नेपाल में फिर बाढ़ का खतरा : भोटेकोशी का बहाव तेज, रसुवा-नुवाकोट-धादिंग में अलर्ट ; 675 मौतें, 275 से ज्यादा भारतीय अब भी लापता

नेपाल में भोटेकोशी नदी के तेज बहाव और बाढ़ से तबाही का दृश्य, राहत-बचाव अभियान के साथ रिपोर्टर चुन्नीलाल प्रधान की तस्वीर

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चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट

नेपाल में अभी 26 अगस्त को विनाशकारी बाढ़ के उत्पादन से बाहर भी नहीं निकल पाया है कि भोटेकोशी नदी के बढ़ते बहाव ने एक बार फिर नई चिंता पैदा कर दी है। रविवार सुबह नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीआरआरएमए) की ओर से के पहाड़ों में तेजी की सूचना सामने आई, जिसके बाद प्रशासन ने नदी किनारे रसुवा, नुवाकोट और धाद आश्रय वाले लोगों को रहने की सलाह दी है। ताज़ा चेतावनी से पता चलता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में पानी, ज्वालामुखी और तेज़ लहरें हैं, जहाँ कुछ दिन पहले ही पानी, ढलान और तेज़ लहरें थीं, जहाँ सड़कें, मकान और महत्वपूर्ण निचले हिस्से को पुल का भारी नुकसान हुआ था। ताजा रिपोर्ट्स की रात में भोटेकोशी का बहाव अचानक बढ़ गया था, हालांकि बाद में इसके रिव्यू में कमी की भी जानकारी मिली।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई चेतावनी ऐसे समय में है जब राहत और बचाव दल अभी भी पिछली आपदा के मंदी में जीवन तलाश रहे हैं। 26 अगस्त को भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में सिद्दीक बाढ़ ने नेपाल-तिब्बत सीमा से लेकर कई आदिवासियों को भारी तबाही मचाई। नेपाल के अधिकारियों के मुताबिक शनिवार तक 675 लोगों की मौत की पुष्टि हुई थी और हजारों लोग अब भी लापता हो गए थे। नेपाल सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मृत और लापता लोगों के आंकड़ों की खोज, पहचान और सत्यापन के साथ बदलाव संभव है।

एक त्रासदी ख़त्म नहीं हुई, दूसरा संकट सामने आया

भोटेकोशी नदी का ताज़ा मंदी मंदी की सामान्य जानकारी नहीं है। झील इसलिए अधिक है क्योंकि नदी के आसपास के क्षेत्र में पहले ही बाढ़ और बाढ़ की मार झेलना पड़ती है। कई जगहों पर सड़क संपर्क बाधित है, पुल क्षतिग्रस्त हो गया है और पाइपलाइन के लिए फ्लोरिडा तक की राहत की चुनौती बनी हुई है। ऐसे में यदि नदी के पर्यावरण में तेजी से वृद्धि हुई है तो राहत कार्य के साथ-साथ प्रभावित आबादी को सुरक्षित स्थान तक प्रतिबद्धता की चुनौती भी बढ़ सकती है।

नेपाल प्रशासन ने नदी किनारे रहने वाले लोगों से अतिरिक्त सावधानी बरतने की बात कही है। स्थानीय स्तर पर आरक्षण एवं राहत योजनाओं को भी संरक्षित किया गया है। ताज़ा अंडकोष में प्रशासन की विशेषता यह सुनिश्चित करना है कि लोग नदी के किनारे, कज़ाख झील और अन्य अवशेष वाले इलाकों में मच्छर के रूप में न रहें।

यह चेतावनी इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ दिनों से प्रभावित क्षेत्रों में कांस्टीट्यूशन एवं खोज बचाव अभियान चल रहा है। भारी मलबे और इमारतों के संपर्क के कारण टोक्यो में कई नारियल सख्त हो गए हैं। नेपाल सरकार के 26 अगस्त को बाढ़ के बाद सुरक्षा और आपदा प्रबंधन को व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया गया है और खोज, राहत, राहत और क्रमिक अभियान जारी किया गया है।

675 रन ने नेपाल को झकझोर दिया

26 अगस्त की आपदा का पैमाना लगातार सामने आ रहा है। शनिवार तक नेपाल में 675 यात्रियों की पुष्टि की गई थी। हजारों लोग अभी भी लापता हैं और राहत महासागर नदी घाटियों, तटबंधों, क्षतिग्रस्त ढांचों और दुर्गम महासागर में तलाश कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक 4,400 से ज्यादा लोगों को बाथरूम या सुरक्षित ठिकाने पर रखा गया है।

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इस त्रासदी का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। नेपाल-तिब्बत सीमा से जुड़े इलाकों में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक, पर्यटक और तीर्थयात्री भी प्रभावित हुए हैं। नेपाल के आधिकारिक विदेश मंत्रालय ने 27 अगस्त को जारी प्रारंभिक जानकारी में 33 देशों के 596 विदेशी नागरिकों के लापता होने की सूचना दी थी। उस समय सूची में भारतीय नागरिकों की संख्या 167 बताई गई थी, लेकिन बाद की भारतीय सरकारी सूचनाओं में प्रभावित भारतीय नागरिकों का आंकड़ा अलग रूप में सामने आया। यह अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि आपदा के बाद अलग-अलग एजेंसियों द्वारा संपर्क और पहचान का सत्यापन लगातार जारी रहता है।

भारतीय नागरिकों की चिंता सबसे बड़ी मानवीय चुनौती

नेपाल की बाढ़ में भारतीय नागरिकों को लेकर भी चिंता लगातार बनी हुई है। भारत के विदेश मंत्रालय के ताजा अपडेट के अनुसार 108 भारतीय नागरिकों को नेपाल में सुरक्षित बचाया जा चुका है, जबकि 275 से अधिक भारतीय नागरिक अब भी लापता या संपर्क से बाहर हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय मूल के 128 लोगों से भी संपर्क नहीं हो पाया है। यह संख्या उन परिवारों की चिंता को बताती है जो नेपाल, चीन और भारत के अलग-अलग संपर्क माध्यमों से अपने परिजनों की खबर पाने की कोशिश कर रहे हैं।

राहत की एक महत्वपूर्ण खबर यह भी है कि पहले संपर्क से बाहर रहे करीब 50 भारतीय नागरिकों से दोबारा संपर्क स्थापित किया गया है। इसके अलावा रसुवा की एक जलविद्युत परियोजना से चार भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाल लिया गया। इससे बचाव अभियानों के बीच उम्मीद जरूर जगी है कि कठिन परिस्थितियों में फंसे अन्य लोगों तक भी राहत दल पहुंच सकते हैं।

भारत सरकार नेपाल में फंसे अपने नागरिकों को निकालने के साथ-साथ वहां चल रहे राहत एवं बचाव अभियानों में भी सहयोग कर रही है। भारतीय वायुसेना के माध्यम से राहत सामग्री भेजी गई है। ताजा जानकारी के अनुसार भारत ने 11 टन राहत सामग्री की एक और खेप भेजी है, जिसमें बचाव कार्य से जुड़े उपकरण और अन्य आवश्यक सामग्री शामिल है।

चीन की ओर फंसे भारतीयों की भी निकासी जारी

नेपाल की आपदा का एक अलग मानवीय पहलू उन भारतीय नागरिकों से जुड़ा है जो चीन की ओर थे और बाढ़ के बाद सीमा क्षेत्र में फंस गए। विदेश मंत्रालय के मुताबिक पिछले दो दिनों में 598 भारतीय नागरिक चीन से सुरक्षित नेपाल पहुंच चुके हैं। वहीं लगभग 900 भारतीय अभी चीन में सुरक्षित और संपर्क में हैं। भारतीय दूतावास और स्थानीय प्रशासन उनके संपर्क में हैं तथा उनकी सुरक्षित आवाजाही के लिए समन्वय किया जा रहा है।

यह स्थिति बताती है कि आपदा का असर केवल एक नदी घाटी या एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है। नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में आवागमन और संपर्क व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। जिन लोगों के लिए सामान्य परिस्थितियों में सीमा पार करना आसान होता, उनके लिए अब सुरक्षित रास्ता, परिवहन और प्रशासनिक समन्वय सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।

सुरंगों में फंसे लोगों तक पहुंचना बड़ी चुनौती

बाढ़ के बाद कुछ लोगों के सुरंगों और निर्माण परियोजनाओं में फंसे होने की खबरों ने बचाव अभियान को और जटिल बना दिया है। दुर्गम पहाड़ी भूगोल, मलबा, क्षतिग्रस्त सड़कें और नदी का बदलता बहाव बचाव दलों के सामने कठिन परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं।

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भारत ने इस मोर्चे पर भी नेपाल को विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध कराने की पहल की है। भारतीय तकनीकी टीमों ने सुरंग बचाव की संभावनाओं का आकलन शुरू किया है। इसके साथ ही फोरेंसिक विशेषज्ञों की टीम भी भेजी जा रही है, ताकि बरामद शवों की पहचान में डीएनए तकनीक के माध्यम से मदद मिल सके। यह कदम उन परिवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जो कई दिनों से अपने लापता परिजनों की तलाश में हैं।

सड़क और पुल टूटने से राहत की रफ्तार प्रभावित

आपदा के बाद सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्याओं में से एक संपर्क व्यवस्था का टूटना है। कई सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं और पुल बह गए या बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। पहाड़ी इलाकों में सड़क का एक छोटा हिस्सा भी टूट जाए तो पूरा क्षेत्र बाहरी दुनिया से कट सकता है।

इसी वजह से भारत नेपाल को पुलों की बहाली में भी सहायता दे रहा है। भारतीय सहायता के तहत 230 फुट लंबे मॉड्यूलर स्टील ब्रिज के उपकरण नेपाल पहुंच चुके हैं। इसके अलावा कई अन्य बैली ब्रिज के लिए उपकरण भेजने की तैयारी की जा रही है। इन पुलों की स्थापना से प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री पहुंचाने, बचाव दलों की आवाजाही और सामान्य संपर्क बहाल करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

तबाही का असली कारण अभी भी जांच का विषय

26 अगस्त की बाढ़ के पीछे कारणों को लेकर अलग-अलग प्रारंभिक आकलन सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों में हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर या चट्टानी ढांचे के टूटने से अचानक पानी और मलबे के नीचे आने की संभावना बताई गई है। हालांकि नेपाल सरकार ने कहा है कि आपदा का कारण अभी पूरी तरह निर्धारित नहीं हुआ है। इसलिए अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष आने से पहले किसी एक कारण को निश्चित मानना उचित नहीं होगा।

यही कारण है कि भोटेकोशी नदी के ताजा बहाव पर प्रशासन की नजर बनी हुई है। पहले से क्षतिग्रस्त नदी घाटी में अचानक पानी बढ़ना अपने आप में जोखिम पैदा करता है। अगर ऊपरी क्षेत्रों में भारी बारिश या कोई अन्य प्राकृतिक घटना होती है तो उसका असर नीचे के इलाकों में बहुत कम समय में दिखाई दे सकता है।

नदियों के किनारे बसे लोगों के लिए चेतावनी

रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में जारी ताजा अलर्ट का सीधा संदेश यही है कि लोग नदी के किनारे से दूरी बनाए रखें और प्रशासन की चेतावनी को हल्के में न लें। बाढ़ के दौरान सबसे बड़ा खतरा अक्सर उस समय पैदा होता है जब लोग यह मान लेते हैं कि पानी कम हो रहा है और खतरा टल गया है। भोटेकोशी की मौजूदा स्थिति में प्रशासन इसी वजह से अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है।

स्थानीय लोगों से कहा गया है कि वे नदी के बहाव में बदलाव, तेज आवाज, अचानक पानी बढ़ने या मलबा आने जैसी किसी भी असामान्य स्थिति को गंभीरता से लें। संभावित खतरे की स्थिति में सुरक्षित और ऊंचे स्थानों की ओर जाना सबसे महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

भारत-नेपाल सहयोग की परीक्षा

नेपाल की मौजूदा आपदा ने भारत और नेपाल के बीच मानवीय सहयोग की आवश्यकता को एक बार फिर सामने ला दिया है। भारत की ओर से राहत सामग्री, बचाव विशेषज्ञ, फोरेंसिक सहायता और पुल निर्माण से संबंधित उपकरण भेजे जा रहे हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नेपाल में राहत एवं बचाव कार्यों की समीक्षा की है और काठमांडू तथा बीजिंग में भारतीय मिशनों के साथ समन्वय बनाए रखा है।

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नेपाल के लिए इस समय प्राथमिकता साफ है—लापता लोगों को राहत देना, जीवित बचे लोगों को सुरक्षित निकालना, मृतकों की पहचान करना और प्रभावित परिवारों तक राहत पहुंचाना। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि सरकार अपनी ओर से खोज, राहत, राहत और यात्री अभियान में सभी सुविधाएं उपलब्ध करा रही है।

आंकड़ों के पीछे हजारों परिवार के रिश्तेदार हैं

बाढ़ की खबरों में 675 प्रवासी, हजारों लापता, 108 भारतीयों की वापसी, 275 से ज्यादा भारतीयों की तलाश और चीन से 598 भारतीयों की सुरक्षित वापसी जैसे आंकड़े सामने आए हैं। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे हजारों परिवार के लोग और इंतजार छिपा हुआ है।

किसी भी परिवार के लिए ‘लापता’ शब्द सिर्फ एक वैज्ञानिक पात्र नहीं होता। इसका अर्थ है- फोन का जवाब न मिलना, किसी राहत शिविर में नाम न मिलना, हितग्राही में तलाश, चौकियों से सूचना प्रौद्योगिकी और हर नए अपडेट में किसी अज्ञात नाम की उम्मीद करना। यही कारण है कि बचाव अभियानों के साथ-साथ सही जानकारी और पहचान की प्रक्रिया भी बहुत महत्वपूर्ण है।

नेपाल में राहत अभियान के बीच प्रशासन ने भी अपस्टॉल स्टॉक्स और टॉयलेट्स से बचने की अपील की है। आपदा के समय परिवारों की चिंताएं बढ़ गई हैं और बचाव अभियान भी प्रभावित हो सकता है। दस्तावेज़ से प्रमाणित दस्तावेज़ पर विश्वसनीय होना आवश्यक है।

अब आगे क्या?

भोटेकोशी नदी के ताज़ा बहाव ने नेपाल के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। प्रशासन के अंतर्संबंध नदी के विश्लेषण, मौसम प्रभावित और क्षेत्र की स्थिति पर है। रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग में जारी यात्रियों के बीच राहत एवं बचाव कार्य को सुरक्षित तरीके से जारी रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

26 अगस्त के बाढ़ से यह स्पष्ट हो गया है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाएँ तेजी से विनाशकारी रूप ले सकती हैं। एक ओर नदी का बहाव और समुद्र की निगरानी की चुनौती है, तो दूसरी ओर हजारों लापता लोगों की तलाश है, गोदाम ग्रेडियलों की बहाली और विदेशी नागरिकों की सुरक्षित ग्राहकों का दबाव है।

इस पूरे संकट में सबसे जरूरी है- मितव्ययी, शीघ्र सूचना, सुरक्षित उत्पादक और भारत-नेपाल-चीन के बीच प्रभावशाली समन्वय। 675 मोटोरोला का पात्र पहले ही नेपाल के लिए एक गहन मानव निर्मित ट्रैवेल बन चुका है। अब भोटेकोशी के नए प्रत्याशा के बीच सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि पानी का विशाल घाट जल्द ही सामान्य हो, विश्राम आश्रमों को सुरक्षित विश्राम मिलें और विश्राम आश्रमों के नीचे दबे जीवन की आशा में सामान्य दल अधिक से अधिक लोगों को सुरक्षित अवकाश प्रदान करें।

नेपाल के पहाड़ी इलाके में इस समय हर आबादी नदी की आवाज चेतावनी की तरह जा रही है। एक तरफ तबाही के निशान हैं, दूसरी तरफ घाटी के आने की उम्मीद है- और इसी तरह की उम्मीद के बीच भोटेकोशी के किनारे नेपाल फिर से कायम है।

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Author: यायावर

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