लखनऊ

मुर्गी फार्मों की बेलगाम गाड़ियां बन रही हैं ग्रामीणों के लिए खतरा? किसान की मौत के बाद उठे बड़े सवाल

पेड़ की छांव में बैठे किसान को ट्राले ने कुचला, ग्रामीणों ने भारी वाहनों की आवाजाही पर उठाए सवाल

कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

लखनऊ। राजधानी लखनऊ के बंथरा थाना क्षेत्र के खसरवारा गांव में सोमवार को हुई एक दर्दनाक दुर्घटना ने ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित मुर्गी फार्मों और उनसे जुड़े भारी वाहनों की आवाजाही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गांव के लोगों का आरोप है कि पोल्ट्री फार्मों में दाना और अन्य सामग्री लेकर आने-जाने वाले ट्रक, ट्राले और भारी वाहन लंबे समय से संकरी ग्रामीण सड़कों पर तेज रफ्तार से दौड़ रहे हैं, जिससे आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। अब एक किसान की मौत के बाद ग्रामीणों का आक्रोश खुलकर सामने आ गया है।

जानकारी के अनुसार खसरवारा निवासी संतराम रावत खेत से लौटने के बाद घर के पास एक पेड़ की छांव में बैठकर आराम कर रहे थे। इसी दौरान पोल्ट्री फार्म की ओर जा रहा एक ट्राला अनियंत्रित होकर उनकी ओर बढ़ गया और उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि संतराम रावत की मौके पर ही मौत हो गई।

घटना की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंच गए। स्थानीय लोगों के अनुसार हादसे के बाद चालक मौके से फरार हो गया। ग्रामीणों ने दुर्घटना में शामिल वाहन को रोक लिया और पुलिस को सूचना दी। बाद में बंथरा थाना पुलिस मौके पर पहुंची तथा वाहन को कब्जे में लेकर थाने ले गई। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजकर मामले की जांच शुरू कर दी है।

ग्रामीणों का आरोप, वर्षों से बनी हुई है समस्या

ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। उनके अनुसार गांव के भीतर और आसपास स्थित पोल्ट्री फार्मों तक पहुंचने वाले भारी वाहन रोजाना संकरी गलियों और ग्रामीण संपर्क मार्गों से गुजरते हैं। कई बार वाहन तेज गति से चलते हैं, जिससे बच्चों, बुजुर्गों और किसानों के लिए सड़क पर निकलना जोखिम भरा हो जाता है।

स्थानीय निवासियों का आरोप है कि पिछले कई वर्षों से भारी वाहनों की अनियंत्रित आवाजाही को लेकर शिकायतें की जाती रही हैं, लेकिन स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ। लोगों का कहना है कि गांव की सड़कें मूल रूप से ग्रामीण आवागमन के लिए बनी थीं, लेकिन अब इन पर बड़े ट्राले और ट्रक लगातार दौड़ रहे हैं।

खेत, स्कूल और घरों के बीच दौड़ रहे ट्राले

ग्रामीणों का कहना है कि जिन रास्तों से बच्चे स्कूल जाते हैं, किसान खेतों तक पहुंचते हैं और महिलाएं दैनिक कार्यों के लिए निकलती हैं, उन्हीं मार्गों पर भारी वाहन भी लगातार चल रहे हैं। इससे हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है।

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि कई बार छोटे-मोटे हादसे हो चुके हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में बात आगे नहीं बढ़ पाती। उनका मानना है कि यदि समय रहते सुरक्षा उपाय किए गए होते तो शायद संतराम रावत की जान बचाई जा सकती थी।

परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

संतराम रावत के परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पहले से ही कठिन बताई जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार उनकी पत्नी का पहले ही निधन हो चुका था। परिवार में पहले एक पुत्र की भी मृत्यु हो चुकी है, जबकि बेटी की शादी हो चुकी है। अब परिवार में एक छोटा बेटा ही बचा है।

ग्रामीणों का कहना है कि परिवार लगातार कठिन परिस्थितियों का सामना करता रहा है और अब घर के मुखिया की मौत ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। लोगों ने प्रशासन से मृतक परिवार को आर्थिक सहायता प्रदान करने की मांग की है।

सुरक्षा व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल

घटना के बाद ग्रामीणों ने क्षेत्र में यातायात सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि गांव के भीतर भारी वाहनों के लिए गति सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। साथ ही ऐसे मार्गों पर चेतावनी बोर्ड, स्पीड ब्रेकर और नियमित निगरानी की व्यवस्था भी आवश्यक है।

ग्रामीणों का मानना है कि यदि भारी वाहनों की आवाजाही पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में भी ऐसे हादसे दोहराए जा सकते हैं।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

सड़क सुरक्षा से जुड़े जानकारों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों के साथ यातायात प्रबंधन को भी समान रूप से मजबूत करना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार ग्रामीण आबादी वाले क्षेत्रों में भारी वाहनों की आवाजाही के लिए अलग नियम और समय-सीमा तय की जानी चाहिए।

उनका कहना है कि वाहन चालकों के प्रशिक्षण, गति नियंत्रण और नियमित जांच के साथ-साथ संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू किए जाने चाहिए।

ग्रामीणों की प्रमुख मांगें

घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने कई मांगें रखी हैं। इनमें गांव के भीतर भारी वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण, गति सीमा लागू करना, दुर्घटना की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तथा मृतक परिवार को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना शामिल है।

जांच के बाद स्पष्ट होगी तस्वीर

फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। दुर्घटना के वास्तविक कारणों और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगा। हालांकि खसरवारा की यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ गई है। क्या ग्रामीण इलाकों में संचालित पोल्ट्री फार्मों और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े भारी वाहनों की आवाजाही पर्याप्त निगरानी में है? और क्या गांवों की सुरक्षा व्यवस्था मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप है?

संतराम रावत की मौत के बाद ग्रामीणों की मांग साफ है—विकास और कारोबार जरूरी हैं, लेकिन उससे पहले ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो ऐसे हादसे भविष्य में भी लोगों की जान लेते रहेंगे।

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