20 अक्टूबर 2026 10:08 पूर्वाह्न

वोट देगा जहीर, मौज करेगा अहीर… कैसे सपा के लिए संजीवनी बने मुसलमान, ओवैसी की एंट्री से डगमगा रहा अब्दुल!

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा के एमवाई समीकरण और मुस्लिम वोट बैंक पर ओवैसी की चुनौती दर्शाती फीचर इमेज, रिपोर्टर ठाकुर बख्श सिंह की तस्वीर के साथ।

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

The specified slider id does not exist.

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट
जनगणदूत.कॉम | उत्तर प्रदेश की सियासत

उत्तर प्रदेश की सियासत में एक पुराना सवाल फिर सिर उठाने लगा है—वोट किसी के नाम पर पड़ेगा और सत्ता की राजनीति में हिस्सेदारी किसकी होगी? समाजवादी पार्टी की ताकत माने जाने वाले मुस्लिम-यादव यानी एमवाई समीकरण के सामने अब प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और राजनीतिक लाभ का सवाल खड़ा हो रहा है। राजनीतिक गलियारों में गूंजता जुमला, ‘वोट देगा जहीर, मौज करेगा अहीर’, इसी बहस को धार देता है। इसका आशय मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन और सत्ता-संगठन में उनकी हिस्सेदारी के बीच कथित अंतर पर सवाल उठाना है। यह एक राजनीतिक तंज है, न कि किसी पूरे समुदाय के व्यवहार का प्रमाण।

समाजवादी पार्टी लंबे समय से मुस्लिम और यादव मतदाताओं के समर्थन को अपनी चुनावी ताकत मानती रही है। यादव समुदाय के बीच पार्टी का पारंपरिक आधार रहा है, जबकि मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन कई चुनावों में भाजपा के मुकाबले मजबूत विपक्षी विकल्प की तलाश से भी जुड़ा रहा है। लेकिन अब एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता ने इस समीकरण के भीतर नई बहस पैदा कर दी है। ओवैसी मुस्लिम समाज के स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व और अधिक प्रतिनिधित्व की मांग उठा रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या सपा अपना पुराना भरोसा कायम रख पाएगी या मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से की नई राजनीतिक पसंद उसके चुनावी गणित को प्रभावित करेगी?

सपा के लिए संजीवनी कैसे बना मुस्लिम समर्थन?

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का राजनीतिक झुकाव अलग-अलग दौर में बदलता रहा है। कांग्रेस के लंबे राजनीतिक प्रभुत्व के बाद मंडल-कमंडल की राजनीति, बसपा का उभार और समाजवादी पार्टी का विस्तार—इन सभी ने मुस्लिम मतदाताओं की पसंद को प्रभावित किया। समय के साथ सपा ने खुद को भाजपा के मुकाबले प्रमुख विपक्षी विकल्प के रूप में स्थापित किया। इससे मुस्लिम मतदाताओं के एक बड़े हिस्से का समर्थन पार्टी के साथ जुड़ता गया।

मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव के नेतृत्व तक सपा ने धर्मनिरपेक्ष राजनीति, सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यक हितों की पैरवी को अपनी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाया। पार्टी का तर्क रहा कि भाजपा को चुनौती देने के लिए विपक्षी मतों का एकजुट होना जरूरी है। मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से ने भी चुनावी मुकाबलों में इसी रणनीति को प्राथमिकता दी।

यही वह राजनीतिक आधार है, जिसने सपा के एमवाई समीकरण को लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखा। हालांकि, मुस्लिम मतदाताओं को किसी एक दल का स्थायी समर्थक मानना सही नहीं होगा। स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय समस्याएं, रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे उनके फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।

‘अब्दुल अब दरी नहीं बिछाएगा, चुनाव भी लड़ेगा’

ओवैसी की राजनीति का एक महत्वपूर्ण संदेश मुस्लिम समाज के स्वतंत्र नेतृत्व से जुड़ा है। उनकी पार्टी एआईएमआईएम का तर्क है कि मुस्लिम मतदाताओं से समर्थन मांगने वाले दलों को समुदाय के नेताओं और युवाओं को भी पर्याप्त राजनीतिक अवसर देना चाहिए। इस विचार के जरिए ओवैसी उस असंतोष को राजनीतिक आवाज देने की कोशिश करते हैं, जिसमें समर्थक होने और निर्णय लेने की स्थिति में होने के बीच अंतर महसूस किया जाता है।

ओवैसी का जोर इस बात पर है कि मुस्लिम समाज केवल दूसरे दलों को सत्ता तक पहुंचाने का माध्यम बनकर न रह जाए। उनकी राजनीति में अपने उम्मीदवार उतारने, विधानसभा तक पहुंचने और नीतिगत फैसलों में हिस्सेदारी हासिल करने का मुद्दा प्रमुख है। यही बात सपा के लिए चुनौती बन सकती है, क्योंकि यदि मुस्लिम मतदाताओं का कोई हिस्सा स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व को अवसर देने का फैसला करता है, तो कुछ सीटों पर चुनावी मुकाबला बदल सकता है।

हालांकि, राजनीतिक नारे और चुनावी वास्तविकता अलग-अलग चीजें हैं। ओवैसी की अपील कितने मतदाताओं को प्रभावित करेगी, यह उनके संगठन, उम्मीदवारों की लोकप्रियता और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसी तरह, यह भी तय नहीं है कि मुस्लिम मतदाता बड़े पैमाने पर सपा से दूरी बना लेंगे।

ओवैसी की एंट्री से सपा क्यों हुई सतर्क?

एआईएमआईएम उन क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशती रही है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे क्षेत्रों में यदि पार्टी मजबूत उम्मीदवार उतारती है और उसे उल्लेखनीय समर्थन मिलता है, तो सपा के उम्मीदवारों के सामने नई चुनौती पैदा हो सकती है। चुनावी मुकाबले में इसका असर सीट-दर-सीट अलग हो सकता है।

संभल से सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने मुस्लिम बहुल सीटों पर ओवैसी के प्रचार को लेकर सवाल उठाते हुए उनसे उन क्षेत्रों में भी सक्रियता दिखाने की बात कही, जहां भाजपा लगातार जीतती रही है। इस तरह की प्रतिक्रिया बताती है कि विपक्षी राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को लेकर प्रतिस्पर्धा का सवाल कितना संवेदनशील है।

सपा की चिंता का एक पहलू यह भी है कि विपक्षी वोटों में बंटवारा होने पर कुछ सीटों पर भाजपा को फायदा मिल सकता है। लेकिन यह निष्कर्ष हर सीट पर लागू नहीं किया जा सकता। किसी उम्मीदवार की मौजूदगी से चुनावी परिणाम पर क्या असर पड़ेगा, यह पिछले चुनाव में जीत-हार के अंतर, उम्मीदवारों की ताकत और अन्य दलों के प्रदर्शन को देखकर ही समझा जा सकता है।

आजम खां, बर्क परिवार और पूर्वांचल के मुस्लिम चेहरे

समाजवादी पार्टी में मुस्लिम नेताओं की भूमिका की चर्चा होती है तो रामपुर के आजम खां का नाम प्रमुखता से सामने आता है। लंबे समय तक वह पार्टी के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे। संभल के बर्क परिवार ने भी क्षेत्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई। पूर्वांचल में मुख्तार अंसारी परिवार और प्रयागराज क्षेत्र में अतीक अहमद का नाम भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है, हालांकि इन नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि और विवाद अलग-अलग रहे हैं।

इन उदाहरणों के आधार पर सपा की मुस्लिम नेतृत्व संबंधी नीति का मूल्यांकन किया जाता रहा है। पार्टी के समर्थक इसे मुस्लिम समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की कोशिश बताते हैं, जबकि आलोचक सवाल उठाते हैं कि प्रमुख चेहरों की मौजूदगी के बावजूद समुदाय के आम कार्यकर्ताओं और नई पीढ़ी को कितने अवसर मिले।

असल बहस केवल यह नहीं है कि पार्टी में कितने मुस्लिम नेता हैं। यह भी देखना होगा कि उन्हें टिकट वितरण, संगठनात्मक फैसलों और नीतिगत चर्चाओं में कितनी प्रभावी भूमिका मिलती है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल किसी समुदाय के चेहरे को आगे करना नहीं, बल्कि उसके मुद्दों को निर्णय प्रक्रिया में जगह देना भी है।

बाबरी मस्जिद विध्वंस से बना भरोसा, बदली राजनीति में नई कसौटी

समाजवादी पार्टी और मुस्लिम मतदाताओं के रिश्ते को समझने के लिए अयोध्या की राजनीति का उल्लेख भी जरूरी है। बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले मुलायम सिंह यादव की सरकार के दौरान कारसेवकों पर गोली चलाने की कार्रवाई ने उनकी राजनीतिक छवि को गहराई से प्रभावित किया। उनके समर्थकों ने इसे कानून-व्यवस्था और मस्जिद की सुरक्षा से जुड़ा फैसला बताया, जबकि इस कार्रवाई की आलोचना भी हुई।

इस घटनाक्रम ने मुस्लिम मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के बीच मुलायम सिंह यादव की स्वीकार्यता को मजबूत करने में भूमिका निभाई। सपा ने बाद के वर्षों में भी धर्मनिरपेक्ष राजनीति और अल्पसंख्यक हितों को अपनी पहचान से जोड़े रखा। लेकिन आज की राजनीति में केवल पुरानी घटनाओं और ऐतिहासिक भरोसे के सहारे समर्थन बनाए रखना आसान नहीं है। नई पीढ़ी रोजगार, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक हिस्सेदारी जैसे सवालों पर भी जवाब चाहती है।

2022 में सपा को मिला मुस्लिम समर्थन, लेकिन सत्ता रही दूर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में समाजवादी पार्टी ने 111 सीटों पर जीत हासिल की थी। सहयोगी दलों के साथ उसका प्रदर्शन पिछले चुनाव की तुलना में बेहतर रहा, लेकिन भाजपा ने 255 सीटें जीतकर सरकार बनाई। यह परिणाम बताता है कि सपा एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरी, मगर सत्ता हासिल करने के लिए उसका चुनावी गठजोड़ पर्याप्त नहीं रहा।

चुनावोत्तर सर्वेक्षणों और राजनीतिक विश्लेषणों में मुस्लिम मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के सपा गठबंधन की ओर झुकाव के संकेत मिले थे। हालांकि, मुस्लिम मतदाताओं के पार्टीवार वोट प्रतिशत के अनुमान अलग-अलग सर्वेक्षणों में भिन्न हो सकते हैं। इसलिए किसी अनुमान को आधिकारिक और सर्वमान्य आंकड़े के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

2022 के चुनाव में कानून-व्यवस्था, धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद, बुलडोजर कार्रवाई, सामाजिक न्याय और विपक्षी एकजुटता जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे। सपा ने इन मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेरा, जबकि भाजपा ने कानून-व्यवस्था और विकास को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया। इन मुद्दों ने अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में मतदाताओं की पसंद को प्रभावित किया, लेकिन पूरे परिणाम को किसी एक कारण से जोड़ना सही नहीं होगा।

2012 में सपा की जीत और मुस्लिम बहुल सीटों का समीकरण

वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। यह जीत उसके व्यापक सामाजिक गठजोड़ और चुनावी संगठन की सफलता मानी गई। मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन भी पार्टी की सफलता के महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल था।

मुस्लिम आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में सपा की सफलता को लेकर अक्सर आंकड़े उद्धृत किए जाते हैं। लेकिन किसी सीट पर मुस्लिम आबादी का अनुपात और वहां किसी पार्टी को मिलने वाले वोट दो अलग-अलग बातें हैं। उम्मीदवार की सामाजिक स्वीकार्यता, जातीय समीकरण, स्थानीय समस्याएं और मुकाबले में शामिल दलों की संख्या भी परिणाम तय करती है। इसलिए मुस्लिम बहुल सीटों के आंकड़ों की पुष्टि निर्वाचन क्षेत्रवार विश्वसनीय स्रोतों से करना जरूरी है।

राजभर का हमला और मुस्लिम हिस्सेदारी की बहस

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर भी अलग-अलग मौकों पर समाजवादी पार्टी पर मुस्लिम समाज को चुनावी समर्थन के लिए इस्तेमाल करने और पर्याप्त राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं देने के आरोप लगाते रहे हैं। इन आरोपों का राजनीतिक अर्थ यही है कि विपक्षी दलों के बीच मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने की प्रतिस्पर्धा तेज है।

सपा के समर्थक इस बहस को भाजपा के मुकाबले विपक्षी मतों की एकजुटता से जोड़ते हैं। उनका तर्क है कि अलग-अलग उम्मीदवारों के उतरने से कुछ सीटों पर विपक्षी वोट बंट सकते हैं। दूसरी ओर, स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व की पैरवी करने वाले लोग सवाल उठाते हैं कि यदि कोई समुदाय लगातार किसी दल को समर्थन देता है, तो उसके बदले उसे संगठन और सत्ता में कितनी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।

इसलिए ‘वोट देगा जहीर, मौज करेगा अहीर’ जैसे तंज को केवल चुनावी नारे के रूप में नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और राजनीतिक जवाबदेही की बहस के रूप में भी समझा जा सकता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि ऐसे नारों को किसी समुदाय के खिलाफ अपमानजनक सामान्यीकरण में न बदला जाए। चुनाव में हर मतदाता को अपनी पसंद तय करने का अधिकार है और किसी समुदाय का समर्थन किसी दल के लिए स्थायी गारंटी नहीं है।

क्या मुस्लिम वोटों में बंटवारा सपा को पड़ेगा भारी?

आगामी विधानसभा चुनाव में सपा के सामने सबसे बड़ा सवाल अपने समर्थकों का भरोसा बनाए रखने का होगा। यदि एआईएमआईएम कुछ सीटों पर प्रभावशाली प्रदर्शन करती है, तो वहां मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। लेकिन ओवैसी की मौजूदगी का अर्थ अपने आप सपा के वोटों में बड़ी गिरावट नहीं है। मतदाता स्थानीय परिस्थितियों और जीतने की संभावना को देखकर भी फैसला कर सकते हैं।

सपा को यह साबित करना होगा कि मुस्लिम समाज का समर्थन उसके लिए केवल चुनाव जीतने का साधन नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जनहित की जिम्मेदारी भी है। वहीं, एआईएमआईएम के सामने अपनी स्वतंत्र राजनीति को जमीनी संगठन, प्रभावी उम्मीदवारों और ठोस जनहित के मुद्दों में बदलने की चुनौती होगी। दोनों दलों की वास्तविक ताकत का पता चुनावी मैदान में ही चलेगा।

निष्कर्ष: अब सवाल केवल वोट का नहीं, हिस्सेदारी का भी है

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम-यादव समीकरण ने समाजवादी पार्टी को लंबे समय तक मजबूत राजनीतिक आधार दिया है। लेकिन बदलते समय में इस समीकरण को अटूट मानना उचित नहीं होगा। ओवैसी की राजनीति ने मुस्लिम नेतृत्व, टिकट वितरण और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को लेकर नई बहस खड़ी की है। सपा के लिए चुनौती केवल अपने पारंपरिक मतदाताओं को साथ बनाए रखने की नहीं, बल्कि उनके बीच उठ रहे प्रतिनिधित्व और जवाबदेही के सवालों का जवाब देने की भी है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुस्लिम मतदाता सपा के पुराने भरोसे को प्राथमिकता देते हैं, एआईएमआईएम को अवसर देते हैं या स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग फैसले करते हैं। इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में मुस्लिम वोटों का सवाल अब केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ नेतृत्व, हिस्सेदारी और राजनीतिक सम्मान की बहस भी जुड़ चुकी है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें