महिला सशक्तिकरण की अनदेखी: गौशालाओं के संचालन में स्वयं सहायता समूहों को मौका क्यों नहीं?

रिपोर्टर संजय सिंह राणा के साथ गौशाला में गौवंशों की तस्वीर, महिला सशक्तिकरण, स्वयं सहायता समूह और गौशाला संचालन विषयक जनगणदूत फीचर इमेज।

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✍️ संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

चित्रकूट। निराश्रित गौवंशों के संरक्षण और रखरखाव के लिए सरकार द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए विभिन्न ग्राम पंचायतों और ग्रामीण क्षेत्रों में गौशालाओं की स्थापना की गई है, ताकि बेसहारा पशुओं को सुरक्षित आश्रय मिल सके। लेकिन चित्रकूट में जमीनी स्तर पर कई गौशालाओं की स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। पशुओं के लिए पर्याप्त चारे, स्वच्छ पानी, चिकित्सा सुविधाओं और उचित देखभाल की कमी की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में गौशालाओं के संचालन की मौजूदा व्यवस्था और उसकी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

स्वयंसेवी संगठनों को प्राथमिकता पर उठे सवाल

चित्रकूट के ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना हुआ है कि गौशालाओं के संचालन की जिम्मेदारी लगातार कुछ स्वयंसेवी संगठनों को सौंपी जा रही है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि प्रभावशाली संस्थाओं को प्राथमिकता मिल रही है जबकि अन्य सक्षम समूहों को अवसर नहीं दिया जा रहा। कई स्थानों पर यह भी देखने को मिला है कि जिन संस्थाओं को संचालन की जिम्मेदारी दी गई, वहां गौवंशों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। पशुओं के स्वास्थ्य, पोषण और रखरखाव को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं।

गौवंशों की दुर्दशा चिंता का विषय

चित्रकूट में संचालित गौशालाओं का उद्देश्य केवल पशुओं को आश्रय देना नहीं बल्कि उनके संरक्षण और संवर्धन को सुनिश्चित करना भी है। इसके बावजूद कई स्थानों पर पशुओं को पर्याप्त चारा नहीं मिल पाने, समय पर उपचार न होने और रखरखाव में लापरवाही की खबरें सामने आती रही हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि गौशालाओं का नियमित निरीक्षण और स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

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स्वयं सहायता समूहों को जिम्मेदारी देने की मांग

चित्रकूट में महिला स्वयं सहायता समूह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत बड़ी संख्या में महिलाएं विभिन्न आर्थिक गतिविधियों से जुड़कर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में यह मांग उठ रही है कि गौशालाओं के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी स्वयंसेवी संगठनों के बजाय महिला स्वयं सहायता समूहों को सौंपी जाए। इससे न केवल महिलाओं को रोजगार मिलेगा बल्कि पशुओं की बेहतर देखभाल भी सुनिश्चित हो सकेगी।

महिला सशक्तिकरण से जुड़े हैं बड़े अवसर

विशेषज्ञों का मानना है कि चित्रकूट की ग्रामीण महिलाएं पशुपालन और पशु देखभाल का व्यावहारिक अनुभव रखती हैं। यदि उन्हें गौशालाओं के संचालन में शामिल किया जाए तो यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। इससे महिलाओं की आय बढ़ेगी, परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को नई गति मिलेगी।

विभागीय निगरानी की आवश्यकता

चित्रकूट में गौशालाओं की निगरानी में पशुपालन विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि कहीं भी लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो उसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि चयन प्रक्रिया, संचालन और निरीक्षण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की पक्षपातपूर्ण व्यवस्था की आशंका समाप्त हो सके।

जागरूकता अभियान करेगा जमीनी पड़ताल

चित्रकूट के ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय सामाजिक संगठनों ने गौशालाओं की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करने की तैयारी शुरू कर दी है। “चलो गांव की ओर” जागरूकता अभियान के तहत विभिन्न गौशालाओं का निरीक्षण कर वहां की व्यवस्थाओं, पशुओं की स्थिति और संचालन प्रक्रिया का आकलन किया जाएगा। अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि कहीं भी अनियमितता या लापरवाही मिलती है तो उसे प्रशासन और शासन के समक्ष उठाया जाएगा।

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गौसंरक्षण और आत्मनिर्भर भारत के लिए जरूरी बदलाव

चित्रकूट की गौशालाएं केवल पशु संरक्षण का केंद्र नहीं बल्कि ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं। यदि संचालन व्यवस्था में महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी बढ़ाई जाए तो इससे गौवंश संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर भारत जैसे तीन बड़े उद्देश्यों को एक साथ मजबूती मिल सकती है। इसलिए समय की मांग है कि गौशाला संचालन की वर्तमान व्यवस्था की समीक्षा कर पारदर्शी और जवाबदेह मॉडल विकसित किया जाए।


क्या चित्रकूट में स्वयं सहायता समूह गौशालाओं का बेहतर संचालन कर सकते हैं?

ग्रामीण महिलाओं को पशुपालन का व्यावहारिक अनुभव होता है। ऐसे में स्वयं सहायता समूहों को जिम्मेदारी मिलने पर गौशाला संचालन अधिक जवाबदेह और व्यवस्थित हो सकता है।

गौशालाओं की बदहाली के मुख्य कारण क्या हैं?

अपर्याप्त निगरानी, संसाधनों की कमी, जवाबदेही का अभाव और संचालन में लापरवाही प्रमुख कारण माने जाते हैं।

महिला सशक्तिकरण और गौशाला संचालन का क्या संबंध है?

गौशाला संचालन महिलाओं को रोजगार, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक भागीदारी का अवसर प्रदान कर सकता है।

जागरूकता अभियान का उद्देश्य क्या है?

चित्रकूट में गौशालाओं की वास्तविक स्थिति का आकलन करना और अनियमितताओं को प्रशासन के सामने लाना इस अभियान का मुख्य उद्देश्य है।

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Author: यायावर

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