✍️ संपादक : अनिल अनूप
भारतीय राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका मूल्यांकन केवल उनके पदों, चुनावी सफलताओं या सरकारों की उपलब्धियों से नहीं किया जा सकता। वे अपने समय से आगे जाकर राजनीतिक संस्कृति को प्रभावित करते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। वे प्रधानमंत्री थे, विदेश मंत्री थे, विपक्ष के नेता थे, भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख चेहरों में रहे, संसद के विलक्षण वक्ता थे और साहित्य की दुनिया में एक संवेदनशील कवि भी। लेकिन इन सभी पहचानों के ऊपर एक पहचान ऐसी थी, जिसे आज की राजनीतिक भाषा में समझना शायद सबसे अधिक जरूरी है—वह असहमति को दुश्मनी में बदलने के पक्षधर नहीं थे।
भारत सरकार के आधिकारिक जीवन-वृत्त के अनुसार वाजपेयी चार दशक से अधिक समय तक संसदीय राजनीति में सक्रिय रहे और नौ बार लोकसभा तथा दो बार राज्यसभा के सदस्य चुने गए। वे 1996 में अल्प अवधि के लिए प्रधानमंत्री बने और बाद में 1998 से 2004 तक प्रधानमंत्री रहे।
लेकिन आज जब अटल बिहारी वाजपेयी को याद किया जाता है तो अक्सर उनकी कविताएं, भाषण, पोखरण परीक्षण, कारगिल युद्ध, स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और पाकिस्तान के साथ शांति प्रयासों का उल्लेख होता है। इन सबके बीच उनके व्यक्तित्व का एक अपेक्षाकृत कम चर्चित पक्ष छूट जाता है—वाजपेयी केवल राजनीति में सहिष्णु भाषा बोलने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे स्वयं को लगातार साहित्य, पत्रकारिता, संगीत और आत्ममंथन से जोड़कर रखने वाले राजनेता थे।
यही वह बिंदु है, जहां से उनके व्यक्तित्व को समझने का एक नया रास्ता खुलता है।
राजनीति में आने से पहले पत्रकार और साहित्य-साधक
वाजपेयी के बारे में आम धारणा यह है कि वे आरएसएस और भारतीय जनसंघ के रास्ते राजनीति में आए और आगे चलकर भाजपा के सबसे बड़े नेताओं में शामिल हुए। यह तथ्य सही है, लेकिन उनकी यात्रा इससे कहीं अधिक व्यापक थी।
प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार उन्होंने पत्रकारिता को भी अपने सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया था। 1951 में भारतीय जनसंघ से जुड़ने के बाद उनका पत्रकारिता जीवन राजनीति की ओर मुड़ गया। आधिकारिक विवरण उन्हें एक प्रशंसित कवि के रूप में भी रेखांकित करता है और यह बताता है कि वे संगीत तथा पाक-कला में भी रुचि रखते थे।
यही बात उन्हें अपने दौर के कई राजनेताओं से अलग करती है।
वाजपेयी के लिए भाषा केवल भाषण देने का माध्यम नहीं थी। भाषा उनके लिए विचार को मनुष्य तक पहुंचाने का पुल थी। इसलिए उनके भाषणों में राजनीतिक तर्क के साथ साहित्यिक संवेदना दिखाई देती थी। उनकी कविता में राजनीति आती थी तो भी वह केवल राजनीतिक नारा नहीं बनती थी; उसमें मनुष्य, संघर्ष, निराशा, आशा और आत्मविश्वास के प्रश्न उपस्थित रहते थे।
यह गुण आज के राजनीतिक विमर्श के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र मतभेदों पर ही चलता है। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक मतभेद व्यक्तिगत घृणा में बदल जाएं। वाजपेयी का महत्व इसलिए भी है कि वे वैचारिक रूप से दृढ़ होते हुए भी संवाद की संभावना को समाप्त नहीं करते थे।
सबसे कम चर्चित बातों में एक: एक राजनेता का रचनात्मक आत्म-संसार
वाजपेयी के बारे में एक कम चर्चित तथ्य यह है कि सत्ता और राजनीति के अत्यधिक दबाव के बीच भी उन्होंने अपने भीतर के कवि को मरने नहीं दिया।
यह बात मामूली लग सकती है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व के संदर्भ में इसका अर्थ बहुत बड़ा है।
सत्ता मनुष्य को अक्सर पद, प्रोटोकॉल और निर्णयों तक सीमित कर देती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद व्यक्ति के सामने फाइलें, सुरक्षा, विदेश नीति, आर्थिक निर्णय, राजनीतिक संकट और चुनावी रणनीतियां होती हैं। ऐसे वातावरण में संवेदनशीलता बचाए रखना कठिन होता है। वाजपेयी की विशिष्टता यही थी कि उन्होंने सत्ता के बीच भी अपने भीतर की साहित्यिक दुनिया को जीवित रखा।
उनकी कविता ‘ऊंचाई’ को ही देखें। उसमें ऊंचा उठने के साथ जमीन से जुड़े रहने की चेतावनी मिलती है। यह केवल काव्यात्मक विचार नहीं, बल्कि उनके सार्वजनिक जीवन की एक व्याख्या भी मानी जा सकती है।
एक राजनेता के लिए यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—ऊंचाई यदि मनुष्य को समाज से काट दे तो वह उपलब्धि नहीं, अलगाव बन जाती है।
वाजपेयी की राजनीतिक लोकप्रियता का एक कारण शायद यही मानवीयता थी। वे भाषण में गंभीर बात कह सकते थे और अगले ही क्षण किसी हल्के हास्य से वातावरण को सहज बना सकते थे। उनकी वाणी में ठहराव था, इसलिए उनके शब्दों का प्रभाव केवल शब्दों से नहीं बल्कि विरामों से भी पैदा होता था।
कक्षा दस में लिखी कविता और भविष्य का संकेत
वाजपेयी की साहित्यिक प्रतिभा के आरंभ से जुड़ा एक प्रसंग अपेक्षाकृत कम चर्चा में आता है। 2025 में लखनऊ में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया था कि वाजपेयी ने अपनी चर्चित कविता ‘हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन’ विद्यार्थी जीवन में, लगभग कक्षा दस के दौरान लिखी थी। उनके अनुसार 1942 में कालिचरण कॉलेज के एक शिविर में जब उन्होंने कविता सुनाई तो उसे काफी सराहना मिली।
इस प्रसंग का महत्व केवल इसलिए नहीं कि एक किशोर ने कविता लिखी। इसका महत्व इस बात में है कि वाजपेयी के व्यक्तित्व में राजनीतिक चेतना और साहित्यिक अभिव्यक्ति बहुत आरंभिक अवस्था में ही साथ-साथ विकसित होने लगी थीं।
बाद के वर्षों में यही दोनों धाराएं उनके सार्वजनिक जीवन की पहचान बनीं। उनकी राजनीति में शब्द थे, लेकिन शब्दों के पीछे भाव भी थे। उनकी कविता में राष्ट्र था, लेकिन राष्ट्र के भीतर मनुष्य भी था। यही अंतर उन्हें केवल एक राजनेता से एक सार्वजनिक बौद्धिक व्यक्तित्व बनाता है।
संयुक्त राष्ट्र में हिंदी: भाषा से आगे आत्मविश्वास की राजनीति
अटल बिहारी वाजपेयी की अंतरराष्ट्रीय पहचान का एक महत्वपूर्ण पक्ष संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में दिया गया उनका भाषण है। विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में संबोधन उनके भाषा-स्वाभिमान और भारतीय सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया। हाल के एक संकलन में भी उनके संयुक्त राष्ट्र के हिंदी भाषण को उनकी प्रमुख वाणी-धरोहरों में शामिल किया गया है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी।
भाषा का सम्मान करना और दूसरी भाषाओं का विरोध करना दो अलग बातें हैं। वाजपेयी का दृष्टिकोण इस फर्क को समझने वाला था। हिंदी में बोलना उनके लिए दुनिया से कटना नहीं था; बल्कि अपनी भाषा में दुनिया से संवाद करना था।
आज जब वैश्वीकरण के दौर में भाषा का प्रश्न फिर नए रूप में सामने है, वाजपेयी का यह पक्ष हमें बताता है कि आत्मविश्वास का अर्थ अपनी भाषा को ही श्रेष्ठ मानना नहीं, बल्कि अपनी भाषा में विश्व से बराबरी के साथ संवाद करने का साहस रखना है।
विरोधी विचारधारा के लोगों के प्रति सम्मान
वाजपेयी की राजनीतिक यात्रा विचारधारात्मक रूप से स्पष्ट थी। वे भारतीय जनसंघ से आए, भाजपा के प्रमुख नेताओं में रहे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि से जुड़े थे। लेकिन उनके व्यक्तित्व की उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि वे अपने विरोधियों को लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा मानते थे।
उनके भाषणों में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की आलोचना होती थी, परंतु आलोचना के बावजूद व्यक्तिगत सम्मान की गुंजाइश बनी रहती थी।
यह परंपरा आज की राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सीख है।
वाजपेयी के समय में संसद में तीखी बहसें होती थीं। सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव भी होता था। लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान और व्यक्तिगत संबंधों की एक अलग संस्कृति मौजूद थी। वाजपेयी की इसी शैली के कारण विरोधी दलों के कई नेता भी उनके वक्तृत्व और व्यक्तित्व की प्रशंसा करते थे।
उनका ‘अजातशत्रु’ कहा जाना केवल प्रशंसा का विशेषण नहीं था; यह उनकी राजनीतिक शैली की ओर संकेत करता था। 2025 के एक कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने भी उन्हें इसी रूप में याद करते हुए उनकी व्यापक स्वीकार्यता और संवाद की राजनीति का उल्लेख किया।
13 दिन की सरकार: हार में भी गरिमा
1996 में वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने। लेकिन उनकी सरकार बहुमत साबित नहीं कर सकी और उन्हें केवल कुछ ही दिनों बाद पद छोड़ना पड़ा। यह भारतीय संसदीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।
लेकिन उस घटना का सबसे बड़ा राजनीतिक पाठ केवल यह नहीं है कि सरकार 13 दिन चली। पाठ यह है कि सत्ता से हटते समय भी राजनीतिक गरिमा कैसे बचाई जाती है। वाजपेयी का वह दौर बताता है कि प्रधानमंत्री पद का महत्व कुर्सी पर बैठे रहने में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा के साथ जिम्मेदारी निभाने में है।
इसके बाद उन्होंने वापसी की। 1998 में सरकार बनी और 1999 में वे फिर प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार 13 अक्टूबर 1999 को उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की नई सरकार के प्रमुख के रूप में दूसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला। उनकी यह राजनीतिक यात्रा असफलता के बाद पुनरागमन का भी उदाहरण है।
गठबंधन राजनीति के वास्तुकार
आज गठबंधन राजनीति भारतीय लोकतंत्र की सामान्य वास्तविकता है। लेकिन जब वाजपेयी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को नेतृत्व दिया, तब अलग-अलग क्षेत्रीय और वैचारिक दलों को एक साथ लेकर स्थिर सरकार चलाना आसान नहीं था।
वाजपेयी की बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में से एक यही थी कि उन्होंने गठबंधन को केवल संख्या का खेल नहीं रहने दिया। उन्होंने सहयोगी दलों के साथ संवाद, सहमति और राजनीतिक संतुलन की आवश्यकता को समझा।
यही कारण है कि उनके नेतृत्व की चर्चा केवल भाजपा के संदर्भ में नहीं, बल्कि भारतीय गठबंधन राजनीति के विकास के संदर्भ में भी की जानी चाहिए।
उनका राजनीतिक दर्शन एक वाक्य में शायद यह था—सहमति जरूरी है, लेकिन सहमति के लिए आत्मसमर्पण जरूरी नहीं। यह लोकतांत्रिक नेतृत्व की कठिन कला है।
परमाणु शक्ति और शांति—दोनों को साथ देखने वाला नेता
1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया। यह निर्णय भारत की सामरिक नीति के इतिहास में निर्णायक माना जाता है। लेकिन वाजपेयी का राजनीतिक व्यक्तित्व केवल शक्ति-प्रदर्शन तक सीमित नहीं था।
उन्होंने पाकिस्तान के साथ संवाद की कोशिश भी की। दिल्ली से लाहौर बस यात्रा और लाहौर घोषणा इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। यहीं वाजपेयी की राजनीति का विरोधाभास नहीं बल्कि संतुलन दिखाई देता है।
एक ओर वे भारत की सुरक्षा और सामरिक स्वायत्तता को लेकर दृढ़ थे, दूसरी ओर वे पड़ोसी देश के साथ संवाद की आवश्यकता भी समझते थे।
शक्ति और शांति को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखना उनकी विदेश नीति की महत्वपूर्ण विशेषता थी।
कारगिल युद्ध के समय उनका नेतृत्व और युद्ध के बाद भी शांति की संभावना बनाए रखना इसी संतुलन को दर्शाता है।
विकास की राजनीति में दूरदृष्टि
वाजपेयी की विरासत का एक दूसरा पक्ष है—इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी।
स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना ने देश के प्रमुख महानगरों को राजमार्गों से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम उठाया। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने ग्रामीण संपर्क को राष्ट्रीय विकास के एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। यहां उनकी सोच को केवल सड़क निर्माण तक सीमित करना उचित नहीं होगा।
सड़क का अर्थ बाजार तक पहुंच है। सड़क का अर्थ अस्पताल तक पहुंच है। सड़क का अर्थ विद्यालय और रोजगार तक पहुंच है। सड़क का अर्थ गांव को देश की आर्थिक धारा से जोड़ना है।
इसलिए वाजपेयी की विकास-दृष्टि में बुनियादी ढांचा केवल निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता का साधन था।
छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड: छोटे राज्यों की राजनीति
वाजपेयी सरकार के समय 2000 में तीन नए राज्यों—छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड—का गठन हुआ। यह भारतीय संघीय ढांचे में महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय था।
आज जब क्षेत्रीय आकांक्षाओं, स्थानीय पहचान और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण पर चर्चा होती है, तब इस निर्णय को भी उसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए।
विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के गठन को लेकर वाजपेयी के पुराने राजनीतिक वादे का उल्लेख आज भी किया जाता है। हाल की एक रिपोर्ट में भी इस वादे और राज्य गठन के बीच संबंध को रेखांकित किया गया है।
यह घटना बताती है कि वाजपेयी की राजनीति केवल दिल्ली की सत्ता तक सीमित नहीं थी; उसमें राज्यों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को जगह देने की क्षमता भी थी।
अटल की सबसे बड़ी विरासत: राजनीतिक भाषा
वाजपेयी की सबसे बड़ी विरासत शायद कोई एक योजना, कोई एक चुनाव या कोई एक विदेश नीति निर्णय नहीं है।
उनकी सबसे बड़ी विरासत राजनीतिक भाषा की वह शैली है जिसमें विरोध संभव था, लेकिन अपमान अनिवार्य नहीं था।
आज राजनीति में शब्द पहले से अधिक तेज हो गए हैं। सोशल मीडिया ने वक्तव्य को तत्काल हथियार बना दिया है। आरोप कुछ सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। राजनीतिक विरोध कई बार व्यक्तिगत चरित्र पर हमले में बदल जाता है।
ऐसे समय में वाजपेयी की राजनीति को याद करना केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए आत्मपरीक्षण है।
क्या लोकतंत्र में हम विरोधी को शत्रु बनाए बिना अपनी बात कह सकते हैं? क्या हम अपनी विचारधारा के प्रति दृढ़ रहते हुए दूसरे विचार के अस्तित्व को स्वीकार कर सकते हैं? क्या हम सत्ता में रहते हुए विपक्ष की भूमिका को सम्मान दे सकते हैं? क्या हम हार के बाद भी गरिमा बनाए रख सकते हैं? वाजपेयी का सार्वजनिक जीवन इन प्रश्नों का एक संभावित उत्तर देता है।
अटल को केवल एक दल के नेता में सीमित करना उनके साथ अन्याय है
अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के महान नेताओं में से एक थे—इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन उन्हें केवल भाजपा की राजनीतिक विरासत तक सीमित कर देना उनके व्यक्तित्व की व्यापकता को कम करना होगा।
वे भारतीय संसद की परंपरा का हिस्सा थे। वे हिंदी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण आवाज थे। वे आधुनिक भारतीय राजनीतिक कविता के विशिष्ट हस्ताक्षर थे। वे विदेश नीति के व्यावहारिक समर्थक थे। वे गठबंधन राजनीति के सफल प्रयोगकर्ता थे। वे राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर दृढ़ थे और शांति की आवश्यकता को भी समझते थे।
यही बहुआयामी व्यक्तित्व उन्हें समकालीन भारतीय राजनीति में विशिष्ट बनाता है।
आज के राजनेताओं के लिए अटल का सबसे कठिन सबक
वाजपेयी की विरासत से सबसे कठिन सीख लेना शायद यही है कि लोकप्रिय होना और मर्यादित होना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
राजनीति में आवाज ऊंची किए बिना भी प्रभाव पैदा किया जा सकता है। कठोर निर्णय लेते हुए भी भाषा में संवेदनशीलता रखी जा सकती है। वैचारिक दृढ़ता के साथ संवाद की गुंजाइश छोड़ी जा सकती है। और सबसे महत्वपूर्ण—राजनीतिक विरोधी को देश का विरोधी समझे बिना उससे संघर्ष किया जा सकता है। यही लोकतंत्र की परिपक्वता है।
वाजपेयी के व्यक्तित्व का वह कम चर्चित साहित्यिक पक्ष हमें बताता है कि शायद उनकी राजनीतिक भाषा की जड़ें उनके कवि-मन में थीं। जिसने शब्दों की शक्ति को समझ लिया हो, वह जानता है कि एक शब्द पुल बना सकता है और वही शब्द दीवार भी। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी लंबी सार्वजनिक यात्रा में शब्दों से पुल बनाने की कोशिश की।
अटल की स्मृति नहीं, अटल की शैली चाहिए
अटल बिहारी वाजपेयी का निधन 16 अगस्त 2018 को हुआ, लेकिन उनके राजनीतिक जीवन की बहस समाप्त नहीं हुई। बल्कि समय बीतने के साथ उनकी प्रासंगिकता के कुछ नए आयाम सामने आते हैं।
आज आवश्यकता केवल उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय राजनीति उनके जीवन से कुछ कठिन सबक ग्रहण करे।
उनका कवि होना हमें संवेदनशीलता सिखाता है। उनका पत्रकार होना हमें शब्दों की जिम्मेदारी समझाता है। उनका संसदीय जीवन हमें लोकतांत्रिक बहस का महत्व बताता है। उनकी गठबंधन राजनीति हमें सहमति का मूल्य समझाती है। उनकी विदेश नीति शक्ति और संवाद के संतुलन की सीख देती है। उनकी विकास परियोजनाएं दीर्घकालिक दृष्टि का महत्व बताती हैं।
और उनका विरोधियों के प्रति व्यवहार यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी जीवनरेखा है।
अटल बिहारी वाजपेयी की सबसे बड़ी पहचान शायद यही थी कि वे राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानते थे। उनके भीतर का कवि उन्हें बार-बार मनुष्य और समाज की ओर लौटाता था। इसलिए आज जब हम अटल बिहारी वाजपेयी को याद करें तो केवल यह न पूछें कि उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में क्या किया। यह भी पूछें कि उन्होंने राजनीति को किस तरह जिया।
क्योंकि इतिहास में सरकारें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं, दल बदलते हैं और राजनीतिक समीकरण बदल जाते हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन की भाषा, लोकतांत्रिक मर्यादा और संवाद की संस्कृति यदि किसी नेता के कारण मजबूत होती है, तो उसकी विरासत सत्ता की अवधि से कहीं लंबी होती है।
अटल बिहारी वाजपेयी की वास्तविक विरासत शायद यही है—विचारों में दृढ़ता, शब्दों में गरिमा और विरोध के बीच भी संवाद की संभावना। और आज के शोर भरे राजनीतिक समय में, शायद इससे अधिक दुर्लभ और जरूरी विरासत कोई दूसरी नहीं।

























