सावन, कांवड़ और विरह : जब ‘बोल बम’ के जयघोष में घुल जाती है ‘आजहूँ न आए बालमा’ की पीड़ा

संपादक अनिल अनूप की तस्वीर के साथ सावन, कांवड़ यात्रा, भगवान शिव, विरहिणी, झूला और भारतीय लोकसंस्कृति को दर्शाती रंगीन संपादकीय फीचर इमेज।

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संपादक अनिल अनूप


सावन फिर आ गया है। धरती ने हरी चुनरिया ओढ़ ली है। आम और पीपल की डालियों पर झूले पड़ने लगे हैं। खेतों में धान की रोपाई के साथ किसानों के चेहरे खिल उठे हैं। बादलों की गड़गड़ाहट, रिमझिम फुहारें, मिट्टी की सोंधी महक और हरियाली का अथाह विस्तार मानो प्रकृति की नई कविता बन गए हैं।

इसी सावन में भारत की सड़कें भी एक अलग दृश्य प्रस्तुत करती हैं। केसरिया वस्त्रों में सजे लाखों कांवड़िए कंधों पर रंग-बिरंगी कांवड़ उठाए “बोल बम”, “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के उद्घोष के साथ गंगाजल लेकर शिवधाम की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। उनकी पदयात्रा केवल पैरों की यात्रा नहीं होती; वह श्रद्धा, तप, अनुशासन और समर्पण की यात्रा होती है।

लेकिन यही सावन भारतीय मन का दूसरा रूप भी सामने लाता है। किसी गाँव के आँगन में झूले पर बैठी नवविवाहिता, किसी खिड़की पर टकटकी लगाए प्रतीक्षारत स्त्री, किसी लोकगायिका की कजरी या किसी कवि की पंक्तियों में विरह का स्वर गूँज उठता है— “आजहूँ न आए बालमा…”

यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्त्री के मन का सबसे मार्मिक उद्गार है। यही भारत की सांस्कृतिक विलक्षणता है कि जहाँ एक ओर भगवान शिव से मिलने की उत्कंठा लिए लाखों श्रद्धालु आगे बढ़ रहे होते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने प्रिय की प्रतीक्षा में किसी विरहिणी की आँखें सावन की बारिश से भी अधिक भीगी होती हैं।

सावन केवल ऋतु नहीं, भारतीय मानस का उत्सव है

भारतीय पंचांग में बारह महीने हैं, लेकिन सावन का स्थान सबसे अलग है। यह केवल मौसम परिवर्तन का संकेत नहीं देता बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृतियों को भी जीवंत कर देता है।

इस महीने में खेतों की हरियाली, मंदिरों की घंटियाँ, शिवालयों की भीड़, कांवड़ यात्रा, झूले, कजरी, मल्हार, लोकगीत, राधा-कृष्ण की लीलाएँ और प्रेम की अनगिनत कथाएँ एक साथ जीवित हो उठती हैं।

दुनिया के बहुत कम देशों में कोई ऋतु इतनी गहराई से धर्म, साहित्य, संगीत, कृषि, परिवार और लोकजीवन को प्रभावित करती है जितना भारत में सावन करता है।

कांवड़ यात्रा : केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, सामूहिक तपस्या

कांवड़ यात्रा को यदि केवल धार्मिक आयोजन मान लिया जाए तो उसके व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप के साथ अन्याय होगा।

सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना… नियमों का पालन करना… सादा भोजन करना… नंगे पाँव कठिन यात्रा पूरी करना… दूसरों की सहायता करना… और अंततः शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करना— यह सब मनुष्य के भीतर अनुशासन, धैर्य और आत्मसंयम का संस्कार विकसित करता है।

यात्रा के दौरान जगह-जगह लगने वाले भंडारे भारतीय समाज की सेवा-परंपरा का जीवंत उदाहरण हैं। कोई जल पिलाता है, कोई दवा देता है, कोई विश्राम की व्यवस्था करता है, तो कोई रात भर जागकर यात्रियों की सेवा करता है। यहीं भारतीय समाज की वह अद्भुत शक्ति दिखाई देती है जहाँ अपरिचित लोग भी परिवार बन जाते हैं।

शिव क्यों हैं सावन के केंद्र?

भारतीय परंपरा में शिव केवल देवता नहीं, जीवन-दर्शन हैं। वे कैलाश के योगी भी हैं और पार्वती के पति भी। वे संहारक भी हैं और करुणा के सागर भी। वे भस्म रमाने वाले विरक्त भी हैं और गंगा को धारण करने वाले लोकनायक भी।

सावन में शिव की आराधना इसलिए भी विशेष मानी जाती है क्योंकि वर्षा का जल जीवन का प्रतीक है। जल से अभिषेक करते हुए मनुष्य मानो अपने भीतर की तपन, अहंकार और विकारों को भी धोने का संकल्प लेता है।

लेकिन सावन का दूसरा चेहरा—विरह

यदि कांवड़ यात्रा सावन का बाहरी उत्सव है तो विरह उसका भीतरी संगीत है। लोक साहित्य में सावन का सबसे बड़ा स्वर विरह का है। बादलों की पहली गर्जना सुनते ही विरहिणी का मन बेचैन हो उठता है। उसे लगता है कि यदि आज उसका प्रिय साथ होता तो यह मौसम कितना सुंदर होता। लेकिन जब वह दूर है, तब यही हरियाली उसकी आँखों में आँसू बन जाती है। इसलिए लोकगीतों में बार-बार सुनाई देता है— “आजहूँ न आए बालमा…”

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यह शिकायत नहीं है। यह प्रेम की सबसे पवित्र अभिव्यक्ति है।

भारत के लोकगीतों में सावन : भाषा अलग, भावना एक

भारत का प्रत्येक क्षेत्र सावन को अपनी बोली में गाता है। शब्द बदल जाते हैं। धुन बदल जाती है। लेकिन भाव नहीं बदलता।

पूर्वांचल की कजरी : प्रतीक्षा का सबसे मधुर संगीत

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की धरती पर सावन का नाम आते ही कजरी की धुन कानों में गूँजने लगती है। लोकगायिका गाती है— “आजहूँ न आए बालमा…”

इन शब्दों का सीधा अर्थ है—”प्रिय, तुम आज भी नहीं आए।” लेकिन इसका वास्तविक भावार्थ इससे कहीं गहरा है। यहाँ विरहिणी अपने प्रिय से शिकायत कम करती है, अपने मन की व्यथा अधिक कहती है।

वह देखती है कि पेड़ झूम रहे हैं… सखियाँ झूले झूल रही हैं… कोयल गा रही है… धरती भीग रही है… लेकिन उसका अपना मन सूखा पड़ा है। प्रकृति जितनी सुंदर होती जाती है, उसका अकेलापन उतना ही गहरा होता जाता है। यही कारण है कि कजरी सुनने वाला हर व्यक्ति अपने जीवन के किसी न किसी अधूरे इंतज़ार को याद करने लगता है।

अवध की मल्हार : बादल बाहर भी बरसते हैं, भीतर भी

अवध क्षेत्र के लोकगीतों में अक्सर सुनाई देता है— “बरसे बदरिया सावन की…” यहाँ बादल केवल खेतों को सींचने नहीं आते। वे मन की स्मृतियों को भी भिगो देते हैं। यदि प्रिय साथ हो तो यही वर्षा उत्सव बन जाती है। यदि प्रिय दूर हो तो हर बूंद आँखों का आँसू बन जाती है।

अवध की मल्हार हमें सिखाती है कि प्रकृति और मनुष्य कभी अलग नहीं होते। जो बाहर घटता है, वही भीतर भी घटता है।

ब्रज का सावन : जहाँ प्रेम भक्ति बन जाता है

ब्रज में सावन का अर्थ केवल वर्षा नहीं है। यह राधा और कृष्ण के मिलन का मौसम है। झूले पड़ते हैं। मंदिर सजते हैं। गीत गूँजते हैं— “झूला पड़े सावन में…”

यह केवल झूले का वर्णन नहीं है। इसका भावार्थ है कि प्रेम जीवन को गति देता है। राधा और कृष्ण का झूलना जीव और परमात्मा के मिलन का प्रतीक बन जाता है। ब्रज की यही विशेषता है कि वहाँ श्रृंगार और भक्ति एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते।

मिथिला : परदेस की पीड़ा

मिथिला के लोकगीतों में अक्सर सुनाई देता है— “सखि, मोर पिया परदेशिया…” इस एक पंक्ति में पूरे समाज का इतिहास छिपा है। रोज़गार के लिए दूर गए पति… घर पर अकेली प्रतीक्षा करती पत्नी… और सावन का लंबा मौसम।

यह गीत केवल प्रेम का नहीं, सामाजिक यथार्थ का भी दस्तावेज़ है। परदेस केवल दूरी नहीं है। वह मन की रिक्तता का दूसरा नाम है।

बुंदेलखंड : कठोर धरती, कोमल हृदय

बुंदेलखंड की धरती को लोग अक्सर पथरीली और कठोर कहते हैं, लेकिन वहाँ के लोकगीतों को सुनिए तो लगता है कि इस मिट्टी से अधिक संवेदनशील कोई हृदय नहीं। बुंदेली लोकधुनों में विरहिणी गाती है— “सावन आयो रे सजन बिना, मनवा मोर उदास…”

इन पंक्तियों का भावार्थ है कि जीवन की वास्तविक हरियाली पेड़ों या खेतों से नहीं आती, बल्कि अपने प्रियजनों की उपस्थिति से आती है। यदि मन का साथी दूर हो तो सावन भी सूना लगता है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल भौतिक सुखों से नहीं, बल्कि भावनात्मक संबंधों से जीवित रहता है।

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राजस्थान : मरुभूमि में भी भीगता है मन

राजस्थान के लोकगीतों में सावन का इंतज़ार सबसे अधिक मार्मिक दिखाई देता है। जहाँ वर्षा वर्ष भर में कुछ ही दिनों की अतिथि होती है, वहाँ बादल केवल मौसम नहीं, जीवन लेकर आते हैं। लोकधुन कहती है— “मेघा बरसे रे, पिया बिन लागे ना जिया…”

इसका भावार्थ केवल प्रेम-वियोग नहीं है। जैसे सूखी धरती बादलों की बाट जोहती है, वैसे ही मन अपने प्रिय की प्रतीक्षा करता है। यहाँ बादल आशा हैं, वर्षा जीवन है और प्रिय मिलन का प्रतीक है। मरुभूमि का यह गीत सिखाता है कि अभाव ही प्रेम की गहराई को सबसे अधिक उजागर करता है।

भोजपुरी अंचल : आँसू भी गीत बन जाते हैं

भोजपुरी कजरियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें विरह के साथ जीवन का उत्साह भी चलता रहता है। कहीं पत्नी अपने परदेस गए पति से शिकायत करती है, कहीं सखियों से मन की बात कहती है, तो कहीं भोलेनाथ से प्रार्थना करती है कि उसके प्रिय सकुशल लौट आएँ।

भोजपुरी लोकजीवन हमें सिखाता है कि दुःख को भी गीत में बदल देना भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है। यहाँ आँसू भी सुर बन जाते हैं और प्रतीक्षा भी उत्सव का हिस्सा।

कालिदास से लेकर विद्यापति तक : सावन का साहित्यिक वैभव

भारतीय साहित्य में वर्षा ऋतु का सबसे भव्य चित्रण महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ में किया। यक्ष अपने संदेशवाहक के रूप में बादल को चुनता है। बादल केवल जल नहीं ले जाता, वह प्रेम, स्मृति और विरह का दूत बन जाता है।

मिथिला के अमर कवि विद्यापति ने वर्षा और विरह को अद्भुत ढंग से जोड़ा। उनके गीतों में सावन का हर बादल प्रिय की स्मृति जगाता है।

सूरदास के ब्रज में सावन कृष्ण की लीलाओं से भर उठता है। मीरा के लिए यही ऋतु प्रभु-मिलन की तड़प बन जाती है। कबीर बाहरी वर्षा से आगे बढ़कर मन के भीतर बरसते सावन की बात करते हैं। यानी भारतीय साहित्य में सावन केवल मौसम नहीं, मनुष्य की आत्मा का रूपक है।

फिल्मी गीतों ने भी बचाए रखे लोकजीवन के रंग

समय बदला, गाँव शहर बने, जीवन की गति तेज हुई, लेकिन सावन का संगीत समाप्त नहीं हुआ। हिंदी सिनेमा ने लोकजीवन के इन रंगों को नई पीढ़ियों तक पहुँचाया।

“सावन का महीना पवन करे शोर…” में प्रकृति का उल्लास है। “रिमझिम गिरे सावन…” में स्मृतियों की भीगी आहट है। “अब के बरस भेज भइया को बाबुल…” में बेटी का दर्द है। इन गीतों ने यह सिद्ध किया कि तकनीक बदल सकती है, लेकिन सावन का भाव कभी पुराना नहीं होता।

कांवड़ यात्रा : आस्था के साथ अनुशासन भी

कांवड़ यात्रा जितनी विशाल होती जा रही है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आती है। शिव स्वयं योग, संयम, करुणा और सरलता के प्रतीक हैं। इसलिए यदि उनकी यात्रा में अनुशासन, स्वच्छता, सहिष्णुता और पर्यावरण संरक्षण का भाव जुड़ जाए, तभी यात्रा अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करेगी।

धर्म कभी दूसरे के कष्ट का कारण नहीं बन सकता। आस्था का सबसे सुंदर रूप वही है जिसमें श्रद्धा के साथ संवेदनशीलता भी जुड़ी हो।

यदि कांवड़िया रास्ते में पौधे भी लगाए, प्लास्टिक का उपयोग न करे, नदियों को स्वच्छ रखने का संकल्प ले और दूसरों की सुविधा का ध्यान रखे, तो यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, सामाजिक परिवर्तन का अभियान बन सकती है।

सावन और पर्यावरण : प्रकृति की पुकार

सावन हमें केवल पूजा करना नहीं सिखाता, बल्कि प्रकृति का सम्मान करना भी सिखाता है। आज नदियाँ प्रदूषित हैं। तालाब मिट रहे हैं। पेड़ कट रहे हैं। भूजल घट रहा है। जलवायु परिवर्तन वर्षा के चक्र को प्रभावित कर रहा है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाली पीढ़ियाँ सावन को केवल गीतों और पुस्तकों में पढ़ेंगी।

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शिव के मस्तक पर विराजमान गंगा हमें यही संदेश देती हैं कि जल ही जीवन है। इसलिए सावन का सबसे बड़ा व्रत नदियों, जंगलों और जलस्रोतों की रक्षा होना चाहिए।

विरह का महत्व आधुनिक समाज क्यों भूल रहा है?

आज का समय त्वरित संवाद का समय है। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दूरियों को कम कर दिया है, लेकिन मनुष्यों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ती जा रही है।

प्रतीक्षा का धैर्य समाप्त हो रहा है। रिश्तों में ठहराव कम हो गया है। जबकि भारतीय साहित्य कहता है कि विरह प्रेम को गहराई देता है। प्रतीक्षा मनुष्य को संवेदनशील बनाती है। जो मिलन बिना इंतज़ार के मिल जाए, उसका आनंद भी क्षणिक होता है। शायद इसलिए हमारे पूर्वजों ने सावन के गीतों में विरह को इतना बड़ा स्थान दिया।

सावन हमें जोड़ता है, बाँटता नहीं

यदि ध्यान से देखें तो कांवड़िया और विरहिणी दोनों एक ही साधना में लगे हैं। एक अपने आराध्य से मिलने के लिए चल रहा है। दूसरी अपने प्रिय के आने की प्रतीक्षा कर रही है।

दोनों के भीतर समर्पण है। दोनों के भीतर विश्वास है। दोनों के भीतर प्रेम है। अंतर केवल इतना है कि एक की यात्रा पैरों से होती है, दूसरी की यात्रा हृदय से। यही भारतीय संस्कृति का अद्भुत समन्वय है, जहाँ भक्ति और श्रृंगार विरोधी नहीं, बल्कि एक ही भावधारा के दो तट हैं।

भारत की आत्मा का सबसे भीगा हुआ महीना

सावन को केवल वर्षा का मौसम समझना उसकी आत्मा को न समझना है। यह वह महीना है जिसमें खेतों में हरियाली उगती है, मंदिरों में श्रद्धा खिलती है, लोकगीतों में प्रेम झरता है और साहित्य में संवेदना का नया अध्याय खुलता है।

जब लाखों कांवड़िए “हर-हर महादेव” का उद्घोष करते हुए गंगाजल लेकर शिवालयों की ओर बढ़ते हैं, तब भारत की आस्था चलती हुई दिखाई देती है। और जब किसी गाँव की चौपाल, किसी आम के पेड़ के नीचे पड़े झूले या किसी नवविवाहिता की खिड़की से यह स्वर उठता है—“आजहूँ न आए बालमा…”—तब भारत का हृदय बोलता है।

एक ओर शिव हैं—वैराग्य, तपस्या और लोककल्याण के प्रतीक। दूसरी ओर विरहिणी है—प्रेम, धैर्य और समर्पण की प्रतिमूर्ति। सावन इन दोनों को एक सूत्र में बाँध देता है। यही कारण है कि यह महीना भारतीय संस्कृति का सबसे भीगा हुआ, सबसे जीवंत और सबसे मानवीय अध्याय बन जाता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सावन को केवल धार्मिक उत्सव या सांस्कृतिक परंपरा के रूप में न देखें, बल्कि उसके भीतर छिपे संदेश को भी समझें। आस्था में अनुशासन जोड़ें, प्रेम में धैर्य जोड़ें, विकास में प्रकृति को जोड़ें और आधुनिकता में अपनी लोक-स्मृतियों को बचाए रखें।

क्योंकि जिस दिन भारत के गाँवों से कजरी की आवाज़, मंदिरों से “हर-हर महादेव” का जयघोष और वर्षा की पहली फुहार पर मिट्टी की सोंधी महक समाप्त हो जाएगी, उस दिन केवल एक ऋतु नहीं, हमारी हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक चेतना का एक अमूल्य अध्याय भी खो जाएगा।

सावन हर वर्ष लौटकर आता है, पर वह हमसे हर बार एक ही प्रश्न पूछता है—क्या हमारे भीतर अभी भी आस्था बची है? क्या प्रेम बचा है? क्या प्रकृति के प्रति संवेदना बची है? यदि इन तीनों का उत्तर “हाँ” है, तभी सचमुच सावन आया है।

यायावर
Author: यायावर

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