अंजनी कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे रहे हैं, जिन्होंने नायक बनकर नहीं, बल्कि खलनायक के रूप में दर्शकों के दिल-दिमाग पर ऐसी छाप छोड़ी कि उनका असली नाम पीछे छूट गया और पर्दे का किरदार ही उनकी पहचान बन गया। पंडित कन्हैयालाल उन्हीं विलक्षण कलाकारों में शामिल थे। फिल्म मदर इंडिया के सुक्खी लाला ने उन्हें ऐसी लोकप्रियता दी कि कई दर्शकों के लिए कन्हैयालाल का नाम लेते ही आंखों के सामने वही चालाक, स्वार्थी और अवसरवादी साहूकार का चेहरा उभर आता है।
धोती-कुर्ता, चेहरे पर बनावटी मासूमियत, आंखों में धूर्तता, बातचीत में जरूरत के हिसाब से बदलता लहजा और अपनी बात मनवाने की अद्भुत कला—कन्हैयालाल ने हिंदी फिल्मों में एक ऐसा चरित्र गढ़ा, जो भारतीय ग्रामीण समाज में मौजूद शोषणकारी व्यवस्था का प्रतीक बन गया। उनके किरदारों में खलनायकी जरूर थी, लेकिन उसमें व्यंग्य और हास्य का ऐसा पुट रहता था कि दर्शक उनसे नफरत करते हुए भी उन्हें देखने के लिए उत्सुक रहते थे।
सुक्खी लाला बना कन्हैयालाल की पहचान
मदर इंडिया में सुक्खी लाला का किरदार हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार खलनायकों में गिना जाता है। फिल्म में वह गांव के गरीब और जरूरतमंद लोगों की मजबूरी का फायदा उठाने वाला साहूकार है। कर्ज, ब्याज और लालच के जरिए वह दूसरों की परेशानियों को अपने फायदे में बदलने की कोशिश करता है।
कन्हैयालाल ने इस भूमिका को जिस सहजता से निभाया, उसने उन्हें उस दौर के दूसरे खलनायकों से अलग पहचान दी। वह पर्दे पर आते थे तो दर्शकों को पहले से अंदाजा हो जाता था कि अब कोई चाल चलेगी, कोई स्वार्थी सौदा होगा या किसी मजबूर व्यक्ति की परेशानी का फायदा उठाया जाएगा।
उनकी खासियत यह थी कि उन्होंने अपने किरदार को केवल डरावना खलनायक नहीं बनाया। उसमें लालच था, चालाकी थी, हास्य था और एक ऐसी सामाजिक सच्चाई भी थी जिसे दर्शक अपने आसपास पहचान सकते थे।
आंखों और आवाज से अभिनय करने वाले कलाकार
कन्हैयालाल की अभिनय शैली बहुत अलग थी। उनके संवाद बोलने का तरीका, चेहरे के भाव, शरीर की हलचल और आंखों की भाषा उनके अभिनय को प्रभावशाली बनाती थी। वह सामान्य बातचीत को भी इस तरह प्रस्तुत करते थे कि उसके भीतर छिपा स्वार्थ दर्शकों को साफ दिखाई देने लगता था।
कभी उनका स्वर मीठा और सिफारिशी होता, कभी उसमें लालच झलकता और कभी जरूरत पड़ने पर आवाज में बनावटी हमदर्दी आ जाती। यही परिवर्तन उनके अभिनय की सबसे बड़ी ताकत था।
उनके किरदारों में एक अजीब तरह की उतावली भी दिखाई देती थी। बातचीत करते समय शरीर की हलचल, चलने का अंदाज और चेहरे के भाव मिलकर एक ऐसी छवि बनाते थे, जिसे दर्शक आसानी से भूल नहीं पाते थे।
एक ही तरह के किरदार, लेकिन हर बार नया असर
कन्हैयालाल को फिल्मों में अक्सर साहूकार, बनिया, लालची व्यक्ति, स्वार्थी मध्यस्थ या चालाक ग्रामीण के किरदार मिलते रहे। आज की भाषा में इसे टाइपकास्टिंग कहा जा सकता है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि एक जैसे दिखाई देने वाले किरदारों के बावजूद उन्होंने दर्शकों को कभी पूरी तरह बोर नहीं किया।
इसका कारण उनकी अभिनय क्षमता थी। वह हर भूमिका में छोटी-छोटी बारीकियों के जरिए अंतर पैदा कर देते थे। कहीं उनकी खलनायकी अधिक उभरती, कहीं हास्य, कहीं लालच और कहीं सामाजिक व्यंग्य।
यही वजह है कि उन्हें केवल खलनायक कहना उनके अभिनय के साथ न्याय नहीं होगा। उनके किरदारों में खलनायक, हास्य कलाकार और चरित्र अभिनेता—तीनों का मिश्रण दिखाई देता था। आसान भाषा में कहें तो वह पर्दे पर ‘थ्री इन वन’ कलाकार की तरह दिखाई देते थे।
दर्शकों की नफरत भी बनी अभिनय की सफलता
किसी अभिनेता के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह है कि दर्शक उसके निभाए किरदार को सच मानने लगें। कन्हैयालाल के साथ यही हुआ।
उनकी खलनायकी इतनी प्रभावशाली थी कि दर्शक उन्हें वास्तविक जीवन में भी उस किरदार से जोड़ने लगे। उनके अभिनय को लेकर लोगों की नाराजगी इतनी गहरी हो जाती थी कि उन्हें गालियां तक सुननी पड़ीं। उनके घर पर पत्थर फेंके जाने की घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है।
लेकिन कन्हैयालाल ने इस प्रतिक्रिया को अपने अभिनय की असफलता नहीं माना। इसके उलट, यह उनके लिए इस बात का प्रमाण था कि उन्होंने किरदार को प्रभावी ढंग से जीवंत किया है।
एक अभिनेता के लिए इससे बड़ी विडंबना और सफलता क्या हो सकती है कि लोग अभिनेता को भूलकर उसके किरदार से नफरत करने लगें?
बनारस की रामलीला से शुरू हुआ अभिनय का आकर्षण
पंडित कन्हैयालाल का जन्म 15 दिसंबर 1910 को बनारस में हुआ था। उनका पारिवारिक वातावरण भी कला और रंगमंच से जुड़ा हुआ था। उनके पिता रामलीला मंडली चलाते थे। बचपन में ही कन्हैयालाल को अभिनय और मंचीय प्रस्तुतियों का वातावरण देखने को मिला।
रामलीला जैसी लोकनाट्य परंपरा ने उनके भीतर अभिनय के प्रति रुचि पैदा की। मंच पर कलाकारों को अलग-अलग चरित्र निभाते देखना उनके लिए केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि अभिनय की शुरुआती पाठशाला भी था।
यही वातावरण आगे चलकर उनके फिल्मी जीवन की नींव बना।
भाई की तलाश में मुंबई पहुंचे और बदल गई जिंदगी
कन्हैयालाल के बड़े भाई संकटा प्रसाद फिल्मों में काम करने के उद्देश्य से मुंबई जा चुके थे। परिवार में जब काफी समय तक उनकी कोई खबर नहीं मिली तो उनकी मां ने कन्हैयालाल को भाई की तलाश में मुंबई भेजा।
यही यात्रा कन्हैयालाल के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई।
मुंबई पहुंचने पर उन्हें पता चला कि उनके भाई संकटा प्रसाद सागर मूवीटोन से जुड़े हुए थे। उस समय भारतीय सिनेमा अपने शुरुआती दौर से गुजर रहा था और टॉकी फिल्मों का दौर तेजी से विकसित हो रहा था।
संकटा प्रसाद ने सागर मूवीटोन की शुरुआती फिल्मों में काम किया था। इनमें वीर अभिमन्यु, रोमांटिक प्रिन्स और अबुल हसन जैसी फिल्में शामिल थीं।
भाई की सिफारिश से कन्हैयालाल को भी सागर मूवीटोन में काम मिल गया। बताया जाता है कि उन्हें शुरुआत में 35 रुपये मासिक वेतन पर नौकरी मिली थी। यहीं से वह उस दुनिया में दाखिल हुए, जिसने आगे चलकर उन्हें हिंदी सिनेमा का यादगार चरित्र अभिनेता बना दिया।
35 रुपये की नौकरी से फिल्मी पहचान तक
आज जब फिल्मों में काम करने वाले कलाकारों की फीस लाखों-करोड़ों रुपये में चर्चा का विषय बनती है, तब कन्हैयालाल की शुरुआत पर नजर डालना भारतीय फिल्म उद्योग के बदलते इतिहास को समझने जैसा है।
35 रुपये महीने की नौकरी से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे अभिनय की दुनिया में आगे बढ़ा। उस दौर में फिल्मों में काम करना आज की तरह व्यवस्थित और चमकदार पेशा नहीं था। स्टूडियो व्यवस्था के भीतर कलाकारों को अलग-अलग तरह के काम करने पड़ते थे।
कन्हैयालाल ने भी इसी वातावरण में सिनेमा को समझा, अभिनय की बारीकियां सीखीं और धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई।
खलनायक लेकिन सिर्फ खलनायक नहीं
कन्हैयालाल के फिल्मी सफर को देखें तो एक बात साफ होती है—उन्होंने खलनायक की परिभाषा को एक अलग रूप दिया। उनके पात्र तलवार लेकर नायक के सामने खड़े होने वाले पारंपरिक खलनायक नहीं थे। उनकी ताकत छल, लालच, चालाकी और परिस्थितियों का फायदा उठाने में होती थी।
वे आम जिंदगी में मौजूद उस व्यक्ति की तरह लगते थे जो मीठी बात करके अपना काम निकाल लेता है। यही वजह थी कि दर्शक उनके पात्रों से आसानी से जुड़ जाते थे।
उनके अभिनय में एक सामाजिक व्यंग्य भी छिपा होता था। गरीब की मजबूरी और अमीर की चालाकी, ग्रामीण जीवन की कठिनाइयां और व्यवस्था की कमजोरियां—इन सबके बीच उनका किरदार अक्सर एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आता था।
‘सुक्खी लाला’ आज भी क्यों याद है?
कई कलाकारों की फिल्में समय के साथ भुला दी जाती हैं, लेकिन कुछ किरदार कालजयी बन जाते हैं। सुक्खी लाला भी ऐसा ही किरदार है।
इस चरित्र की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वह केवल फिल्म की कहानी का हिस्सा नहीं था। वह उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधि दिखाई देता था, जिसमें गरीबी और कर्ज से जूझते लोगों की मजबूरी का फायदा उठाने वाले लोग मौजूद थे।
कन्हैयालाल ने इस भूमिका में ऐसी वास्तविकता भर दी कि दर्शकों को पर्दे पर अभिनय नहीं, बल्कि अपने समाज का कोई जाना-पहचाना चेहरा दिखाई देता था।
यही कारण है कि समय बीतने के बावजूद कन्हैयालाल और सुक्खी लाला का नाम एक-दूसरे से अलग करना मुश्किल है।
पर्दे की नफरत, कलाकार की उपलब्धि
कन्हैयालाल के अभिनय की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही थी कि दर्शकों ने उन्हें पसंद करने के बजाय उनके किरदारों से नफरत की—और यही नफरत उनकी सफलता की निशानी बन गई।
अभिनेता के तौर पर उन्होंने यह साबित किया कि पर्दे पर महान बनने के लिए हमेशा नायक बनना जरूरी नहीं। कभी-कभी एक प्रभावशाली चरित्र अभिनेता पूरी फिल्म की स्मृति में अपनी अलग जगह बना सकता है।
कन्हैयालाल ऐसे ही कलाकार थे। उन्होंने अपने लिए नायक की पारंपरिक छवि नहीं बनाई, बल्कि चरित्रों की दुनिया में अपनी पहचान स्थापित की। उनके किरदारों में चालाकी थी, स्वार्थ था, हास्य था और सामाजिक यथार्थ भी।
हिंदी सिनेमा में कन्हैयालाल की विरासत
भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर से लेकर उसके परिपक्व होते समय तक कन्हैयालाल ने लंबा सफर तय किया। उन्होंने उस दौर में अभिनय किया जब फिल्मों में चरित्रों को स्थापित करने के लिए कलाकारों के चेहरे, आवाज और संवाद अदायगी पर बहुत निर्भरता होती थी।
उनकी अभिनय शैली ने यह दिखाया कि बिना बड़े एक्शन, भारी-भरकम संवाद या नायकत्व के भी कोई कलाकार दर्शकों के मन में स्थायी जगह बना सकता है।
आज की पीढ़ी उन्हें मुख्य रूप से ‘मदर इंडिया’ के सुक्खी लाला के रूप में याद करती है, लेकिन उनका महत्व इससे कहीं व्यापक है। वह हिंदी सिनेमा के उन चरित्र अभिनेताओं में थे जिन्होंने पर्दे पर भारतीय समाज के एक खास वर्ग और उसकी मानसिकता को जीवंत किया।
कन्हैयालाल की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक अभिनेता की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस दौर के भारतीय सिनेमा की कहानी भी है, जब रंगमंच, लोकनाट्य और स्टूडियो व्यवस्था से निकले कलाकार अपने अभिनय के बल पर अपनी जगह बना रहे थे।
बनारस की रामलीला मंडली के वातावरण से निकलकर मुंबई के स्टूडियो तक पहुंचने वाला यह कलाकार अंततः ऐसा नाम बना, जिसे उसके असली नाम से ज्यादा उसके पर्दे के किरदार ने प्रसिद्ध किया।
कन्हैयालाल का ‘सुक्खी लाला’ भले ही पर्दे का किरदार था, लेकिन उस किरदार की छवि हिंदी सिनेमा की सामूहिक स्मृति में आज भी वास्तविक लगती है। यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी जीत है—जब उसका निभाया हुआ पात्र फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के मन में जिंदा रहे।

























