संपादकीय
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अकेलापन, दर्द और जीवन का दर्शन : एक संवाद जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया
अकेलापन और जीवन का दर्शन हर व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी रूप में उपस्थित रहता है। कुछ लोग…
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बदबख्त नशा और बाअदब नशेड़ी
“बदबख्त नशा और बाअदब नशेड़ी” संपादकीय शराब के नशे से उत्पन्न भ्रम, झूठे आत्मविश्वास और उसके सामाजिक दुष्परिणामों का गहन…
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जब घर जला तो शेर अमर हो गया : बशीर बद्र, दंगे और हमारी सामूहिक विफलता
अनिल अनूप, संपादक भारतीय उपमहाद्वीप की साहित्यिक परंपरा में कुछ शायर ऐसे होते हैं जिनकी रचनाएं केवल कागज पर लिखे…
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हिंदी पत्रकारिता दिवस : पत्रकार बढ़े, लेकिन क्या पत्रकारिता बची रह गई है?
✍️ लेखक: अनिल अनूप (संपादकीय) हर वर्ष 30 मई को देशभर में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। कई लोग…
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नौतपा : तपती धरती, तमतमाता आसमान और बदलते समय की चेतावनी
संपादक अनिल अनूप भारत की पारंपरिक ऋतु व्यवस्था में “नौतपा” केवल मौसम का एक चरण नहीं, बल्कि प्रकृति की एक…
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जातिवाद की जंजीरों में जकड़ा हिन्दू समाज आखिर कब जागेगा?
– अनिल अनूपनिष्पक्ष, संवेदनशील और जनपक्षीय दृष्टि के साथ भारत को दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में गिना जाता है।…
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छात्रों का क्या कसूर? नीट पेपर लीक ने फिर खड़ा किया शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सबसे बड़ा सवाल
मोहन द्विवेदी देश के लाखों छात्रों के सपनों पर एक बार फिर अविश्वास का साया मंडरा गया है। मेडिकल की…
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अगर खबरें बोल सकतीं, तो वे पत्रकारों से क्या कहतीं?
अनिल अनूप आज के समय में खबरें सिर्फ कागज़ पर छपे शब्द नहीं रहीं। वे मोबाइल स्क्रीन की चमक में…
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शब्दों के आईने में समाज, संस्कार और सियासत : बदलते भारत की एक जीवंत शाब्दिक यात्रा
-अनिल अनूप समाज कभी एक जगह खड़ा नहीं रहता। वह हर दिन बदलता है, हर पीढ़ी के साथ अपना रंग…
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“पायल उतार दऽ… आवाज करऽता!” : रिश्तों, राजनीति और समाज के शोर का सच
अनिल अनूप ✍️ भोजपुरी लोकसंगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि वह भारतीय ग्रामीण जीवन की संवेदनाओं, संघर्षों, रिश्तों…
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