संपादकीय

तीजन बाई : एक आवाज़ जिसने पंडवानी को अमर कर दिया

संपादक अनिल अनूप

भारत की लोक परंपराओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी पुस्तकालय, विश्वविद्यालय या संग्रहालय में जन्म नहीं लेतीं, बल्कि खेतों, खलिहानों, चौपालों, मेलों और गांवों की धूल में आकार लेती हैं। इन्हीं लोक परंपराओं से समय-समय पर ऐसे असाधारण कलाकार निकलते हैं, जो अपने अद्वितीय व्यक्तित्व और साधना से किसी लोककला को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित कर देते हैं। पंडवानी की महान साधिका तीजन बाई ऐसी ही विरल प्रतिभा थीं। उनके निधन के साथ केवल एक प्रसिद्ध लोकगायिका का जीवन समाप्त नहीं हुआ, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति का एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय भी इतिहास बन गया जिसने महाभारत की कथा को लोकजीवन की धड़कनों से जोड़कर पूरी दुनिया तक पहुंचाया।

तीजन बाई का जाना केवल छत्तीसगढ़ की क्षति नहीं है। यह भारतीय लोकसंस्कृति, लोकनाट्य और मौखिक परंपराओं के लिए भी गहरा आघात है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि कला की महानता उसके साधनों में नहीं, बल्कि साधक की आत्मा में होती है। जिस कलाकार ने अपना अधिकांश जीवन गांवों की मिट्टी में बिताया, वही आगे चलकर पेरिस, लंदन, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और दुनिया के अनेक देशों में भारत की सांस्कृतिक पहचान बन गई।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के छोटे से गांव अटारी में जन्मी तीजन बाई का बचपन अभावों से भरा था। परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर था। खेतों में मजदूरी करना, जंगल से पत्ते लाना, चटाइयां और झाड़ू बनाना, घर चलाने के लिए छोटे-मोटे काम करना—यही उनका बचपन था। लेकिन इसी कठिन जीवन के बीच लोकसंगीत उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन गया। परिवार में गीत-संगीत का वातावरण था और महाभारत की कथाएं सुनते-सुनते उनका मन पंडवानी में रमने लगा।

उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, लेकिन स्मरण शक्ति, लोकबुद्धि और अभ्यास के बल पर उन्होंने महाभारत के असंख्य प्रसंग कंठस्थ कर लिए। जिस कलाकार ने विद्यालय की पढ़ाई नहीं की, उसी ने आगे चलकर विश्वविद्यालयों से मानद डी.लिट. की उपाधियां प्राप्त कीं। यह उपलब्धि बताती है कि ज्ञान केवल पुस्तकों का मोहताज नहीं होता।

तीजन बाई का जीवन संघर्षों की लंबी यात्रा था। कम उम्र में विवाह, पारिवारिक कलह, सामाजिक उपेक्षा और आर्थिक संकट उनके जीवन का हिस्सा रहे। उस दौर में महिलाओं का मंच पर खड़े होकर पंडवानी गाना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जाता था। महिलाओं को बैठकर वेदमती शैली में प्रस्तुति देने की अनुमति थी, जबकि खड़े होकर अभिनयप्रधान कपालिक शैली को पुरुषों का क्षेत्र समझा जाता था। लेकिन तीजन बाई ने इस परंपरा को चुनौती दी। उन्होंने न केवल खड़े होकर पंडवानी गाई, बल्कि अपने अभिनय, स्वर और अभिव्यक्ति से इस शैली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया।

यही वह साहस था जिसने उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाया। उन्होंने किसी आंदोलन का नारा नहीं दिया, लेकिन अपने कर्म से साबित कर दिया कि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता। उन्होंने मंच पर महिला कलाकार की भूमिका की नई परिभाषा लिखी। आज जब महिलाओं की समान भागीदारी की बात होती है, तब तीजन बाई का जीवन एक प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आता है।

उनकी प्रस्तुति केवल गायन नहीं होती थी। वह अभिनय, कथा-वाचन, संगीत और भावाभिव्यक्ति का अद्भुत संगम होती थी। उनके हाथ में पकड़ा साधारण तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी दुर्योधन का अभिमान और कभी कृष्ण की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक। मंच पर वे अकेली होती थीं, लेकिन दर्शकों को लगता था कि पूरा महाभारत उनके सामने जीवित हो उठा है।

यही उनकी सबसे बड़ी कलात्मक शक्ति थी। उन्होंने महाभारत को केवल सुनाया नहीं, बल्कि उसे जीकर दिखाया। उनके स्वर में द्रौपदी का अपमान भी था, भीम का क्रोध भी, अर्जुन की दुविधा भी और कृष्ण की करुणा भी। उनके चेहरे के भाव, हाथों की मुद्राएं और आवाज़ का उतार-चढ़ाव दर्शकों को कथा के भीतर ले जाता था। यही कारण है कि भाषा न समझने वाले विदेशी दर्शक भी उनकी प्रस्तुति से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते थे।

लोककलाओं के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती बाज़ारवाद और बदलती सांस्कृतिक प्राथमिकताएं हैं। नई पीढ़ी तेजी से डिजिटल मनोरंजन की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में तीजन बाई जैसी कलाकारों का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोककला कभी पुरानी नहीं होती, यदि उसे जीवंत तरीके से प्रस्तुत किया जाए। उन्होंने पंडवानी को संग्रहालय की वस्तु बनने से बचाया और उसे समकालीन सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बनाए रखा।

उनकी सफलता का सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्होंने अपनी जड़ों से कभी समझौता नहीं किया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान मिलने के बाद भी उनका रहन-सहन ग्रामीण ही बना रहा। वे सरल भाषा बोलती थीं, साधारण जीवन जीती थीं और अपनी सफलता का श्रेय हमेशा लोक परंपरा को देती थीं। प्रसिद्धि उनके व्यक्तित्व पर कभी हावी नहीं हुई।

उनके जीवन का एक प्रसंग आज भी प्रेरित करता है। जब उनसे पूछा गया कि विश्वभर में प्रसिद्ध होने के बाद भी उन्होंने भिलाई इस्पात संयंत्र में साधारण कर्मचारी के रूप में काम करना क्यों स्वीकार किया, तब उनका उत्तर था कि मिठाइयों के बीच भी उन्हें जली हुई रोटी की याद रहती है। इस एक वाक्य में उनकी पूरी जीवन-दृष्टि समाहित थी। उन्होंने कभी अपनी गरीबी नहीं भूली। शायद यही कारण था कि प्रसिद्धि ने उनके भीतर अहंकार को जन्म नहीं दिया।

तीजन बाई ने भारतीय लोककलाओं को वैश्विक पहचान दिलाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड सहित अनेक देशों में पंडवानी प्रस्तुत की। विदेशों के दर्शकों ने भले ही छत्तीसगढ़ी भाषा न समझी हो, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति इतनी प्रभावशाली थी कि भाव सीधे हृदय तक पहुंचते थे। यही सच्ची कला की पहचान होती है।

भारत सरकार ने उनकी साधना का सम्मान करते हुए उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान उन्हें मिले। विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियों से सम्मानित किया। लेकिन इन पुरस्कारों से कहीं अधिक बड़ा सम्मान वह प्रेम था जो आम लोगों ने उन्हें दिया। गांवों की चौपालों से लेकर अंतरराष्ट्रीय सभागारों तक उन्हें जिस आत्मीयता से सुना गया, वही उनकी वास्तविक उपलब्धि थी।

उनके जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश यह है कि विपरीत परिस्थितियां प्रतिभा को रोक नहीं सकतीं। वैवाहिक संघर्ष, आर्थिक संकट, सामाजिक विरोध और पारिवारिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने अपनी कला का साथ नहीं छोड़ा। कई बार उन्हें अपने जीवन में कठिन निर्णय लेने पड़े, लेकिन उन्होंने पंडवानी को कभी नहीं छोड़ा। यदि उस समय वे परिस्थितियों के आगे झुक जातीं, तो संभव है कि दुनिया आज तीजन बाई को कभी जान ही नहीं पाती।

जीवन के अंतिम वर्षों में बीमारी ने उन्हें कमजोर कर दिया। लकवे ने उनकी आवाज़ और शरीर दोनों को प्रभावित किया। जिन होंठों से कभी महाभारत गूंजता था, वहां धीरे-धीरे मौन उतर आया। जिन हाथों में तंबूरा जीवित पात्रों की तरह बोलता था, वे हाथ निस्तेज हो गए। बेटे की असमय मृत्यु और लगातार बिगड़ते स्वास्थ्य ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। फिर भी लोगों की स्मृतियों में उनकी छवि हमेशा उसी ऊर्जावान कलाकार की रहेगी जो मंच पर उतरते ही वातावरण बदल देती थी।

यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में अनेक लोककलाकारों को जीवन के अंतिम वर्षों में आर्थिक और चिकित्सकीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। तीजन बाई के जीवन में भी कुछ समय तक पेंशन जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर समस्याएं सामने आईं। यह घटना केवल एक कलाकार की नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक नीतियों की भी परीक्षा है। जिन कलाकारों ने देश की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा बढ़ाई, उनके सम्मानजनक जीवन और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी समाज और सरकार दोनों की होनी चाहिए।

आज आवश्यकता केवल तीजन बाई को श्रद्धांजलि देने की नहीं, बल्कि उनकी विरासत को संरक्षित करने की भी है। पंडवानी जैसी लोककलाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भारतीय लोककलाओं को अधिक स्थान मिले। युवा कलाकारों को छात्रवृत्ति और मंच उपलब्ध कराए जाएं। उनकी प्रस्तुतियों का व्यवस्थित डिजिटल अभिलेखन किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां इस अमूल्य धरोहर से जुड़ सकें।

तीजन बाई ने हमें यह भी सिखाया कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं होती, बल्कि समाज की स्मृति होती है। उसमें इतिहास भी होता है, संस्कृति भी, दर्शन भी और मानवीय संवेदनाएं भी। जब कोई लोककला कमजोर पड़ती है तो केवल एक कला नहीं मरती, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति का एक हिस्सा भी खो जाता है।

उनका जीवन भारतीय महिलाओं के संघर्ष, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का भी जीवंत उदाहरण है। उन्होंने किसी मंच से महिला अधिकारों का भाषण नहीं दिया, लेकिन अपने जीवन से यह साबित कर दिया कि यदि प्रतिभा और संकल्प मजबूत हो तो समाज की पुरानी दीवारें भी टूट जाती हैं। उन्होंने परंपरा का सम्मान किया, लेकिन जड़ता को स्वीकार नहीं किया।

आज जब हम तीजन बाई को अंतिम विदाई दे रहे हैं, तब उनके तंबूरे की ध्वनि भले ही मौन हो गई हो, लेकिन उनकी कला कभी मौन नहीं होगी। वह हर उस कलाकार की आवाज़ में जीवित रहेगी जो लोक परंपरा को आगे बढ़ाएगा। वह हर उस युवा के सपने में जीवित रहेगी जो छोटे गांव से निकलकर दुनिया के मंच पर पहुंचने का साहस करेगा।

तीजन बाई का निधन एक युग का अवसान अवश्य है, लेकिन उनकी विरासत अमर रहेगी। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि मिट्टी से उठी आवाज़ यदि सच्ची हो तो वह सीमाओं, भाषाओं और देशों की दीवारें पार कर पूरी मानवता की धरोहर बन जाती है। भारतीय लोकसंस्कृति जब भी अपने सबसे उज्ज्वल नक्षत्रों का स्मरण करेगी, तीजन बाई का नाम उनमें सदैव अग्रणी रहेगा। उनका जीवन हमें यह विश्वास दिलाता है कि कला की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्मा में होती है, और जिसकी आत्मा लोक से जुड़ी हो, उसे समय कभी पराजित नहीं कर सकता।

One Comment

  1. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

    अनूप जी,
    इस लेख को पढ़कर मुझे पंजाबी गायक हंसराज हंस के बारे में सुनी हुई एक बात याद आ गई। हंसराज हंस की गायन शैली में इतना आकर्षण है कि एक बार एक विदेशी महिला ने कहा था कि बेशक उसे पंजाबी की समझ नहीं लेकिन expression यानि चेहरे और देह की भाषा का आकर्षण मोहित कर लेता है।

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