गजब अंदाज है कलेक्टर साहब का! अचानक स्कूल पहुंचे, फर्श पर बैठकर बच्चों को पढ़ाया ; जानिए कौन हैं IAS मधुसूदन हुल्गी

देवरिया डीएम IAS मधुसूदन हुल्गी सरकारी स्कूल में बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाते हुए, साथ में रिपोर्टर इरफान अली लारी की तस्वीर

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इरफान अली लारी की रिपोर्ट

देवरिया में जिलाधिकारी मधुसूदन हुल्गी इन दिनों अपने अलग प्रशासनिक अंदाज को लेकर चर्चा में हैं। कभी मुख्यमंत्री की अगवानी के लिए तेज कदमों से दौड़ते नजर आए डीएम अब सरकारी स्कूल की कक्षा में बच्चों के बीच फर्श पर बैठकर उनसे पढ़ाई का हाल पूछते और शिक्षक की भूमिका निभाते दिखाई दिए। प्रशासनिक पद की औपचारिकता से अलग उनका यह सहज व्यवहार बच्चों और शिक्षकों के लिए भी खास अनुभव बन गया।

हाल ही में स्कूल निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी अचानक कक्षा में पहुंचे। उन्होंने विद्यालय की व्यवस्थाओं का जायजा लिया और बच्चों की उपस्थिति, पठन-पाठन तथा उपलब्ध सुविधाओं के बारे में जानकारी ली। इसके बाद वह बच्चों के बीच जाकर बैठ गए। बच्चों से बातचीत करते हुए उन्होंने उनकी पढ़ाई को समझने की कोशिश की और यह जानना चाहा कि उन्हें पाठ्यक्रम समझने में किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

इस दौरान डीएम का अंदाज अचानक शिक्षक जैसा हो गया। उन्होंने बच्चों से सवाल किए, उनकी किताबें देखीं और पढ़ाई से जुड़े विषयों पर संवाद किया। बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाने की उनकी तस्वीर और वीडियो सामने आने के बाद उनके इस व्यवहार की चर्चा होने लगी।

औचक निरीक्षण में सामने आई स्कूल की तस्वीर

जिलाधिकारी मधुसूदन हुल्गी सरकारी विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति समझने के लिए निरीक्षण पर निकले थे। ऐसे निरीक्षणों का उद्देश्य केवल भवन, साफ-सफाई या सरकारी सुविधाओं की उपलब्धता देखना नहीं होता, बल्कि यह भी समझना होता है कि विद्यालय में बच्चों को वास्तव में किस स्तर की शिक्षा मिल रही है।

विद्यालय पहुंचने पर उन्होंने सबसे पहले वहां की व्यवस्थाओं को देखा। साफ-सफाई की स्थिति संतोषजनक मिलने पर उन्होंने प्रसन्नता जाहिर की। हालांकि बच्चों की अपेक्षाकृत कम उपस्थिति ने उनका ध्यान खींचा। उन्होंने उपस्थिति कम होने के कारणों को समझने की कोशिश की।

इसके बाद उनका ध्यान कक्षा में पढ़ रहे बच्चों की ओर गया। बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। डीएम भी उनके बीच बैठ गए। किसी अधिकारी और बच्चों के बीच आमतौर पर दिखाई देने वाली औपचारिक दूरी यहां नजर नहीं आई। उन्होंने बच्चों से सहज ढंग से बातचीत की और उनकी शैक्षणिक स्थिति को समझने का प्रयास किया। यही वह क्षण था जिसने निरीक्षण को सामान्य प्रशासनिक दौरे से अलग बना दिया।

अधिकारी से शिक्षक बन गए डीएम

कक्षा में बच्चों के साथ बातचीत के दौरान जिलाधिकारी ने केवल सवाल-जवाब तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने बच्चों को पढ़ाया भी। पाठ्यक्रम के अलग-अलग हिस्सों के बारे में चर्चा की और बच्चों से प्रश्न पूछकर यह जानने की कोशिश की कि वे विषयों को कितना समझ पा रहे हैं।

शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा में यह तरीका इसलिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि विद्यालय की वास्तविक स्थिति केवल रजिस्टर या रिपोर्ट से पूरी तरह समझना कठिन होता है। कक्षा में बैठकर बच्चों से संवाद करने पर यह पता चलता है कि शिक्षक किस तरह पढ़ा रहे हैं, विद्यार्थी कितना समझ रहे हैं और पढ़ाई के दौरान उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

डीएम ने इसी प्रत्यक्ष संवाद का रास्ता अपनाया। बच्चों से उनके पाठ्यक्रम, पढ़ाई और विद्यालय में मिलने वाली सुविधाओं को लेकर बातचीत की गई। उन्होंने बच्चों की समझ को सवालों के माध्यम से परखा और पढ़ाई के दौरान आने वाली दिक्कतों को जानने का प्रयास किया।

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बच्चों के लिए भी यह अनुभव सामान्य दिन से अलग था। जिस अधिकारी का नाम वे प्रशासन और जिले के स्तर पर सुनते होंगे, वही अधिकारी अचानक उनके बीच बैठकर उनकी किताब और पढ़ाई की बात कर रहा था। स्वाभाविक रूप से इससे बच्चों में उत्सुकता पैदा हुई।

कम उपस्थिति ने खींचा ध्यान

विद्यालय निरीक्षण के दौरान कम छात्र उपस्थिति प्रशासन के लिए हमेशा एक महत्वपूर्ण विषय होती है। सरकारी स्कूलों में भवन, शिक्षकों और सरकारी योजनाओं की उपलब्धता के साथ-साथ बच्चों की नियमित उपस्थिति भी शिक्षा की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण संकेतक है।

डीएम मधुसूदन हुल्गी ने भी विद्यालय में कम उपस्थिति को गंभीरता से समझने का प्रयास किया। किसी विद्यालय में बच्चों की संख्या कम रहने के पीछे अनेक कारण हो सकते हैं—अभिभावकों की जागरूकता, स्थानीय परिस्थितियां, विद्यालय से दूरी, पारिवारिक परिस्थितियां या बच्चों का नियमित रूप से स्कूल न आना। इसलिए केवल उपस्थिति दर्ज कर लेना समस्या का समाधान नहीं है।

ऐसे में जिलाधिकारी का बच्चों और विद्यालयी व्यवस्था से सीधे संवाद करना प्रशासन के लिए जमीनी फीडबैक हासिल करने का एक तरीका है।

केवल निरीक्षण नहीं, संवाद पर जोर

मधुसूदन हुल्गी के स्कूल निरीक्षण की सबसे उल्लेखनीय बात यही रही कि उन्होंने विद्यालय को केवल एक प्रशासनिक इकाई के रूप में नहीं देखा। वह सीधे बच्चों तक पहुंचे।

सरकारी स्कूलों में निरीक्षण के दौरान अधिकारी आम तौर पर प्रधानाध्यापक, शिक्षकों और संबंधित विभागीय अधिकारियों से जानकारी लेते हैं। लेकिन जब कोई अधिकारी स्वयं कक्षा में जाकर बच्चों से बातचीत करता है तो उसे शिक्षा व्यवस्था का दूसरा पक्ष भी समझ में आता है।

बच्चे अक्सर वह बात आसानी से बता देते हैं जो औपचारिक बैठक में सामने नहीं आती। उन्हें कौन-सा विषय कठिन लगता है, स्कूल में कौन-सी सुविधा उपयोगी है, पढ़ाई में किस तरह की परेशानी आती है और शिक्षक से उनका संवाद कैसा है—इन सवालों के जवाब सीधे बच्चों से मिल सकते हैं। मधुसूदन हुल्गी का यह तरीका इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण दिखाई देता है।

इससे पहले दौड़ को लेकर भी चर्चा में आए थे

देवरिया के जिलाधिकारी मधुसूदन हुल्गी इससे पहले भी अपने सहज और सक्रिय अंदाज को लेकर चर्चा में आ चुके हैं। मई 2026 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के देवरिया आगमन के दौरान मुख्यमंत्री की अगवानी के लिए डीएम के तेज कदमों से दौड़ने का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना था।

उस घटना के बाद अब सरकारी स्कूल में बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाने का उनका अंदाज सामने आया है। दोनों घटनाओं में एक समान बात दिखाई देती है—औपचारिकता से अलग उनका सक्रिय और प्रत्यक्ष भागीदारी वाला व्यवहार।

हालांकि प्रशासनिक कार्यशैली का मूल्यांकन केवल ऐसे दृश्यों से नहीं किया जा सकता। किसी अधिकारी की वास्तविक सफलता योजनाओं के क्रियान्वयन, कानून-व्यवस्था, जनसुनवाई, विकास कार्यों और सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता में दिखाई देती है। लेकिन जमीनी स्तर पर जाकर लोगों और बच्चों से संवाद करना प्रशासनिक संवेदनशीलता का सकारात्मक संकेत जरूर माना जा सकता है।

कौन हैं IAS मधुसूदन हुल्गी?

मधुसूदन हुल्गी उत्तर प्रदेश कैडर के 2015 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी हैं। वह मूल रूप से कर्नाटक से हैं। उपलब्ध प्रोफाइल और रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने इंजीनियरिंग और उच्च शिक्षा के बाद सिविल सेवा की ओर रुख किया।

उनकी शैक्षणिक यात्रा भी उल्लेखनीय है। भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के रसायन अभियांत्रिकी विभाग की पूर्व छात्र सूची में उनका नाम दर्ज है।

उपलब्ध जीवनी संबंधी स्रोतों के अनुसार उन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु से उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से लोक प्रबंधन में परास्नातक किया। कुछ मीडिया रिपोर्टों में उनकी जन्मतिथि 6 अप्रैल 1986 दी गई है, जबकि कुछ पुराने डेटाबेस में अलग तारीख दर्ज है; इसलिए जन्मतिथि संबंधी विवरण को प्रकाशित करते समय आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलान करना उचित होगा।

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यूपीएससी की राह भी आसान नहीं थी

मधुसूदन हुल्गी की सिविल सेवा यात्रा उन अभ्यर्थियों के लिए प्रेरणादायक है जो प्रतियोगी परीक्षाओं में शुरुआती असफलताओं से निराश हो जाते हैं।

2015 बैच के इस अधिकारी ने 2014 की सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की थी। एक पुराने साक्षात्कार में उन्होंने अपनी तैयारी की यात्रा के बारे में बताया था कि शुरुआती प्रयासों में उन्हें असफलता मिली और लगातार प्रयासों के बाद वह सफलता तक पहुंचे। उपलब्ध सामग्री के अनुसार उन्होंने यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा में कई बार असफलता का सामना किया, लेकिन प्रयास जारी रखा। आखिरकार उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में सफलता प्राप्त की और भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चयनित हुए।

उनकी कहानी का यह पक्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षा प्राप्त करना सफलता की गारंटी नहीं है। सफलता के लिए तैयारी, निरंतरता और असफलताओं से सीखने की क्षमता भी जरूरी है।

महोबा से शुरू हुआ प्रशासनिक सफर

भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के बाद मधुसूदन हुल्गी की प्रशासनिक यात्रा उत्तर प्रदेश से शुरू हुई। उनकी शुरुआती तैनाती महोबा में असिस्टेंट मजिस्ट्रेट/असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में हुई। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों और विभागों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। उपलब्ध सेवा विवरण में महोबा, अयोध्या, सुल्तानपुर, वाराणसी और मुरादाबाद सहित कई महत्वपूर्ण तैनातियां दर्ज हैं।

वह अयोध्या में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट रहे। इसके बाद सुल्तानपुर और वाराणसी में मुख्य विकास अधिकारी के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। मुरादाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने शहरी विकास से जुड़े प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन किया।

इन विभिन्न पदों ने उनके प्रशासनिक अनुभव को अलग-अलग क्षेत्रों से जोड़ा। कहीं कानून-व्यवस्था और राजस्व प्रशासन से जुड़ी जिम्मेदारियां थीं तो कहीं ग्रामीण विकास और शहरी नियोजन से संबंधित कार्य।

शिक्षा क्षेत्र से भी रहा है गहरा जुड़ाव

मधुसूदन हुल्गी की प्रशासनिक यात्रा में शिक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियां भी महत्वपूर्ण रही हैं। दिसंबर 2022 में उन्हें सर्व शिक्षा अभियान से जुड़े दायित्व में अतिरिक्त राज्य परियोजना निदेशक बनाया गया था। शिक्षा क्षेत्र से उनका यह जुड़ाव आज देवरिया में विद्यालय निरीक्षण के दौरान भी दिखाई देता है।

यही कारण है कि सरकारी स्कूलों की व्यवस्था, बच्चों की उपस्थिति और पठन-पाठन की स्थिति को लेकर उनकी प्रत्यक्ष रुचि को केवल एक औचक निरीक्षण की घटना के रूप में देखने के बजाय उनके प्रशासनिक अनुभव के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा सकता है।

कौशांबी के डीएम भी रह चुके हैं

जिलाधिकारी के रूप में मधुसूदन हुल्गी की पहली प्रमुख तैनाती कौशांबी में हुई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार जून 2024 में उन्हें कौशांबी का जिलाधिकारी बनाया गया था। बाद में उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष सचिव तथा आवास एवं विकास परिषद में अपर आवास आयुक्त जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी संभालीं।

इसके बाद मई 2026 में उन्होंने देवरिया के जिलाधिकारी के रूप में कार्यभार संभाला। देवरिया में उनकी कार्यशैली में योजनाओं के क्रियान्वयन, क्षेत्रीय निरीक्षण और जमीनी स्तर पर प्रशासनिक निगरानी पर जोर दिखाई देता है।

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स्कूलों की हकीकत समझने का सीधा तरीका

सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को लेकर देशभर में बहस होती रही है। शिक्षा के क्षेत्र में केवल भवन और संसाधनों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। बच्चों की नियमित उपस्थिति, शिक्षक की उपलब्धता, कक्षा में पठन-पाठन का स्तर, बच्चों की सीखने की क्षमता और अभिभावकों का भरोसा—ये सभी शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण घटक हैं।

इसीलिए किसी जिलाधिकारी का स्कूल में जाकर बच्चों के साथ बैठना प्रशासनिक दृष्टि से एक उपयोगी अभ्यास हो सकता है। इससे अधिकारी को कागजी रिपोर्ट के साथ-साथ वास्तविक परिस्थितियों का भी अंदाजा मिलता है।

मधुसूदन हुल्गी का बच्चों के बीच बैठना इसी दृष्टिकोण को सामने लाता है। उन्होंने निरीक्षण को केवल निरीक्षण तक सीमित न रखते हुए बच्चों से संवाद को उसका हिस्सा बनाया।

बच्चों के लिए अधिकारी नहीं, शिक्षक का अनुभव

कक्षा में बैठे बच्चों के लिए जिलाधिकारी का उनके बीच बैठना निश्चित रूप से सामान्य अनुभव नहीं था। प्रशासनिक पद की गरिमा अपनी जगह है, लेकिन बच्चों के सामने उस गरिमा को सहज संवाद में बदल देना उन्हें अधिक खुलकर बोलने का अवसर दे सकता है।

जब अधिकारी खुद सवाल पूछता है और बच्चों के जवाब सुनता है तो संवाद एकतरफा नहीं रहता। बच्चे भी अपनी बात रखने लगते हैं। यही संवाद आगे चलकर शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए उपयोगी फीडबैक बन सकता है।

डीएम का यह अंदाज इस संदेश को भी मजबूत करता है कि सरकारी विद्यालय केवल सरकारी भवन नहीं हैं। वे उन बच्चों के भविष्य से जुड़े संस्थान हैं जिनके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सामाजिक और आर्थिक अवसरों का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

असली परीक्षा अब सुधार के परिणामों की

मधुसूदन हुल्गी का बच्चों के बीच बैठना और उन्हें पढ़ाना निश्चित रूप से चर्चा का विषय बना है। लेकिन किसी भी प्रशासनिक पहल की असली सफलता उसके दीर्घकालिक परिणामों से तय होती है।

यदि ऐसे निरीक्षणों के बाद स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ती है, पठन-पाठन की गुणवत्ता सुधरती है, शिक्षकों की जवाबदेही मजबूत होती है और बच्चों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिलता है तो यह पहल वास्तव में प्रभावी मानी जाएगी।

औचक निरीक्षण का उद्देश्य केवल अधिकारी की मौजूदगी दर्ज कराना नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार लाना होना चाहिए। यदि कक्षा में बैठकर बच्चों की समस्या सुनने से प्रशासन को वास्तविक कमियां पता चलती हैं और उन कमियों को दूर करने की कार्रवाई होती है, तभी यह तरीका अपनी सार्थकता साबित करेगा।

देवरिया में अलग पहचान बना रहे हैं डीएम

देवरिया के जिलाधिकारी मधुसूदन हुल्गी का स्कूल में बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाना प्रशासनिक कामकाज की उस शैली की तस्वीर पेश करता है जिसमें अधिकारी कार्यालय की चारदीवारी से बाहर निकलकर सीधे लाभार्थियों तक पहुंचने का प्रयास करता है।

एक तरफ स्कूल की साफ-सफाई और व्यवस्थाओं की समीक्षा, दूसरी तरफ कम छात्र उपस्थिति पर ध्यान और फिर बच्चों के बीच बैठकर उनकी पढ़ाई को समझना—यह पूरा क्रम प्रशासनिक निरीक्षण को मानवीय स्वरूप देता है।

मधुसूदन हुल्गी की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि उनका प्रशासनिक सफर केवल एक जिले तक सीमित नहीं रहा। महोबा से शुरू होकर अयोध्या, सुल्तानपुर, वाराणसी, मुरादाबाद, कौशांबी और शासन स्तर की जिम्मेदारियों तक पहुंचने के बाद अब देवरिया में वह जिलाधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं।

बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाने की उनकी तस्वीर इसी व्यापक प्रशासनिक यात्रा का एक सहज और मानवीय पक्ष सामने लाती है।

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Author: यायावर

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