नदी के 150-150 मीटर बफर जोन में भी हुई रजिस्ट्री, मंदाकिनी की बाढ़ ने खोल दी निर्माण की पोल

चित्रकूट में मंदाकिनी नदी की भीषण बाढ़ का हवाई दृश्य, जलमग्न रामघाट क्षेत्र और रिपोर्टर संजय सिंह राणा की तस्वीर के साथ नदी बफर जोन व डूब क्षेत्र में हुए निर्माण पर सवाल उठाती फीचर इमेज।

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संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

चित्रकूट/कानपुर। चित्रकूट की जीवनरेखा मानी जाने वाली मंदाकिनी नदी ने इस मानसून में ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि रामघाट और आसपास के इलाकों में दशकों से खड़े निर्माण, सड़कें और घर बाढ़ की चपेट में आ गए। लेकिन इस तबाही ने केवल प्राकृतिक आपदा की तस्वीर नहीं दिखाई, बल्कि नदी के डूब क्षेत्र, बफर जोन और उसके आसपास हुए निर्माण को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

29 अगस्त 2026 की बाढ़ ने रामघाट क्षेत्र में नदी और इंसानी बस्तियों के बीच बिगड़े संतुलन को सामने ला दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उस दौरान मंदाकिनी का जलस्तर खतरे के निशान से कई मीटर ऊपर पहुंच गया और रामघाट, मंदिरों, मकानों तथा निचले इलाकों में पानी घुस गया।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस नदी को बाढ़ के समय फैलने के लिए प्राकृतिक क्षेत्र चाहिए, उसके दोनों ओर लगभग 150-150 मीटर के बफर क्षेत्र में निर्माण और जमीनों की रजिस्ट्री आखिर कैसे होती चली गई?

राघव प्रयाग से रामघाट तक सिकुड़ता गया नदी का रास्ता

मंदाकिनी का प्रवाह जैसे-जैसे राघव प्रयाग घाट से रामघाट की तरफ बढ़ता है, नदी का प्राकृतिक फैलाव क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित होता जाता है। इसी इलाके में पयस्वनी और सरयू का पानी भी मंदाकिनी में आकर मिलता है। सामान्य दिनों में यह संगम धार्मिक आस्था का केंद्र दिखाई देता है, लेकिन बरसात में यही अतिरिक्त जलप्रवाह नदी के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।

नदी को अपना फैलाव क्षेत्र नहीं मिलता तो पानी अपनी राह खुद बनाता है। इस बार यही हुआ। जहां पहले जलधारा और बाढ़ के पानी के लिए खुला क्षेत्र था, वहां अब पक्के मकान, दुकानें, होटल और अन्य निर्माण दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप तेज बहाव का दबाव उन स्थानों पर पड़ा जहां इंसानी गतिविधियां बढ़ चुकी हैं।

चित्रकूट में अगस्त के दौरान बारिश भी सामान्य से काफी अधिक रही। एक रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त में करीब 629.92 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि औसत 354.05 मिमी बताया गया है।

यानी नदी पर एक तरफ असाधारण बारिश का दबाव था और दूसरी तरफ उसके प्राकृतिक रास्ते में बढ़ता निर्माण।

तीन हिस्सों में समझिए मंदाकिनी का बदलता भूगोल

मंदाकिनी के इस पूरे प्रवाह क्षेत्र को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। उद्गम क्षेत्र से राघव प्रयाग घाट तक कई स्थानों पर नदी के आसपास अपेक्षाकृत खुला क्षेत्र बचा हुआ है। ऐसे हिस्सों में बाढ़ का पानी फैलने के बावजूद नुकसान तुलनात्मक रूप से कम रहा।

इसके बाद राघव प्रयाग घाट से बंधोइन की तरफ बढ़ते हुए नदी का स्वरूप बदलता है। रामघाट और उससे जुड़े तीर्थ क्षेत्र में नदी के किनारे मानव गतिविधियां बेहद घनी हो गई हैं।

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स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह आरोप उठता रहा है कि रामघाट और आसपास के क्षेत्र में हजारों निर्माण ऐसे हैं, जिन्होंने नदी के डूब क्षेत्र तक जगह घेर ली है। सवाल केवल अवैध निर्माण का नहीं है। सवाल यह भी है कि यदि कोई निर्माण नियमों के विपरीत था तो उसके नक्शे कैसे स्वीकृत हुए और जमीनों की रजिस्ट्री किस आधार पर हुई?

यही वह सवाल है जिसका जवाब प्रशासनिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

बाढ़ ने बता दिया कि नदी का नक्शा कागज पर नहीं चलता

नदी का नक्शा कागज पर बनाई गई सीमा से नहीं चलता। नदी अपना रास्ता जलस्तर, ढाल, प्रवाह और आसपास के प्राकृतिक भूगोल के अनुसार तय करती है।

29 अगस्त की बाढ़ ने इसी वास्तविकता को सामने ला दिया। जिन क्षेत्रों में नदी के फैलाव को रोकने वाले निर्माण खड़े कर दिए गए हैं, वहां पानी का दबाव बढ़ा। रामघाट सहित निचले इलाकों में घरों और दुकानों में पानी पहुंचा। सड़कें जलमग्न हुईं और कई जगह आवागमन बाधित हुआ।

बाढ़ उतरने के बाद भी तस्वीर सामान्य नहीं हुई। दोबारा बारिश होने पर मंदाकिनी फिर उफनती रही और प्रशासन को निचले इलाकों को खाली कराने तथा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की जरूरत पड़ी।

700 साल पुराने मंदिर बचे, नए निर्माण क्यों नहीं?

रामघाट और आसपास के धार्मिक स्थलों की एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। महाराजाधिराज स्वामी मत्तगजेंद्रनाथ मंदिर, निर्मोही अखाड़ा, भरत मंदिर, चरखारी मंदिर, ब्रह्मपुरी, पर्णकुटी और तुलसी गुफा जैसे पुराने धार्मिक स्थल लंबे समय से बाढ़ का सामना करते आए हैं।

इन पुराने निर्माणों की स्थिति यह सवाल भी खड़ा करती है कि पारंपरिक निर्माण और आधुनिक अनियोजित पर्यटन विकास में अंतर कितना महत्वपूर्ण है।

पुराने मंदिर और घाट नदी के भूगोल तथा स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित हुए थे। इसके विपरीत बाद के वर्षों में पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियों के विस्तार के साथ नदी किनारे होटल, दुकानें, मकान और अन्य निर्माण बढ़ते गए।

यही कारण है कि इस बार बाढ़ ने केवल पानी नहीं बढ़ाया, बल्कि नदी और इंसानी निर्माण के बीच टकराव को भी उजागर किया।

पयस्वनी और सरयू का भी सिकुड़ता गया रास्ता

समस्या केवल मंदाकिनी तक सीमित नहीं है। पयस्वनी और सरयू के प्रवाह क्षेत्र में भी निर्माण और अतिक्रमण को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार जिन स्थानों पर कभी कच्ची झोपड़ियां या अपेक्षाकृत खुला भूभाग दिखाई देता था, वहां अब पक्के मकान खड़े हो चुके हैं। जल निकासी और गंदगी रोकने के नाम पर बनाई गई संरचनाएं भी कई जगह बरसात के दौरान पानी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं।

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इस बार तेज बारिश और बाढ़ के दौरान ऐसे अवरोधों का असर सामने आया। पानी को प्राकृतिक दिशा में पर्याप्त जगह नहीं मिलने पर वह आसपास के इलाकों में फैल गया। सतना-चित्रकूट मार्ग के लिए बनाए गए बाईपास को भी नुकसान पहुंचने की बात सामने आई है।

इस पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक हाइड्रोलॉजिकल सर्वे अब बेहद जरूरी हो गया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहां नदी का वास्तविक डूब क्षेत्र है, कहां जलनिकासी अवरुद्ध है और किन निर्माणों ने प्रवाह को प्रभावित किया है।

19 दिनों में नौ बार खतरे के निशान के पार

मंदाकिनी का इस बार का व्यवहार सामान्य मौसमी बाढ़ से कहीं अधिक गंभीर रहा। उपलब्ध स्थानीय आंकड़ों के अनुसार 14 अगस्त से 2 सितंबर के बीच नदी नौ बार खतरे के निशान के ऊपर पहुंची।

रामघाट पर खतरे का निशान 126.500 मीटर बताया गया है। सितंबर की शुरुआत में भी नदी खतरे के निशान से ऊपर बहती रही और रामघाट समेत कई इलाकों में पानी भरने की स्थिति बनी रही।

29 अगस्त को स्थिति और विकट हो गई थी। उस समय विभिन्न रिपोर्टों में जलस्तर 135 मीटर के आसपास या उससे अधिक पहुंचने की जानकारी सामने आई। इसे बेहद असाधारण बाढ़ की स्थिति माना गया।

इसके बाद भी संकट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। सितंबर के शुरुआती दिनों में दोबारा भारी बारिश के कारण नदी फिर उफनी और रामघाट के मंदिरों तथा निचले इलाकों में पानी पहुंचा।

जब नदी घटती है, तब भी छोड़ जाती है सवाल

बाढ़ का पानी उतरने के बाद अक्सर प्रशासन और लोग राहत की सांस लेते हैं। लेकिन नदी के किनारे जमा कीचड़, क्षतिग्रस्त सड़कें, टूटती दीवारें, खराब विद्युत ढांचा और बर्बाद हुई दुकानों के बीच एक बड़ा सवाल रह जाता है—क्या अगली बाढ़ के पहले कोई स्थायी समाधान होगा?

यदि नदी के प्रवाह क्षेत्र में निर्माण जारी रहा तो अगली बड़ी बारिश में नुकसान और बढ़ सकता है।

बाढ़ को केवल बारिश की समस्या मानकर उसका समाधान नहीं किया जा सकता। अत्यधिक वर्षा प्राकृतिक कारण है, लेकिन नदी के रास्ते में अवरोध मानवजनित कारण हो सकते हैं। दोनों को अलग-अलग समझे बिना प्रभावी बाढ़ प्रबंधन संभव नहीं है।

पर्यटन विकास या नदी के अस्तित्व की कीमत?

चित्रकूट धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र है। यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इसलिए घाटों, रास्तों, धर्मशालाओं, दुकानों और होटल जैसी सुविधाओं का विकास स्वाभाविक है।

लेकिन विकास की दिशा महत्वपूर्ण है।

यदि पर्यटन सुविधाएं नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में खड़ी होती हैं तो अल्पकाल में भले ही वे आर्थिक गतिविधि बढ़ाएं, लेकिन दीर्घकाल में वही निर्माण बाढ़ के समय सबसे कमजोर साबित हो सकते हैं।

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सामाजिक कार्यकर्ता आनंद सिंह पटेल के अनुसार रामघाट और आसपास का तीर्थ क्षेत्र कभी तपस्थली के रूप में जाना जाता था। समय के साथ यहां धार्मिक गतिविधियों के साथ व्यापारिक गतिविधियां बढ़ती गईं।

नदी सफाई और जल संरक्षण से जुड़े अजीत सिंह का मानना है कि इस बाढ़ को भविष्य के लिए चेतावनी के रूप में देखना चाहिए। कारोबारी अरुण गुप्ता भी बाढ़ से सबक लेकर नदी के रास्ते में आए कब्जों को स्वयं हटाने की जरूरत पर जोर देते हैं।

प्रशासन ने सर्वे का दिया भरोसा

बाढ़ की भयावहता के बाद अब प्रशासन की निगाह नदी के बफर जोन और तीर्थ क्षेत्र में हुए निर्माण पर है।

चित्रकूट के जिलाधिकारी पुलकित गर्ग ने कहा है कि भीषण बाढ़ के बाद दोबारा सर्वे कराया जाएगा। नदी के बफर जोन और तीर्थ क्षेत्र में यदि अवैध कब्जे मिलते हैं तो उन्हें चिह्नित कर कार्रवाई कराई जाएगी।

यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल बाढ़ के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक समाधान के लिए नदी के पूरे कैचमेंट, डूब क्षेत्र, जलनिकासी मार्ग और निर्माण क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन करना होगा।

अब जरूरी है नदी का नया सर्वे

मंदाकिनी की इस बाढ़ ने एक बड़ा सबक दिया है—नदी को केवल घाट और पर्यटन स्थल के रूप में नहीं देखा जा सकता। वह एक जीवित जलप्रणाली है और उसे अपना प्राकृतिक फैलाव क्षेत्र चाहिए।

अब प्रशासन के सामने कई सवाल हैं। नदी के दोनों ओर 150-150 मीटर के बफर क्षेत्र की वास्तविक स्थिति क्या है? कितने निर्माण स्वीकृत हैं और कितने बिना अनुमति के? किन जमीनों की रजिस्ट्री हुई? किन स्थानों पर नक्शे स्वीकृत किए गए? क्या निर्माण से पहले बाढ़ और जलनिकासी का अध्ययन किया गया था? और सबसे महत्वपूर्ण, नदी के वास्तविक डूब क्षेत्र की सीमा आखिर कहां तक है?

इन सवालों का जवाब पुराने कागजी नक्शों से नहीं, बल्कि नए वैज्ञानिक सर्वे, राजस्व अभिलेख, सिंचाई विभाग के रिकॉर्ड और वास्तविक जमीनी स्थिति को एक साथ देखकर ही मिल सकता है।

29 अगस्त की बाढ़ ने रामघाट का भौतिक नक्शा भले बिगाड़ दिया हो, लेकिन उससे कहीं बड़ा काम अब बाकी है—मंदाकिनी के वास्तविक प्राकृतिक नक्शे को फिर से समझना।

क्योंकि अगर नदी की राह को नहीं समझा गया और निर्माण का दबाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो अगली बाढ़ केवल चेतावनी नहीं होगी। वह और बड़ी तबाही का कारण बन सकती है।

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Author: यायावर

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