खास बात

पंचायत चुनाव में देरी के बीच योगी सरकार का बड़ा फैसला: यूपी के ग्राम प्रधान बने प्रशासक, लेकिन सीमित रहेंगे अधिकार

पंचायतों का कार्यकाल खत्म होते ही लागू हुई नई व्यवस्था

🖋️ चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के चुनाव में संभावित देरी के बीच योगी सरकार ने बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त कर दिया है। हालांकि सरकार ने साफ कर दिया है कि प्रशासक बने ग्राम प्रधान केवल सामान्य और रूटीन कार्य ही कर सकेंगे। उन्हें कोई नीतिगत या बड़े वित्तीय निर्णय लेने का अधिकार नहीं होगा।

राज्य सरकार के इस फैसले के बाद पूरे प्रदेश की ग्राम पंचायतों में नई प्रशासनिक व्यवस्था लागू हो गई है। पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त होने के बाद 27 मई से यह आदेश प्रभावी माना जा रहा है।

सरकार के आदेश में क्या कहा गया?

पंचायती राज विभाग द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि ग्राम पंचायतों के सामान्य निर्वाचन 2026 के बाद नई पंचायतों की प्रथम बैठक आयोजित होने तक अथवा अधिकतम छह माह की अवधि तक निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में नियुक्त किया जाएगा।

“दिनांक 27-05-2026 से निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ग्राम पंचायतों में प्रशासक के रूप में सामान्य (रूटीन) कार्यों के निर्वहन हेतु नामित किये जाने के लिए संबंधित जिलाधिकारियों को अधिकृत किया जाता है। प्रशासक कोई नीति विषयक निर्णय नहीं लेंगे।”

 

सरकार ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे अपने-अपने जिलों में तत्काल प्रभाव से इस व्यवस्था को लागू करें।

प्रशासक बनने के बाद क्या नहीं कर सकेंगे ग्राम प्रधान?

सरकार ने प्रशासक बने ग्राम प्रधानों के अधिकारों को सीमित कर दिया है। पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में जो अधिकार ग्राम प्रधानों को प्राप्त थे, वे अब पूर्ण रूप से लागू नहीं होंगे।

  • नई विकास योजनाओं को मंजूरी नहीं दे सकेंगे
  • बड़े निर्माण कार्यों का निर्णय नहीं ले सकेंगे
  • नई वित्तीय योजनाएं शुरू नहीं कर सकेंगे
  • पंचायत निधि से बड़े भुगतान संबंधी निर्णय नहीं कर पाएंगे
  • किसी दीर्घकालिक योजना या नीति को लागू नहीं कर पाएंगे

यानी पंचायत प्रशासन अब सीमित दायरे में ही कार्य करेगा।

किन कार्यों की मिलेगी अनुमति?

  • सफाई व्यवस्था
  • पेयजल आपूर्ति
  • स्ट्रीट लाइट रखरखाव
  • मनरेगा से जुड़े नियमित कार्य
  • जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र संबंधी प्रक्रियाएं
  • सार्वजनिक सुविधाओं का रखरखाव

इस व्यवस्था का उद्देश्य गांवों में प्रशासनिक शून्यता की स्थिति से बचना बताया जा रहा है।

विशेष परिस्थितियों में कैसे होगा फैसला?

सरकार ने आदेश में यह प्रावधान भी रखा है कि यदि कोई अत्यावश्यक स्थिति उत्पन्न होती है और नीतिगत निर्णय जरूरी हो जाता है, तो प्रशासक सीधे फैसला नहीं ले सकेंगे। ऐसी स्थिति में प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी को भेजा जाएगा। जिलाधिकारी की स्वीकृति के बाद ही कोई निर्णय लागू हो सकेगा।

सीएम योगी के निर्देश पर लागू हुई व्यवस्था

सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर यह व्यवस्था लागू की गई है। सरकार का मानना है कि पंचायत चुनाव होने तक गांवों में विकास और प्रशासनिक कार्य पूरी तरह बंद न हों, इसलिए यह अंतरिम व्यवस्था आवश्यक थी।

ग्रामीण विकास पर पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था से गांवों के दैनिक कामकाज तो चलते रहेंगे, लेकिन विकास की गति धीमी पड़ सकती है। क्योंकि बड़े फैसलों और नई योजनाओं पर रोक लगने से पंचायत स्तर पर विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

गांव-गांव में चर्चा का विषय बना आदेश

सरकार का यह फैसला ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। कई गांवों में लोग यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि अब विकास कार्यों की रफ्तार कैसी रहेगी और पंचायतों में फैसले किस स्तर पर लिए जाएंगे। फिलहाल इतना तय है कि पंचायत चुनाव होने तक ग्राम प्रधान अब ‘प्रधान’ नहीं बल्कि ‘प्रशासक’ की भूमिका में दिखाई देंगे।

FAQ : क्लिक करें और जानें

क्या ग्राम प्रधान अब भी विकास कार्य करा सकेंगे?

प्रशासक बने ग्राम प्रधान केवल सामान्य और रूटीन कार्य करा सकेंगे। बड़े विकास और नीतिगत फैसलों की अनुमति नहीं होगी।

यह व्यवस्था कितने समय तक लागू रहेगी?

नई ग्राम पंचायतों की पहली बैठक होने तक अथवा अधिकतम छह माह तक यह व्यवस्था लागू रहेगी।

क्या प्रशासक कोई नीतिगत फैसला ले सकेंगे?

नहीं। किसी भी नीतिगत निर्णय के लिए जिलाधिकारी की अनुमति आवश्यक होगी।

सरकार ने यह फैसला क्यों लिया?

पंचायत चुनाव में देरी और प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिए सरकार ने यह अंतरिम व्यवस्था लागू की है।

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