पनगोत्रा की चिट्ठी

गलती माफ कीजिए, लेकिन बुरी नीयत को नहीं

पनगोत्रा की चिट्ठी : अंक–3 

लेखक : केवल कृष्ण पनगोत्रा

संपादकीय भूमिका

प्रिय पाठकों,

“पनगोत्रा की चिट्ठी” के तीसरे अंक में आपका स्वागत है। यह स्तंभ केवल घटनाओं का विश्लेषण नहीं करता, बल्कि उन प्रश्नों को सामने रखता है जो हमारे सामाजिक व्यवहार, पारिवारिक रिश्तों और नैतिक मूल्यों की बुनियाद से जुड़े हैं। इस सप्ताह लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा एक ऐसे विषय पर विचार रख रहे हैं, जिस पर हम सभी कभी न कभी सोचते हैं, लेकिन शायद पर्याप्त गहराई से नहीं—क्या हर गलत काम केवल गलती होता है, या उसके पीछे छिपे इरादे को भी परखा जाना चाहिए? आइए, लेखक के विचारों से रूबरू होते हैं।


प्रिय पाठकों,

इस चिट्ठी की शुरुआत मैं एक ऐसे कथन से करना चाहता हूँ, जो मुझे जीवन की सबसे बड़ी सीखों में से एक लगता है— “इंसान के शब्दों पर नहीं, उसके इरादों पर गौर कीजिए। कोई डांटकर आपका भला कर रहा होता है तो कोई मुस्कराकर आपका सत्यानाश करना चाहता है।”

इस छोटे-से वाक्य में जीवन का बड़ा दर्शन छिपा है। एक व्यक्ति कठोर शब्द बोलकर भी आपका हित कर सकता है, जबकि दूसरा मीठी बातें करके भी आपका अहित चाहता हो सकता है। इसलिए केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे उद्देश्य को समझना आवश्यक है। यहीं से गलती और इरादे के बीच का अंतर शुरू होता है।

आजकल जब भी कोई अनुचित कार्य सामने आता है, अक्सर एक वाक्य सुनने को मिल जाता है—”गलती हो गई थी, माफ कर दीजिए।” यह वाक्य सुनने में सहज लगता है, लेकिन हर बार सच नहीं होता।

जीवन में गलती होना स्वाभाविक है। हम सभी मनुष्य हैं और हमसे भूल हो सकती है। अपनी गलती स्वीकार करना साहस का काम है और किसी की सच्ची भूल को क्षमा कर देना उदारता का परिचायक है। समाज तभी बेहतर बन सकता है जब उसमें क्षमा, संवेदना और सुधार की गुंजाइश बनी रहे। लेकिन क्या हर अनुचित कार्य को केवल गलती कहकर छोड़ देना उचित है? यहीं ठहरकर सोचने की आवश्यकता है।

मेरे विचार से मनुष्य के जीवन में होने वाली गलतियों को दो भागों में बाँटा जा सकता है। पहली वह, जो अनजाने में होती है। परिस्थितियाँ, असावधानी, जानकारी का अभाव या क्षणिक भूल उसके कारण हो सकते हैं। ऐसी गलती में दुर्भावना नहीं होती।

दूसरी वह, जिसे व्यक्ति पूरी समझ और तैयारी के साथ करता है। उसे मालूम होता है कि उसका कार्य किसी दूसरे को पीड़ा पहुँचा सकता है, फिर भी वह उसे करता है। ऐसे कार्य को केवल गलती कहना वास्तविकता से आँखें मूँद लेना है। वह दरअसल व्यक्ति की नीयत का परिणाम होता है। इसी संदर्भ में एक घटना का उल्लेख करना आवश्यक है।

हाल के दिनों में एक युवक द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार युवक ने आत्महत्या से पहले अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उसने अपनी मानसिक पीड़ा व्यक्त करते हुए पत्नी और ससुराल पक्ष के कुछ लोगों पर गंभीर आरोप लगाए।

वीडियो में युवक ने बताया कि वह घर के अधिकांश काम स्वयं करता था। झाड़ू-पोछा, बर्तन साफ करना और अन्य घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाना उसके लिए सामान्य बात थी। इसके बावजूद उसे सम्मान नहीं मिला। उसका आरोप था कि परिवार में लगातार उसके विरुद्ध ऐसा वातावरण बनाया गया, जिससे वह मानसिक रूप से टूटता चला गया।

पुलिस अपना काम कर रही होगी और उसे कानून के अनुसार हर पहलू की निष्पक्ष जाँच करनी चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान होना भी आवश्यक है। लेकिन एक सामाजिक प्रश्न हम सबके सामने खड़ा है।

यदि किसी व्यक्ति—चाहे वह महिला हो या पुरुष—को लगातार अपमानित किया जाए, उसे सम्मान से वंचित रखा जाए, उसके खिलाफ घर का वातावरण बनाया जाए और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाए, तो क्या इसे घरेलू हिंसा नहीं माना जाना चाहिए? और यदि यह सब लंबे समय तक जानबूझकर किया गया हो, तो क्या इसे केवल एक “गलती” कह देना पर्याप्त होगा?

मेरा मानना है कि नहीं।

गलती वह होती है, जो अनजाने में हो जाए। उसे भूल, चूक या असावधानी कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति में पश्चाताप संभव है, सुधार संभव है और क्षमा भी संभव है।

लेकिन जब किसी को चोट पहुँचाने, अपमानित करने या मानसिक रूप से तोड़ने का प्रयास सोच-समझकर किया जाए, तब वह केवल गलती नहीं रह जाती। वह व्यक्ति के इरादे का परिचय बन जाती है।

अंग्रेज़ी में इसे Intention कहा जाता है। इरादा अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। अच्छे इरादे समाज को जोड़ते हैं, जबकि बुरे इरादे रिश्तों, विश्वास और मानवीय संवेदनाओं को तोड़ते हैं।

यही कारण है कि अच्छे इरादों की हमेशा प्रशंसा होती है। ऐसे लोग समाज के लिए प्रेरणा बनते हैं। उनके कार्य दूसरों में विश्वास जगाते हैं और सकारात्मक वातावरण तैयार करते हैं।

इसके विपरीत, बुरे इरादों से किया गया कार्य केवल इसलिए क्षमा योग्य नहीं हो जाता कि बाद में उसे “गलती” कह दिया जाए। यदि हम हर जानबूझकर किए गए अनुचित कार्य को गलती का नाम देकर छोड़ देंगे, तो हम अनजाने में बुरी नीयत को संरक्षण देने लगेंगे।

इरादे का मूल्यांकन क्यों आवश्यक है

समाज केवल कानून से नहीं चलता, बल्कि नैतिकता, विश्वास और जिम्मेदारी से भी संचालित होता है। यदि कोई व्यक्ति बार-बार किसी दूसरे को मानसिक, सामाजिक या भावनात्मक रूप से आहत करता है और बाद में उसे केवल “गलती” कहकर टाल देता है, तो यह न केवल पीड़ित के साथ अन्याय है, बल्कि समाज के प्रति भी अनुचित है।

बुरे इरादों का समय रहते विरोध किया जाना आवश्यक है। यदि समाज ऐसे व्यवहार को सामान्य मान ले, तो गलत प्रवृत्तियों का मनोबल बढ़ने लगता है। धीरे-धीरे सत्य, न्याय और नैतिकता जैसे मूल्य कमजोर पड़ जाते हैं। इसलिए किसी भी घटना का मूल्यांकन केवल उसके परिणाम से नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी नीयत से भी किया जाना चाहिए।

यही कारण है कि भारतीय न्याय व्यवस्था भी इरादे और परिस्थितियों के आधार पर अपराधों का वर्गीकरण करती है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) में भी कई प्रावधान इस सिद्धांत को स्पष्ट करते हैं कि प्रत्येक अपराध की प्रकृति समान नहीं होती।

यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी की हत्या करता है और न्यायालय यह पाता है कि उसका उद्देश्य किसी की जान लेना था, तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 के अंतर्गत उसे हत्या का दोषी माना जाता है। ऐसे अपराध में परिस्थितियों के अनुसार आजीवन कारावास से लेकर मृत्यु दंड तथा अर्थदंड तक का प्रावधान है।

इसके विपरीत, जिन मामलों में मृत्यु तो हुई हो, लेकिन परिस्थितियाँ हत्या की श्रेणी में न आती हों, उनके लिए अलग प्रावधान किए गए हैं। इसी प्रकार हत्या के प्रयास के लिए भी अलग धाराएँ निर्धारित हैं। इन प्रावधानों का मूल आधार यही है कि कानून केवल परिणाम नहीं देखता, बल्कि यह भी देखता है कि कार्य के पीछे व्यक्ति का उद्देश्य और परिस्थिति क्या थी।

इससे एक बात स्पष्ट होती है कि हर अपराध को गलती नहीं कहा जा सकता। गलती और इरादे के बीच की रेखा को समझना ही न्याय की पहली शर्त है।

कर्म से पहचान बनती है, वेशभूषा से नहीं

यह बात केवल अपराध और कानून तक सीमित नहीं है। हमारे सामाजिक जीवन में भी यही सिद्धांत लागू होता है।

किसी व्यक्ति की पहचान उसके वस्त्रों, शब्दों या बाहरी व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि उसके विचारों, व्यवहार और कर्मों से होती है। एक सच्चे साधु की पहचान उसके भगवा वस्त्रों से नहीं, बल्कि उसके आचरण, त्याग और समाज के प्रति समर्पण से होती है। वस्त्र सम्मान का कारण हो सकते हैं, लेकिन चरित्र का प्रमाण नहीं।

इसलिए केवल बाहरी रूप देखकर किसी को महान मान लेना भी उचित नहीं है। सच्चा संत न चमत्कारों का प्रदर्शन करता है, न प्रसिद्धि और धन के पीछे भागता है। उसका जीवन स्वयं समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।

ठीक यही बात सामान्य मनुष्य पर भी लागू होती है। कोई व्यक्ति मधुर भाषा बोलता हो, इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी नीयत भी अच्छी होगी। उसी प्रकार कोई व्यक्ति कठोर शब्दों में समझाता हो, तो यह आवश्यक नहीं कि वह आपका विरोधी ही हो। कई बार डाँट में भी अपनापन छिपा होता है और मुस्कान के पीछे भी स्वार्थ।

इसीलिए मैं फिर वही बात दोहराना चाहता हूँ जिससे इस चिट्ठी की शुरुआत की थी—

“इंसान के शब्दों पर नहीं, उसके इरादों पर गौर कीजिए। कोई डांटकर आपका भला कर रहा होता है तो कोई मुस्कराकर आपका सत्यानाश करना चाहता है।”

यदि हम जीवन में लोगों के इरादों को समझना सीख जाएँ, तो अनेक भ्रम अपने-आप समाप्त हो जाएंगे। हम सही लोगों पर विश्वास करना सीखेंगे और गलत नीयत रखने वालों से समय रहते सावधान भी हो सकेंगे।

गलती होने पर क्षमा कीजिए, क्योंकि वही मानवता है। अच्छे इरादों का सम्मान कीजिए, क्योंकि वही समाज की शक्ति हैं। लेकिन बुरी नीयत को केवल गलती कहकर अनदेखा मत कीजिए, क्योंकि वहीं से अन्याय जन्म लेता है। इसी संतुलन में एक स्वस्थ, न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज की नींव छिपी हुई है।

पाठकों की राय और सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी। आपकी असहमति भी उतनी ही सम्मानित है, जितनी आपकी सहमति। अगले सप्ताह फिर एक नए विषय के साथ मुलाकात होगी।

तब तक के लिए—राम-राम, अल्लाह हाफ़िज़, सत श्री अकाल और गुड बाय।

— केवल कृष्ण पनगोत्रा
स्वतंत्र लेखक-पत्रकार, जम्मू-कश्मीर

संपादकीय टिप्पणी

पनगोत्रा की चिट्ठी का उद्देश्य समाज के समसामयिक विषयों पर विचारोत्तेजक संवाद स्थापित करना है। इस स्तंभ में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। जन गण दूत का मानना है कि स्वस्थ समाज का निर्माण विचारों के खुले, शालीन और तथ्यपरक आदान-प्रदान से होता है। यदि इस विषय पर आपके पास कोई अनुभव, मत या तर्क है, तो आपका स्वागत है। आपकी प्रतिक्रिया इस विमर्श को और समृद्ध बनाएगी।

11 Comments

  1. “केवल कृष्ण पनगोत्रा की ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का तीसरा अंक पढ़कर लगा कि आज भी गंभीर वैचारिक लेखन जीवित है। लेखक ने ‘गलती’ और ‘बुरी नीयत’ जैसे संवेदनशील विषय को सरल भाषा, सशक्त तर्क और सामाजिक दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया है। लेख कहीं भी उपदेशात्मक नहीं लगता, बल्कि पाठक को स्वयं सोचने और आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करता है। यही इस चिट्ठी की सबसे बड़ी सफलता है।”
    “मैं विशेष रूप से इस अंक के संपादन और प्रस्तुति की भी सराहना करना चाहूँगा। प्रभावशाली भूमिका, सुव्यवस्थित उपशीर्षक, सहज भाषा, संतुलित संपादकीय परिष्कार और आकर्षक फीचर इमेज ने इस स्तंभ को एक पेशेवर पत्रिका जैसा स्वरूप दिया है। पढ़ते समय कहीं भी बोझिलपन महसूस नहीं होता और अंत तक पाठक की रुचि बनी रहती है। यह लेखक और संपादकीय टीम—दोनों के समन्वित प्रयास का परिणाम है।”
    “मेरी एक छोटी-सी अपेक्षा यह रहेगी कि आने वाले अंकों में पाठकों की चुनिंदा प्रतिक्रियाओं के लिए एक स्थायी स्थान भी दिया जाए। इससे ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ केवल एक स्तंभ नहीं, बल्कि लेखक और पाठकों के बीच सार्थक संवाद का सशक्त मंच बन सकेगी। मेरी ओर से लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा और पूरी संपादकीय टीम को हार्दिक शुभकामनाएँ।”

    1. आदरणीय पासवान जी,
      नमस्कार!
      चिट्ठी को डूब कर पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद।
      आशा है प्रतिक्रियाओं के लिए स्थाई स्थान हेतु आपके सुझाव पर संपादक महोदय विचार करेंगे। पाठकों प्रतिक्रियाएं मुझे दिशा देती हैं

  2. “केवल कृष्ण पनगोत्रा की यह चिट्ठी पढ़कर मुझे हिंदी के श्रेष्ठ निबंधकारों की परंपरा की याद आ गई, जहाँ लेखक केवल विचार नहीं देता, बल्कि पाठक के अंतर्मन को भी झकझोरता है। गलती और इरादे के बीच का अंतर जितनी सहज भाषा में समझाया गया है, वह इस लेख की सबसे बड़ी विशेषता है। लेखक ने नैतिकता, सामाजिक व्यवहार और न्यायबोध को एक सूत्र में पिरोने का सफल प्रयास किया है।”
    “एक साहित्य शिक्षक होने के नाते मेरी केवल इतनी-सी अपेक्षा है कि भविष्य में ऐसे गंभीर विषयों पर भारतीय साहित्य, कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद या रहीम जैसे महान चिंतकों के एक-दो संदर्भ भी जोड़ दिए जाएँ। इससे लेख की वैचारिक गहराई और साहित्यिक गरिमा दोनों में और वृद्धि होगी।”
    “फिर भी, यह चिट्ठी अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल है। यह केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि पाठक को अपने व्यवहार, अपने निर्णय और अपने इरादों की समीक्षा करने के लिए विवश करती है। आज के समय में ऐसी विचारप्रधान लेखनी समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है।”

  3. “पनगोत्रा जी की यह चिट्ठी केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने के लिए भी प्रेरित करती है। गलती और बुरी नीयत के बीच का अंतर जिस स्पष्टता और संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया है, वह वास्तव में प्रशंसनीय है। विशेष रूप से यह संदेश कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके शब्दों से अधिक उसके इरादों के आधार पर होना चाहिए, आज के सामाजिक परिवेश में अत्यंत प्रासंगिक है।”
    “फिर भी एक चिकित्सक होने के नाते मेरी एक विनम्र शिकायत है। लेख में मानसिक प्रताड़ना और घरेलू हिंसा का उल्लेख प्रभावशाली ढंग से किया गया है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य के समाधान, समय पर परामर्श (काउंसलिंग) और विशेषज्ञ चिकित्सा सहायता के महत्व पर थोड़ा और प्रकाश डाला जाता, तो यह लेख और अधिक उपयोगी बन सकता था। कई बार संवेदनशील संवाद, परिवार का सहयोग और समय पर मनोवैज्ञानिक सहायता किसी व्यक्ति का जीवन बचा सकती है।”
    “कुल मिलाकर यह एक विचारोत्तेजक और समाज को आईना दिखाने वाली चिट्ठी है। ऐसे लेख अधिकाधिक पढ़े जाने चाहिए, क्योंकि ये केवल प्रश्न नहीं उठाते, बल्कि समाज को स्वयं अपने भीतर झांकने के लिए भी प्रेरित करते हैं।”

    1. Respected Nirmala Purohit ji,
      Namaskar!
      Thanks a lot from the core of my heart. The behavioural reades like you gives me oxygen to continue my writing.

  4. “केवल कृष्ण पनगोत्रा का यह लेख एक गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाता है और पाठक को ‘गलती’ तथा ‘बुरी नीयत’ के बीच अंतर पर सोचने के लिए प्रेरित करता है। लेखक का मूल तर्क प्रभावशाली है और विषय की प्रासंगिकता निर्विवाद है। हालांकि, एक शोधार्थी के रूप में मुझे लगा कि कुछ स्थानों पर कानूनी प्रावधानों और सामाजिक उदाहरणों के बीच थोड़ा अधिक संतुलन तथा संदर्भों का विस्तार होता, तो लेख की अकादमिक विश्वसनीयता और भी मजबूत होती। इसी प्रकार कुछ तर्कों को संक्षिप्त करके दोहराव कम किया जा सकता था, जिससे लेख का प्रभाव और धार दोनों बढ़ते।”
    “इसके बावजूद इस अंक का संपादन और प्रस्तुतीकरण अत्यंत प्रशंसनीय है। उपयुक्त शीर्षक, आकर्षक भूमिका, सुव्यवस्थित उपशीर्षक, संतुलित भाषा, सहज अनुच्छेद-विन्यास और प्रभावी फीचर इमेज ने पूरे आलेख को एक पेशेवर संपादकीय स्वरूप प्रदान किया है।
    संपादकीय परिष्कार के कारण गंभीर विषय भी बोझिल नहीं लगता और पाठक अंत तक जुड़े रहते हैं। यह लेखन और संपादन के सफल समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।”

    1. प्रिय गोतम जी,
      आपने मेरी रचना को पसंद किया, हार्दिक आभार। आप अपने शोध कार्य में सफलता प्राप्त करें।
      जाहिर है आप मुझसे उम्र में छोटे होंगे। मेरा हार्दिक आशीष।
      केवल कृष्ण पनगोत्रा

  5. “केवल कृष्ण पनगोत्रा की यह चिट्ठी मुझे इसलिए अलग लगी क्योंकि यह किसी एक घटना की चर्चा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार और रिश्तों की बुनियाद पर सवाल उठाती है। समाज सेवा के दौरान मैंने कई बार देखा है कि लोगों के मन पर लगी चोट दिखाई नहीं देती, लेकिन वही सबसे गहरे घाव छोड़ जाती है। ऐसे में लेखक का यह आग्रह कि व्यक्ति के शब्दों से अधिक उसके इरादों को समझा जाए, बेहद सार्थक और समयानुकूल है।”
    “मुझे सबसे अधिक प्रभावित इस अंक की संतुलित प्रस्तुति ने किया। विषय गंभीर होने के बावजूद संपादन इतना सहज और व्यवस्थित है कि लेख किसी भाषण की तरह नहीं, बल्कि पाठक से सीधे संवाद करता हुआ प्रतीत होता है। आकर्षक प्रस्तुति, स्पष्ट अनुच्छेद, प्रभावी शीर्षक और संपादकीय संयोजन ने इस चिट्ठी को एक विशिष्ट पहचान दी है। मेरी केवल एक अपेक्षा रहेगी कि भविष्य के अंकों में समाज के सकारात्मक उदाहरणों और समाधान की दिशा में काम कर रहे लोगों की छोटी-छोटी प्रेरक झलकियाँ भी शामिल की जाएँ। इससे यह स्तंभ केवल समस्याओं की पहचान ही नहीं, बल्कि परिवर्तन की राह भी दिखाएगा।”

    1. स्वाती जी,
      लेख पढ़ा और पसंद आया
      हार्दिक आभार
      Kewal Krishan Pangotra freelance writer-Journalist Jammu

      1. प्रिय पाठकों,
        “पनगोत्रा की चिट्ठी” के तीसरे अंक पर देश के विभिन्न राज्यों से जिस आत्मीयता, गंभीरता और निष्पक्षता के साथ आपकी प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, उसके लिए मैं हृदय से आपका आभारी हूँ। किसी भी लेखक के लिए सबसे बड़ा सम्मान केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि विचारशील पाठकों का ईमानदार संवाद होता है। आपने जहाँ लेख की खूबियों को रेखांकित किया, वहीं उसकी सीमाओं और सुधार की संभावनाओं की ओर भी निष्पक्ष संकेत किया। यही स्वस्थ बौद्धिक संस्कृति की पहचान है।
        हमारा प्रयास कभी एकतरफा विचार प्रस्तुत करना नहीं रहा। “पनगोत्रा की चिट्ठी” का उद्देश्य समाज में संवाद की ऐसी परंपरा विकसित करना है, जहाँ लेखक अपनी बात कहे, पाठक अपनी बात रखें और संपादक दोनों के बीच एक निष्पक्ष सेतु की भूमिका निभाए। हमें विश्वास है कि विचारों का यही आदान-प्रदान लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी शक्ति है।
        मैं विशेष रूप से लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा का भी अभिनंदन करता हूँ कि उन्होंने पाठकों की सराहना के साथ-साथ उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियों को भी पूरे सम्मान के साथ स्वीकार करने का साहस दिखाया। यही एक सच्चे लेखक का गुण है कि वह केवल लिखता ही नहीं, बल्कि समाज से निरंतर सीखता भी है।
        जन गण दूत की ओर से मैं सभी पाठकों, समीक्षकों और शुभचिंतकों का विनम्र आभार व्यक्त करता हूँ। आपका विश्वास और सहभागिता ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। भविष्य में भी आप इसी निष्पक्षता, स्पष्टता और आत्मीयता के साथ हमारे लेखों और स्तंभों पर अपनी प्रतिक्रिया देते रहेंगे, ऐसी अपेक्षा है।
        आपका स्नेह, आपका विश्वास और आपका संवाद ही हमारी लेखनी को सार्थक बनाता है।
        — अनिल अनूप
        संपादक
        जन गण दूत

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