कर्ज के बोझ तले दबा पिता, लेकिन बेटे को बना दिया देश का नंबर-1 “जेवलिन थ्रोअर”

रिपोर्टर रामकीर्ति यादव की तस्वीर के साथ रोहित यादव, उनके पिता सभाजीत यादव और परिवार की फीचर इमेज, जो संघर्ष से देश के नंबर-1 जेवलिन थ्रोअर बनने की प्रेरक कहानी दर्शाती है।

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रामकीर्ति यादव की रिपोर्ट

जौनपुर। किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे वर्षों की मेहनत, अनुशासन और त्याग छिपा होता है, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो केवल खेल उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाती हैं। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के रहने वाले युवा जेवलिन थ्रोअर रोहित यादव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आज रोहित देश के नंबर-1 और विश्व के शीर्ष खिलाड़ियों में अपनी जगह बना चुके हैं। उन्होंने शानदार प्रदर्शन के दम पर भारत के स्टार भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा को राष्ट्रीय रैंकिंग में पीछे छोड़ दिया है। हालांकि इस सफलता के पीछे उनके पिता सभाजीत यादव का अथक संघर्ष, आर्थिक कठिनाइयों से जंग और वर्षों का समर्पण छिपा है।

आर्थिक तंगी के बावजूद नहीं छोड़ा सपना

रोहित यादव के पिता सभाजीत यादव स्वयं एक धावक रह चुके हैं। खेल के प्रति उनका लगाव बचपन से था, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण वे अपने सपनों को पूरी तरह साकार नहीं कर सके। उन्होंने ठान लिया कि जो मुकाम वे हासिल नहीं कर पाए, वहां अपने बेटे को जरूर पहुंचाएंगे।

परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। कई बार घर चलाना भी चुनौती बन जाता था। बेटे की खेल यात्रा को जारी रखने के लिए उन्होंने कर्ज लिया, आर्थिक परेशानियां झेलीं और अपनी जरूरतों से समझौता किया। इसके बावजूद उन्होंने कभी रोहित के अभ्यास में कमी नहीं आने दी।

महज छह साल की उम्र से शुरू हुई जेवलिन की यात्रा

सभाजीत यादव ने रोहित की प्रतिभा को बचपन में ही पहचान लिया था। जब रोहित केवल छह वर्ष के थे, तभी उनके हाथ में पहली बार जेवलिन थमा दी गई। उस समय महंगे खेल उपकरण खरीदना परिवार के लिए संभव नहीं था, इसलिए स्थानीय संसाधनों से तैयार किए गए बांस के भाले से ही अभ्यास शुरू कराया गया।

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धीरे-धीरे यही अभ्यास रोहित की पहचान बन गया। सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुई यह यात्रा आज अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है।

खेत बना स्टेडियम, पेड़ बना अभ्यास का लक्ष्य

गांव में आधुनिक खेल सुविधाओं का अभाव था। ऐसे में सभाजीत यादव ने अपने खेत को ही अभ्यास मैदान में बदल दिया। खेत के किनारे खड़े पेड़ों पर मोटी चादर बांधकर लक्ष्य तैयार किया जाता और रोहित घंटों तक उसी पर भाला फेंकने का अभ्यास करते।

महंगे कोचिंग सेंटर, आधुनिक ट्रैक और अंतरराष्ट्रीय सुविधाएं उनके पास नहीं थीं, लेकिन मेहनत, अनुशासन और नियमित अभ्यास ने इन सभी कमियों को पीछे छोड़ दिया।

चोटें आईं, लेकिन हौसला नहीं टूटा

खेल के शुरुआती दिनों में रोहित और उनके भाइयों को कई बार चोटों का सामना करना पड़ा। सुविधाओं की कमी के कारण उपचार भी आसान नहीं था। इसके बावजूद परिवार ने हार नहीं मानी।

सभाजीत यादव स्वयं अपने बेटों का मार्गदर्शन करते रहे। वे केवल पिता ही नहीं, बल्कि प्रशिक्षक, प्रेरक और हर मुश्किल में साथ खड़े रहने वाले साथी भी बने। उनका विश्वास था कि निरंतर मेहनत करने वाला खिलाड़ी एक दिन जरूर सफल होता है।

छोटे मुकाबलों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर

गांव और आसपास आयोजित स्थानीय प्रतियोगिताओं से रोहित ने अपने खेल करियर की शुरुआत की। प्रत्येक प्रतियोगिता में उनका प्रदर्शन बेहतर होता गया। धीरे-धीरे राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।

कड़ी मेहनत और लगातार बेहतर प्रदर्शन का परिणाम यह हुआ कि रोहित ने राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष स्थान हासिल कर लिया। अब वे विश्व के अग्रणी जेवलिन थ्रो खिलाड़ियों में शामिल हो चुके हैं।

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87.05 मीटर थ्रो से बनाया नया मुकाम

रोहित यादव ने 87.05 मीटर का शानदार भाला फेंककर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इस प्रदर्शन ने उन्हें न केवल देश का नंबर-1 खिलाड़ी बनाया बल्कि विश्व रैंकिंग में भी शीर्ष खिलाड़ियों के बीच स्थापित कर दिया।

इसी प्रदर्शन के आधार पर उन्होंने आगामी एशियाई खेलों के लिए भी क्वालीफाई किया, जिससे देश को उनसे पदक की नई उम्मीदें हैं।

पिता का संघर्ष बना बेटे की सबसे बड़ी ताकत

सभाजीत यादव का मानना है कि यदि परिवार खिलाड़ी पर विश्वास बनाए रखे तो सीमित संसाधन भी बड़ी सफलता की राह में बाधा नहीं बनते। उन्होंने आर्थिक संकट, कर्ज और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद अपने बेटे का मनोबल कभी कमजोर नहीं होने दिया।

उनकी यही सोच आज रोहित की सबसे बड़ी ताकत बन गई है। एक पिता का त्याग और विश्वास किस तरह किसी खिलाड़ी का भविष्य बदल सकता है, इसकी जीवंत मिसाल रोहित यादव की कहानी है।

जौनपुर के लिए गौरव का क्षण

रोहित यादव की उपलब्धि केवल उनके परिवार की नहीं, बल्कि पूरे जौनपुर और उत्तर प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना यह साबित करता है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या महंगी सुविधाओं की मोहताज नहीं होती।

आज रोहित यादव हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। उनका संघर्ष यह संदेश देता है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत निरंतर हो और परिवार का साथ मिले, तो कठिन से कठिन परिस्थितियां भी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकतीं।

प्रेरणा देती है यह कहानी

रोहित यादव की सफलता केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं है, बल्कि उस पिता के अटूट विश्वास की जीत है जिसने कर्ज, अभाव और संघर्ष के बावजूद अपने बेटे के सपनों को टूटने नहीं दिया। बांस के भाले से शुरू हुआ सफर आज विश्व मंच तक पहुंच चुका है। यह कहानी बताती है कि मजबूत इरादे, कठिन परिश्रम और परिवार का समर्पण किसी भी सपने को साकार कर सकता है।

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Author: यायावर

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