विनीता साहू की रिपोर्ट
तिरुवनंतपुरम। वरिष्ठ पत्रकार और द वायर की संपादक सीमा चिश्ती ने कहा है कि मौजूदा समय में स्वतंत्र और छोटे मीडिया संस्थानों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा कि जब बड़े मीडिया संस्थान समाज की छोटी और हाशिये पर मौजूद आवाज़ों को सुनने के लिए तैयार नहीं होते, तब स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र में संवाद और सूचनाओं के प्रवाह को बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बनता है।
तिरुवनंतपुरम प्रेस क्लब में आयोजित 25वें एन. नरेंद्रन स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए सीमा चिश्ती ने भारतीय मीडिया के मौजूदा परिदृश्य, पत्रकारिता की चुनौतियों और स्वतंत्र मीडिया की जिम्मेदारियों पर विस्तार से चर्चा की। इस वर्ष व्याख्यान का विषय ‘जंतर-मंतर से परे मीडिया’ था। कार्यक्रम का आयोजन पत्रकार एन. नरेंद्रन के मित्रों की ओर से किया गया था।
सीमा चिश्ती ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र के स्वस्थ संचालन के लिए नागरिकों तक विश्वसनीय और उपयोगी सूचना पहुंचना बेहद जरूरी है। ऐसे समय में जब सूचना की मात्रा लगातार बढ़ रही है, सही और अच्छी जानकारी को सुरक्षित रखना पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
छोटी आवाज़ों को सुनना लोकतंत्र की जरूरत
सीमा चिश्ती ने कहा कि मीडिया की ताकत केवल बड़े संस्थानों, बड़े संसाधनों या बड़े दर्शक वर्ग में नहीं होती। लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन आवाज़ों का सामने आना भी उतना ही आवश्यक है, जिनकी पहुंच मुख्यधारा के मीडिया तक सीमित है।
उन्होंने स्वतंत्र मीडिया संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि अलग-अलग छोटे और स्वतंत्र मीडिया संस्थान यदि एक-दूसरे से जुड़कर काम करें, संसाधन साझा करें और संयुक्त जांच-पड़ताल को बढ़ावा दें तो पत्रकारिता की प्रभावशीलता बढ़ाई जा सकती है।
उन्होंने स्वतंत्र मीडिया के संदर्भ में ‘छोटा होना ही बेहतर है’ जैसी धारणा सामने रखते हुए कहा कि छोटे संस्थानों के पास कई बार उन मुद्दों पर काम करने की अधिक स्वतंत्रता होती है, जिन्हें बड़े मीडिया संस्थान प्राथमिकता नहीं देते।
उनके अनुसार पत्रकारिता का उद्देश्य केवल बड़ी खबरों को प्रकाशित करना नहीं है, बल्कि समाज के उन हिस्सों की वास्तविकताओं को सामने लाना भी है, जो अक्सर समाचारों के केंद्र में नहीं आ पाते।
अच्छी जानकारी को बचाना सबसे बड़ी चुनौती
सीमा चिश्ती ने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने केवल खबर जुटाने और प्रकाशित करने की चुनौती नहीं है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के विस्तार के साथ सूचनाओं की बाढ़ आ गई है। ऐसे वातावरण में तथ्यात्मक, विश्वसनीय और संदर्भपूर्ण जानकारी को सुरक्षित रखना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के लिए ‘अच्छी जानकारी’ का उपलब्ध रहना बेहद जरूरी है। यदि नागरिकों तक तथ्य आधारित सूचनाएं नहीं पहुंचेंगी तो लोकतांत्रिक निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने पत्रकारों को यह भी याद दिलाया कि किसी खबर का महत्व केवल उसके तत्काल प्रभाव से तय नहीं होता। कई बार ऐसी खबरें, दस्तावेज और रिपोर्ट लंबे समय बाद किसी महत्वपूर्ण घटना को समझने में मदद करते हैं। इसलिए पत्रकारिता के पुराने रिकॉर्ड और महत्वपूर्ण खबरों का सुरक्षित रहना भी लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक है।
‘एरर 404 पत्रकारिता’ पर चिंता
व्याख्यान के दौरान सीमा चिश्ती ने डिजिटल युग में पत्रकारिता से जुड़ी एक गंभीर समस्या की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने ‘एरर 404 पत्रकारिता’ का उल्लेख करते हुए कहा कि पुरानी और महत्वपूर्ण खबरों का ऑनलाइन उपलब्ध न रहना पत्रकारिता के इतिहास और सार्वजनिक स्मृति के लिए नुकसानदायक है।
‘एरर 404’ आम तौर पर उस स्थिति को कहा जाता है जब इंटरनेट पर किसी वेबपेज को खोजने पर वह उपलब्ध नहीं मिलता। सीमा चिश्ती ने इस शब्द का इस्तेमाल उन महत्वपूर्ण पत्रकारिता सामग्री के संदर्भ में किया, जो समय के साथ वेबसाइटों से गायब हो जाती हैं या जिन्हें ऑनलाइन रिकॉर्ड से हटा दिया जाता है।
उन्होंने संकेत दिया कि पत्रकारिता की पुरानी सामग्री केवल अतीत का रिकॉर्ड नहीं होती, बल्कि वर्तमान घटनाओं और सामाजिक बदलावों को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए समाचार संस्थानों और पत्रकारों को अपने डिजिटल अभिलेखों के संरक्षण पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।
2014 के बाद मीडिया परिदृश्य में बदलाव का जिक्र
सीमा चिश्ती ने वर्ष 2014 के बाद भारतीय मीडिया के विकास और बदलावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस अवधि में बड़े मीडिया संस्थानों का प्रभाव और विस्तार बढ़ा, लेकिन इसके साथ ही पत्रकारिता के सामने दुष्प्रचार और सूचना की विश्वसनीयता से जुड़ी चुनौतियां भी बढ़ीं।
उन्होंने पत्रकारों को केवल संस्थागत सीमाओं में बंधकर काम करने के बजाय नई परिस्थितियों को समझने और उनके अनुरूप पत्रकारिता के नए तरीके विकसित करने की जरूरत बताई।
उनका जोर इस बात पर था कि पत्रकारिता तकनीकी बदलावों से अलग नहीं रह सकती। डिजिटल प्लेटफॉर्म, नए संचार माध्यम और तकनीकी नवाचार पत्रकारिता के काम करने के तरीके को लगातार बदल रहे हैं। इन तकनीकों का उपयोग लोकतांत्रिक संवाद और तथ्यपरक पत्रकारिता को मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए।
स्वतंत्र मीडिया के बीच सहयोग पर जोर
सीमा चिश्ती ने स्वतंत्र और विभाजित मीडिया संस्थानों से आपसी सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि छोटे संस्थानों के पास संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन सामूहिक प्रयास के जरिए वे बड़ी और जटिल पत्रकारिता परियोजनाओं पर काम कर सकते हैं।
उन्होंने संयुक्त जांच और सहयोगात्मक पत्रकारिता को भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया। एक संस्थान के पास किसी खबर के लिए दस्तावेज हो सकते हैं, दूसरे के पास स्थानीय स्रोत और तीसरे के पास तकनीकी क्षमता। इन क्षमताओं को एक साथ लाकर ऐसी पत्रकारिता की जा सकती है, जिसका प्रभाव अकेले काम करने वाले छोटे संस्थान के मुकाबले कहीं अधिक हो।
उनके इस विचार का केंद्र यही था कि स्वतंत्र पत्रकारिता को प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग की संस्कृति विकसित करनी चाहिए।
पत्रकारिता में तकनीक की भूमिका
सीमा चिश्ती ने पत्रकारों से तकनीकी बदलावों को समझने और उनका रचनात्मक इस्तेमाल करने की अपील की। उनका कहना था कि तकनीक केवल सूचना के प्रसार का माध्यम नहीं है, बल्कि खोजी पत्रकारिता, डेटा के विश्लेषण, दस्तावेजों के संरक्षण और पाठकों तक सामग्री पहुंचाने के नए अवसर भी प्रदान करती है।
आज डिजिटल माध्यमों ने पत्रकारिता को पारंपरिक अखबार, रेडियो और टेलीविजन की सीमाओं से आगे बढ़ा दिया है। लेकिन इसके साथ गलत सूचना, भ्रामक सामग्री और सूचना की अधिकता जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं। ऐसे माहौल में पत्रकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे तथ्यों की जांच करें और पाठकों को विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराएं।
सीमा चिश्ती ने पत्रकारों को बदलाव लाने वाली तकनीकी क्षमताओं का सामूहिक रूप से इस्तेमाल करने का संदेश दिया।
एन. नरेंद्रन स्मृति व्याख्यान की 25वीं वर्षगांठ
तिरुवनंतपुरम प्रेस क्लब में आयोजित यह कार्यक्रम एन. नरेंद्रन स्मृति व्याख्यान श्रृंखला की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया गया। इस मौके पर मीडिया से जुड़े विभिन्न विषयों पर सेमिनार और संवाद भी आयोजित किए गए।
एन. नरेंद्रन स्मृति व्याख्यान पत्रकारिता से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा के लिए एक मंच के रूप में आयोजित किया जाता रहा है। इसकी 25वीं वर्षगांठ का आयोजन इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण रहा कि कार्यक्रम में मीडिया के वर्तमान स्वरूप, स्वतंत्र पत्रकारिता और तकनीकी बदलाव जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।
वरिष्ठ पत्रकार एन. माधवन कुट्टी ने व्याख्यान सत्र का संचालन किया। कार्यक्रम में पत्रकारिता से जुड़े लोगों और मीडिया क्षेत्र में रुचि रखने वाले प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
तीन दशक से अधिक का पत्रकारिता अनुभव
सीमा चिश्ती का पत्रकारिता करियर तीन दशक से अधिक समय में विभिन्न माध्यमों तक फैला हुआ है। उन्होंने वर्ष 1990 से मल्टीमीडिया पत्रकार के रूप में काम किया है और अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों भाषाओं में प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन पत्रकारिता का अनुभव हासिल किया है।
वर्ष 1994 से 1996 के बीच उन्होंने लंदन स्थित बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के साथ काम किया। इसके बाद वर्ष 1996 से 2006 तक वे बीबीसी इंडिया में दिल्ली की संपादक रहीं। इससे पहले उन्होंने एचटीवी में 1990 से 1993 तक टेलीविजन पत्रकारिता के क्षेत्र में काम किया।
उनका पत्रकारिता अनुभव केवल किसी एक माध्यम तक सीमित नहीं रहा। प्रिंट, रेडियो, टेलीविजन और डिजिटल मीडिया के बदलते स्वरूप को करीब से देखने के कारण भारतीय पत्रकारिता के विकास पर उनकी समझ व्यापक मानी जाती है।
द इंडियन एक्सप्रेस में लंबा संपादकीय अनुभव
सीमा चिश्ती वर्ष 2006 से 2020 तक द इंडियन एक्सप्रेस में वरिष्ठ संपादक रहीं। इस दौरान उन्होंने भारतीय समाज और राजनीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण किया।
उनकी पत्रकारिता में अल्पसंख्यक समुदायों के हाशिये पर जाने, सांस्कृतिक बदलाव, युवाओं से जुड़े प्रश्न और भारत के प्रमुख राजनीतिक घटनाक्रम प्रमुख विषय रहे हैं। उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, भारतीय न्याय व्यवस्था, चुनावी राजनीति तथा तकनीक और राजनीति के बीच बदलते संबंधों पर भी महत्वपूर्ण रिपोर्ट और विश्लेषण प्रकाशित किए।
राज्य की निगरानी और नागरिकों से जुड़े तकनीकी एवं राजनीतिक सवाल भी उनके पत्रकारिता कार्य के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं।
भारत की विविधता को समझने की पत्रकारिता
सीमा चिश्ती की पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को समझने का प्रयास रहा है। भारत में अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और सामाजिक समूहों की परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
ऐसे में किसी बड़े राजनीतिक या सामाजिक बदलाव को समझने के लिए केवल राजधानी या बड़े शहरों की तस्वीर पर्याप्त नहीं होती। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों की आवाज़ों को सुनना भी जरूरी है। उनकी पत्रकारिता इसी व्यापक दृष्टिकोण को सामने लाने का प्रयास करती रही है।
उनके अनुसार पत्रकारिता का काम केवल घटना का विवरण देना नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझना और पाठकों तक उसका संदर्भ पहुंचाना भी है।
पुस्तक के जरिए स्वतंत्र भारत की कहानी
सीमा चिश्ती ने हाल में ‘नोट बाय नोट: द इंडिया स्टोरी (1947-2017)’ नामक पुस्तक का सह-लेखन भी किया है। यह पुस्तक स्वतंत्र भारत के इतिहास को वर्ष 1947 से 2017 तक के सफर के रूप में प्रस्तुत करती है।
इस पुस्तक की विशेषता यह है कि स्वतंत्र भारत की राजनीतिक और सामाजिक यात्रा को प्रत्येक वर्ष के हिंदी फिल्म संगीत के साथ जोड़कर समझाने का प्रयास किया गया है। इससे इतिहास को केवल घटनाओं और तारीखों के माध्यम से देखने के बजाय उस दौर के सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण से जोड़कर समझने का अवसर मिलता है।
स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए नई राह की जरूरत
तिरुवनंतपुरम में दिए गए अपने व्याख्यान में सीमा चिश्ती ने जिस मुद्दे पर सबसे अधिक जोर दिया, वह स्वतंत्र पत्रकारिता की भूमिका और उसका भविष्य है। उनका संदेश यह था कि मीडिया की विश्वसनीयता केवल बड़े संस्थानों के माध्यम से नहीं बचाई जा सकती।
जब बड़ी संस्थागत व्यवस्थाएं समाज की कुछ आवाज़ों को पर्याप्त जगह नहीं देतीं, तब छोटे मीडिया संस्थानों और स्वतंत्र पत्रकारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन इसके लिए उन्हें अकेले संघर्ष करने के बजाय एक-दूसरे के साथ सहयोग करना होगा।
संयुक्त जांच, संसाधनों का साझा इस्तेमाल, तकनीकी नवाचार और डिजिटल अभिलेखों का संरक्षण स्वतंत्र पत्रकारिता को मजबूत करने के महत्वपूर्ण रास्ते हो सकते हैं।
लोकतंत्र के लिए विश्वसनीय सूचना जरूरी
सीमा चिश्ती के संबोधन का व्यापक संदेश यही रहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव और राजनीतिक संस्थाओं से नहीं चलता। लोकतंत्र के लिए जागरूक नागरिक और विश्वसनीय सूचना का उपलब्ध होना भी उतना ही आवश्यक है।
यदि नागरिकों को तथ्यपरक और स्वतंत्र जानकारी उपलब्ध नहीं होगी तो वे सार्वजनिक मुद्दों पर सही निर्णय लेने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। इसलिए पत्रकारिता की जिम्मेदारी केवल खबर प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है। तथ्य की जांच, संदर्भ की व्याख्या, रिकॉर्ड का संरक्षण और हाशिये की आवाज़ों को मंच देना भी पत्रकारिता के मूल दायित्वों में शामिल है।
25वें एन. नरेंद्रन स्मृति व्याख्यान में सीमा चिश्ती ने इसी व्यापक जिम्मेदारी की ओर ध्यान दिलाते हुए स्वतंत्र मीडिया के लिए सहयोग, तकनीक और विश्वसनीय सूचना को भविष्य की पत्रकारिता के महत्वपूर्ण आधार के रूप में रेखांकित किया।

























