20 अक्टूबर 2026 7:12 अपराह्न

‘मेरी बेटी का क्या कसूर था?’ प्रिया हत्याकांड में चार दोषियों को उम्रकैद, मां का दर्द बरकरार

कानपुर के घाटमपुर में प्रिया हत्याकांड पर आधारित फीचर इमेज, जिसमें रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर, सांकेतिक पुलिस जांच का दृश्य और बेटी को खो चुकी मां का दर्द दर्शाया गया है।

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

प्रिया हत्याकांड | उत्तर प्रदेश क्राइम स्टोरी

कानपुर प्रिया हत्याकांड: किसी मां के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि जिस बच्ची को उसने अपनी आंखों के सामने बड़ा होते देखा, जिसकी हंसी से घर में रौनक रहती थी, उसी को वह एक दिन हमेशा के लिए खो दे। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के घाटमपुर क्षेत्र में सात वर्षीय प्रिया की हत्या ने एक परिवार की दुनिया उजाड़ दी। इस अपराध ने न केवल एक मां से उसकी बेटी छीन ली, बल्कि पड़ोसियों के बीच वर्षों से कायम विश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाई।

दिवाली के आसपास हुई इस वारदात की जांच में परिचित लोगों की भूमिका सामने आई। पुलिस की पड़ताल और अदालत में चले मुकदमे के बाद दिसंबर 2023 में विशेष पॉक्सो अदालत ने चार दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। मीडिया में प्रकाशित मामले के विवरण के अनुसार, इस अपराध के पीछे संतान प्राप्ति से जुड़ा अंधविश्वास भी एक अहम पहलू था। सवाल यह है कि किसी की इच्छा पूरी करने के नाम पर एक मासूम की जिंदगी छीन लेने की मानसिकता आखिर पैदा कैसे होती है?

दिवाली की खुशियों के बीच लापता हो गई प्रिया

नवंबर 2020 में दिवाली का त्योहार था। घरों में साफ-सफाई, पकवान और पूजा की तैयारियां चल रही थीं। बच्चे भी त्योहार की खुशियों में शामिल थे। इसी दौरान सात वर्षीय प्रिया अपने घर में थी। परिवार के परिचित युवक अंकुल का वहां आना-जाना था। वह प्रिया और उसके भाई-बहनों के साथ खेलता था, इसलिए उसके आने पर परिवार को कोई असामान्य बात महसूस नहीं हुई।

घटना के दिन अंकुल प्रिया के घर आया और उसके साथ खेलने लगा। कुछ समय बाद वह बच्ची को अपने साथ ले गया। मां को लगा कि वह उसे पड़ोस में किसी परिचित के घर ले गया होगा। त्योहार के घरेलू कामों में व्यस्त होने के कारण शुरुआत में परिवार को तत्काल किसी अनहोनी की आशंका नहीं हुई।

लेकिन शाम बीतने लगी और प्रिया घर नहीं लौटी। मां की चिंता बढ़ने लगी। उसने अपने बेटे को बच्ची को बुलाकर लाने के लिए कहा। आसपास के घरों में तलाश की गई, लोगों से पूछा गया, लेकिन प्रिया का कोई पता नहीं चला। परिवार ने अपने स्तर पर हर संभव जगह खोजा। जब बच्ची नहीं मिली तो पुलिस को सूचना दी गई।

रात बीतने के बाद अगली सुबह गांव के बाहर खेत में बच्ची का शव मिलने की खबर आई। कुछ महिलाएं सुबह के समय वहां से गुजर रही थीं, तभी उनकी नजर शव पर पड़ी। सूचना फैलते ही आसपास के लोग घटनास्थल पर पहुंचने लगे। प्रिया की मां के लिए यह खबर ऐसा सदमा थी, जिसने उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया।

परिचित चेहरा, जिस पर परिवार करता था भरोसा

प्रिया के परिवार और पड़ोस में रहने वाले दंपती के बीच लंबे समय से घरेलू संबंध थे। परिवार की मानें तो बच्चों की देखभाल और रोजमर्रा के कामों में एक-दूसरे की मदद की जाती थी। मां जब घर के कामों में व्यस्त होती, तब पड़ोस की महिला भी बच्चों की देखभाल में सहयोग करती थी। इसी वजह से दोनों परिवारों के बीच बहन जैसा अपनापन बन गया था।

मीडिया में प्रकाशित विवरण के अनुसार, अंकुल बचपन से अपने चाचा-चाची के साथ रह रहा था। उसके माता-पिता की दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के बाद उसका पालन-पोषण उसी घर में हुआ। प्रिया के परिवार से उसका परिचय पुराना था। वह बच्ची के साथ खेलता था और परिवार के घर भी आता-जाता था।

यही परिचय इस घटना को और अधिक पीड़ादायक बनाता है। परिवार को जिस व्यक्ति से खतरे की आशंका नहीं थी, उसी के साथ बच्ची चली गई। लेकिन इस घटना को केवल एक परिवार की त्रासदी मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। यह बच्चों की सुरक्षा, परिचितों पर भरोसे और अभिभावकीय सतर्कता के बीच संतुलन की जरूरत भी रेखांकित करती है।

किसी व्यक्ति से पुराना परिचय होना अपने आप में उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। साथ ही, किसी एक अपराध के कारण सभी पड़ोसियों और परिचितों को संदेह की नजर से देखना भी समाधान नहीं है। जरूरी यह है कि बच्चों के आने-जाने की जानकारी रखी जाए और उनकी सुरक्षा को लेकर परिवार में खुला संवाद बना रहे।

पुलिस की जांच में खुलती गई अपराध की परतें

प्रिया के लापता होने की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने परिजनों से पूछताछ की। जांच के दौरान यह जानना महत्वपूर्ण था कि बच्ची को आखिरी बार किसके साथ देखा गया था। परिवार ने अंकुल का नाम बताया। इसके बाद पुलिस ने उसकी तलाश और उससे जुड़े लोगों की भूमिका की जांच तेज कर दी।

बच्ची का शव मिलने के बाद मामला गंभीर आपराधिक जांच में बदल गया। पुलिस ने घटनाक्रम, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और आरोपियों से पूछताछ के आधार पर मामले की कड़ियां जोड़ने का प्रयास किया। प्रकाशित समाचारों के अनुसार, जांच में अंकुल और उसके साथी वीरन की भूमिका सामने आई। दोनों पर बच्ची के साथ यौन हिंसा और हत्या करने के आरोप सिद्ध हुए।

मामले से जुड़े विवरणों में बच्ची के शरीर के साथ की गई अत्यंत क्रूरता का उल्लेख मिलता है। हालांकि, अपराध की गंभीरता बताने के लिए वीभत्स घटनाओं का विस्तार से वर्णन आवश्यक नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि एक नाबालिग बच्ची यौन अपराध और हत्या की शिकार हुई तथा पुलिस की जांच में चार लोगों की भूमिका सामने आई।

जघन्य अपराधों की जांच में घटनास्थल से प्राप्त साक्ष्य, गवाहों के बयान, चिकित्सकीय रिपोर्ट और अन्य परिस्थितिजन्य प्रमाण अहम होते हैं। अदालत में अभियोजन पक्ष को इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर आरोप साबित करने होते हैं। इस मामले में भी न्यायिक प्रक्रिया के बाद दोषियों को सजा सुनाई गई।

संतान की चाह और अंधविश्वास का खतरनाक दावा

इस हत्याकांड की सबसे विचलित करने वाली कड़ियों में से एक कथित अंधविश्वास था। मामले के संबंध में प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, आरोपी दंपती की शादी को कई वर्ष हो चुके थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा में वे एक ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आए, जिसने कथित तौर पर एक अंधविश्वासी उपाय सुझाया।

रिपोर्टों में दावा किया गया कि उन्हें बताया गया था कि दिवाली की रात किसी बच्ची के आंतरिक अंग का सेवन करने से संतान प्राप्त हो सकती है। इसी अंधविश्वासी धारणा को अपराध की साजिश से जोड़कर देखा गया। जांच में सामने आए विवरणों के अनुसार, अंकुल ने बच्ची की हत्या की और उसके बाद उसके चाचा-चाची तक आंतरिक अंग पहुंचाए।

यह कथित विश्वास किसी वैज्ञानिक प्रमाण पर आधारित नहीं था। किसी भी व्यक्ति के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि वह संतान प्राप्ति, बीमारी से मुक्ति या किसी अन्य इच्छा की पूर्ति के नाम पर किसी निर्दोष को नुकसान पहुंचाए। अंधविश्वास के नाम पर हिंसा को आस्था की आड़ नहीं दी जा सकती।

संतान न होना कुछ लोगों के लिए गहरा भावनात्मक अनुभव हो सकता है। लेकिन इस स्थिति का समाधान किसी तांत्रिक के कथित चमत्कारी दावे में तलाशना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। जब कोई व्यक्ति किसी अनुष्ठान के नाम पर किसी बच्चे को नुकसान पहुंचाने की सलाह देता है, तो यह धार्मिक विश्वास का विषय नहीं, बल्कि कानून और मानवता से जुड़ा गंभीर खतरा है।

प्रिया हत्याकांड यह भी स्पष्ट करता है कि अपराध की जिम्मेदारी उन लोगों की होती है जो अपराध करने या उसमें सहयोग देने का निर्णय लेते हैं। किसी कथित तांत्रिक की सलाह, सामाजिक दबाव या निजी इच्छा अपराध को उचित नहीं बना सकती।

दिसंबर 2023 में विशेष पॉक्सो अदालत का फैसला

प्रिया हत्याकांड की सुनवाई के बाद दिसंबर 2023 में विशेष पॉक्सो अदालत ने चार दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। प्रकाशित समाचार रिपोर्टों में दोषियों के नाम अंकुल, वीरन, परशुराम और सुनैना बताए गए हैं। मामले में सजा सुनाए जाने के साथ जुर्माने का भी उल्लेख किया गया था।

इस फैसले का महत्व इसलिए भी है कि इसमें एक नाबालिग बच्ची के साथ हुए यौन अपराध और हत्या की गंभीरता को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से परखा गया। ऐसे मामलों में कानून का उद्देश्य केवल दोषियों को दंडित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि बच्चों के विरुद्ध अपराधों को किसी सामाजिक संबंध, परिचय या कथित धार्मिक विश्वास के आधार पर कमतर न माना जाए।

उम्रकैद की सजा अदालत द्वारा निर्धारित दंड है। इसे पीड़ित परिवार के नुकसान की भरपाई नहीं माना जा सकता। न्यायिक फैसला दोषियों को जवाबदेह बनाता है, लेकिन किसी मां को उसकी खोई हुई संतान वापस नहीं दे सकता।

प्रकाशन के लिए दोषियों के नाम, सजा की धाराओं और जुर्माने की सटीक राशि को अदालत के फैसले या आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलाना उचित होगा। इससे समाचार की तथ्यात्मक विश्वसनीयता बनी रहती है और पाठकों तक प्रमाणित जानकारी पहुंचती है।

‘मेरी बच्ची का क्या कसूर था?’ मां का दर्द आज भी कायम

प्रिया की मां के लिए यह घटना केवल एक आपराधिक मुकदमा नहीं, बल्कि जीवन भर साथ रहने वाला दुख है। बेटी की मौत ने उसके घर की खुशियां छीन लीं। मीडिया में प्रकाशित मां के बयान के अनुसार, घटना के बाद दिवाली का त्योहार उसके लिए खुशी के बजाय दर्द और भय की याद लेकर आने लगा।

जिस समय दूसरे परिवार त्योहार की तैयारियों में जुटते हैं, उस समय प्रिया की मां को अपनी बेटी की याद सताती है। एक समय घर-आंगन में खेलती बच्ची अब केवल स्मृतियों में रह गई है। मां के लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि जिस बेटी को उसने प्यार से पाला, उसे वह आखिरी बार भी सामान्य रूप से गले नहीं लगा सकी।

ऐसी त्रासदी में परिवार का दुख केवल शुरुआती दिनों तक सीमित नहीं रहता। मुकदमे की सुनवाई, तारीखें और फैसले कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन शोक का अपना अलग समय होता है। किसी प्रियजन को खोने का दर्द लंबे समय तक रह सकता है और त्योहार, स्थान या पुरानी यादें उसे फिर से जगा सकती हैं।

प्रिया की मां के सवाल में पूरे मामले की मानवीय त्रासदी समाई है—आखिर उसकी बच्ची का कसूर क्या था? किसी बच्चे का किसी परिवार में जन्म लेना, किसी के साथ खेलना या किसी परिचित पर भरोसा करना उसके विरुद्ध अपराध का कारण नहीं बन सकता। दोष हमेशा अपराध करने वालों का होता है, पीड़ित बच्चे का नहीं।

एक हत्या ने पड़ोस के रिश्तों और भरोसे को बदल दिया

प्रिया की मौत का प्रभाव उसके परिवार से बाहर भी महसूस किया गया। पहले बच्चों का एक-दूसरे के घर आना-जाना सामान्य बात थी। पड़ोसी एक-दूसरे के बच्चों की देखभाल कर लेते थे और परिवारों के बीच परिचय का रिश्ता था। इस घटना के बाद कई लोगों के मन में अपने बच्चों को दूसरों के घर भेजने को लेकर डर पैदा हो गया।

सामाजिक जीवन भरोसे पर चलता है, लेकिन भरोसे का अर्थ बिना सावधानी के हर परिस्थिति को स्वीकार करना नहीं है। बच्चों की सुरक्षा और पड़ोसियों के बीच सहयोग एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। परिवार स्पष्ट नियम बनाकर, बच्चों से खुलकर बात करके और उनके साथ होने वाली गतिविधियों की जानकारी रखकर दोनों को साथ लेकर चल सकते हैं।

इस मामले का सामाजिक संदेश यह भी है कि किसी अपराध के बाद पूरे समुदाय को स्थायी भय में छोड़ देना उचित नहीं। भय के बजाय जागरूकता, जवाबदेही और सुरक्षित व्यवहार को बढ़ावा देना चाहिए। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि वे किसी भी असहज अनुभव को बिना डरे अपने माता-पिता या किसी विश्वसनीय वयस्क से साझा कर सकें।

बच्चों की सुरक्षा और अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता जरूरी

प्रिया हत्याकांड से यह सीख मिलती है कि बच्चों की सुरक्षा परिवार, विद्यालय और समाज की साझा जिम्मेदारी है। बच्चों को उनकी उम्र के अनुरूप यह समझाना चाहिए कि बिना अभिभावक की अनुमति के किसी के साथ कहीं न जाएं, किसी असहज स्थिति में तुरंत सहायता मांगें और किसी भी डराने वाली बात को छिपाकर न रखें। यह शिक्षा भय पैदा करके नहीं, बल्कि संवाद और भरोसे के जरिए दी जानी चाहिए।

अभिभावकों को भी बच्चों के आने-जाने और उनकी देखभाल करने वाले लोगों के बारे में स्पष्ट जानकारी रखनी चाहिए। किसी परिचित व्यक्ति द्वारा बच्चे को अकेले ले जाने, गोपनीयता रखने के लिए कहने या अनुचित व्यवहार करने की स्थिति को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। आशंका होने पर पुलिस और बाल संरक्षण तंत्र से संपर्क करना जरूरी है।

अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। संतान प्राप्ति, बीमारी या किसी अन्य समस्या के समाधान के नाम पर चमत्कारी दावे करने वालों से सावधान रहना चाहिए। किसी कथित अनुष्ठान में हिंसा या नुकसान की सलाह दी जाए तो उसे तुरंत अस्वीकार कर संबंधित अधिकारियों को जानकारी देनी चाहिए।

समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, कानूनी जागरूकता और बच्चों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने की जरूरत है। किसी भी प्रकार की निजी इच्छा या कथित धार्मिक उपाय को मानव जीवन से बड़ा नहीं माना जा सकता।

दोषियों को सजा मिली, लेकिन मां के सवाल का दर्द बाकी

दिसंबर 2023 में अदालत द्वारा चार दोषियों को उम्रकैद सुनाए जाने के बाद कानूनी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव पूरा हुआ। लेकिन प्रिया की मां के लिए न्याय का यह परिणाम उस खालीपन को नहीं भर सकता, जो बेटी की मौत से पैदा हुआ। उसकी स्मृतियां, त्योहार से जुड़ा दुख और बेटी को खोने का दर्द आज भी इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू हैं।

प्रिया हत्याकांड केवल एक क्राइम स्टोरी नहीं है। यह उस खतरनाक मानसिकता की कहानी है जिसमें अंधविश्वास इंसान की विवेकशीलता पर हावी हो जाता है और एक मासूम की जिंदगी इसकी कीमत चुकाती है। यह परिचित संबंधों में बच्चों की सुरक्षा, अपराध की जवाबदेही और पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े करता है।

अदालत ने दोषियों को सजा सुनाई, लेकिन समाज के सामने जिम्मेदारी अब भी कायम है—अंधविश्वास के नाम पर हिंसा को रोकना, बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना और किसी भी अपराध के लिए पीड़ित को जिम्मेदार ठहराने वाली सोच का विरोध करना।

प्रिया की मां का सवाल आज भी दिल को झकझोरता है—‘मेरी बेटी का क्या कसूर था?’ इस सवाल का सबसे जरूरी जवाब यही है कि बच्ची का कोई कसूर नहीं था। अपराध का दोष उन्हीं पर है जिन्होंने उसे अंजाम दिया। समाज की जिम्मेदारी है कि ऐसी त्रासदी को केवल खबर बनाकर न छोड़ दे, बल्कि इससे सीख लेकर बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित वातावरण तैयार करे।

तथ्य संबंधी टिप्पणी: यह लेख उपलब्ध घटनाक्रम और प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। आरोपियों के नाम, सजा की धाराओं और अन्य न्यायिक विवरणों को प्रकाशित करने से पहले आधिकारिक फैसले से सत्यापित किया जाना चाहिए।

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