मिश्रीलाल कोरी के साथ चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
नेपाल और तिब्बत की सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ और हिमालयी आपदा ने पूरे क्षेत्र को शोक, भय और अनिश्चितता के अंधकार में धकेल दिया है। पहाड़ों से उतरकर आई पानी, बर्फ, चट्टानों और मलबे की प्रचंड धारा ने कुछ ही घंटों में गांवों, कस्बों, पुलों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं को तबाह कर दिया। राहत और बचाव कार्य लगातार जारी हैं, लेकिन बीतते समय के साथ लापता लोगों के जीवित मिलने की उम्मीदें भी कमजोर पड़ती जा रही हैं।
ताजा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार मृतकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई एजेंसियों के अनुसार मरने वालों का आंकड़ा 392 से आगे बढ़कर 469 तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है, जबकि करीब 1,500 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। नेपाल पुलिस, सेना, चीन की बचाव एजेंसियां और अंतरराष्ट्रीय राहत दल युद्धस्तर पर खोज अभियान चला रहे हैं।
हिमालय में आया ऐसा जलजला जिसने सब कुछ बदल दिया
विशेषज्ञों के अनुसार यह आपदा केवल सामान्य बाढ़ नहीं थी। नेपाल-तिब्बत सीमा के निकट एक विशाल ग्लेशियर के टूटने, चट्टानों के खिसकने और हिमस्खलन की श्रृंखला ने लाखों घन मीटर पानी, बर्फ और मलबे को अचानक नीचे की ओर धकेल दिया। देखते ही देखते ल्हेंदे खोला, भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में पानी का स्तर कई मीटर ऊपर पहुंच गया।
वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों की अस्थिरता ने इस त्रासदी की पृष्ठभूमि तैयार की। कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी सबसे गंभीर पर्वतीय आपदाओं में से एक मान रहे हैं।
मलबे में बदल गए गांव, उजड़ गईं बस्तियां
आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वे किसी युद्धग्रस्त इलाके से कम नहीं हैं। अनेक गांव पूरी तरह मिट्टी और पत्थरों के नीचे दब गए हैं। कई स्थानों पर घरों की केवल छतें दिखाई दे रही हैं, जबकि कहीं पूरी बस्तियां नदी के साथ बह गईं।
नुवाकोट, रसुवा, धादिंग और त्रिशूली घाटी के कई इलाके सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। सड़कें ध्वस्त हो चुकी हैं, बिजली व्यवस्था चरमरा गई है और संचार नेटवर्क भी कई स्थानों पर ठप पड़ा हुआ है। बचावकर्मियों को प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
मलबे से निकल रहे शव, अस्पतालों में अपनों की तलाश
बाढ़ के बाद सबसे दर्दनाक तस्वीरें अस्पतालों, राहत शिविरों और शव पहचान केंद्रों से सामने आ रही हैं। बड़ी संख्या में लोग अपने लापता परिजनों की तलाश में भटक रहे हैं। कई शव इतने क्षत-विक्षत अवस्था में मिले हैं कि उनकी पहचान करना भी मुश्किल हो गया है।
राहत दलों को कीचड़ और मलबे के बीच लगातार शव मिल रहे हैं। डीएनए जांच और अन्य वैज्ञानिक तरीकों की सहायता से मृतकों की पहचान की जा रही है। हजारों परिवारों की उम्मीदें अब खोजी दलों की सफलता पर टिकी हुई हैं।
लगभग 1500 लोग अब भी लापता
नेपाल और तिब्बत के अधिकारियों के अनुसार सीमा के दोनों ओर कुल 1,468 से अधिक लोग लापता हैं। इनमें स्थानीय नागरिकों के साथ बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक, पर्वतारोही और कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालु शामिल हैं।
नेपाल में 900 से अधिक लोग लापता बताए गए हैं, जबकि तिब्बत के ग्यिरोंग क्षेत्र में 550 से अधिक लोगों का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है। लापता लोगों में भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, मलेशिया, यूक्रेन और कई अन्य देशों के नागरिक शामिल हैं।
भारतीय नागरिकों को लेकर बढ़ी चिंता
भारत सरकार ने नेपाल और तिब्बत में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर विशेष अभियान शुरू किया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार सैकड़ों भारतीयों से संपर्क टूट गया था, जिनमें कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालु और विभिन्न परियोजनाओं में कार्यरत श्रमिक शामिल हैं।
अब तक दर्जनों भारतीयों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जबकि अनेक लोगों की खोज जारी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नेपाल और चीन में भारतीय दूतावासों के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर राहत और बचाव कार्यों की समीक्षा की है।
राहत और बचाव में जुटी हजारों की टीम
नेपाल सेना, नेपाल पुलिस, चीनी बचाव दल और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के हजारों कर्मी प्रभावित क्षेत्रों में तैनात हैं। हेलीकॉप्टरों की मदद से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है और राहत सामग्री गिराई जा रही है।
अब तक सैकड़ों लोगों को हेलीकॉप्टर से बचाया गया है। कई दुर्गम इलाकों में सेना के जवान पैदल पहुंचकर लोगों तक भोजन, दवाइयां और तंबू पहुंचा रहे हैं। एक उल्लेखनीय अभियान में नेपाल सेना ने सुरंग में फंसे लगभग 350 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला।
नई झील बनी, दूसरी आपदा का खतरा
इस समय सबसे बड़ी चिंता भोटे कोशी नदी प्रणाली के उद्गम क्षेत्र में बनी नई अवरोध झील को लेकर है। ग्लेशियर टूटने और भारी मलबा जमा होने से नदी का प्रवाह रुक गया, जिससे लाखों घन मीटर पानी जमा हो गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो नीचे के इलाकों में एक और भीषण बाढ़ आ सकती है। नेपाल और चीन दोनों देशों ने निचले क्षेत्रों के लोगों को सतर्क रहने और नदी किनारों से दूर रहने की चेतावनी जारी की है।
बुनियादी ढांचा बुरी तरह तबाह
नेपाल के सड़क विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार दर्जनों पुल बह गए हैं और लगभग 40 किलोमीटर से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं। कई जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचा है।
काठमांडू को उत्तरी क्षेत्रों से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्ग बंद पड़े हैं। कई जिलों का संपर्क देश के बाकी हिस्सों से लगभग कट गया है। राहत सामग्री पहुंचाने में यही सबसे बड़ी चुनौती बन रही है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बढ़ाया मदद का हाथ
भारत सहित कई देशों ने नेपाल के लिए राहत सामग्री भेजनी शुरू कर दी है। भारत ने दवाइयों, खाद्य सामग्री और आपदा राहत उपकरणों की बड़ी खेप नेपाल भेजी है। संयुक्त राष्ट्र, रेड क्रॉस और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी करोड़ों डॉलर की सहायता की घोषणा की है।
मानवीय संगठनों का अनुमान है कि इस आपदा से 90 हजार से अधिक लोग प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं और उन्हें लंबे समय तक राहत एवं पुनर्वास सहायता की आवश्यकता होगी।
अभी खत्म नहीं हुई है त्रासदी
नेपाल और तिब्बत की यह आपदा केवल एक बाढ़ नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी और जलवायु संकट की गंभीर चेतावनी भी है। पहाड़ों में बढ़ती अस्थिरता, ग्लेशियरों का टूटना और अचानक आने वाली बाढ़ें आने वाले वर्षों में और बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।
फिलहाल हजारों परिवार अपनों की तलाश में हैं। बचावकर्मी दिन-रात मलबा हटाकर जीवन की कोई निशानी खोज रहे हैं। लेकिन हर गुजरते घंटे के साथ उम्मीद और चिंता का यह संघर्ष और गहरा होता जा रहा है। हिमालय की गोद में आई इस महात्रासदी ने पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर दिया है, और सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रकृति का यह कहर अभी थमा है, या फिर कोई नया खतरा अभी बाकी है?

























