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काम के दबाव में शिक्षक ने फ्लाईओवर से लगाई छलांग, सुसाइड नोट ने उठाए प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल

परवेज अंसारी की रिपोर्ट

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्य के दौरान बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) की निगरानी कर रहे एक सरकारी शिक्षक द्वारा फ्लाईओवर से छलांग लगाने की घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था और चुनावी कार्यों में लगे कर्मचारियों पर पड़ रहे मानसिक दबाव को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। घायल शिक्षक के पास से मिले सुसाइड नोट में काम के अत्यधिक दबाव और लगातार बढ़ते मानसिक तनाव का उल्लेख होने के बाद यह मामला केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं रह गया, बल्कि चुनावी ड्यूटी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

रानी झांसी फ्लाईओवर से लगाई छलांग, अस्पताल में चल रहा इलाज

जानकारी के अनुसार 45 वर्षीय आनंद कुमार सरोहा दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय के अंतर्गत संचालित एक सर्वोदय बाल विद्यालय में गणित के शिक्षक हैं। उन्हें निर्वाचन संबंधी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के दौरान बीएलओ सुपरवाइजर की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी।

बताया जा रहा है कि गुरुवार को उन्होंने रानी झांसी फ्लाईओवर से लगभग 30 फीट नीचे छलांग लगा दी। राहगीरों ने उन्हें गंभीर रूप से घायल अवस्था में देखकर तत्काल पुलिस और एम्बुलेंस को सूचना दी। प्राथमिक उपचार के लिए उन्हें बाड़ा हिंदूराव अस्पताल ले जाया गया, जहां से बाद में बेहतर इलाज के लिए दूसरे अस्पताल में रेफर कर दिया गया। चिकित्सकों के अनुसार उनकी हालत फिलहाल खतरे से बाहर है, हालांकि दोनों हाथों में फ्रैक्चर सहित शरीर के कई हिस्सों में गंभीर चोटें आई हैं।

घटनास्थल से मिला सुसाइड नोट

पुलिस को मौके से एक हस्तलिखित सुसाइड नोट भी मिला है, जिसे जांच के लिए सुरक्षित कर लिया गया है।

बताया गया है कि नोट में शिक्षक ने लिखा है कि पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत लगातार खराब हो रही थी और वह अत्यधिक मानसिक दबाव महसूस कर रहे थे। इसी तनाव के चलते उन्होंने यह कदम उठाने का फैसला किया।

पुलिस सुसाइड नोट की सत्यता की जांच करने के साथ-साथ परिवार, सहकर्मियों और परिचितों के बयान भी दर्ज कर रही है ताकि घटना की वास्तविक परिस्थितियों का पता लगाया जा सके।

बीएलओ सुपरवाइजर के रूप में मिली थी अतिरिक्त जिम्मेदारी

शिक्षण कार्य के अलावा आनंद कुमार सरोहा को सदर बाजार क्षेत्र के बूथ संख्या 141 से 150 तक नियुक्त बीएलओ की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी।

इस कार्य के अंतर्गत मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण, मतदाताओं के सत्यापन, स्थानांतरित मतदाताओं की सूची तैयार करना, मृत मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया, अनुपस्थित मतदाताओं का सत्यापन, नए मतदाताओं का पंजीकरण तथा ऑनलाइन डाटा अपलोड जैसे अनेक कार्य शामिल हैं।

इन सभी कार्यों को सीमित समय में पूरा करने की जिम्मेदारी बीएलओ और उनके सुपरवाइजरों पर होती है।

पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही

दिल्ली पुलिस ने घटना की जांच शुरू कर दी है। फ्लाईओवर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग खंगाली जा रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शिक्षक वहां तक कैसे पहुंचे और घटना से पहले क्या परिस्थितियां थीं।

पुलिस इस मामले को फिलहाल आत्महत्या के प्रयास के रूप में देखते हुए सभी पहलुओं की जांच कर रही है।

चुनावी कार्यों के दबाव पर उठे सवाल

इस घटना के बाद बीएलओ और बीएलओ सुपरवाइजरों के बीच चुनावी कार्यों के बढ़ते दबाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

कई कर्मचारियों का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान प्रत्येक बीएलओ को लगभग 1200 या उससे अधिक मतदाताओं का सत्यापन करना पड़ता है। इसके अलावा घर-घर जाकर इन्यूमरेशन फॉर्म वितरित करना, मतदाता पहचान पत्र से संबंधित कार्य, स्थानांतरित, मृत एवं अनुपस्थित मतदाताओं की सूची तैयार करना तथा सभी सूचनाओं को ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड करना भी उनकी जिम्मेदारी होती है। कर्मचारियों का कहना है कि इतने व्यापक कार्य को बहुत कम समय में पूरा करने का दबाव लगातार बना रहता है।

अधिकारियों के व्यवहार को लेकर भी कर्मचारियों की शिकायत

बीएलओ और बीएलओ सुपरवाइजरों से बातचीत में कई कर्मचारियों ने दावा किया कि समय सीमा पूरी कराने के लिए विभिन्न स्तरों के अधिकारी लगातार दबाव बनाते हैं।

कर्मचारियों का आरोप है कि कार्य में थोड़ी भी देरी होने पर निलंबन, विभागीय कार्रवाई, सेवा समाप्ति अथवा पुलिस कार्रवाई का भय दिखाया जाता है। कई कर्मचारियों ने यह भी कहा कि लगातार फटकार और मानसिक दबाव के कारण कार्य करना अत्यंत कठिन हो जाता है।

हालांकि इन आरोपों पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

कम मानदेय को लेकर भी नाराजगी

बीएलओ कार्य से जुड़े कई कर्मचारियों का कहना है कि पूरे वर्ष इस अतिरिक्त जिम्मेदारी के बदले उन्हें लगभग 12 हजार से 18 हजार रुपये तक का मानदेय मिलता है।

उनका आरोप है कि यह भुगतान भी कई बार समय पर नहीं हो पाता, जबकि कार्यभार लगातार बढ़ता जा रहा है। कर्मचारियों का मानना है कि जिम्मेदारी और भुगतान के बीच संतुलन नहीं होने से असंतोष बढ़ रहा है।

कई विभागों के कर्मचारियों को लगाई जाती है ड्यूटी

जानकारी के अनुसार बीएलओ का कार्य केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं है। विभिन्न सरकारी विभागों के कर्मचारी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, लिपिक, एमटीएस तथा अन्य कार्मिकों को भी निर्वाचन कार्यों में लगाया जाता है।

कई कर्मचारियों का कहना है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्याओं या अन्य कठिनाइयों के बावजूद उन्हें चुनावी ड्यूटी से राहत नहीं मिलती। उनका दावा है कि एक बार इस कार्य में नियुक्ति होने के बाद लंबे समय तक इससे मुक्त होना आसान नहीं होता।

मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ती चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ता कार्यभार, समयबद्ध लक्ष्य, प्रशासनिक दबाव और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन न बना पाने की स्थिति कई कर्मचारियों को मानसिक तनाव की ओर धकेल सकती है।

ऐसे मामलों में समय पर परामर्श, कार्य का संतुलित वितरण, पर्याप्त मानव संसाधन तथा संवेदनशील प्रशासनिक व्यवहार अत्यंत आवश्यक माना जाता है। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संस्थागत सहायता उपलब्ध कराना भी समय की जरूरत है।

निष्पक्ष जांच की मांग

शिक्षक द्वारा उठाए गए इस कदम के बाद कर्मचारी संगठनों और विभिन्न वर्गों में निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। लोगों का कहना है कि यदि वास्तव में चुनावी कार्यों का दबाव इस घटना का कारण बना है तो संबंधित परिस्थितियों की गहराई से जांच होनी चाहिए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए।

फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और सुसाइड नोट सहित सभी तथ्यों की पड़ताल की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही घटना के वास्तविक कारणों पर अंतिम स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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