खास बात

बुंदेलखंड में फिर भड़का ‘चिता आंदोलन’ : चिताओं पर लेटीं आदिवासी महिलाएं, विस्थापितों ने भ्रष्टाचार और पुनर्वास में गड़बड़ी के लगाए गंभीर आरोप

केन-बेतवा सहित कई परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों का दोबारा उग्र विरोध, कहा—पूर्ण पुनर्वास और न्याय मिलने तक आंदोलन रहेगा जारी

संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

छतरपुर/पन्ना। बुंदेलखंड में विकास परियोजनाओं से प्रभावित हजारों ग्रामीणों का आक्रोश एक बार फिर सड़क पर दिखाई देने लगा है। छतरपुर और पन्ना जिलों में विभिन्न परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए परिवारों ने प्रशासन के खिलाफ दोबारा मोर्चा खोल दिया है। केन-बेतवा लिंक परियोजना, मझगाय, रूंझ, नेगुवा तथा एनटीपीसी से प्रभावित ग्रामीणों ने अपने लंबे समय से लंबित पुनर्वास, मुआवजे और अधिकारों की मांग को लेकर ‘चिता आंदोलन’ के दूसरे चरण की शुरुआत कर दी है।

आंदोलन ने दूसरे दिन और भी भावनात्मक रूप ले लिया, जब बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से बनाई गई चिताओं पर लेट गईं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि सरकार उनकी जीविका, घर और जमीन छीन सकती है तो उनके लिए यह संघर्ष जीवन और मृत्यु का सवाल बन चुका है। इस अनोखे विरोध प्रदर्शन ने पूरे इलाके का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

क्रमिक अनशन के साथ तेज हुआ आंदोलन

शनिवार से शुरू हुए आंदोलन के दूसरे दिन प्रभावित परिवारों ने क्रमिक अनशन भी प्रारंभ कर दिया। आंदोलनकारियों का कहना है कि अब वे केवल आश्वासन सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। वर्षों से लंबित समस्याओं का स्थायी समाधान चाहते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार कई बार प्रशासन ने बातचीत कर आंदोलन समाप्त कराया, लेकिन बाद में किए गए अधिकांश वादे कागजों तक ही सीमित रह गए। इसी वजह से इस बार आंदोलन को लंबी लड़ाई के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।

बिना पूर्व सूचना मकान तोड़ने का आरोप

विस्थापित परिवारों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कई गांवों में अधिकारियों ने बिना पर्याप्त पूर्व सूचना दिए लोगों के पुश्तैनी मकानों को ध्वस्त कर दिया। इससे अनेक परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए हैं।

ग्रामीणों का दावा है कि मकान तोड़े जाने के बावजूद उन्हें न तो समय पर वैकल्पिक आवास मिला और न ही पूर्ण मुआवजा। प्रभावित लोगों का कहना है कि वर्षों की मेहनत से बनाए गए उनके घर एक झटके में उजाड़ दिए गए, जबकि पुनर्वास की प्रक्रिया अब भी अधूरी है।

मुआवजा सूची में अनियमितता और रिश्वतखोरी के आरोप

आंदोलन में शामिल लोगों का आरोप है कि मुआवजा वितरण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं रही। उनका कहना है कि ग्राम सभाओं की भूमिका को नजरअंदाज करते हुए अधिकारियों ने मनमाने ढंग से पात्र लोगों की सूची तैयार की।

ग्रामीणों का आरोप है कि कई वास्तविक हकदारों के नाम सूची से बाहर कर दिए गए, जबकि कुछ प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाया गया। आंदोलनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि पात्रता बनाए रखने या भूमि संबंधी मामलों में राहत देने के नाम पर रिश्वत की मांग की गई। हालांकि इन आरोपों पर प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

‘आपदा में अवसर तलाश रहे हैं भ्रष्ट अधिकारी और नेता’

जय किसान संगठन के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने प्रशासन और राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा हमला बोला। उनका आरोप है कि विकास परियोजनाओं की आड़ में कुछ अधिकारी और प्रभावशाली लोग आर्थिक लाभ कमाने में जुटे हैं, जबकि वास्तविक विस्थापित अपने अधिकारों के लिए भटक रहे हैं।

उन्होंने दावा किया कि मुआवजा वितरण और भूमि अधिग्रहण से जुड़े कई मामलों में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। भटनागर ने कहा कि संगठन आने वाले समय में परियोजनाओं से जुड़े करोड़ों रुपये के मुआवजा वितरण की प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करेगा, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके।

पहले भी कई अनोखे आंदोलनों से खींचा था ध्यान

बुंदेलखंड के विस्थापित परिवारों का यह पहला बड़ा आंदोलन नहीं है। इससे पहले भी वे अपने अधिकारों के लिए कई प्रतीकात्मक और अनोखे आंदोलन कर चुके हैं।

ग्रामीणों ने पहले कड़ाके की ठंड में लगातार कई दिनों तक चिता सत्याग्रह किया था। इसके अलावा वे घंटों तक पानी में खड़े रहकर जल सत्याग्रह भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं, प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने के लिए कई बार ग्रामीणों ने सांकेतिक रूप से फांसी के फंदे पर लटककर भी विरोध दर्ज कराया था।

इन आंदोलनों के बाद प्रशासन ने कई बार लिखित आश्वासन दिए, लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जमीनी स्तर पर अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। यही कारण है कि इस बार आंदोलन अधिक व्यापक और निर्णायक स्वरूप में किया जा रहा है।

‘मिट्टी सत्याग्रह’ के बाद अब आर-पार की लड़ाई

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने वर्षों से लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाई है। मिट्टी सत्याग्रह, जल सत्याग्रह, चिता सत्याग्रह और अन्य शांतिपूर्ण आंदोलनों के बावजूद उनकी मूल समस्याओं का समाधान नहीं हुआ।

आंदोलनकारियों का कहना है कि अब वे केवल आश्वासन या लिखित भरोसे पर आंदोलन समाप्त नहीं करेंगे। उनका स्पष्ट कहना है कि जब तक प्रत्येक प्रभावित परिवार को न्यायसंगत मुआवजा, रहने योग्य भूमि, वैकल्पिक आवास और संपूर्ण पुनर्वास उपलब्ध नहीं कराया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

प्रशासन की चुप्पी से बढ़ रही नाराजगी

आंदोलन के बीच अब तक स्थानीय प्रशासन की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इससे प्रभावित परिवारों में नाराजगी और बढ़ती दिखाई दे रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि प्रशासन शीघ्र सकारात्मक पहल नहीं करता, तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।

स्थानीय लोगों का मानना है कि विकास परियोजनाएं क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन उनका लाभ तभी सार्थक होगा जब प्रभावित परिवारों के अधिकारों की भी समान रूप से रक्षा की जाए। बिना समुचित पुनर्वास और पारदर्शी मुआवजा व्यवस्था के विकास की प्रक्रिया सामाजिक असंतोष को जन्म देती है।

न्याय और पुनर्वास की मांग बनी आंदोलन का केंद्र

बुंदेलखंड में चल रहा यह आंदोलन केवल मुआवजे का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह विस्थापित परिवारों के सम्मान, आजीविका और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बनता जा रहा है। आंदोलनकारी चाहते हैं कि प्रत्येक पात्र परिवार का निष्पक्ष सर्वे कराया जाए, पारदर्शी तरीके से मुआवजा दिया जाए और पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया समयबद्ध ढंग से पूरी की जाए।

फिलहाल चिता आंदोलन और क्रमिक अनशन जारी है। अब सबकी नजर प्रशासन और सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी है कि वे आंदोलनकारियों की मांगों पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान कैसे निकालते हैं।

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