मिशन नारी शक्ति पर सवाल: छेड़खानी के बाद 14 वर्षीय किशोरी का अपहरण, आखिर कब सुरक्षित होंगी हमारी बेटियां?

चित्रकूट के रैपुरा में किशोरी अपहरण मामले पर रिपोर्टर संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

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संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

चित्रकूट। सरकार और पुलिस प्रशासन की ओर से महिलाओं एवं बेटियों की सुरक्षा को लेकर लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। मिशन नारी शक्ति जैसे अभियानों के जरिए महिलाओं और बालिकाओं को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने का दावा भी किया जाता है। लेकिन चित्रकूट जिले के रैपुरा कोतवाली क्षेत्र से सामने आया एक मामला इन दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आरोप है कि अनुसूचित जाति समुदाय की 14 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ पहले छेड़खानी की गई और शिकायत के बाद भी समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से कुछ ही सप्ताह बाद उसके अपहरण की घटना सामने आ गई।

पीड़ित परिवार का आरोप है कि यदि पहली घटना में पुलिस ने समय रहते आरोपित के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की होती तो नाबालिग को दोबारा निशाना बनाए जाने की नौबत शायद नहीं आती। परिवार ने पुलिस की कार्यप्रणाली और स्थानीय स्तर पर कथित लापरवाही को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

29 जुलाई को दर्ज हुई थी छेड़खानी की एफआईआर

पीड़ित परिवार के अनुसार रैपुरा कोतवाली क्षेत्र के एक गांव में ठाकुर समुदाय के एक युवक पर 14 वर्षीय किशोरी के साथ छेड़खानी करने का आरोप लगा था। घटना के बाद परिवार ने साहस जुटाकर रैपुरा कोतवाली पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। परिवार का दावा है कि 29 जुलाई 2026 को मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी।

परिजनों के मुताबिक, शिकायत के बाद पुलिस क्षेत्राधिकारी राजापुर ने गांव पहुंचकर घटनास्थल का निरीक्षण भी किया था। बताया जा रहा है कि पीड़िता के साथ अधिकारी घटनास्थल तक पहुंचे और मामले की जानकारी ली गई। इसके बावजूद परिवार का आरोप है कि प्रारंभिक शिकायत के बाद आरोपित के खिलाफ ऐसी ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिससे वह दोबारा इस तरह की घटना को अंजाम देने से डरता।

परिजनों का यह भी आरोप है कि मामले में नामजद अथवा आरोपित युवक के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और एससी/एसटी एक्ट समेत गंभीर धाराओं में मामला दर्ज होने के बावजूद गिरफ्तारी नहीं की गई। यही बिंदु अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।

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आरोपी के पिता पर भी अभद्रता का आरोप

पीड़ित परिवार का आरोप है कि पहली घटना की शिकायत के बाद कथित आरोपी के पिता ने भी नाबालिग की मां के साथ अभद्रता और गाली-गलौज की। परिवार के अनुसार इस व्यवहार से उन्हें सामाजिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा।

पीड़ित पक्ष का कहना है कि जब एक परिवार अपनी नाबालिग बेटी की सुरक्षा को लेकर पुलिस के पास पहुंचता है तो उसे संरक्षण और निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद होती है। लेकिन यदि शिकायत के बाद भी आरोपित पक्ष का कथित दबदबा बना रहे तो पीड़ित परिवार के भीतर असुरक्षा की भावना और गहरी हो जाती है।

24 अगस्त को फिर सामने आया गंभीर मामला

परिवार के अनुसार पहली घटना के बाद मामला शांत नहीं हुआ। आरोप है कि 24 अगस्त 2026 को उसी 14 वर्षीय नाबालिग लड़की का अपहरण कर लिया गया। घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मामले को संज्ञान में लिया और 25 अगस्त 2026 को अपहरण का मुकदमा दर्ज किया।

अपहरण के मामले में प्रीतम ठाकुर पुत्र यशवंत ठाकुर, अरुण ठाकुर पुत्र यशवंत ठाकुर और यशवंत ठाकुर पुत्र चेला ठाकुर के नाम आरोपितों के रूप में सामने आने की बात कही गई है। वहीं, पीड़ित परिवार की ओर से रज्जू नामक व्यक्ति को मुख्य आरोपी बताए जाने का आरोप लगाया गया है।

परिवार का दावा है कि रज्जू ने कथित तौर पर लड़की को उसके घर से लेकर बोडी पोखरी चौराहे तक पहुंचाने में भूमिका निभाई। हालांकि, इस आरोप की भी जांच और पुलिस की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।

पहली शिकायत के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल पहली एफआईआर से जुड़ा हुआ है। यदि पीड़ित परिवार के दावे के अनुसार 29 जुलाई को नाबालिग से छेड़खानी के मामले में पॉक्सो एक्ट और एससी/एसटी एक्ट जैसी गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था, तो उसके बाद पुलिस की कार्रवाई किस स्तर तक पहुंची?

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क्या आरोपित की गिरफ्तारी के लिए प्रभावी प्रयास किए गए?
क्या पीड़िता और उसके परिवार को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराई गई?
क्या मामले की नियमित निगरानी की गई?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पहली शिकायत के बाद आरोपित पक्ष पर कानून का ऐसा दबाव बनाया गया था, जिससे दोबारा अपराध की आशंका कम हो सके?

इन सवालों का जवाब पुलिस प्रशासन की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

हल्का इंचार्ज पर परिवार ने लगाए गंभीर आरोप

पीड़ित परिजनों ने स्थानीय हल्का इंचार्ज सुभाष राम पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। परिवार का आरोप है कि मुख्य आरोपी बताए जा रहे रज्जू को बचाने के लिए कथित तौर पर मोटी रकम की वसूली की गई। यह बेहद गंभीर आरोप है और इसकी स्वतंत्र तथा निष्पक्ष जांच जरूरी है।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि रिश्वत या किसी आरोपी को बचाने से जुड़े आरोप फिलहाल पीड़ित परिवार के आरोप हैं, जिन्हें जांच के बिना तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता। यदि ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक परिवार के साथ अन्याय का मामला नहीं होगा, बल्कि पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

‘चलो गांव की ओर’ टीम ने परिवार से की मुलाकात

मामले की जमीनी हकीकत जानने के लिए ‘चलो गांव की ओर’ जागरूकता अभियान की टीम ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की। टीम ने परिजनों से घटनाक्रम की जानकारी ली और उनके द्वारा लगाए जा रहे आरोपों को समझने का प्रयास किया।

टीम की ओर से पुलिस की कथित लापरवाही पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। खास तौर पर यह सवाल सामने आया कि जब एक नाबालिग लड़की से छेड़खानी के मामले में पहले ही शिकायत और मुकदमा दर्ज था, तब उसकी सुरक्षा और आरोपी के खिलाफ कार्रवाई को लेकर पुलिस ने कितनी गंभीरता दिखाई?

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मिशन नारी शक्ति की जमीनी परीक्षा

महिला और बालिका सुरक्षा केवल सरकारी अभियानों, पोस्टरों और जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रह सकती। इसकी असली परीक्षा तब होती है जब किसी पीड़ित परिवार की शिकायत पुलिस थाने तक पहुंचती है।

चित्रकूट का यह मामला इसी कसौटी पर पुलिस व्यवस्था को परखता दिखाई दे रहा है। यदि पहली शिकायत पर समय रहते प्रभावी कानूनी कार्रवाई हुई होती, पीड़िता की सुरक्षा सुनिश्चित की गई होती और आरोपित के खिलाफ कानून का स्पष्ट संदेश गया होता, तो क्या बाद की घटना को रोका जा सकता था—यह जांच का महत्वपूर्ण विषय है।

नाबालिग से जुड़े मामले में पुलिस को संवेदनशीलता, निष्पक्षता और कानून के अनुरूप त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही पीड़ित परिवार के आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, ताकि यदि किसी स्तर पर लापरवाही, मिलीभगत या भ्रष्टाचार सामने आता है तो जिम्मेदार लोगों पर भी कार्रवाई हो।

अब पुलिस प्रशासन की अग्निपरीक्षा

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष और गंभीर जांच कराएगा? क्या पहली एफआईआर से लेकर अपहरण के मुकदमे तक पुलिस की भूमिका की भी समीक्षा होगी? क्या आरोपितों की भूमिका की जांच के साथ-साथ उन पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय की जाएगी, जिन पर परिवार ने लापरवाही के आरोप लगाए हैं?

एक 14 वर्षीय नाबालिग की सुरक्षा से जुड़ा यह मामला महज एक परिवार की पीड़ा नहीं है। यह उस व्यवस्था के सामने भी सवाल है, जिसका उद्देश्य महिलाओं और बेटियों को भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना है।

अब देखना होगा कि पुलिस प्रशासन पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए कितनी गंभीरता दिखाता है या फिर परिवार को न्याय की तलाश में दर-दर भटकना पड़ेगा। मिशन नारी शक्ति की वास्तविक सफलता इसी बात से तय होगी कि शिकायत करने वाली बेटी और उसके परिवार को कानून कितना सुरक्षित महसूस करा पाता है।

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Author: यायावर

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