित ट्रांजिट कैंपों में रहने को मजबूर हैं। वर्षों पहले जिस पुनर्विकास परियोजना के तहत उन्हें बेहतर जीवन और स्थायी आवास का सपना दिखाया गया था, वह सपना अब तक अधूरा है। उनके सामने सिर्फ घर का संकट नहीं है, बल्कि अपनी पीढ़ियों पुरानी कला को बचाने का भी सवाल खड़ा है।

लोक संस्कृति की राजधानी थी कठपुतली कॉलोनी

कठपुतली कॉलोनी की स्थापना 1950 और 1960 के दशक के बीच मानी जाती है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों से लोक कलाकार रोज़गार और पहचान की तलाश में दिल्ली आए थे। धीरे-धीरे शादीपुर डिपो के पास यह बस्ती बस गई।

यहां लगभग 3,000 से अधिक परिवार रहते थे, जिनमें अधिकांश लोक कलाकार थे। राजस्थान के भाट समुदाय के कठपुतली कलाकारों ने इस कॉलोनी को उसका नाम दिया। समय के साथ यहां जादूगर, नट, बाजीगर, लोक संगीतकार और अन्य पारंपरिक कलाकार भी बसते गए।

दिल्ली आने वाले विदेशी पर्यटक अक्सर इस बस्ती का रुख करते थे। कई कलाकारों ने देश-विदेश में प्रदर्शन कर नाम कमाया। कुछ कलाकारों ने यूरोप, अमेरिका और एशिया के कई देशों में भारतीय लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया।

लेकिन विडंबना यह रही कि जिन कलाकारों ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को दुनिया तक पहुंचाया, उनके अपने घर और जीवन की सुरक्षा कभी सुनिश्चित नहीं हो सकी।

पुनर्विकास का सपना और विस्थापन की शुरुआत

साल 2009 में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने कठपुतली कॉलोनी के पुनर्विकास की योजना बनाई। इस परियोजना का उद्देश्य था कि झुग्गी बस्ती की जगह आधुनिक बहुमंजिला आवास बनाए जाएं और वहां रहने वाले परिवारों को फ्लैट दिए जाएं।

योजना सुनने में आकर्षक थी। कलाकारों को बताया गया कि कुछ वर्षों के भीतर उन्हें स्थायी मकान मिल जाएंगे। लेकिन परियोजना के क्रियान्वयन में देरी होती गई।

2014-15 के आसपास बड़ी संख्या में परिवारों को आनंद पर्वत के ट्रांजिट कैंप में स्थानांतरित कर दिया गया। उन्हें आश्वासन दिया गया कि यह व्यवस्था अस्थायी होगी। आज एक दशक से अधिक समय बीत चुका है। अनेक परिवार अब भी ट्रांजिट कैंप में रह रहे हैं।

ट्रांजिट कैंप की हकीकत

आनंद पर्वत का ट्रांजिट कैंप कलाकारों के लिए अस्थायी आश्रय तो बन गया, लेकिन यह उनके जीवन और कला दोनों के लिए चुनौती साबित हुआ।

कम जगह वाले कमरों में बड़े परिवार रहने को मजबूर हैं। कई कमरों में रोशनी और हवा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। कलाकार बताते हैं कि पहले उनकी झुग्गियों में भले ही सुविधाएं कम थीं, लेकिन कला के अभ्यास के लिए जगह थी।

कठपुतली कलाकारों को कठपुतलियां तैयार करने के लिए स्थान चाहिए। जादूगरों को अपने उपकरण रखने पड़ते हैं। संगीतकारों को रियाज़ के लिए खुला माहौल चाहिए। लेकिन ट्रांजिट कैंप के संकुचित कमरों में यह संभव नहीं हो पाता।

कई कलाकारों का कहना है कि उनके बच्चे अब अपनी पारंपरिक कला सीखने में रुचि नहीं ले रहे क्योंकि न तो अभ्यास की जगह है और न ही उस कला से सम्मानजनक आय।

कला से दूर होती नई पीढ़ी

कठपुतली कॉलोनी की सबसे बड़ी त्रासदी सिर्फ विस्थापन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का क्षरण है। एक समय था जब बच्चे अपने माता-पिता के साथ मंच पर जाते थे। घरों में कठपुतली बनाना, गीत गाना और वाद्य यंत्र बजाना रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। अब स्थिति बदल गई है।

मोबाइल फोन, इंटरनेट और बदलती मनोरंजन संस्कृति के कारण पारंपरिक कलाओं की मांग पहले ही कम हो चुकी थी। विस्थापन ने इस संकट को और गहरा कर दिया।

आज अनेक युवा नौकरी, ड्राइविंग, मजदूरी, डिलीवरी सेवाओं और छोटे-मोटे व्यवसायों की ओर जा रहे हैं। उनके लिए कला जीविका का भरोसेमंद साधन नहीं रह गई।

एक कलाकार के शब्दों में, “हमारे पिता और दादा कठपुतली चलाकर परिवार पालते थे, लेकिन आज हमारे बच्चे पूछते हैं कि इससे कमाई कितनी होगी।” यह सवाल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भविष्य से जुड़ा हुआ है।

क्या सिर्फ मकान ही समाधान है?

सरकारी एजेंसियां अक्सर पुनर्विकास को आवासीय समस्या के समाधान के रूप में प्रस्तुत करती हैं। लेकिन कठपुतली कॉलोनी का मामला बताता है कि कलाकार समुदायों के लिए सिर्फ मकान पर्याप्त नहीं है। इन लोगों की पहचान उनके घरों से नहीं, बल्कि उनकी कला से जुड़ी है।

यदि किसी कलाकार को बहुमंजिला इमारत में फ्लैट मिल भी जाए, लेकिन उसके पास रियाज़ की जगह न हो, प्रस्तुति के अवसर न हों और कला से आय न मिले, तो क्या उसकी सांस्कृतिक पहचान बची रहेगी? विशेषज्ञों का मानना है कि पुनर्विकास योजनाओं में सांस्कृतिक और आर्थिक पुनर्वास को भी शामिल किया जाना चाहिए। कठपुतली कलाकारों के लिए प्रशिक्षण केंद्र, प्रदर्शन स्थल, सांस्कृतिक बाजार और कला विद्यालय विकसित किए जाने चाहिए थे। लेकिन ऐसा व्यापक दृष्टिकोण अब तक दिखाई नहीं देता।

विकास बनाम विरासत

कठपुतली कॉलोनी का मामला विकास और विरासत के बीच संघर्ष का उदाहरण बन गया है। एक पक्ष का तर्क है कि झुग्गियों का पुनर्विकास आवश्यक था। लोगों को बेहतर आवास मिलना चाहिए और शहर का आधुनिक विकास भी जरूरी है।

दूसरा पक्ष सवाल उठाता है कि क्या विकास की कीमत पर सांस्कृतिक विरासत को खत्म किया जा सकता है?

यदि किसी ऐतिहासिक स्मारक को बचाने के लिए विशेष योजनाएं बनाई जा सकती हैं, तो सदियों पुरानी लोक कलाओं और कलाकार समुदायों को बचाने के लिए क्यों नहीं?

कठपुतली कॉलोनी केवल जमीन का टुकड़ा नहीं थी। वह भारत की जीवित सांस्कृतिक धरोहर थी। वहां की गलियां संग्रहालय की वस्तुएं नहीं, बल्कि जीवंत परंपराओं का संसार थीं।

सरकारी योजनाएं और वास्तविकता

केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर लोक कलाकारों के संरक्षण के लिए योजनाओं की घोषणा करती रही हैं। सांस्कृतिक मंत्रालय, संगीत नाटक अकादमी और अन्य संस्थान कलाकारों को मंच देने का दावा करते हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर कलाकारों का कहना है कि इन योजनाओं का लाभ सीमित लोगों तक पहुंचता है।

कई कलाकारों के पास आवश्यक दस्तावेज नहीं होते। कुछ को जानकारी नहीं मिलती। कुछ प्रक्रियाएं इतनी जटिल हैं कि गरीब कलाकार उनके दायरे से बाहर रह जाते हैं। परिणाम यह है कि अनेक कलाकार आज भी अनियमित आय और असुरक्षित भविष्य के साथ जीवन जी रहे हैं।

पर्यटन और संस्कृति से जुड़ सकता है समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि कठपुतली कॉलोनी जैसी बस्तियों को सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता था।

दुनिया के कई देशों में लोक कलाकारों के लिए विशेष सांस्कृतिक गांव बनाए गए हैं, जहां पर्यटक कला का अनुभव करते हैं और कलाकारों को नियमित आय प्राप्त होती है। दिल्ली जैसे महानगर में भी ऐसा मॉडल विकसित किया जा सकता है। यदि कलाकारों को स्थायी प्रदर्शन स्थल, विपणन सहायता और डिजिटल मंच उपलब्ध कराए जाएं, तो उनकी कला फिर से जीवित हो सकती है।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से भी पारंपरिक कलाओं को नए दर्शक मिल सकते हैं। इसके लिए संस्थागत सहयोग और प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

अधूरा इंतजार

आज आनंद पर्वत के ट्रांजिट कैंप में रहने वाले हजारों लोग अपने स्थायी घरों का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन उससे भी बड़ा इंतजार है अपनी कला को फिर से सम्मान मिलने का। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह नहीं कि मकान कब मिलेगा, बल्कि यह है कि तब तक उनकी कला बचेगी भी या नहीं।

एक पीढ़ी धीरे-धीरे मंच से उतर रही है। दूसरी पीढ़ी मंच पर आने को तैयार नहीं। ऐसे में कठपुतली कॉलोनी की कहानी सिर्फ पुनर्वास की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि यह भारत की लोक सांस्कृतिक विरासत के भविष्य पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न बन जाती है।

कठपुतली कॉलोनी का संकट केवल आवासीय समस्या नहीं है। यह उस देश की विडंबना है जो अपनी सांस्कृतिक विविधता पर गर्व करता है, लेकिन उन्हीं कलाकारों को सुरक्षित भविष्य देने में संघर्ष करता है जो उस संस्कृति को जीवित रखते हैं।

यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में कठपुतली कॉलोनी की पहचान सिर्फ इतिहास के पन्नों में रह जाएगी। रंग-बिरंगी कठपुतलियां, ढोल की थाप, जादू के करतब और लोक गीतों की गूंज शायद तस्वीरों और दस्तावेजों तक सीमित होकर रह जाए। तब सवाल यह होगा कि क्या हमने सिर्फ एक बस्ती खोई, या अपनी सांस्कृतिक आत्मा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी खो दिया?

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