संपादकीय
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शब्दों के आईने में समाज, संस्कार और सियासत : बदलते भारत की एक जीवंत शाब्दिक यात्रा
-अनिल अनूप समाज कभी एक जगह खड़ा नहीं रहता। वह हर दिन बदलता है, हर पीढ़ी के साथ अपना रंग…
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“पायल उतार दऽ… आवाज करऽता!” : रिश्तों, राजनीति और समाज के शोर का सच
अनिल अनूप ✍️ भोजपुरी लोकसंगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि वह भारतीय ग्रामीण जीवन की संवेदनाओं, संघर्षों, रिश्तों…
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जनता का मूड : बदलाव, भरोसा और नई उम्मीदों का जनादेश
✍️ अनिल अनूप भारत के पांच महत्वपूर्ण राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी—में आए चुनावी नतीजों ने यह स्पष्ट…
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क्या 1 मई का जश्न एक झूठ है? मजदूर,आज भी क्यों मजबूर है?
— अनिल अनूप हर साल 1 मई को मजदूर दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। भाषण होते हैं,…
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विश्वास का यह सेतु ; समाचार दर्पण 24 की यात्रा, जनगणदूत का नया पड़ाव
✍️विशेष संपादकीय: अनिल अनूप समय के विस्तृत आकाश में चौदह वर्ष कोई बहुत लंबा कालखंड नहीं माना जाता, किंतु जब…
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